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गणेशशंकर विद्यार्थी और 'प्रताप': स्वाधीनता संघर्ष का स्वर्णिम अध्याय

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अटल तिवारी
बीसवीं सदी के दूसरे दशक में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को जिन विभूतियों ने गति दी उसमें गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम अग्रिम पंक्ति के सेनानियों में है। विद्यार्थी जी ने सब कुछ दांव पर लगाकर आजादी के लिए पत्रकारिता को ध्येय बनाया। लोगों को आंदोलन के लिए प्रेरित किया। विद्यार्थी जी ने एक तरफ अपने साप्ताहिक अखबार ‘प्रताप’ के जरिए अंग्रेज सरकार को पग-पग पर चुनौती दी तो दूसरी ओर देश की सामंती ताकतों को कठघरे में खड़ा करने में भी लेश मात्र का संकोच नहीं किया। क्रांतिकारी एवं मुखर राजनीतिक विचारों को लेकर ‘प्रताप’ हिन्दी प्रदेश का ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत का प्रमुख अखबार बना। उसका राजनीतिक स्वर क्रांतिकारी था, लेकिन इसके साथ कांग्रेस की नीतियों का भी पक्षधर था। अपनी इस पत्रकारिता के कारण उस पर छापे, जमानत, जब्ती, चेतावनी, धमकी एवं संचालकों को कारावास तक झेलना पड़ा। इन परिस्थितियों में भी संपादक विद्यार्थी जी देश के उत्थान और आजादी की मशाल लिए पत्रकारिता के युद्ध क्षेत्र में डटे रहे। 

उस समय अखबारनवीसी पेशा नहीं था। देश और समाज सेवा के लिए अखबार निकाले जाते थे। पत्रकारिता में वही ल…