29 September 2016

भगत सिंह और सांप्रदायिकता का सवाल

शुभनीत कौशिक 

सांप्रदायिकता के सवाल पर विचार करते हुए क्रांतिकारी विचारक भगत सिंह ने ‘किरती’ पत्रिका में मई-जून 1928 में दो विचारोत्तेजक लेख लिखे थे। ये लेख न सिर्फ़ अपने ऐतिहासिक संदर्भ और सांप्रदायिकता के प्रश्न पर अंतर्दृष्टि देने के लिए पढ़े जाने चाहिए, बल्कि भारत की वर्तमान स्थिति में ये लेख तो पहले से ज़्यादा प्रासंगिक हो जाने के कारण और पठनीय हो चले हैं। 

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आइए, सबसे पहले पढ़ते हैं और सिलसिलेवार ढंग से विचार करते हैं, जून 1928 में ‘किरती’ पत्रिका में छपे उनके लेख पर, जिसका शीर्षक था: ‘सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज’। इस लेख की पहली पंक्तियों में यह आशावादी क्रांतिकारी विचारक कुछ निराश-सा जान पड़ता है तत्कालीन हिंदुस्तान की दशा से। वे लिखते हैं, ‘भारतवर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म के होना ही दूसरे धर्म के कट्टर शत्रु होना है’। वे देखते हैं कि किसी व्यक्ति का हिन्दू, मुस्लिम या सिख होना भर ही काफी है उसके मारे जाने के लिए। ऐसी स्थिति में, भगत सिंह को भारत का भविष्य अंधकारमय नजर आता है। क्या आज 2015 के भारत में हम ठीक ऐसी ही परिस्थितियों से दो-चार नहीं हो रहे हैं।

इन ‘धर्मों’ ने, भगत सिंह के अनुसार, ‘हिंदुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है’। वे चिंता जताते हैं कि आखिर धार्मिक दंगे भारत का पीछा कब छोड़ेंगे। वे इस बात पर दुखी हैं कि ‘अंधविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं’। ऐसे विरले ही लोग होते हैं, जो अंधविश्वास की धारा के प्रतिकूल अपने दिमाग और तर्क में विश्वास को बरकरार रख पाते हैं। सांप्रदायिक दंगों के लिए, भगत सिंह सांप्रदायिक नेताओं और अखबारों को जिम्मेदार ठहराते हैं। वे कहते हैं कि “इस समय हिंदुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने का बेड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज-स्वराज’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाए बैठे हैं या इसी धर्मांधता के बहाव में बह चले हैं’। 

धर्मांधता के बहाव में बह जाने वालों नेताओं में से एक, भगत सिंह के आदरणीय नेता लाला लाजपत राय खुद थे। लाला लाजपत राय के हिंदू महासभा में शामिल होने और सांप्रदायिक राजनीति के प्रति उनके झुकाव का विरोध करने के लिए भगत सिंह ने एक नायाब तरीका अपनाया। भगत सिंह ने एक पैम्फलेट छापा, जिसमें उन्होंने राबर्ट ब्राउनिंग की प्रसिद्ध कविता ‘द लॉस्ट लीडर’ को उद्धृत किया। ब्राउनिंग ने अपनी यह कविता स्वतन्त्रता के विरुद्ध हो जाने पर विलियम वर्ड्सवर्थ की आलोचना करते हुए लिखी थी। इसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थीं: ‘Just for a handful of silver he left us’, ‘Blot out his name, then, record one lost soul more’। इस पूरे पैम्फलेट में, लाला लाजपत राय के विरुद्ध एक शब्द नहीं कहा गया था, बस आवरण-पृष्ठ पर उनकी तस्वीर ही छाप दी गयी थी! [बिपन चंद्र, इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस, पृ. 257] भगत सिंह मानते हैं कि ऐसे नेता जरूर हैं जो अपने हृदय से सबका भला चाहते हैं, पर उनकी संख्या इतनी कम है कि वे ‘सांप्रदायिकता की प्रबल बाढ़ को’ रोक पाने में समर्थ नहीं है। ऐसी दशा में उद्विग्न होकर भगत सिंह कह उठते हैं कि लगता है ‘भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है’। 

सांप्रदायिक दंगों को भड़काने के लिए, भगत सिंह, अख़बारों को भी समान रूप से दोषी ठहराते हैं। उन्हें दुख है कि पत्रकारिता का व्यवसाय ‘गंदा’ हो चला है। दंगों में अखबारों की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए भगत सिंह कहते हैं कि ये अखबार ‘एक-दूसरे के विरुद्ध मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएं भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौवल करवाते हैं’। ध्यान रहे कि भगत सिंह स्वयं भी एक पत्रकार थे। गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र ‘प्रताप’, पंजाब से छपने वाली पत्रिका ‘किरती’ और हिंदी की पत्रिकाओं जैसे ‘चाँद’, ‘अभ्युदय’, ‘भविष्य’, ‘मतवाला’ में उन्होंने लगातार लेख लिखे थे। इस संदर्भ में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आख़िर यह युवा विचारक पत्रकारिता के बारे में, अखबारों और उनके संपादकों के कर्तव्य और जिम्मेदारियों की चर्चा करते हुए किन बातों पर खास तौर पर ज़ोर देता है। 

बकौल भगत सिंह, अखबारों का असली कर्तव्य है: शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना। पर उन्हें दुख है कि अपने इस असल कर्तव्य का पालन करने की बजाय, अखबार ठीक इसके उलट, अज्ञान फैलाने, संकीर्णता का प्रचार करने, लोगों को सांप्रदायिक बनाने और इस तरह भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करने जैसा काम कर रहे हैं। इस सबसे भगत सिंह के मन में एक सवाल कौंधता है, और वह सवाल यह है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’ वे पाते हैं कि असहयोग आंदोलन के दौरान जहाँ ऐसा लगता था कि स्वतन्त्रता मिलने में बस थोड़ी ही देर है, वहीं अब ऐसी दिन आ गए हैं कि ‘स्वराज्य एक सपना मात्र’ बनकर रह गया है। 

