8 May 2018

भारत विभाजन और गाँधी-नेहरु-पटेल व अम्बेडकर-जिन्ना-सावरकर

सुधांशु द्विवेदी

विभाजन का मूल कारण तो निःसंदेह एक ही था "हिन्दू –मुस्लिम अलगाव की अमिट भावना". हालांकि यह भावना सदियों पुरानी थी पर 1857 के बाद अंग्रेजों का एक ही मकसद था भारतीय लोगों में फूट डालकर अपने शासन को मजबूत करना. इसके लिये उन्होने मुस्लिमों , सिखों , दलितों , द्रविडों-- सबको अलग अलग भड़काये रखा. अब सवाल सिर्फ यह है कि वे कौन भारतीय लोग थे जो इस अलगाव को और बढ़ा रहे थे? वे कौन थे जो बस तटस्थ होने का मज़ा ले रहे थे? और वे कौन थे जिन्होंने इस अलगाव को ख़त्म करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया ?

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हम इतिहास का तटस्थ मूल्यांकन करें तो पाएंगे कि गाँधी , नेहरु , पटेल , मौलाना आज़ाद , खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे लोगों ने अंतिम समय तक अंग्रेजों की साजिश के विरुद्ध संघर्ष किया और जब अनेक विभाजनों की स्थिति बन गई तभी विवशता में विभाजन को स्वीकार किया. मौलाना और सीमान्त गाँधी ने तो उसे अंत तक स्वीकार नहीं किया. जबकि सावरकर और जिन्ना यह मानते रहे कि हिन्दू हित और मुस्लिम हित अलग चीजें हैं और वे विभाजन पर जोर देते रहे. विभाजन का समर्थन डॉ अम्बेडकर ने भी किया पर इस समर्थन की वजह स्थायी शांति की तलाश ही थी न कि कोई अन्य राजनीतिक मंतव्य.

गाँधी , नेहरु और पटेल में गाँधी पूरी तरह से विभाजन के खिलाफ थे तो सरदार पटेल 1946 तक विभाजन के मुखर समर्थक हो चुके थे. क्योंकि वे शेष भारत को संयुक्त रखने के लिए ऐसा करना ज़रूरी मानने लगे थे. जबकि नेहरु को अंत तक यही भरोसा था कि जिन्ना सिर्फ मुसलमानों के लिए बेहतर सौदे बाज़ी के लिए पाकिस्तान का शिगूफा छोड़ रहे हैं और अंततः अपना बेहतर हिस्सा लेकर शांत हो जायेंगे. पर यहाँ नेहरु का अनुमान गलत निकला. जिन्ना अन्ततः ज्यादा से ज्यादा आक्रामक रुख अपनाते गए जो अपने चरम रूप में सीधी कार्यवाही के रूप में आया . उनके मुकाबले गाँधी-नेहरु के मेल मिलाप के प्रयास बेहद कमजोर साबित हुए. 

विभाजन को लेकर कुछ प्रश्न कुछ भ्रान्तियाँ फैली हुई हैं उनका एक एक करके उत्तर दिया जा रहा है –

१) क्या गांधीजी विभाजन के लिए जिम्मेदार थे ?
यह संघियों द्वारा फैलाया गया सबसे बड़ा ऐतिहासिक झूठ है ताकि भारत विभाजन हेतु किये गए संघी धतकरमों पर पर्दा पड़ जाये ! विभाजन मेरी लाश पर होगा-- यह गाँधी जी का संकल्प था पर कांग्रेस के दक्षिणपंथी खेमे को अंततः गाँधी के लाश बन जाने की कोई चिंता न थी . वे विभाजन पर दृढ़ थे . इसलिए मजबूरी में अकेला पड़ जाने की वजह से गाँधी को विभाजन की बात विवशता में माननी पड़ी !

लिखित इतिहास का अध्ययन करने से पता चलता है कि बडी चालाकी से इसमें तथ्यों के साथ छेडखानी की गई है। उन दिनों चल रही उग्र एवं पतनशील तथा अव्यवस्थित राजनीति के कारण गांधी बहुत सक्रिय हो गए थे। देश के विभाजन के प्रस्ताव और उसके विरुद्ध हुई हिंसके प्रतिक्रिया ने तनाव पैदा कर दी थी जिसके कारण मानवीय इतिहास में दर्दनाक पृथकतावादी हत्याएँ हुई! कट्टर मुसलमानों की नजर में गांधी हिंदू थे जिन्होंने धार्मिक/सांप्रदायिक आधार पर पाकिस्तान के निर्माण का विरोध किया था। कट्टर हिंदुओं की नजर में वे हिंदुओं पर हुए अत्याचार का बदला लेने में बाधक थे। गोडसे इसी अतिवादी सोच की उपज था।

