17 January 2017

दर्शन-रहित खादी सिर्फ एक कपड़ा है.

सौरभ बाजपेयी

क्या गाँधीजी के लिए चर्खा एक ब्रांड था? क्या गाँधीजी चर्खे के ब्रांड एम्बेसडर थे? आजकल हर चीज़ को बाज़ार की शब्दावली में पिरोने का बड़ा चलन है. मोदीजी इस कला के माहिर हैं. उनके लिए कहा जाता है कि वो इवेंट मैनेजर हैं. वो हर चीज़ को बाजारी जुमले में परोसते हैं. मेड इन इंडिया में कुछ भी इंडियन नहीं है, पर बाजारबोध है. यही हाल कमोबेश उनकी हर योजना का है. मोदीजी विकास के नाम पर वोट मांगकर सत्ता में आये हैं. उनकी मजबूरी है कि वो हर कहीं अच्छे दिन का अहसास दिलाते रहें. इसलिए इस साल खादी की बिक्री में हुयी बढ़ोत्तरी को वो अपनी उपलब्धि की तरह पेश करना चाहते हैं. इसमें कुछ गलत नहीं है लेकिन आत्मरति की एक सीमा होती है. वो उस सीमा को पार कर गए हैं. उन्हें अपनी छवि इतनी विराट दिखने लगी है कि वो गाँधीजी की जगह खुद को देखना चाहते हैं. लेकिन क्या यह कोई आसान सपना है? 

गाँधीजी के लिए चरखा कातना और खद्दर पहनना भारत की आम गरीब जनता के साथ एकाकार होने का जरिया था. गाँधीजी ने खादी अपनाई थी क्योंकि वो भारत के आम गरीब लोगों की तरह दिखना चाहते थे. आज जो लोग खादी पहनकर उसके ब्रांड अम्बेसडर बनना चाहते हैं, वो आम लोगों के बीच ख़ास दिखना चाहते हैं. गाँधीजी ने अपने करियर को स्वेच्छा से त्यागकर गरीबी को अपना लिया था. वो पैदाइशी गरीब नहीं थे, उन्होंने गरीब हो जाने के रास्ते को सोच-समझकर चुना था. आज जो लोग कैलेंडर पर चरखा कात रहे हैं वो कहते हैं कि वो पैदाइशी गरीब थे. उन्होंने—उनके खुद के कहे मुताबिक़— रेलवे स्टेशन पर चाय तक बेची है. लेकिन अपने हाथ में ताकत आते ही उन्होंने अमीर रजवाड़ों जैसी जिंदगी चुन ली है. वो भोग-विलास और सुख-सुविधा की जिंदगी जीने वाले व्यक्ति हैं. महंगे कपडे उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा हैं. कई बार तो उनके सूट की कीमत कई-कई लाख होती है. उनके द्वारा इस्तेमाल किये गए पेन और घड़ियाँ भी दुनिया के सबसे महंगे ब्रांड हैं.

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इसलिए गाँधीजी जब चरखा कातते थे तो उसके पीछे त्याग की एक पूरी गाथा छिपी थी. जो व्यक्ति लन्दन से बैरिस्टरी पढ़कर शानो-शौकत की जिंदगी बसर कर सकता था, उसने अपने लिए ताउम्र संघर्ष की राह चुनी थी. सादा-कठोर जीवन और थकाने वाली दिनचर्या— गाँधीजी के चरखे के पीछे यह नैतिक ताकत काम करती थी. गाँधीजी विलायत से लौटकर भारत आये तो वापस नहीं गए. दूसरे गोलमेज सम्मलेन के लिए ही वो लन्दन गए और वहाँ भी उन्होंने अपनी वेशभूषा नहीं बदली. अपनी धोती को आधा पहने और आधा ओढ़े वो फ़कीर यूरोप की ठंडी आबोहवा में भी ब्रिटिश राज की आँख की किरकिरी बना रहा. लेकिन आज जो लोग कैलेंडर पर गाँधीजी की जगह लेने की हसरत पाल बैठे हैं, वो पूरी दुनिया का चक्कर लगाने के लिए भारत के प्रधानमंत्री बने हैं. उनका दिल अपने देश, अपने देश के लोगों और उसकी मिट्टी में लगने से ज्यादा विदेश में रमता है. गाँधीजी ने खुद को हर तरह के झूठ-फरेब और धोखाधड़ी से बचाकर आत्मबल इकठ्ठा किया था. मोदीजी अपने हवाई जुमलों, झूठे वायदों और कॉर्पोरेट के पक्ष में आम गरीब लोगों को ठगने के लिए जाने जाते हैं. गाँधीजी के विरोधी उन्हें गाली देने के लिए “अधनंगा फ़कीर” कहते थे. मोदीजी जब खुद को फ़कीर कहते हैं तो लोग सिवाय खिल्ली उड़ाने के उनको गंभीरता से नहीं लेते.   

