9 August 2016

करो या मरो

मृदुला मुख़र्जी 
(भारत का स्वतंत्रता संघर्ष पुस्तक से साभार )

....यों तो गांधीजी आने वाले संघर्ष के बारे में चर्चा करते ही आ रहे थे, पर अब देर करना उन्हें गलत लगने लगा था. उन्होंने कांग्रेस को यह चुनौती भी दे डाली थी कि अगर उसने संघर्ष का उसका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया तो “मैं देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दूंगा.” नतीजतन कांग्रेस कार्यसमिति ने वर्धा की अपनी बैठक (14 जुलाई 1942) में संघर्ष के निर्णय को अपनी स्वीकृति दे दी. अगले महीने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक होने वाली थी, जिसमें इस प्रस्ताव का अनुमोदन होना था. यह ऐतिहासिक सभा बम्बई के ग्वालिया टैंक में हुयी. जनता का उत्साह देखते ही बनता था. अन्दर तो नेता विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श कर रहे थे और बाहर जनसमुद्र उमड़ रहा था. नेताओं का निर्णय जानने की उत्सुकता इतनी थी कि खुले अधिवेशन में जब भाषण होने लगे, तो हजारों- हजार की भीड़ होने के बावजूद सभा में पूरी शान्ति थी.

करो या मरो 
गांधीजी के भाषण का बिजली जैसा असर हुआ. सबसे पहले तो उन्होंने यह स्पष्ट किया कि “असली संघर्ष इसी क्षण से शुरू नहीं हो रहा है. आपने सिर्फ अपना फैसला करने का संपूर्ण अधिकार मुझे सौंपा है. अब मैं वायसराय से मिलूँगा और उनसे कहूँगा कि वे कांग्रेस का प्रस्ताव स्वीकार कर लें. इसमें दो या तीन हफ्ते लग जायेंगे.” लेकिन “इतना आप निश्चित जान लें कि मैं मंत्रिमंडलों वगैरह पर वायसराय से कोई समझौता करने नहीं जा रहा हूँ. सम्पूर्ण आज़ादी से कम किसी भी चीज़ से मैं संतुष्ट होने वाला नहीं. हो सकता है कि नमक टैक्स, शराबखोरी आदि ख़त्म करने का प्रस्ताव दें. लेकिन मेरे शब्द होंगे, ‘आज़ादी से कम कुछ नहीं’.” इसके बाद ही उन्होंने ‘करो या मरो’ का नारा दिया, “एक मंत्र है, छोटा- सा मंत्र, जो मैं आपको देता हूँ. उसे आप अपने ह्रदय में अंकित कर सकते हैं और अपनी सांस-सांस द्वारा व्यक्त कर सकते हैं. वह मंत्र है, करो या मरो, या तो हम भारत को आज़ाद कराएँगे या इस कोशिश में अपनी जान दे देंगे. अपनी गुलामी का स्थायित्व देखने के लिए हम जिंदा नहीं रहेंगे.”....

9 अगस्त के तड़के ही कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर अज्ञात स्थानों पर भेज दिया गया. वस्तुतः सरकार युद्ध के बाद से ही यह कदम उठाने की तैयारी कर रही थी और 1940 में ही उसने एक विस्तृत क्रांतिकारी आन्दोलन अध्यादेश जारी कर दिया था. 8 अगस्त 1940 को वायसराय ने राज्यपालों को एक पत्र में लिखा था, “मैं गहराई से महसूस करता हूँ कि मौजूदा हालात में यदि कांग्रेस का कोई हिस्सा युद्ध की घोषणा कर देता है, तो उसका एकमात्र संभव जवाब यही हो सकता है कि पूरे संगठन को ही कुचलने का इरादा घोषित कर दिया जाए.” गांधीजी बड़ी सावधानी से जल्दबाजी से इस जाल में फंसने से बचते आ रहे थे और व्यक्तिगत सत्याग्रह, लगातार प्रचार व संगठनात्मक कार्यों से आन्दोलन का माहौल बनाये हुए थे. लेकिन अब सरकार उन्हें और वक़्त देने को राजी नहीं थी. इसके पहले कि अखिल भारतीय कांग्रेस समिति भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित करे, गिरफ्तारी और दमन के सरकारी निर्देश जारी हो गए. 

सरकार के इस अचानक हमले से देश भर में तूफ़ान-सा आ गया. बम्बई में लाखों लोग ग्वालिया टैंक की ओर उमड़ पड़े, जहां एक जनसभा होने की घोषणा की गयी थी. अधिकारीयों से टकराव भी हुआ. अहमदाबाद और पूना में भी यही हुआ. 10 अगस्त को दिल्ली, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना इत्यादि शहरों में हड़ताल रही तथा बड़े-बड़े जुलूस निकले. इसके साथी ही सरकार ने प्रेस पर हमला बोल दिया. बहुत-से अखबार कुछ दिनों के लिए बंद रहे. ‘नेशनल हेराल्ड’ और ‘हरिजन’ तो पूरे आन्दोलन के दौरान नहीं निकले. 

