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Showing posts from October, 2016

राष्ट्रीयता

गणेश शंकर विद्यार्थी 
[स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान कानपुर में भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों को शांत कराते हुए शहीद हुए लेखक-पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की आज (26 अक्टूबर) जयंती है. इस मौके पर ‘राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट’ उन्हें याद करते हुए 25 जून 1915 को साप्ताहिक ‘प्रताप’ में ‘राष्ट्रीयता’ शीर्षक से छपा उनका लेख ‘स्वाधीन’ के पाठकों के लिए पेश कर रहा है. इस समय देश में राष्ट्र प्रेम चर्चा में भी है, ऐसे में विद्यार्थी जी का यह लेख पढ़ा जाना चाहिए.]
देश में कहीं-कहीं राष्‍ट्रीयता के भाव को समझने में गहरी और भद्दी भूल की जा रही है। आये दिन हम इस भूल के अनेकों प्रमाण पाते हैं। यदि इस भाव के अर्थ भली-भाँति समझ लिये गये होते तो इस विषय में बहुत-सी अनर्गल और अस्‍पष्‍ट बातें सुनने में न आतीं। राष्‍ट्रीयता जातीयता नहीं है। राष्‍ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा नहीं है। राष्‍ट्रीयता सामाजिक बंधनों का घेरा नहीं है। राष्‍ट्रीयता का जन्‍म देश के स्‍वरूप से होता है। उसकी सीमाएँ देश की सीमाएँ हैं। प्राकृतिक विशेषता और भिन्‍नता देश को संसार से अलग और स्‍पष्‍ट करती है और उसके निवासियों को एक विशेष बंधन-क…

मार्टिन लूथर किंग की विचार-यात्रा

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शुभनीत कौशिक
मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने सितंबर 1958 में महात्मा गांधी, अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांत के प्रति अपने लगाव और जुड़ाव की विस्तार से चर्चा करते हुए एक लेख लिखा, जिसका शीर्षक था: “माई पिलग्रिमेज टू नॉन-वायलेंस”। यह लेख फ़ेलोशिप पत्रिका के 1 सितंबर 1958 के अंक में छपा। इस लेख में मार्टिन लूथर किंग ने महात्मा गांधी के अतिरिक्त कार्ल मार्क्स, नित्शे और राईनहोल्ड नीबूर सरीखे विचारकों के चिंतन की गहराई से समीक्षा की। और विचारों की उपयोगिता की समीक्षा के इस क्रम में, अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते को सर्वाधिक योग्य रास्ता पाया।

इस लेख का आरंभ, मार्टिन लूथर किंग अटलांटा में बिताए अपने बचपन से करते हैं, जहाँ उन्होंने अपनी आँखों से अश्वेतों पर हो रहे अमानवीय व्यवहार को देखा और कु-क्लक्स-क्लैन सरीखे घोर नस्लवादी संगठन द्वारा अश्वेतों पर किए जा रहे बर्बर अत्याचारों के साक्षी बने। वे लिखते हैं कि ‘एक वक़्त ऐसा भी आया जब मैं सभी गोरों के प्रति द्वेषभाव रखने के करीब जा पहुँचा था’। अपनी युवावस्था में, उन्होंने कुछ ऐसी जगहों पर काम किया जहाँ गोरे और काले दोनों ही समुदायों के लोग काम करते थे …