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Showing posts from August, 2015

बिपन चन्द्र: एक श्रद्धांजलि

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राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट अपने महान विचारक और पथ-प्रदर्शक को उनकी पहली पुण्यतिथि पर नमन करता है. उनकी तकरीबन आधी सदी की अकादमिक मेहनत का नतीज़ा है कि आज़ादी की लड़ाई को इतनी समग्रता के साथ समझा जा सका. फ्रंट के लिए इससे ज्यादा उत्साहवर्धक बात और क्या हो सकती है कि कल हमारे मार्गदर्शक प्रो० आदित्य मुख़र्जी ने कहा कि "अगर आज बिपन जीवित होते तो फ्रंट की स्थापना से बहुत खुद होते क्योंकि वो खुद हमेशा इसी तरह से काम किये जाने के हिमायती थे". 

शेर-ए-मैसूर ‘टीपू सुल्तान’ के इतिहास को मनमाने ढंग से तोडा-मरोडा गया है:प्रो.बी.एन.पाण्डेय

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[अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान पर राज करने के लिए “बांटो और राज करो” की नीति अपनाई थी, यह सब जानते हैं. लेकिन यह बांटने का खेल कैसे- कैसे खेला गया इसका बहुत सटीक उदाहरण यह आर्टिकल है. इसलिए जो कुछ लिखा है उस पर कभी यकीन न करें. हमारे आस- पास बहुत कुछ ऐसा नॉनसेन्स है, जिसका हिस्टोरिकल कॉमनसेन्स से कुछ भी लेना- देना नहीं है.]   

Role of Muslims in the Freedom Struggle

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Affan Nomani 
[Affan Nomani is a young research scholar at JNUTA. He has also been publishing in many leading newspapers such as The Deccan Herald for last few years. His beauty is he thinks beyond his age and writes with rare maturity. He lives in Hyderabad, a bastion of Majlis-i-Ittehadul Muslimeen, and writes against Owaisi brothers.We always believe that there is no need to be defensive in front of communal forces. Rather we should loudly claim our legacy of the freedom struggle and expose the collaborators of the British empire. In this article, Nomani does the same...]
The patriotism of Indian Muslims is being questioned today. Those who question Muslim's love for this country, they don't know the Indian history and the role of Indian Muslim freedom fighters.
I studied the book Hardly peter 1971 , Partners in Freedom  and True Muslims: Thought of some Muslim scholars in British India , 1912-47 and Composite Nationalism and Islam which was written by Moulana Hussain Ahmed …

Should Britain Pay Reparations to India?

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[It was former Minister of State for External Affairs Shashi Tharoor who kick-started the debate by saying Britain owes India reparations for the economic exploitation that the Raj carried out during its rule. The 'Empire' had struck back saying Britain's legacy of its colonial rule was a 'unified' India, a secular democracy and the notion of equality. Are the Empire’s apologists engaging in chicanery and half-truths? What about the systematic destruction of India's cottage industry and transforming India into a British 'market'? Did British imperialism sustain itself through the vast resources of its colony? Join NDTV for this special Independence Day debate.]


This show must be watched to understand the logic of the empire and its counter by Prof. Aditya Mukherjee, a celebrated historian of modern Indian history. What Tharoor had earlier said in his famous speech at Oxford was originally taken from writings of great historian Bipan Chandra and his stude…

भारत में डंका

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मित्रों, ‘स्वाधीन’ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी यादों को स्मृति में बनाये रखने और उससे सीख लेने को प्रेरित करता रहा है. इस बात को ध्यान में रखकर उसने अपने पाठकों के लिए हमेशा शब्दों का पिटारा पेश किया है.69वें स्वतंत्रता दिवसके उपलक्ष्य में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े गीतों की एक सीरीज पेश की जा रही है. इस कड़ी में आजचौथे दिन मारकंडे शायर कागीत‘भारत में डंका’ स्वाधीन के पाठकों के लिए पेश है...

मारकंडे शायर
भारत में डंका आजादी का बजवा दिया गांधी बाबा ने. सत्याग्रह का झंडा दुनियां में फहरा दिया गांधी बाबा ने..1.. सर पर गठरी थी गुलामी की, अति दूर थी हमसे आजादी. बन कर प्रह्लाद हमें सत पथ दिखला दिया गांधी बाबा ने..2.. घुस गये विदेशी घर में थे, सब माल लूट कर ले जाते. सद शुक्र हाथ सोतों का पकड़ बिठला दिया गांधी बाबा ने..3.. सत्तर करोड़ धन जाता था प्रतिवर्ष विदेशी कपड़ों से. तब मंत्र विदेशी बहिष्कार, सिखला दिया गांधी बाबा ने..4.. दे ज्ञान हमें चरखे का पुनि खद्दर का बाना पहना कर. दिल गोरे चमड़े वालों का दहला दिया गांधी बाबा ने..5.. निश्चयहिं दिवाला निकलेगा मेनिचस्टर लंकाशायर का. गर उस पथ पर हम चलें सभी, जो बत…

माता के सर पर ताज रहे

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मित्रों, ‘स्वाधीन’ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी यादों को स्मृति में बनाये रखने और उससे सीख लेने को प्रेरित करता रहा है. इस बात को ध्यान में रखकर उसने अपने पाठकों के लिए हमेशा शब्दों का पिटारा पेश किया है. 69वें स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े गीतों की एक सीरीज पेश की जा रही है. इस कड़ी में आज तीसरे दिन माधव शुक्ल का गीत ‘माता के सर पर ताज रहे’ स्वाधीन के पाठकों के लिए पेश है...

उठो सोने वालो

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उठो सोने वालो वंशीधर शुक्ल
उठो सोने वालो सबेरा हुआ है वतन के फकीरों का फेरा हुआ है जगो तो, निराशा निशा खो रही है सुनहरी सुपूरब दिशा हो रही है चलो मोह की कालिमा धो रही है न अब कौम कोई पड़ी सो रही है तुम्हें किस लिए मोह घेरा हुआ है उठो...

खींचो कमान खींचो

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मित्रों, ‘स्वाधीन’ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी यादों को स्मृति में बनाये रखने और उससे सीख लेने को प्रेरित करता रहा है. इस बात को ध्यान में रखकर उसने अपने पाठकों के लिए हमेशा शब्दों का पिटारा पेश किया है. अब जब स्वतंत्रता दिवस को तीन दिन शेष हैं तो इस मौके पर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े गीतों की एक सीरीज पेश की जा रही है. इस कड़ी में आज रामचन्द्र द्वेदी ‘प्रदीप’ का गीत ‘स्वाधीन’ के पाठकों के लिए पेश है. गीत में इस्तेमाल की गई पंक्ति ‘खींचो कमान खींचो’ को आज के दौर में राष्ट्रीय आंदोलन पर हमला करने वालों को जवाब देने के तौर पर लिया जाये, जिसमें तीर-कमान हिंसक हथियार नहीं बल्कि अहिंसक प्रतिरोध का प्रतीक हैं...
रामचन्द्र द्वेदी ‘प्रदीप’
खींचो कमान खींचो ओ भारत माँ के नौजवान खींचो आज निशाना चूक न जाना पिछली गल्ती मत दोहराना वरना फिर होगा पछताना जगह-जगह तूफान बवंडर आँखें मत मीचो खींचो कमान खींचो जो भीख मांगने से दर दर आजादी मिलती हो घर घर लानत ऐसी आजादी पर ओ वीरों की संतान देश को तीरों से सींचो खींचो कमान खींचो.