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Showing posts from August, 2017

ganga aaye kahan se

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गंगा आये कहाँ से,  गंगा जाये कहाँ रे  आये कहाँ से, जाये कहाँ रे  लहराये पानी में जैसे धूप-छाँव रे  गंगा आये कहाँ से,  गंगा जाये कहाँ रे  लहराये पानी में जैसे धूप-छाँव रे 
रात कारी दिन उजियारा  मिल गये दोनों साये  साँझ ने देखो रंग रुप के कैसे भेद मिटाये  लहराये पानी में जैसे धूप-छाँव रे ... 
काँच कोई माटी कोई रंग-बिरंगे प्याले  प्यास लगे तो एक बराबर जिस में पानी डाले  लहराये पानी में जैसे धूप-छाँव रे ...
नाम कोई बोली कोई  लाखों रूप और चेहरे  खोल के देखो प्यार की आँखें सब तेरे सब मेरे  लहराये पानी में जैसे धूप-छाँव रे ...

Interview: Irfan Habib Debunks RSS’s Nationalism and Their Attempts to Rewrite History

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Interview: Irfan Habib Debunks RSS’s Nationalism and Their Attempts to Rewrite History BY AJOY ASHIRWAD MAHAPRASHASTA ON 09/10/2016
“What RSS promotes is fantasy not history….There is nothing common between history and such mythology.”

Irfan Habib. Credit: Amber Habib
Many prominent scholars have come forward in the last two years to condemn the Bharatiya Janata Party (BJP)-led Union government for steering the Sangh parivar’s Hindutva agenda in autonomous public institutions. They have repeatedly pointed out that attack on independent thinkers and thoughts have increased under the BJP regime and this may portend an all-round attack on reason, free speech and scientific temper in society.
A life-long leftist and renowned historian, Irfan Habib, has been at the forefront of an intellectual resistance towards the Sangh parivar. The octogenarian historian has constantly called out BJP’s attempts to communalise history. Presently, professor emeritus at the Aligarh Muslim University (AMU)…

गाँधी जैसा भारत चाहते थे

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Freedom Fighters: “The Very Idea of India is Under Challenge”

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Freedom Fighters: “The Very Idea of India is Under Challenge”


To mark 70 years of independence and 75 years of the Quit India Movement, The Wire spoke to four freedom fighters from Maharashtra. They recall their experiences of the freedom struggle and express anguish at India's current political scenario.

"If I live, I want to fight RSS. But I will also accept Gandhiji. In this situation in which we are, we should not treat RSS as untouchable. It should be possible for us to tell them that if you pursue what you are doing, you will destroy the country."- GG Parikh.
https://www.youtube.com/watch?v=_A60lHbYswY, 20 August 2017.

Seventy Years After Independence, Remembering the Titans Who Got Us There

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BY SUCHETA MAHAJAN ON 15/08/2017
Today there is an attempt at portraying the Congress party – and its leaders during independence and Partition – in very different hues from the inclusiveness, tolerance, democracy and secularism it upheld in very trying times.
Mahatma Gandhi with Jawaharlal Nehru (L) and Sardar Vallabhai Patel. Credit: Wikimedia Commons
Seventy years after 1947, what does August 15 symbolise for us? Independence from colonial rule, accompanied by a tragic Partition. When India turned 50, Ashis Nandy asked why the best creative minds had maintained an “almost cultivated silence” on Partition. He was mirroring the sentiment that Partition has somehow been ignored in the concern with the legacy of freedom. Today, 70 years on, I wonder why there is a preoccupation with Partition, to the exclusion of independence. All the commemoration is around Partition. This week, in Delhi alone, there are many film festivals on Partition, the launch of a new online archive collecting …

अगर तिरंगा फहराना ही देशभक्ति है तो संघ पंद्रह साल पहले ही देशभक्त हुआ है

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सौरभ बाजपेयी 
द वायर, 14/08/2017

आज़ादी के 70 साल: क्या 2002 के पहले तिरंगा भारतीय राष्ट्र का राष्ट्रध्वज नहीं था या फिर आरएसएस खुद अपनी आज की कसौटी पर कहें तो देशभक्त नहीं था?

15 अगस्त को मदरसों पर तिरंगा फहराने संबंधी योगीजी का हालिया आदेश सिर-आंखों पर है. उन्हें पूरी तसल्ली हो जाए इसलिए तिरंगा फहराने की वीडियो रिकॉर्डिंग कराने में भी हमें कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए.
आखिर देशभक्ति मापने का जो पैमाना उन्होंने तैयार किया है उस पर खरा उतरना हमारा फर्ज है. लेकिन इस प्राथमिक सहमति के बाद क्या हमें योगीजी सहित सभी नवदेशभक्तों को प्रसिद्ध नागपुर केस नंबर 176 की याद दिलाने की इजाजत है? आखिर जब पैमाना बनाया ही गया है तो क्यों न हम सब उस पर खड़े होकर अपनी-अपनी देशभक्ति माप लें?
अगस्त 2013 को नागपुर की एक निचली अदालत ने वर्ष 2001 के एक मामले में दोषी तीन आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया था. इन तीनों आरोपियों बाबा मेंढे, रमेश कलम्बे और दिलीप चटवानी का जुर्म तथाकथित रूप से सिर्फ इतना था कि वे 26 जनवरी 2001 को नागपुर के रेशमीबाग स्थित आरएसएस मुख्यालय में घुसकर गणतंत्र दिवस पर तिरंगा झंडा फहराने के प्र…