गांधी की हत्या दशकों से योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा मनःस्थिति में परिवर्तनो का परिणाम थी। कट्टरपंथी हिंदुओं के फलने-फुलने में गांधी बाधक थे और समय के साथ यह भावना पागलपन में बदल गई। वर्ष 1934 से लेकर लगातार 14 वर्ष़ों में गांधी पर छह बार प्राणघातक हमले हुए। गोडसे द्वारा 30 जनवरी 1948 को किया गया हमला सफल रहा। अन्य पाँच हमलों का समय है जुलाई 1934, जुलाई एवं सितंबर 1944, सितंबर 1946 और 20 जनवरी 1948। गोडसे पूर्ववर्ती दो हमलों में शामिल था। वर्ष 1934, 1944 एवं 1946 के असफल हमले जब हुए तब पाकिस्तान का निर्माण और उसे 55 करोड रुपये दिये जाने का प्रस्ताव अस्तित्व में नहीं थे। इसकी साजिश बहुत पहले ही रची गई थी। 

एक सभ्य समाज में मतभेदों का निराकरण खुले एवं स्पष्ट विचार-विमर्श के लोकतांत्रिक तरीकों से जनमत जागृति द्वारा किया जाता है। गांधी हमेशा इसके पक्षधर थे। गांधी ने बातचीत के लिए गोडसे को बुलाया था, पर इस अवसर का लाभ उठाने के लिए वह आगे नहीं आया। यह स्पष्ट करता है कि गोडसे का, मतभेदों को लोकतांत्रिक तरीके से निराकरण करने में, विश्वास का अभाव था (यानी विश्वास नहीं था)। ऐसे संकुचित मानसिकता के लोग अपने विरोधी को खत्म कर डालते हैं।

हिंदू मानसिकता भी पाकिस्तान के निर्माण की उतनी ही जिम्मेदार है जितना कि मुस्लिम कट्टरता। कट्टरवादी हिंदुओं ने मुसलमानों को `मलेच्छ` कहकर हेय दृष्टि से देखा और यह दृढ़विश्वास व्यक्त किया कि मुसलमानों के साथ उनका सह-अस्तित्व असंभव है। आपसी अविश्वास एवं आरोप प्रत्यारोप ने दोनों संप्रदायों के कट्टरपंथियों को बढावा दिया कि वे हिंदू एवं मुस्लिम दोनों की अलग राष्ट्रीयता बताएँ। इससे मुस्लिम लीग की इस मांग को बल मिला कि सांप्रदायिक प्रश्न का यही हल है। दोनों तरफ के लोगों के निहितार्थ़ों ने अलगाववादी मानसिकता को बढावा दिया और `नफरत` को उन्होंने बडी चालाकी से जायज बताते हुए इतिहास के तथ्यों से खिलवाड किया। यह गंभीर मामला है उस देश के लिए जिसकी सोच से आज भी यह प्रश्न गायब नहीं हुआ।

शायर इकबाल, जिन्होंने प्रसिद्ध गीत `सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा` लिखा है, पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने 1930 में अलग देश के सिद्धांत को जन्म दिया। कहने की जरूरत नहीं है कि इस मनःस्थिति को हिंदू अतिवादियों ने ही मजबूत किया था। वर्ष 1937 में अहमदाबाद में हिंदू महासभा का खुला सत्र आयोजित हुआ जिसमें वीर सावरकर ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा `भारत एक देश आज नहीं समझा जा सकता यहाँ दो अलग-अलग राष्ट्र मुख्य रूप से हैं - एक हिंदू और दूसरा मुस्लिम (स्वातंत्र्यवीर सावरकर, खण्ड 6, पेज 296, महाराष्ट्र प्रांतीय हिंदू महासभा, पुणे) वर्ष 1945 में, उन्होंने कहा था - मेरा श्री जिन्ना से द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत से कोई विवाद नहीं है। हम, हिंदू स्वयं एक देश हैं और यह ऐतिहासिक तथ्य है कि हिंदू और मुस्लिम दो देश हैं (इंडियन एजुकेशनल रजिस्ट्रार 1943, खण्ड 2, पेज 10) यह अलगाववादी और असहमत अस्तित्व की मानसिकता दोनों पक्षों की थी जिससे पाकिस्तान के निर्माण को बल मिला।

