23 October 2014

विवाद का धर्म

अरुण माहेश्वरी
जनसत्ता 29 सितंबर, 2014: कुछ टीवी चैनलों पर सनातनपंथियों और सार्इं भक्तों के बीच धर्म की दुनिया में चल रही वर्चस्व की लड़ाई के दृश्य बेहद दिलचस्प थे। मंदिरों से सार्इं बाबा की मूर्तियों को हटाने, उनकी पूजा-अर्चना पर रोक लगाने का जैसे एक अभियान चल रहा है। तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं वाले सनातन धर्म के पास अब एक भी नए देवता को रखने की जगह नहीं है! जो लोग सनातन धर्म की सर्वसमावेशी उदारता के प्रमाण के तौर पर बुद्ध और महावीर को भी उसके देवताओं की कतार में शामिल करने की बात कहते हैं, उसी के इस आक्रामक रुख की उनके पास कोई विशेष व्याख्या नहीं है। सार्इं के चरित्र को लेकर मनगढ़ंत किस्सों को जरूर हवा में उछाला जा रहा है, जैसा कभी ब्राह्मणवाद और बौद्ध दर्शन के बीच या शैव और वैष्णवों के बीच के खूनी संघर्षों के समय में भी किया गया होगा।
जब हम आधुनिक भारत में राजनीति या सत्ता-विमर्श में धर्म के प्रवेश के इतिहास को देखते हैं तो अनायास ही हमारा ध्यान आरएसएस की ओर चला जाता है। आधुनिक भारत में आरएसएस एक ऐसा प्रमुख राजनीतिक उद्देश्यों वाला संगठन है, जो धर्म के जरिए राजनीति करने के साथ ही धर्म के क्षेत्र में भी प्रत्यक्ष दखलंदाजी को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाए हुए है। आरएसएस के इतिहासकार विश्व हिंदू परिषद के गठन को आरएसएस के जीवन की एक बहुत बड़ी घटना मानते रहे हैं। गंगाधर इंदूरकर ने अपनी किताब ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अतीत और वर्तमान’ में लिखा है- ‘संघ द्वारा स्थापित अन्य संस्थाओं की अपेक्षा इस संस्था (विश्व हिंदू परिषद) के विषय में गुरुजी को अधिक आत्मीयता थी। …राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अतिरिक्त किसी अन्य संस्था के साथ गुरुजी का नाम नहीं जुड़ा, किन्तु विश्व हिंदू परिषद के लिए बाईस व्यक्तियों का जो प्रथम ट्रस्ट बना, उसमें तेरहवें क्रमांक पर माधव सदाशिव गोलवलकर का नाम दिखाई देता है।’
आरएसएस का ‘एकचालाकानुवर्तित्व’ का सिद्धांत सिर्फ राजनीति के लिए नहीं, धर्म के क्षेत्र में भी हिंदू समाज के सभी धार्मिक संस्थानों को एक कमान के अधीन लाने का सिद्धांत है। विहिप का गठन हिंदू धर्म को एक पैगंबरी धर्म में तब्दील करने के मकसद से हिंदुओं की सभी धार्मिक संस्थाओं में दखल देने के लिए किया गया था। आरएसएस भारतीय धर्म-दर्शन की वैविध्यमय विशिष्टता को अपने रास्ते की बड़ी बाधा मानता रहा है। इसीलिए उसने गिरजाघरों और मस्जिदों की तरह किसी एक संस्था के द्वारा हिंदुओं के धार्मिक जीवन को चालित करने का बीड़ा उठा रखा है।
विहिप की घोषित मान्यताओं में कहा गया है कि ‘परिवर्तित संदर्भों में मठ, मंदिर आदि धार्मिक केंद्रों को केवल भक्ति, पूजा, उपासना केंद्रों के रूप में नहीं, बल्कि सेवा और सामाजिक प्रगति के आधार-बिंदु के रूप में देखा जाए।’ अपने अस्तित्व के इन तमाम सालों में विहिप धर्म-संस्थाओं पर अपनी जकड़बंदी के विस्तार में कितना सफल या विफल रहा, यह एक शोध का विषय है। लेकिन इतना साफ है कि उसने धार्मिक मठों, बाबाओं-गुरुओं को सत्ता की राजनीति का अंग बना कर धर्म के पूरे क्षेत्र को आत्मिक उत्थान या आस्था के बजाय वर्चस्व कायम करने के तमाम कुत्सित झगड़ों और विवादों का रणक्षेत्र जरूर बना दिया। आए दिन मठों के अंदर के खूनी संघर्षों के किस्से अखबारों में पढ़ने को मिलते रहते हैं। सत्ता के पक्ष-विपक्ष के खेल में शामिल करके संघी राजनीति ने तमाम मठाधीशों, बाबाओं-गुरुओं में सत्ता का नया मद जागृत किया है। सार्इं प्रसंग में सनातनपंथियों की यही आक्रामकता खुल कर सामने आ रही है। इतिहास गवाह है कि वर्णाश्रमी सनातन धर्म के झंडाबरदारों के जरिए अगर समाज में पुरातनपंथी विचारों और भावनाओं को किसी भी रूप में बल मिलता है तो आखिरकार इसका प्रभाव भारत में सामाजिक न्याय की लड़ाई और भारतीय जनतंत्र पर पड़ेगा।




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