यहाँ यह बताना भी जरूरी है कि खादी कोई उत्पाद नहीं है. अगर है भी तो बिना अपने दर्शन के तो कतई नहीं. सवाल है कि क्या खादी की बिक्री के साथ ही खादी दर्शन का भी इजाफा हुआ है? अगर नहीं तो यह खादी हमारे किस काम की? फिर तो चाहे हम खादी पहनें या रेशम— उसका हमारे लिए कोई मोल नहीं. खादी एवं ग्रामोद्योग कमीशन का दावा है कि मोदीजी द्वारा खादी पहनने की अपील के बाद खादी की बिक्री में ३४% का इजाफा हुया है. इसलिए बदले जमाने में जो खादी की बिक्री में उछाल लाएगा वही उसका ब्रांड अम्बेसडर बन जाएगा. ठीक है लेकिन सवाल तो बनता है कि खादी के पीछे गाँधीजी ने जो दर्शन जोड़ा था क्या मोदीजी उसकी बिक्री में उछाल लाने की कोई कोशिश करने को तैयार हैं? गाँधीजी आम गरीब भारतीयों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए चरखे को मुद्रा व्यवस्था की तरह सार्वभौमिक बनाना चाहते थे. यहाँ मोदीजी आम गरीब की फ़िक्र किये बिना चरखे को मुद्रा व्यवस्था बनाना तो दूर, खुद मुद्रा का ही विमुद्रीकरण कर देते हैं. पिछले कुछ महीनों से नोटबंदी की वजह से तकरीबन पांच-छह करोड़ मजदूर बेरोजगार हो गए हैं. गाँधीजी होते तो उनके हाथ में चरखा देकर मोदी सरकार के विरुद्ध प्रतिरोध खड़ा कर देते.

खादी के दर्शन को समझने के कई आयाम हैं. पहला उसके पीछे छुपा आर्थिक आत्मनिर्भरता का सूत्र है. गाँधीजी सबसे पहले और मूल रूप से राजनीतिज्ञ थे. उन्होंने अपने समयकाल परिस्थिति के अनुसार अपनी रणनीति बनायी थी. अंगरेजी राज के बर्बर आर्थिक शोषण ने भारत को खोखला कर दिया था. परंपरागत हस्तशिल्प और करघा उद्योग को बर्बाद करके विदेशी कपड़ों से भारत के बाजार को पाट दिया था. लन्दन और मैनचेस्टर के कारखानों में बने कपड़े के लिए भारत एक बाज़ार बन गया था. बुनकरों की दशा ऐसी हो गयी थी कि वो हमेशा मौत की कगार पर खड़े रहते थे. भारत में खेती और अन्य उद्योग एक दूसरे के पूरक थे. जो बुनकर थे वो किसान भी थे और जो किसान थे वे भी बुनकरी जैसे काम करते रहते थे. इस हाल में स्वदेशी आन्दोलन के नेताओं ने विदेशी माल और संस्थानों का बहिष्कार किया. गाँधीजी ने इसी भाव को विस्तार देने के लिए १९०८ के बाद चरखे को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना दिया. 

चरखा उनके लिए कई मायनों में बहुत उपयोगी अस्त्र रहा. वे हर हाथ को काम देने के पक्षधर थे. मशीन से हुआ उत्पादन उन्हें मानव श्रम के विरुद्ध लगता था. इसलिए भी चरखा कातना उन्हें मशीन के प्रति प्रतिरोध जैसा लगता था. दूसरी चीज थी कि यह भयंकर गरीबी से जूझ रहे लोगों के लिए एक ही साथ आर्थिक संबल और राजनीतिक हथियार था. आम गरीब लोग लम्बे समय तक जेल नहीं आ सकते थे. उनकी संघर्ष की क्षमता कम थी क्योंकि उन्हें अपने परिवार का पेट भी पालना होता था. इसलिए चरखा कातकर वो अपने लिए कपड़ा जुटा सकते थे, उनकी कुछ आय भी हो जाती थी और वो ब्रिटिश गुलामी के खिलाफ चल रहे महासंग्राम का हिस्सा भी बन जाते थे. तीसरे, चरखा कातने के कार्यक्रम में महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा ले सकती थीं. उनके लिए यह आराम से उनकी दिनचर्या का हिस्सा हो सकता था. महिलाओं को राजनीतिक प्रक्रियाओं का हिस्सा बनाना गाँधीजी का एक महत्वपूर्ण योगदान था. 

