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Showing posts from January, 2018

सुभाष चन्द्र बोस और गाँधी का वह बेमिसाल रिश्ता.

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सौरभ बाजपाई


क्या नेताजी के ज़िंदा होने की ख़बर नेहरू को घेरने के लिए फैलाई गई थी?

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सौरभ बाजपेयी  23/01/2018
लोगों को यक़ीन दिलाया गया कि नेताजी इसलिए भूमिगत रहे क्योंकि नेहरू ने ब्रिटिश सरकार से गुपचुप समझौता किया था कि अगर नेताजी कभी जीवित मिलते हैं तो उन्हें एक युद्ध अपराधी के रूप में तत्काल ब्रिटेन को सौंप दिया जाएगा.
Subhash-Chandra-Bose-Jawahar-Lal-Nehru-Wiki फोटो साभार: विकिपीडिया
एक बार तकरीबन सत्तर साल के एक बुजुर्ग मिले. घरों में अखबार डालने वाले इन बुजुर्ग की शर्ट पर एक बिल्ला टंका था. उस पर नेताजी की तस्वीर के साथ लिखा था- नेताजी जिंदा हैं.
यह बात लगभग आठ बरस पुरानी रही होगी. मैंने हिसाब लगाया कि 23 जनवरी 1897 को कटक में पैदा हुए नेताजी अगर वाकई जिंदा होते तो आज कितने बरस के होते? यकीनन उनकी उम्र तब लगभग 113 बरस होती. किसी भी व्यक्ति के लिए इतनी लम्बी उम्र तक सक्रिय रहना तो दूर, ठीक से जीना ही असंभव होता है.
लेकिन उन अर्धशिक्षित बुजुर्ग के लिए नेताजी अभी जिंदा थे. यह पूछने पर कि इतने निडर नेताजी आखिर किससे डरकर भूमिगत हैं, बड़ा भोला-सा जवाब मिला- वो अंदर ही अंदर तैयारी कर रहे हैं. जिस दिन उनकी तैयारी पूरी हो जायेगी, वो प्रकट हो जायेंगे.
उनसे पूछना बेकार था क…

ON INDIAN CONSTITUTION

Dr Richa Raj 26 January 2018

Mr Anant Kumar Hegde, a five-time Lok Sabha member from Uttara Kannada, who has been made Union Minister of Skill Development and Entrepreneurship in Prime Minister Narendra Modi's cabinet made a controversial remark recently attacking the word ‘secularism’ and asserting, ‘We are here to change the Constitution and we'll change it’ clearly marking a devaluing of the Indian Constitution in its present form even though his party distanced itself from this statement.

In the light of this statement it is imperative to understand both the significance of the Indian Constitution and the date on which the Constitution was enacted. It was on 26 November 1949 that the Constitution was signed by the President of the Constituent Assembly. The draft was voted upon and adopted but the draft itself clearly states ‘that on the 26th of January India shall be a Republic in 1950 when this draft will turn into a Constitution and we shall enact’ it then. Further, in …

भीमा-कोरेगांव युद्ध को याद करने वाले किस आधार पर ‘देशद्रोही’ सिद्ध किए जा रहे हैं?

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सौरभ बाजपेयी 06/01/2018

जो लोग भीमा-कोरेगांव युद्ध की याद में आयोजित समारोह के आयोजकों को राष्ट्रद्रोही सिद्ध कर रहे हैं वो यह क्यों छुपा ले जाते हैं कि न जाने कितनी बार मराठों ने भी अंग्रेज़ों के साथ मिलकर अन्य राज्यों के ख़िलाफ़ लड़ाइयां लड़ी हैं.
भीमा-कोरेगांव में एक जनवरी को हुई हिंसा के विरोध में ठाणे में दलित संगठनों ने प्रदर्शन किया. (फोटो: पीटीआई)
इतिहास के मुद्दे तय करने के लिए अब इतिहासकारों की नहीं, भीड़ की जरूरत है. 21वीं सदी के ‘आधुनिक भारत’ में लोग अतीत का एक और बदला चुकाने के लिए तैयार हैं. पद्मावती से पद्मावत तक का सफर पूरा होते ही इतिहास का एक और गड़ा मुर्दा निकालकर बाहर लाया गया है. नए साल में इतिहास के उन्मादीकरण का एक और नया अध्याय मुबारक हो!
दो सौ साल पहले लड़ी गई एक हार का बदला वर्तमान में चुकाने की बिसात बिछ चुकी है. 1 जनवरी 1818 को भीमा-कोरेगांव युद्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी की एक छोटी टुकड़ी ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की अपेक्षाकृत बड़ी सेना को बुरी तरह हरा दिया था.
इस लड़ाई में कंपनी की तरफ से लड़ने वाले ज्यादातर सैनिक महाराष्ट्र की दलित महार जाति से ताल्लुक रखते थे. वैस…

जिन क्रांतिकारियों के सहारे संघ गांधी पर निशाना साधता है, वे आरएसएस कैंप से नहीं आये थे

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सौरभ बाजपेयी 29/11/2017

आरएसएस अगर आज़ादी की लड़ाई के बारे में बात करे तो वो क्या बताएगा? अगर वो सावरकर के बारे में बताएगा तो अंग्रेजों को लिखे गए सावरकर के माफ़ीनामे सामने आ जाते हैं.


mahatma gandhi dandimemorial.in
(फोटो साभार: dandimemorial.in)

एक बार अमर्त्य सेन ने एक बड़े पते की बात कही थी, ‘जब मैं किसी एक चीज के बारे में बात कर रहा होता हूं तो उस वक्त दूसरी चीजों के बारे में बात नहीं कर रहा होता.’

यानी अगर कोई किसी गीत में गांधीजी के बारे में बात कर रहा है तो जाहिर है वो उस समय क्रांतिकारियों के बारे में बात नहीं कर रहा. संभव है वही व्यक्ति जब क्रांतिकारियों के बारे में बात कर रहा हो तो उस समय गांधी की बात न करे.

यह बात समझने में उन लोगों को दिक्कत होती है जिनके पास तर्कों की कमी है और कुतर्क ही जिनका सहारा हैं.

बात-बात में पूछने वाले कि ‘आप तब कहां थे’ या ‘आप उनके बारे में क्यों नहीं बोलते’ एक खास बौद्धिक फैक्ट्री के उत्पाद हैं. ये वो लोग हैं जो बौद्धिक विमर्श की अपनी दरिद्रता को छुपाने के लिए विमर्श को भटकाने की रणनीति अपनाते हैं.

उनकी स्थिति तब और दयनीय हो जाती है जब उनका अपना …