Posts

Showing posts from March, 2018

साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज

Image
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह
1919 के जालियँवाला बाग हत्याकाण्ड के बाद ब्रिटिष सरकार ने साम्प्रदायिक दंगों का खूब प्रचार शुरु किया। इसके असर से 1924 में कोहाट में बहुत ही अमानवीय ढंग से हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। इसके बाद राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना में साम्प्रदायिक दंगों पर लम्बी बहस चली। इन्हें समाप्त करने की जरूरत तो सबने महसूस की, लेकिन कांग्रेसी नेताओं ने हिन्दू-मुस्लिम नेताओं में सुलहनामा लिखाकर दंगों को रोकने के यत्न किये। इस समस्या के निश्चित हल के लिए क्रान्तिकारी आन्दोलन ने अपने विचार प्रस्तुत किये। प्रस्तुत लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में छपा। यह लेख इस समस्या पर शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के विचारों का सार है। 


भारत वर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है। यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें। किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिन्दुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह मार-काट इसलिए नहीं की गयी कि फलाँ आदमी दोषी…

भगत सिंह और गांधी

Image
अशोक भारत
भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 को बंगा, लायलपुर, पंंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ था। देशभक्ति उन्हे विरासत में मिली थी। जिस दिन भगत सिंह का जन्म हुआ था उसी दिन उनके पिता सरदार किशन सिंह, चाचा सरदार अजीत सिंह, सरदार स्वर्ण सिंह जेल से रिहा हुए थे । इसलिए उनकी दादी ने उनका नाम भागो वाला रखा जो आगे चल कर भगत सिंह के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उनके चाचा सरदार अजीत सिंह और सरदार स्वर्ण सिंह का जुड़ाव क्रांतिकारी आन्दोलन से था। पिता सरदार किशन सिंह कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे।

देशभक्ति भगत सिंह में कूट-कूट कर भरी थी। देश के लिए जीना और मरना उनके जीवन का मकसद हो गया था। देश का राजनैतिक माहौल तेजी से बदल रहा था। तिलक के बाद कांग्रेस की कमान गांधी जी ने संभाली थी। असहयोग आन्दोलन ने आजादी की लड़ाई में जान फूंक दी थी। देश उबाल पर था। इस माहौल में भगत सिंह का तरुण मन भला कैसे चुपचाप बैठे रह सकता था। भगत सिंह इस आंदोलन में शरीक हुए । उन्होने डी ए वी कॉलेज छोड़ कर नेशनल स्कूल में दाखिला लिया। लेकिन गांधीजी ने अचानक चौरी चौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। पूरा देश गांधी जी के इस फैसले …

क्या गांधीजी वाकई कांग्रेस को भंग करना चाहते थे?

Image
11/02/2018 ऐसा लगता है कि यह दावा बार-बार इसलिए किया जाता है ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि अपने अंतिम दिनों में गांधीजी कांग्रेस और उसके नेताओं से दूर हो गए थे.

भाजपा अपने ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ अभियान को सही ठहराने के लिए बार-बार गांधीजी का सहारा लेती है. अभी कितने दिन बीते हैं जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गांधीजी की सार्वजनिक प्रशंसा करते हुए कहा था कि उनके द्वारा कांग्रेस को भंग करने की इच्छा दरअसल एक दूरदर्शी अपील थी. उनके इसी भाषण में गांधीजी के साथ जातिसूचक प्रत्यय ‘चतुर बनिया’ जोड़ने पर उनका काफ़ी विरोध हुआ था. लेकिन गांधीजी ने कांग्रेस को भंग करने के संबंध में क्या कुछ कहा था, इसका कोई विरोध नहीं हुआ. आम तौर पर लोगों के दिल में यह धारणा बैठा दी गई है कि गांधीजी वास्तव में ऐसा ही चाहते थे. दो दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में इसी मुद्दे को फिर गर्मा दिया. उन्होंने कहा कि वो तो सिर्फ़ गांधीजी के सपनों का भारत बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं. क्योंकि कांग्रेस-मुक्त भारत का विचार नरेंद्र मोदी का नहीं बल्कि ख़ुद गांधीजी का विचार था. इस बार इस बात क…