गाँधी चरखे को इतना महत्त्व देते थे कि उन्होंने चरखे को स्वराज के बराबर बताया था. उन्होनें कहा कि जो चरखे का महत्त्व नहीं समझते, वो स्वराज के अर्थ नहीं समझ सकते. मोदीजी और उनकी संगठन आरएसएस ने बहुत पहले ही स्वराज को सुराज में तब्दील कर दिया है. स्वराज का मतलब है हर भारतीय का अपना राज जबकि सुराज का मतलब है सत्ता चाहे किसी के हाथ हो उसे ठीक ढंग से संचालित करना. यानी उन्होंने गाँधीजी के चरखे से जुड़े दर्शन को सिर के बल खड़ा कर दिया है. हर भारतीय के हाथ में सत्ता के बजाय अब सत्ता अम्बानी-अडानी के हाथ में भी हो सकती है. और, मोदीजी उनके लिए जमीन से लेकर संसाधन तक जुटाने के लिए श्रमिक कानूनों में सुराज के नाम पर श्रमिक विरोधी बदलाव कर सकते हैं. अगर किसान अपनी जमीनें स्वेच्छा से सरकार को सौंपने को तैयार न हों तो मोदीजी सुराज के नाम पर भूमि अधिग्रहण बिल में किसान-विरोधी संशोधन कर सकते हैं.   

मोदीजी की बात अलग है. वो इतिहास का हर पन्ना फाड़कर हर कहीं अपना नाम लिखने को बेताब हैं. अगर ऐसा वो अपने कामों के बूते करते तो अलग बात थी. वो अपने प्रचार माध्यम से लोगों को यह यकीन दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि वो किसी भी महापुरुष से बड़े महापुरुष हैं. पहले उन्होंने नेहरु के खिलाफ दुष्प्रचार करने के लिए खुद को सरदार पटेल की तरह पेश किया. यह बात अलग है कि सरदार पटेल और नेहरु आपस में प्रतिद्वंदी नहीं सहयोगी थे. सरदार पटेल ने गाँधीजी की हत्या के बाद जाने कितनी बार लोगों से नेहरु को अपना नेता मानने की अपील की थी. लेकिन आरएसएस और उसके उत्पाद मोदीजी को इतिहास के सत्य से मतलब नहीं. उन्हें लोगों के दिमाग में यह कीड़ा डालने से मतलब है कि अगर नेहरु की जगह सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते तो इतिहास कुछ और ही होता. गाँधीजी पर सीधा हमला बोलने की कुव्वत इस देश में किसी के पास नहीं है. लेकिन अपरोक्ष रूप से इसी बहाने वो गाँधीजी पर भी हमला बोल लेते हैं. गाँधीजी के आस-पास के सभी महापुरुष अगर आपस में लड़ने-झगड़ने वाले तुच्छ स्वार्थी सिद्ध हो गए तो गाँधीजी सहित आजादी की समूची लड़ाई को ध्वस्त करना आसान हो जाएगा. यह कहने की जरूरत नहीं है कि आज़ादी की लड़ाई से धोखा करने वालों के पास अपना चेहरा बचाने का सिर्फ एक रास्ता है— स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत को जड़ से मिटा देना.  