इस मानसिकता के ठीक विपरीत , गांधी अपने जीवन पर्यंत इन पर दृढ़तापूर्वक जोर देते रहे कि - ईश्वर एक है, सभी धर्म़ों का सम्मान करो, सभी मनुष्य समान हैं और अहिंसा न केवल विचार बल्कि संभाषण और आचरण में भी। उनकी दैनिक प्रार्थनाओं में सूक्तियां, धार्मिक गीत (भजन) तथा विभिन्न धर्मग्रंथों का पाठ होता था। उनमें विभिन्न जातियों के लोग भाग लेते थे। अपनी मृत्यु के दिन तक गांधी का दृष्टिकोण यह था कि राष्ट्रीयता किसी भी व्यक्ति के निजी धार्मिक विचार से प्रभावित नहीं होती। अपने जीवन में अनेक बार अपनी जान को जोखिम में डालकर हिंदुओं तथा मुसलमानों में एकता के लिए काम किया। उन पर देश के विभाजन का आरोप लगाया जाता है जो गलत है। उन्होंने कहा था वे देश का विभाजन स्वीकारने के बदले जल्दी मृत्यु को स्वीकारेंगे। उनका जीवन खुली किताब की तरह है, इस संबंध में तर्क की आवश्यकता नहीं है।

गांधी के नेतृत्व में रचनात्मक कार्य़ों के जरिए सांप्रदायिक एकता ने कांग्रेस के कार्यकमों में महत्वपूर्ण स्थान पाया। राष्ट्रीय स्तर के मुस्लिम नेता एवं बुद्धिजीवी,मसलन; अब्दुल गफ्फार खान, मौलाना आजाद, डॉ. अंसारी हाकिम अजमल खान, बदरूद्दीन तैयबजी, यहाँ तक कि मो. जिन्ना कांग्रेस में पनपे। यह स्वाभाविक ही था कि कांग्रेस देश के विभाजन का प्रस्ताव नहीं मानती लेकिन कुछ हिंदुओं और मुसलमानों की उत्तेजना ने देश में अफरातफरी और कानून-व्यवस्था का संकट पैदा कर दिया। सिंध, पंजाब, बलूचिस्तान पूर्वोत्तर प्रांतों और बंगाल में कानून-व्यवस्था का संकट गहरा गया। जिन्ना ने अडियल रुख अपना लिया। लॉर्ड माउंटबेटन ब्रिटिश कैबिनेट द्वारा तय समय सीमा से बंधे थे और सभी प्रश्नों का त्वरित हल चाहते थे। फलतः जिन्ना की जिद से पाकिस्तान बना।

विभाजन एकमात्र हल माना गया। वर्ष 1946 में हुए राष्ट्रीय चुनाव में मुस्लिम लीग को 90 प्रतिशत सीटें मिली । ऐसे में कांग्रेस के लिए अपनी बात रखना मुश्किल हो रहा था। गांधी ने 5 अप्रैल 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन को कहा कि अगर जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने पर देश का विभाजन नहीं होगा तो वे अंग्रेजों की यह इच्छा स्वीकार लेंगे। लेकिन दूसरी तरफ लॉर्ड माउंटबेटन कांग्रेस को देश का विभाजन के लिए मनाने में सफल रहे। गांधी को इसके बारे में अंधेरे में रखा गया। उनको जब इसका पता चला तो वे हैरान हो गए। उनके पास एकमात्र उपाय आमरण अनशन था। आत्मचिंतन के बाद वे इस नतीजे पर पहुँचे कि इससे हालात और बिगडेंगे तथा कांग्रेस एवं पूरा देश शर्मिंदा होगा।

यह कहा जाता है कि जिन्ना पाकिस्तान के सबसे बडे पैरोकार थे और लॉर्ड माउंटबेटन की प्रत्यक्ष या परोक्ष कृति से वे अपने लक्ष्य में सफल रहे। तब दोनों को अपना निशाना बनाने के बदले गोडसे ने सिर्फ गांधी की हत्या क्यों की जो अपने जीवन के अंतिम दिन तक, कांग्रेस द्वारा विभाजन का प्रस्ताव माने जाने का विरोध कर रहे थे ? कांग्रेस ने 3 जून 1947 को विभाजन का प्रस्ताव स्वीकारा था और पाकिस्तान अस्तित्व में आया। या फिर, जैसा कि वीर सावरकर ने कहा है कि जिन्ना के द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत से उनका कोई विरोध नहीं है -तो क्या सिर्फ और सिर्फ गांधी से उनका विरोध था!