प्रान्तीय तथा स्थानीय स्तर के नेता गिरफ्तार होने से बच गए थे, वे अपने-अपने इलाके में चले गए और प्रतिरोधक गतिविधियों में लग गए. देहात में भी जैसे ही खबर पहुँचने लगी, तो वहां भी विद्रोह का सिलसिला चल पड़ा. छः-साथ सप्ताह तक देश भर में तुमुल आन्दोलन रहा. कुछ ही स्थानों पर लोगों की विशाल भीड़ ने पुलिस थानों, डाकघरों, कचहरियों, रेलवे स्टेशनों तथा सरकारी सत्ता के दूसरे प्रतीकों पर आक्रमण कर दिया. सार्वजनिक भवनों पर तिरंगा फहराया गया. गाँववालों ने हजारों की संख्या में एकत्र होकर रेल की पटरियाँ उखाड़ दीं. पुल उड़ा दिए गए और टेलीफोन तथा तार की लाइनें काट दी गयीं. तहसीलों और जिला मुख्यालयों में सत्याग्रहियों ने गिरफ्तारी भी दी. स्कूल-कॉलेजों में हड़ताल हो गयी और छात्र जुलूस निकालने तथा गैरकानूनी पर्चे लिखने और बांटने में लग गए. ऐसी कई-सौ गैरकानूनी पत्रिकाएँ देश भर से निकलती रहीं. छात्रों ने उभरते हुए गुप्त संगठनों में भी सन्देश ले जाने वगैरह का काम किया. मजदूर भी पीछे नहीं रहे. अहमदाबाद में कारखाने साढ़े तीन महीने तक बंद रहे, बम्बई में एक हफ्ते से ज्यादा तक और जमशेदपुर में 13 दिन तक. अहमदाबाद और पूना के मजदूर कई महीने तक सक्रिय रहे.    




विद्रोह का माहौल 
बिहार और यूपी में तो विद्रोह जैसा माहौल बन गया. अगस्त के मध्य तक विद्यार्थियों तथा अन्य राजनीतिक कार्यकर्ताओं के जरिये आन्दोलन की खबर गाँवों तक फैलने लगी. काशी विश्वविद्यालय के छात्रों ने ‘भारत छोड़ो’ का सन्देश फ़ैलाने के लिए गाँवों में जाने का फैसला किया. उनके नारे थे, थाना जलाओ, स्टेशन फूंक दो, अंग्रेज भाग गया इत्यादि. उन्होंने रेलगाड़ियों पर राष्ट्रीय ध्वज भी फहराया. विद्रोह ने अधिकतर यह रूप धारण किया कि बड़ी संख्या में किसान पास के कस्बे में जुटते और सरकारी सत्ता के सभी प्रतीकों पर हमला बोल देते. कहीं आग लगा दी जाती, कहीं सरकारी अधिकारियों से मुठभेड़ होती. दमन होता, लेकिन इससे जनता का उत्साह कम नहीं हुआ. बिहार के तिरहुत प्रखंड में तो दो सप्ताह तक कोई सरकार ही नहीं थी. सचिवालय गोलीकांड के बाद पटना दो दिन तक बेकाबू रहा. उत्तर और मध्य बिहार के 80 प्रतिशत थानों पर जनता का राज हो गया था. कुछ स्थानों पर गोरों पर व्यक्तिगत हमला भी हुआ. पूर्वी यूपी में आजमगढ़, बलिया और गोरखपुर तथा बिहार में गया, भागलपुर, सारण, पूर्णिया, शाहाबाद, मुजफ्फरपुर और चंपारण स्वतःस्फूर्त जन-विद्रोह के मुख्य केंद्र रहे.

सरकारी आकलनों के अनुसार, नेताओं की गिरफ्तारी के पहले हफ्ते के अन्दर 250 रेलवे स्टेशन या तो नष्ट कर दिए गए या क्षतिग्रस्त हुए और 500 से ज्यादा डाकघरों तथा 150 थानों पर हमला हुआ. पूर्वी यूपी और बिहार में रेलगाड़ियों का आवागमन कई हफ्ते तक अस्तव्यस्त रहा. सिर्फ कर्नाटक में टेलीफोन के तार काटें की 1600 घटनाएं हुईं तथात 28 रेलवे स्टेशनों और 32 डाकघरों पर हमला हुआ. निहत्थी भीड़ ने 532 अवसरों पर पुलिस और सेना की गोलीबारी का सामना किया— यहाँ तक कि हवाई जहाज़ से मशीनगनें भी चलाई गयीं. दमन के अन्य रूप थे— सामूहिक जुर्माना (कुल 90 लाख रुपये इस तरह वसूल किये गए), संदिग्ध लोगों को कोड़ों से पीटना तथा जिन गावों के लोग भाग गए थे, उनमें आग लगा देना. 1942 के अंत तक 60 हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका था, लगभग 26 हजार लोगों को सजा हुयी और 18 हजार लोगों को भारत रक्षा अधिनियमों के तहत बंद रखा गया. मार्शल लॉ लागू नहीं किया गया था और हालांकि सेना कहने को नागरिक प्रशासन के तहत काम कर रही थी, पर दरअसल वह मनमानी कर रही थी. दमन उतना ही कठोर था जितना मार्शल लॉ के अंतर्गत हो सकता था. 

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