गाँधीजी के बारे में उल-जुलूल बातें फैलाना और इतिहास के तथ्यों को विकृत करके पेश करना इसी योजना का हिस्सा है. हाल ही में इन्टरनेट के प्रसार के बाद संघ और उससे जुड़े संगठनों ने सोशल मीडिया और डिजिटल स्पेस के जरिये लोगों के मन में गाँधीजी के प्रति नफरत फैलाने का काम और तेज किया है. अब यह पहले से कहीं सस्ता और सुलभ साधन है. इसलिए हर तरह की सोशल नेटवर्किंग साइट्स और यूट्यूब आदि पर गाँधीजी के विरुद्ध घृणित दुष्प्रचार किया है. ये कौन लोग हैं? यह ऐसा सवाल है जिसका उत्तर एकदम आसान है. गाँधीजी की हत्या में संलिप्तता के बावजूद संघ ने कभी यह नहीं माना कि उसने गाँधीजी की हत्या में हाथ बंटाया. उसी तरह कौन नहीं जानता कि छद्म नामों से इन्टरनेट पर गाँधीजी के खिलाफ अभियान चलने वाले कौन हैं और किस विचारधारा के हामी हैं. 

आज जो भी समाज सेवा या राजनीति के क्षेत्र में आता है, खादी उसका स्वाभाविक पहनावा बन जाता है. गाँधीवादी कार्यकर्ता ही नहीं, अन्य सभी खादी के बने कुरते पहने दिखाई देते हैं. राजनीति में तो खादी एक तरह से राजनीतिक होने का प्रतीक बन गयी है. खद्दर पहनकर लोग बिना कुछ त्याग किये एक दर्जा हासिल कर लेते हैं. वह दर्जा है गाँधीजी की तरह देश और समाज के लिए समर्पित होने का. जब भी कोई राजनीति में हाथ अजमाने का विचार करता है, वह सीधा खादी भण्डार की ओर चल देता है. यह कई लोगों की गाँधी के प्रति श्रृद्धा है. वो गांधी को अपना आदर्श मानते हैं. इसलिए गाँधीजी जैसा पहनावा और उसके पीछे का दर्शन उनके जीवन का अंग बन जाता है. कई समर्पित गाँधीवादी कार्यकर्ता आज भी रोजाना चरखा कातते हैं. कई आजीवन खादी को पहनकर सादगीपूर्ण जीवन जीते हैं. इसलिए वो लोग इस विवेचना के दायरे में नहीं आते. मैं उन सब लोगों के प्रति चिंतित हूँ जो खादी को अपनी कमियाँ-कमजोरियाँ छुपाने की ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं. 

कभी-कभार खादी पहनने के बावजूद मैं खुद को यह नहीं समझा पाता कि एक गाँधीवादी कार्यकर्ता होने के नाते मुझे हमेशा खादी पहननी चाहिए. इसकी वजह है कि आज खादी भंडारों पर बिकने वाली खादी के पीछे गाँधीजी का सामाजिक-राजनीतिक दर्शन लापता है. अब यह किसी राजनीतिक लड़ाई का अस्त्र नहीं है, सामाजिक रूपांतरण का साधन नहीं है. केवल एक चीज है कि खादी की बुनाई-कताई में लगे लोगों के लिए खादी आज भी रोजगार का साधन है और खादी ग्रामोद्योग जैसे संस्थानों के लिए मोटी कमाई और मुनाफे का जरिया. हाल की इस घटना ने मेरे इस विश्वास को पुख्ता कर दिया है कि यह खादी वह खादी नहीं है. वैसे भी गाँधीजी कहते थे कि कातो तो पहनो और पहनो तो कातो. अब कातने वाले महँगी होने की वजह से खादी पहनते नहीं और पहनने वाले खादी-दर्शन के प्रति श्रद्धा न होने की वजह से कातते नहीं. इसीलिए लोगों से खादी पहनने की अपील करके खादी की बिक्री में अभूतपूर्व उछाल लाने वाले मोदीजी जब लुधियाना में चरखा कातते हैं तो चरखा नहीं कात पाते, महज़ फोटो सेशन करते हैं. और, सिर्फ मोदीजी ही क्यों, राजनीतिक गलियारों में ठाठ से खादी पहनकर घूमने वालों में जाने कितनों को तकली पकड़ना तक नहीं आता होगा. बस उनमें और मोदीजी में इतना फर्क है कि सारी अज्ञानता के बावजूद वो गाँधीजी की जगह अपनी फोटो लगवाने की बात सोच तक नहीं सकते और मोदीजी संघ की पाठशाला से भारत के चप्पे-चप्पे से गाँधीजी का नामो-निशान मिटाने की हसरत लेकर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे हैं.

(लेखक राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट नामक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक है. यह संगठन स्वाधीनता संघर्ष के मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए समर्पित है.) 
ईमेल: saurabhvajpeyi@gmail.com

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