इस दृष्टि से गांधी उस स्थिति में बिना विरोध के सब कुछ मान लिये गए। यह आवश्यक है कि गांधी के व्यक्तित्व के उस पक्ष को जाना जाय जिसके कारण वे कट्टर हिंदुओं की आँखों की किरकिरी बने। हालांकि वे निष्ठावान हिंदू थे, उनके अनेक अनन्य मित्र गैर हिंदू थे। इसके कारण वे `एक ईश्वर , सर्व धर्म समभाव`, के सिद्धांत तक पहुँचे और उसे अपने आचरण में ढाला। उन्होंने वर्णभेद, छुआछूत को हिंदू समाज से दूर किया, अंतर्जातीय विवाह को बढावा दिया। उन्होंने उन विवाहों को आशीर्वाद दिया जिसमें वर या वधू में से कोई एक अछूत हो। सवर्ण हिंदुओं ने इस सुधारवादी पहल को गलत अर्थ़ों में लिया। इसने पागलपन की राह पकडी और वे (गांधी) उनके शिकार हुए।

२) क्या कश्मीर में पाकिस्तानी अतिक्रमण के बावजूद गांधी ने भारत सरकार को बाध्य किया कि वह पाकिस्तान को बकाया 55 करोड रुपए दे ?
संपत्ति एवं दायित्वों के बँटवारे की शर्त़ों के मुताबिक भारत को 55 करोड रुपए की दूसरी किश्त चुकानी थी। कुल 75 करोड रुपए पाकिस्तान को दिया जाना था जिसकी एक किश्त के रूप में 20 करोड रुपए उसे पहले ही दिये जा चुके थे। पाकिस्तानी सेना के परोक्ष समर्थन से कश्मीर में उग्र हुए कथित स्वाधीनता संग्रामियों ने यह हरकत दूसरी किश्त दिये जाने के पहले ही शुरू कर दी थी। तब भारत सरकार ने दूसरी किश्त रोकने का निर्णय लिया और लॉर्ड माउंटबेटन ने इसे परस्पर समझौते का उल्लंघन माना था। उन्होंने अपने विचारों से महात्मा गांधी को अवगत भी करा दिया था। गांधी की नजर में `जैसे को तैसा` की नीति अनुचित थी और हालांकि वायसराय के नजरिए से वे सहमत थे कि समझौते का उल्लंघन हुआ है। इसका मिश्रण उन्होंने अपने शुरू किये अनशन में दिखा। उन्होंने उपवास दिल्ली में सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए किया था। गांधी सितंबर 1947 में कलकत्ता से दिल्ली आए थे और शांति स्थापना के लिए पंजाब जाने वाले थे। जब सरदार पटेल ने दिल्ली की विस्फोटक स्थिति की जानकारी उन्हें दी तो उन्होंने अपनी आगे की यात्रा रद्द कर दी और दिल्ली में शांति बनाए रखने के कारण `करो या मरो` के दृढ़संकल्प के साथ दिल्ली में रुकने का निश्चय कर लिया।

पाकिस्तान से भागकर दिल्ली आए हिंदुओं - जिन्होंने अपने संबंधियों की हत्याएँ देखीं, उन्हें लापता पाया, जिनकी औरतों के साथ बलात्कार हुआ और जिनकी संपत्तियाँ छीनी गई थीं - उन्होंने विस्फोटक स्थितियाँ बना दी थीं तब !स्थानीय हिंदू अपने शहर में आए हिंदुओं के प्रति पाकिस्तान में हुए बर्ताव से व्यथित थे तो मुस्लिमों में अतिरंजना जिससे दिल्ली विस्फोट के मुहाने पर पहुँच गई थी। इससे हत्याएँ, बलात्कार/छेडखानी, घरों एवं संपत्तियों की लूट बढ गई जिससे गांधी रोष से भर उठे। इसका सबसे दर्दनाक पहलू यह था कि यह सब उस भारत भूमि पर घटित हो रहा था जिसने अहिंसा के जरिए विदेशी साम्राज्यवाद को समाप्त कर दिया था। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में उन्होंने दिल्ली में सांप्रदायिक सद्भाव एवं शांति के लिए आमरण अनशन शुरू कर दिया। इसी दौरान भारत सरकार ने पाकिस्तान को बकाया 55 करोड रुपए देने का फैसला लिया। इस घालमेल में गांधी आलोचना के पात्र बन गए।

ये तथ्य बताते हैं कि गांधी ने उपवास, भारत सरकार पर नैतिक दबाव बनाने के लिए शुरू नहीं किया था।

डॉ. सुशीला नायर ने जब गांधी का निर्णय सुना तो वह भागकर अपने भाई प्यारेलाल के पास पहुँची और उन्हें सूचित किया कि गांधी ने दिल्ली के लोगों का पागलपन जब तक खत्मे नहीं होता तब तक उपवास करने का फैसला लिया है। उन विपरीत परिस्थितियों में भी पाकिस्तान को 55 करोड रुपए दिये जाने की बात न होना यह बताता है कि गांधी की उपवास का मकसद दिल्ली में शांति की स्थापना कराना था, न कि पाकिस्तान को पैसा दिलाना।

