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Showing posts from June, 2017

क्रांतिकारी आंदोलन के दस्तावेज और उनके राजनैतिक विचारों का इतिहास

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शुभनीत कौशिक फ़िलहाल
जून 2017

हाल के वर्षों में, औपनिवेशिक भारत में उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरोध में हुए क्रांतिकारी आंदोलनों के इतिहास, उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि, भावी राष्ट्र की उनकी संकल्पना और राष्ट्रीय आंदोलन एवं भारतीय समाज पर क्रांतिकारी आंदोलन के प्रभाव को लेकर कई पुस्तकें लिखी गईं हैं. शुक्ला सान्याल की किताब क्रांतिकारी आंदोलन को उसकी समग्रता में समझने के इन प्रयासों में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है. शुक्ला सान्याल अपना ध्यान बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन के आरंभिक चरण पर केंद्रित करती हैं. उनका अध्ययन-काल, 1905 में बंग-भंग के विरोध में शुरू हुए स्वदेशी आंदोलन से लेकर प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति तक बंगाल में हुए क्रांतिकारी आंदोलन तक सीमित है. यह वह समय था, जब क्रांतिकारियों ने अपनी राजनैतिक विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए विविध प्रयोग शुरू किए. क्रांतिकारी आंदोलन के इस आरंभिक चरण में किए गए राजनैतिक प्रयोग, न सिर्फ़ इस चरण के क्रांतिकारी आंदोलन के संबंध में, बल्कि बाद के क्रांतिकारी आंदोलनों के विकास के बारे में भी हमें अंतर्दृष्टि देते हैं.
क्रांतिकारियों की राजनैतिक विचारधारा,…

गाँधी की अहिंसा एक रणनीति थी

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जयपाल नेहरा 

एक बात बिल्कुल दो टूक कि मैं जो भी लिख रहा हूँ वह मेरे विचार में बिल्कुल निरपेक्ष मूल्यांकन है उसका मतलब ना तो गाँधी या नेहरू को स्थापित करना है और ना ही उनको खारिज करना है । सैद्धांतिक तौर पर जवाहरलाल नेहरू और गाँधी सशस्त्र आंदोलन के रत्तिभर भी समर्थक नहीं रहे । अंग्रेजों को आधी शताब्दी पहले हुए1857 की यादें ताजा थीं । 1857 में पूरे इंग्लैंड में कोई भी परिवार नहीं बचा था जिसने अपने अजीज को भारत के अंदर हुए आजादी के इस असंगठित और बिना योजना के चले युद्ध में न खोया हो । किसी का फूफा मरा था तो किसी का मामा, किसी का चाचा मरा था किसी का नाना, किसी का पिताजी शहीद हुए थे तो किसी के ताऊजी या चाचाजी । अंग्रेज इस बात को बखूबी जानते थे कि अब भारत को आक्रामक रवैये से वे अपने नियंत्रण में नहीं रख पाएँगे । 



अब दूसरा पक्ष भी जान लीजिएगा । गाँधी जी और नेहरू भी 1857 की लोकगीतों और लोक कथाओं को सुनने-सुनाने के दौर में पले-बढ़े और पढ़े-सीखे थे जिसमें रौंगटें खङे कर देने वाली वे दास्तानें होती थीं कि अमुक पेङ पर लोगों को फांसीं दी गयी और उनकी लाशें कई महीनों तक उन पेङों पर लटकती रहीं और चील…