2 November 2015

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी: ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरज़ू लेकर चले थे

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शुभनीत कौशिक 

बीएचयू के बारे में सोचते ही अक्सर उसकी संभावनाओं के बारे में ही ख़याल आता हैं। वे संभावनाएं जो मूर्त रूप न ले सकीं, जो दिन की रोशनी न देख सकीं। मतलब, बीएचयू ऐसा “हो सकता था” वाला भाव छा जाता है मन पर, पर वह भाव उतनी ही जल्द तिरोहित हो जाता है, बीएचयू ऐसा “नहीं हो सका” वाले भाव से।महामना ने बड़ी मेहनत से, लगन से खड़ा किया यह विश्वविद्यालय, और उनके इस प्रयोजन में एनी बेसेंट और दरभंगा के महाराजा ने भी बड़ी भूमिका निभाई।
फरवरी 1916 में इस विश्वविद्यालय के स्थापना समारोह में गांधी भी शरीक हुए और उन्होंने उस समारोह में वक्ताओं को मौजूद लोगों को अंग्रेज़ी में संबोधित करने पर आड़े हाथों लिया था। फिर गांधी बीएचयू में आते ही रहे। 1942 में गांधी बीएचयू आए, डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन कुलपति थे उस वक्त, 25 वें दीक्षांत समारोह में भाग लेने के लिए। उसी दौरान गांधी ने याद दिलाया कि हिन्दी के इतने बड़े समर्थक मालवीयजी के इस विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर भी अंग्रेज़ी का ही व्यवहार हो रहा है, यानि मुख्य द्वार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था “BANARAS HINDU UNIVERSITY” और कहीं कोने में हिंदी में लिखा हुआ था “काशी हिंदू विश्वविद्यालय”। तो गांधी की इस शिकायत के बाद मुख्य द्वार पर आखिरकार हिंदी में लिखा गया “काशी हिंदू विश्वविद्यालय”।
इस विश्वविद्यालय के कुलपतियों में मालवीयजी, राधाकृष्णन के अलावे आचार्य नरेंद्र देव और डॉ अमरनाथ झा जैसे लोग भी शामिल थे। 1940-50 के दशक में बीएचयू के बारे में वैज्ञानिक और खगोलविद जयंत नार्लीकर ने बेहतरीन संस्मरण लिखे हैं। उनके पिता प्रो विष्णु नार्लीकर उस वक़्त बीएचयू में ही गणित के अध्यापक थे। बीएचयू में वासुदेव शरण अग्रवाल जैसे कला-मर्मज्ञ, शांति स्वरूप भटनागर, टी आर अनंतरमन (जो रोड्स स्कालर थे) जैसे वैज्ञानिकों, अनंत सदाशिव आलतेकर जैसे इतिहासकारों ने पढ़ाया। पर अपने स्वभाव में, कार्य करने के तरीके में यह विश्वविद्यालय निहायत सामंती प्रवृत्ति दर्शाता रहा है। वह चाहे स्थानीय प्रभाव से हो या किसी अन्य वजह से। जिसका खामियाजा सर जदुनाथ सरकार, शांति स्वरूप भटनागर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह, गणेश प्रसाद जैसे शिक्षकों को भुगतना पड़ा।

