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Showing posts from March, 2015

राष्ट्रीयता

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गणेश शंकर विद्यार्थी 
[क्रान्तिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी एक तरफ गांधी के अनुयायी थे तो दूसरी ओर क्रान्तिकारियों के गुरु. उत्तर प्रदेश के कानपुर से उनके संपादन में निकलने वाले 'प्रताप' अख़बार का दफ्तर हमेशा क्रान्तिकारियों के लिए खुला रहता था. भगत सिंह से लेकर अनेक क्रान्तिकारियों ने 'प्रताप' के संवाददाता के रूप में काम किया था. क्रान्तिकारियों से उनके संबंधों की तासीर इससे भी पता चलती है कि अंग्रेज सरकार द्वारा भगत सिंह आदि वीर सपूतों को फांसी पर लटकाने से वह काफी व्यथित थे. साथ ही हिन्दू-मुस्लिम एकता के पैरोकारी करते हुए कानपुर में भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों को शांत करा रहे थे. इसी बीच 25 मार्च 1931 को वह कुछ उपद्रवियों के निशाने पर आ गए थे, जिन्हें अंग्रेज सरकार के अफसरों ने भड़काया था. यानि भगत सिंह आदि क्रान्तिकारियों की शहादत के तीसरे दिन ही वह शहीद हो गए थे. विद्यार्थी जी की शहादत दिवस पर उनका 21 जून 1915 में 'प्रताप' में प्रकाशित लेख "स्वाधीन" के पाठकों के लिए दे रहे हैं.'राष्ट्रीयता' शीर्षक से लिखा गया यह लेख जितना उस समय महत्वपूर्…

भगत सिंह: एक पुनर्स्मरण

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आज भगत सिंह का शहादत दिवस है। उनके जीवन से जुड़ी हर तारीख इनको याद करने का बहाना बन गई है। 17 दिसम्बर, 1928 को चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और उनके साथियों ने लाहौर के असिस्टेण्ट सुपरिटेण्डेण्ट आॅफ पुलिस साण्डर्स की हत्या कर दी थी। यह और असेम्बली में बम फेंकने की कार्यवाही भगत सिंह के जीवन की सर्वाधिक साहसिक और चर्चित घटनाएं हैं। आम लोगों की स्मृति में भगत सिंह इन्हीं घटनाओं को अंजाम देने वाले ओर बाद में हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चूम लेने वाले दिलेर नौजवान की तरह जि़ंदा हैं। हिन्दी सिनेमा ने लम्बे ओवरकोट और तिरछी हैट वाले गुस्सैल नौजवान की तस्वीर को खूब लोकप्रिय बनाया है। परन्तु भगत सिंह वास्तव में क्या थे, नायक पूजा की हमारी अंध-प्रवृत्ति ने कभी जानने की जरूरत नहीं समझी।



भगत सिंह ने बचपन में बन्दूकें बो कर अँग्रेजों को मार भगाने का सपना देखा था। बन्दूक से ही उन्होंने साण्डर्स की हत्या की थी। असेम्बली में उन्होंने बहरे कानों को सुनाने के लिए बम का धमाका किया था। लेकिन हम भगत सिंह का सच्चा मूल्यांकन उनके इन कामों के आधार पर नहीं कर सकते। भगत सिंह ने स्वयं इन कामों की निस्सारता को समझ लिय…

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और विभाजन

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सीताराम शर्मा कांग्रेस सदस्यों में सरदार वल्लभभाई पटेल विभाजन के सबसे बड़े समर्थक थे लेकिन उन्हें भी विश्वास नहीं था कि भारत की समस्याओं का सबसे बेहतर समाधान विभाजन हो सकता है। उन्होंने अपने आप को बंटवारे के पक्ष से बाहर रखा। उनका कहना था कि इससे रंजिश और दंभ बढ़ेगा। उन्होंने अपने आप को हर कदम पर तब दुविधा में पाया जब तत्कालीन वित्‍तमंत्री लियाकत अली खॉ ने उनके प्रस्ताव ठुकरा दिये। बेहद गुस्से में उन्होने फैसला किया कि अगर कोई विकल्प न बचे, तो बंटवारे का प्रस्ताव मान लिया जाये। उनका विचार था कि अगर ये प्रस्ताव मान लिया गया तो यह मुस्लिम लीग के लिए एक कड़वा सबक होगा। पाकिस्तान थोड़े ही समय में लड़खड़ा जायेगा और जो सूबे भारत छोड़ कर पाकिस्तान में शामिल हुये हैं उन्हें बहुत मुश्‍किलों का सामना करना होगा’’ - मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अपनी आत्मकथा ‘‘इंडिया विन्स फ्रीडम’’ में यह बात आजादी मिलने के दस साल बाद 1957 में लिखी है।


एक राय यह भी है कि आज़ाद ने जवाहरलाल नेहरू को इस बात का दोष दिया था कि उन्‍होंने कांग्रेस और मुस्लिम लीग में दो अवसरों पर सुलह सफाई की सम्भावनाओं पर पानी फेर दिया। पहल…

हत्या के विरुद्ध एक नज़्म

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सौरभ बाजपेयी

[ये नज़्म गोडसे के महिमामंडन के दौर में शुरू हुयी थी। पूरी होते- होते अभिजीत रॉय तक आ पहुंची। हत्या और हत्यारों के विरुद्ध यह हमारा गांधीवादी उद्घोष है.]

सबसेसूनीआँखेंहैं हत्यारोंकी। हैंसबसेज़िंदाख़्वाब हमारीआँखोंमें। जिनकोतुमनेक़त्लकिया हथियारोंसे वोबिखरगएहैंलाखोंमें।
जिनकोतुमनेक़त्लकिया हथियारोंसे। वोमरेनहींहैं, सोयेहैं। उनकीकब्रोंपरजा-जाकर, बेवजहनहींहमरोयेहैं। जिनकोतुमनेक़त्लकिया हथियारोंसे। वोबिखरगएहैं बनकरज़ीस्त[1]हवाओंमें। वोज़र्राबनकर जज़्बहुएहैंमिट्टीमें। उनकीखुशबूमहकरहीहै, चारोंतरफफ़िज़ाओंमें।
जिनकोतुमनेक़त्लकिया हथियारोंसे वोज़िन्दाहैं, वोज़िन्दाहैं, वोज़िन्दाहैं, वोज़िन्दाहैं। वोमिट्टीहैं, वोक़तराहैं, वोज़र्राहैं, वोसोताहैं, वो <