गांधी ने 12 जनवरी 1947 को प्रार्थना सभा में इसका कोई उल्लेख नहीं किया। अगर पाकिस्तान को पैसा दिलाना उपवास की शर्त होती तो वे जरूर उसका उल्लेख करते। 13 जनवरी को प्रवचन में भी उन्होंने इसकी कोई चर्चा नहीं की। 15 जनवरी को, उनके उपवास से संबंधित एक विशेष प्रश्न के उत्तर में भी उन्होंने इसका उल्लेख नहीं किया था। भारत सरकार की प्रेस विज्ञप्ति में इसका कोई उल्लेख नहीं है। गांधी पर उपवास त्यागने के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में गठित कमेटी द्वारा दिये गए आश्वासन में भी इस बात की चर्चा नहीं है। हमें आशा है कि इन तथ्यों से गांधी के उपवास से पाकिस्तान को दिये गए 55 करोड रुपए का जोडा गया विवाद अब समाप्त हो जाएगा ।

३) क्या गांधी की तुष्टिकरण नीति के कारण मुस्लिम आक्रामक हुए?

मुस्लिमों का तुष्टीकरण के आरोपों के संबंध में कहना है कि यह समझा जाना चाहिए कि देश में हिंदू एवं मुसलमानों में मतभेद शुरू से ही रहे हैं जिसका साम्राज्यवादी ताकतों ने बडी चालाकी से इस्तेमाल किया जिसका परिणाम देश के विभाजन के रूप में सामने आया। गांधीजी के बहुत पहले बाल गंगाधर तिलक सरीखे नेताओं ने राष्ट्रीय संघर्ष के दौरान मुसलमानों के विभाजन की दिशा में ठोस कदम उठाए थे जो लखनऊ घोषणापत्र में दिखता है। लोकमान्य तिलक, एनी बेसेंट और मोहम्मद जिन्ना ने एक फार्मूला तैयार किया था जिसमें मुसलमानों को उनकी आबादी की तुलना में अधिक प्रतिशतता दी गई थी। लखनऊ घोषणा पत्र के पक्ष में तिलक के स्पष्ट एवं दृढ़ बयान सिद्ध करते हैं कि गांधीजी से बहुत पहले तिलक ने मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपनायी थी। ...

1857 के बाद से अंग्रेज भी यही नीति अपनाकर देश को बांटे हुए थे. बाद में अंग्रेज दलित तुष्टीकरण के काम में भी जुट गए . गाँधी इस देश के एकमात्र नेता थे जो ईमानदारी और निःस्वार्थ भाव से भारत की आज़ादी और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए लड़ना चाहते थे. इस काम में अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति सबसे बड़ी बाधा थी. यही वजह रही कि गाँधी इस नीति को निष्फल बनाने पर जुट गए. पर अंग्रेजों के पिट्ठू राजनेता उनके इस महती प्रयास को विफल बनाने में जुट गए. कट्टरपंथी हिन्दू और मुस्लिम दोनों गाँधी के खिलाफ थे (और हैं ) क्योंकि गाँधी उनकी घृणा की राजनीति में सबसे मज़बूत बाधा थे. पर गाँधी की जनता में जो महात्मा वाली छवि थी उसकी वजह से वे खुलकर सामने नहीं आ पाते थे. 

पर आज़ादी के बाद इन लोगों ने न केवल गाँधी के भौतिक शरीर की हत्या की बल्कि कई करोड़ मुहों से प्रतिदिन झूठ फ़ैलाने का घृणित काम वे आज भी कर रहे हैं. उनकी अश्लील कोशिशों से पूरा इंटरनेट गंधा रहा है. ऐसे दुष्कृत्यों को रोंकने के लिए ही मैं यह सीरीज लिखकर वास्तविक तथ्यों को सामने लाना चाहता हूँ. विभाजन भारतीय इतिहास की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी ...इस घटना से हम सबक सीख सकें इसके लिए वास्तविक इतिहास को जानना ज़रूरी है ...इसी कड़ी में आज विभाजन में गाँधी जी की भूमिका पर बात की गई है. अगले लेख में नेहरू और पटेल की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की जाएगी ....

( ५ भागों में यह पहला भाग कैसा लगा ? इस प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा ....विपरीत पर सतर्क मतों का स्वागत है सार्थक संवाद के लिए )

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