महात्मा की ऐतिहासिक लाठी

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ललन कुमार राय
भारतवर्ष के इतिहास के पन्नों को उलटने पर आपको एक चित्र के दर्शन अवश्य मिलेंगे । बूढापे को प्रकट करते हुए उनका वह दुबला-पतला शरीर, माथे पर सुंदर घने केशों का अभाव है, परंतु मूँछे हैं । चश्मा भी उन्होंने पहन रखा है । मात्र एक धोती से उनका तन ढका हुआ है । उनकी कमर में एक गोलाकार घडी भी लटकी हुई है परन्तु उनका मुस्कराता हुआ चेहरा जिसे देखकर ही लगता है कि यह किसी तपस्वी की ही तस्वीर है । उनके हाथ मे एक लाठी भी है, जो न ही अधिक लंबी और न ही अधिक मोटी है, जिसे एक हाथ से ही सुविधापूर्वक अच्छी तरह पकड़ा न जा सके । परंतु आप उस लाठी की तुलना किसी चरवाहे की लाठी या लठैत की लाठी के साथ कभी मत कीजियेगा और न ही यह किसी अंधे की ही लाठी है, बल्कि यह लाठी है एक महात्मा की, जिन्होंने हमें आजादी दिलाई है ।
महात्मा गांधी ने जब अपनी अहिंसात्मक विजययात्रा प्रारंभ की थी तब यह लाठी उनके साथ गांडीव की भांति ही जयघोष करते हुए नये इतिहास के नींव पर कदम बढा रही थी । उस लाठी ने अपना समय कभी दक्षिण अफ्रीका में बिताया है तो कभी इंग्लैंड की सैर की है, जहाँ-जहाँ भी वह लाठी गई वहाँ-वहाँ अपनी भारतीय पहचान …

1942 में इसी समय गांधी की अपनों से ही हुई यह बहस बताती है कि हमें आजादी किन मूल्यों पर मिली है

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उस समय राजगोपालाचारी महात्मा गांधी की खुली आलोचना कर रहे थे और गांधी जी उनका विरोध करने के साथ-साथ पंडित नेहरू से भी बहस कर रहे थे.

09 अगस्त 2017 अपूर्वानंद

आज अगस्त क्रांति दिवस है. अगस्त, 1942 के पहले हफ्ते में तब की बंबई में हुई कांग्रेस की कार्य समिति की बैठक ने वह प्रस्ताव पारित किया था जिसे ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव के नाम से जाना गया. नौ अगस्त से इस आंदोलन की शुरुआत हो गई.
लेकिन इस प्रस्ताव तक पहुंचना और उस पर कांग्रेस में एकमत कायम करना आसान न था जैसा आम तौर पर आज समझा जाता है. इसके पीछे एक लंबी तैयारी और आपसी विचार विमर्श और बहस-मुबाहिसा का दौर था.
यह प्रस्ताव तब लिया जा रहा था जब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था. फासिस्ट जर्मनी के साथ-साथ जापान के आक्रामक विस्तार ने युद्ध को भारत की चौखट पर पहुंचा दिया था. खतरा पैदा हो गया था कि जापान भारत पर हमला कर सकता है और उस पर कब्जा भी कर सकता है. सुभाषचंद्र बोस पहले ही हिटलर और जापान के तब के प्रधानमंत्री जनरल तोजो से समझौता कर चुके थे कि भारत की आज़ादी के लिए वे इनका सहयोग लेंगे. उनके कारण भारत के लोगों में जापान के प्रति एक प्रकार की सहानुभूत…

बड़वानी राजघाट को तोड़ने के विरुद्ध प्रार्थना-प्रदर्शन

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मध्य प्रदेश स्थित गांधी स्मारक बड़वानी राजघाट को दिनांक २७ जुलाई २०१७ को आधी रात में प्रशासन ने बुलडोजर चलाकर नेस्तनाबूद कर दिया. इस घटना के विरोध में राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट, खुदाई खिदमतगार और जन आन्दोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (NAPM) सहित तमाम बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता ३० जुलाई को राजघाट के सामने समता स्थल पर एकत्र हुए. 
इस मौके पर प्रख्यात हिंदी आलोचक प्रो० पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि भले ही यह किसी सरकारी आदेश के तहत न किया गया हो लेकिन आज के माहौल में अधिकारियों को यह पता है कि गाँधीजी के साथ ऐसा सलूक किया जा सकता है. साथ ही उन्होनें इस बात की चेतावनी भी दी कि आशावादी होना एक चीज है और परिस्थितियों का अंदाजा न होना एकदम अलग चीज. उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास और रहीम की दोस्ती से जुदा एक किस्सा सुनाते हुए बताया कि साम्प्रदायिक जहर इतनी बारीकी से लोगों के जेहन में भरा जा रहा है कि सोशल मीडिया पर यह कहानी तुलसी और रहीम की नहीं, तुलसी और हरिश्चंद्र की बताकर प्रचारित की जा रही है. 






NAPM के चर्चित नेता सुनीलम जो कि नर्मदा बचाओ आन्दोलन से जुड़े हुए हैं ने बताया कि यह पूरा मामला पूंजीप…