सर जदुनाथ सरकार बीएचयू के पहले लाइब्रेरियन थे, विश्वविद्यालय के बिलकुल आरंभिक दिनों में 1920-21 के दौरान वे यहाँ आए पर साल बीतते-बीतते लोगों ने जिस-तिस कारण से उनका विरोध शुरू कर दिया। आखिरकार सर जदुनाथ को बीएचयू छोडना पड़ा। बाद में, अपने इतिहासकार मित्र जी एस सरदेसाई को लिखे पत्रों में, सर जदुनाथ सरकार ने बीएचयू जाने के अपने निर्णय पर ही अफसोस जताया।
बीएचयू का कुलगीत लिखने वाले शांति स्वरूप भटनागर भी ऐसी ही कुछ वजहों से बीएचयू के विज्ञान संकाय में रसायनशास्त्र के विभागाध्यक्ष पद को छोडकर अन्यत्र चले गए। शांति स्वरूप भटनागर की जीवनी लिखने वाली नोरा रिचर्ड्स के अनुसार, असल में शांति स्वरूपजी ने मालवीयजी से अपने ही विभाग के एक शिक्षक की शिकायत इसलिए की थी क्योंकि उस शिक्षक पर ‘वैचारिक चोरी’ यानि plagiarism के आरोप थे। [तब भी plagiarism होता था] पर इस वजह से विज्ञान संकाय में शांति स्वरूपजी के विरुद्ध माहौल बन गया। ऐसे विरोधी वातावरण में काम करने की बजाय उन्होंने यहाँ से चले जाना ही बेहतर समझा।[ देखें नोरा रिचर्ड्स, ‘सर शांति स्वरूप भटनागर’]
ऐसा ही व्यवहार बलिया में जन्मे गणित के अत्यंत प्रतिभाशाली शिक्षक गणेश प्रसाद के साथ बीएचयू में 1923 में किया गया, जब गणेश प्रसाद को इस विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया। गौरतलब है कि तब महामना मालवीय ही इस विश्वविद्यालय के कुलपति थे, 1919-1938 तक। गणेश प्रसाद (1876-1935) को भारत में “आधुनिक गणितीय शोध का पिता” (फादर ऑफ मैथेमेटिकल रीसर्च) माना जाता है और उन्होंने बनारस में मैथेमेटिकल सोसायटी की भी स्थापना की थी।
बाबू जगजीवन राम को भी इस विश्वविद्यालय में दुखद प्रसंग झेलना पड़ा। यद्यपि वे मालवीयजी के बुलाने पर ही बीएचयू में पढ़ने के लिए आए थे, पर यहाँ कोई भी खाना बनाने वाला महराज जगजीवनजी के लिए खाना बनाने के लिए, और कोई छात्र उनके साथ खाना खाने और छात्रावास में रहने के लिए तैयार नहीं हुआ। आखिरकार जगजीवनजी बीएचयू में नहीं पढ़ सके। मैं सोचता हूँ कि अगर मालवीयजी विरोध की परवाह न करते, या कहते कि कुलपति के रूप में मैं यह कहता हूँ कि ‘जगजीवन राम इसी बीएचयू में पढ़ेंगे, रहेंगे और सबके साथ ही खाएँगे’। तो क्या यह सामंती सोच को तोड़ने और सामाजिक बदलाव लाने का काम नहीं होता। पर ऐसा न होना था, और नहीं हुआ।
हिन्दी के प्रसिद्ध विद्वान हजारी प्रसाद द्विवेदी भी, जो स्वयं बीएचयू के छात्र रहे थे, इस विश्वविद्यालय में बदसलूकी के शिकार हुए। वे दलबंदियों, और हिन्दी विभाग के राजनीतिक पचड़ों में नहीं पड़ना चाहते थे, पर रुद्र काशिकेय जैसे लोगों ने उन्हें जबरन इसमें घसीटा। (देखें, विश्वनाथ त्रिपाठी की किताब “व्योमकेश दरवेश”)
यही व्यवहार नामवर सिंह के साथ भी हुआ, जो पहले कई वर्षों तक हिंदी विभाग में तदर्थ अध्यापक के रूप में रहे पर बाद में उन्हें बिना कारण बताए बाहर का रास्ता दिखा दिया। [देखें काशीनाथ सिंह की किताब ‘घर का जोगी जोगड़ा’]
इस विश्वविद्यालय से पढ़ने वालों में एक नाम माधव राव सदाशिवराव गोलवलकर का भी है। कोई व्यक्ति कहीं से भी पढ़ सकता है, और आगे चलकर किसी विचारधार से जुड़ सकता है। पर बीएचयू के लिए दुर्भाग्यपूर्ण तो यह रहा कि इस विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बाकायदे प्रश्रय दिया। आपातकाल के दौरान कालूलाल श्रीमाली ने विधि संकाय में स्थित संघ के कार्यालय को तुड़वा दिया। आगे चलकर इसका खामियाजा श्रीमाली जी को भुगतना पड़ा, जब भरत सिंह के नेतृत्व में संघियों ने बीएचयू के पूर्व कुलपति श्रीमाली को कैंपस में दौड़ाकर मारा, उन्हें चप्पलों की माला पहनाई गई, ऐसा सिंहद्वार के सामने स्थित महामना की प्रतिमा के ठीक सामने किया गया। क्या तब महामना शर्मसार नहीं हुए होंगे। आज यही भरत सिंह वर्तमान लोकसभा में बलिया से भाजपा के सांसद हैं। [देखें डॉ तुलसीराम, ‘मणिकर्णिका’]
इस विश्वविद्यालय में दलितों के साथ जैसा दुर्व्यवहार किया गया, और आज भी किया जाता है उसका उल्लेख डॉ तुलसीराम जी ने अपनी आत्मकथा के दूसरे खंड में किया ही है। पर इसी विश्वविद्यालय से डॉ आनंद कुमार, दीपक मल्लिक जैसे छात्र नेता भी उभरे। कलाविद कपिला वात्स्यायन ने यहीं वासुदेव शरण अग्रवाल के निर्देशन में शोध किया था। हिन्दी के अनेक मर्मज्ञ आलोचक यहाँ अध्यापक रहे। पर इन सब उपलब्धियों के बावजूद इस विवि की कमियों को ढाँपा नहीं जा सकता, या दुष्यंत के शब्दों में ‘उपलब्धियों के नाम पर आकाश-सी छाती तो है’ ऐसा ही कहना पड़ेगा।
यहाँ लोगों में, छात्रों में सामंती प्रवृत्ति, हॉस्टल के मेस में स्पेशल ट्रीटमेंट लेने से लेकर दलितों और छात्राओं के प्रति होने वाले व्यवहार में, स्पष्ट ही दिखती है। और इस प्रवृत्ति से यहाँ का छात्र समुदाय, शिक्षक, गैर-शिक्षक समुदाय भी कतई अछूता नहीं है।

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