Posts

Showing posts from January, 2017

कोई नहीं है गाँधी का हत्यारा (Nobody killed Gandhi)

Image
३० जनवरी १९४८ को महात्मा गाँधी को किसने मारा? आज की राजनीति के हिसाब से कहें तो सेमी-आटोमेटिक बेरेट्टा एम पिस्तौल से चली तीन गोलियों ने. न ही कोई विचारधारा और न ही कोई व्यक्ति इसके लिए जिम्मेदार था. अगर कोई अपनी सारी सूझ-बूझ को ताख पर रख दे तो ही उस सच को निगल सकता है जिसे ज़बरदस्ती हमारे गले में धकेला जा रहा है. लेकिन अगर कोई ऐसा न करे तो गाँधीजी की हत्या में आरएसएस की संलिप्तता के बारे बहुत कुछ है जिसे बार-बार याद करने, दोहराने और साबित करने की जरूरत है. मुद्दे से भटकने की कोई जरूरत नहीं है. यह लेख एक ऐसी साजिश की तरफ इशारा करता है जिसमें हिन्दू महासभा और आरएसएस दोनों बराबर के भागीदार थे.

आरएसएस कभी स्वीकार नहीं करता कि गाँधीजी की हत्या में उसका कोई हाथ था. उनके हिसाब से नाथूराम गोडसे द्वारा अदालत में दिया गया बयान इस आरोप को झूठा सिद्ध करने के लिए काफी है. जिसमें गोडसे ने संघ से अपना कोई भी सम्बन्ध होने से इनकार किया था और कहा था कि सिर्फ वो और नारायण आप्टे ही गाँधीजी की हत्या के षड़यंत्र में शामिल थे. आरएसएस के हिसाब से खुद हत्यारे की ओर से दिया गया यह बयान काफी होना चाहिए. लेकिन इ…

हम आपके वारिस हैं खान बाबा

Image
सभ्यता की एक सामूहिक याददाश्त होती है. हमारी याददाश्त दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है. हम जिस देश के झंडे पर फख्र करते हैं और जिस भारत माता की जयकार लगाते हैं, उसके सबसे जांबाज सपूतों को भुला चुके हैं. यह आश्चर्य की बात है कि बहुतेरे पढ़े-लिखे युवा ईमानदारी से बताते हैं कि वो खान अब्दुल गफ्फार खान को नहीं जानते. किसी को न जानने से कोई आफत नहीं आती, आफत तब आने वाली होती है जब आप अपने पुरखों को भूलने लगते हैं. जब आप अपने अतीत को भूलने लगते हैं तो यकीन मानिए आपके नीचे की जमीन दरक रही है. वो दिन दूर नहीं जब मौज से यूट्यूब पर गाँधीजी-नेहरुजी के बारे में चटकारेदार वीडिओ देखते-देखते आपके नीचे की जमीन अचानक धंस जायेगी. 

आज खान अब्दुल गफ्फार खान की पुण्यतिथि के मौके पर यही चेताते हुए मैं आपसे पूछता हूँ कि आप अफगानिस्तान के जलालाबाद शहर को आप कैसे जानते हैं? जाहिर है आतंक के गढ़ के तौर पर; जहां आये दिन कोई न कोई आतंकी घटना होती रहती है. कितनों को पता है कि इसी जमीन के भीतर शान्ति का एक बेचैन मसीहा दफ़न है. खान अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हें हम सब बादशाह खान के नाम से पुकारते हैं, की कब्र इसी दहशतज़दां श…

दर्शन-रहित खादी सिर्फ एक कपड़ा है.

Image
सौरभ बाजपेयी
क्या गाँधीजी के लिए चर्खा एक ब्रांड था? क्या गाँधीजी चर्खे के ब्रांड एम्बेसडर थे? आजकल हर चीज़ को बाज़ार की शब्दावली में पिरोने का बड़ा चलन है. मोदीजी इस कला के माहिर हैं. उनके लिए कहा जाता है कि वो इवेंट मैनेजर हैं. वो हर चीज़ को बाजारी जुमले में परोसते हैं. मेड इन इंडिया में कुछ भी इंडियन नहीं है, पर बाजारबोध है. यही हाल कमोबेश उनकी हर योजना का है. मोदीजी विकास के नाम पर वोट मांगकर सत्ता में आये हैं. उनकी मजबूरी है कि वो हर कहीं अच्छे दिन का अहसास दिलाते रहें. इसलिए इस साल खादी की बिक्री में हुयी बढ़ोत्तरी को वो अपनी उपलब्धि की तरह पेश करना चाहते हैं. इसमें कुछ गलत नहीं है लेकिन आत्मरति की एक सीमा होती है. वो उस सीमा को पार कर गए हैं. उन्हें अपनी छवि इतनी विराट दिखने लगी है कि वो गाँधीजी की जगह खुद को देखना चाहते हैं. लेकिन क्या यह कोई आसान सपना है? 
गाँधीजी के लिए चरखा कातना और खद्दर पहनना भारत की आम गरीब जनता के साथ एकाकार होने का जरिया था. गाँधीजी ने खादी अपनाई थी क्योंकि वो भारत के आम गरीब लोगों की तरह दिखना चाहते थे. आज जो लोग खादी पहनकर उसके ब्रांड अम्बेसडर बनना चाहते …

गांधी, खादी और मोदी

कुमार प्रशांत
फुर्सत के पल में, जब दूसरा कुछ न सूझे तो हम सबका एक शगल होता है : कलम ले कर किसी लड़की के फोटो पर दाढ़ी-मूंछ चस्पां करना या कि किसी पुरुष चेहरे को लड़कीनुमा बनाना !अापने भी कभी-न-कभी ऐसी कलमकारी की होगी अौर फिर अपनी ही निरुद्देश्यता पर शर्माए होंगे. ऐसे ही कई कारनामे इन दिनों राजधानी दिल्ली के निरुद्देश्य गद्दीनशीं कर रहे हैं जिसमें चापलूसी का तड़का भी जी भर कर उड़ेला जा रहा है. सबसे ताजा है वह कारनामा जो सरकारी खादी-ग्रामोद्योग अायोग ने किया है - उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फोटो पर कलमकारी कर उसे महात्मा गांधी बनाने की कोशिश की है याकि महात्मा गांधी के फोटो पर कलमकारी कर, उसे नरेंद्र मोदी बनाने का उपक्रम किया है. दोनों ही मामलों में किरकिरी तो नरेंद्र मोदी की ही हुई है - एक पूरा का सारा इंसान कार्टून बना कर छोड़ दिया गया है.
देश में इससे बड़ी हलचल पैदा हुई है - यहां तक कि खादी-ग्रामोद्योग अायोग के कर्मचारी भी अपने ही नौकरीदाताअों के खिलाफ खड़े हो गए हैं ! ऐसा इसलिए हो रहा है कि चापलूसों की फौज नरेंद्र मोदी का कितना भी कार्टून बनाए देश को उससे फर्क नहीं पड़ता है ले…