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महात्मा गांधी और राष्ट्रवाद की संकल्पना

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प्रभा मजुमदार 

इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी भी राष्ट्र का निर्माण एक सतत प्रक्रिया है और इसकी गति, दिशा और राह को निर्धारित करने के लिए, उस समाज और देश के नेता, विचारक तथा सामान्य नागरिकों की राष्ट्रीयता की अवधारणा बड़ा महत्व रखती है। यह अवधारणा, धार्मिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक चेतना के परिपेक्ष्य में, विभिन्न घटकों- अवययों के विमर्श, विश्लेषण-संशोधनों से गुजरते हुए, एक लंबे वैचारिक आंदोलन के दौरान लगातार परिमार्जित होती है।   

1857 की पहले आंदोलन में जन समुदाय की एक विशाल भागीदारी संगठित रूप में उभर कर आई थी जिसमें अलग अलग धर्मों, समुदायों, भाषाई क्षेत्रों के लोगों ने स्वाधीनता का स्वप्न देखा था और हिंदू-मुसलमानों ने मिलकर साम्राज्यवाद को चुनौती दे डाली थी। अंग्रेजों ने इन दोनों धर्मावलंबियों के आचार-व्यवहार-मान्यताओं-विश्वासों में अन्तर जान लिया था और अपनी सत्ता की निरंतरता के लिए , एक दूसरे के विरोध में उनका प्रयोग भी। 
भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर गांधी जी के उभरने से पहले ही बंगाल का विभाजन हो चुका था और परस्पर अविश्वास, नफरत की खाई काफी चौड़ी हो चुकी थी, जिसके और फैलने-गहराने…