आज से लगभग नौ दशक पहले कही गई भगत सिंह की ये बातें, 21वीं सदी के भारत में भी अखबारों की मौजूदा दशा पर कितनी सही साबित होती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अज्ञान, सांप्रदायिकता, संकीर्णता फैलाने और साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करने के इस (कु)कर्तव्य में अब अखबारों-पत्रिकाओं के साथ, इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया भी शामिल हो गया है।

एक परिपक्व विचारक की भांति भगत सिंह, सांप्रदायिकता के समस्या की जड़ में जाने की कोशिश करते हैं और पाते हैं कि इसके मूल में आर्थिक कारण ही हैं। वे कहते हैं कि ‘विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल जरूर होता है’। उनके अनुसार, तबलीग़, तंज़ीम, शुद्धि आदि जो संगठन शुरू हुए उनमें कहीं-न-कहीं आर्थिक कारण निहित थे। भगत सिंह इस समस्या का निदान सुझाते हुए, भारत की आर्थिक दशा में सुधार लाने पर ज़ोर देते हैं क्योंकि जब तक मुल्क की आर्थिक दशा नहीं सुधरेगी, तब तक कोई ‘एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता है’। भूख और दुख से पीड़ित किसी इंसान के लिए सिद्धांतों की बात बेमानी है। वे कहते हैं आर्थिक सुधारों के लिए औपनिवेशिक शासन को समाप्त करना जरूरी है और इसके लिए लोगों को चाहिए कि वे हाथ धोकर औपनिवेशिक सरकार के पीछे पड़ जाएँ और ‘जब तक सरकार न बदल जाये, चैन की सांस न लें’!

सांप्रदायिकता की समस्या से निबटने के लिए भगत सिंह ने किसानों और मजदूरों में वर्ग-चेतना जगाने पर ज़ोर दिया। ताकि वे समझ सकें कि उनके असली दुश्मन पूंजीपति हैं और वे इनके हथकंडों और षडयंत्रों से सावधान रह सकें। भगत सिंह गरीबों से जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के भेदभाव के बिना एकजुट होने और सत्ता अपने हाथ में लेने का आह्वान करते हैं। और जब मजदूरों और किसानों को संबोधित करते हुए वे यह कहते हैं, ‘इन यत्नों में तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जाएंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्रता मिलेगी’, तो वे असल में कार्ल मार्क्स की प्रसिद्ध उक्ति को ही प्रतिध्वनित करते हैं। 

वे इस बात पर खुशी जाहिर करते हैं कि अब भारतीय नवयुवकों के लिए कोई भी व्यक्ति पहले इंसान है, फिर भारतवासी। किसी व्यक्ति के धर्म को तरजीह न देने वाले इन युवकों को भगत सिंह साहस देते हुए कहते हैं, ‘दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए, बल्कि तैयार-बर-तैयार हो यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने’। वे इस संदर्भ में गदर पार्टी के क्रांतिकारियों के विचारों को भी याद करते हैं। स्मरणीय है कि इन क्रांतिकारियों में से एक करतार सिंह सराभा थे, जिन्हें भगत सिंह अपना आदर्श मानते थे। गदर पार्टी के क्रांतिकारियों की समझ में ‘धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला था, जिसमें दूसरे का कोई दखल नहीं और न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए’। भगत सिंह के मतानुसार ‘यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते हैं, धर्मों में चाहे हम अलग-अलग ही रहें’।

‘किरती’ पत्रिका में ही, एक महीने पहले यानि मई 1928 में छपे अपने एक अन्य लेख, ‘धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम’ में, भगत सिंह ने अमृतसर में अप्रैल 1928 में हुई नौजवान सभा की कान्फ्रेंस के संदर्भ में राष्ट्रीय आंदोलन और धर्म के मुद्दे पर अपने विचार जाहिर किए। कान्फ्रेंस में कुछ लोगों का मत था कि धर्म के सवाल को छेड़ा ही न जाए। भगत सिंह कहते हैं कि प्रथमदृष्टया यह भले ही बड़ी ‘नेक सलाह’ जान पड़े पर, असल अनुभव तो कुछ और ही कहानी बयान करते हैं। वे इस संदर्भ में असहयोग आंदोलन का उदाहरण देते हैं, जब राजनीतिक मंचों पर धर्मों को पूरी आज़ादी दी गई। पर इसका नतीजा क्या निकाला! धार्मिक संकीर्णता घटने की बजाय और बढ़ गई। इस दुष्परिणाम को समझकर ही, ‘पूर्ण स्वतन्त्रता’ के हामी कुछ राष्ट्रवादी नेताओं ने यह कहना शुरु किया कि धर्म एक तरह की ‘दिमागी गुलामी’ है और यह भी कि ‘बच्चों से यह कहना कि ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है, मनुष्य कुछ भी नहीं – बच्चों को हमेशा के लिए कमजोर बनाना है’। 

धर्म की प्रासंगिकता के संदर्भ में भगत सिंह दो सवाल उठाते हैं। पहला यह कि यदि धर्म घर तक ही सीमित हो, तब भी क्या यह लोगों के दिलों में भेदभाव नहीं बढ़ाता? दूसरा सवाल यह कि क्या धर्म द्वारा होने वाले भेदभाव से और खुद धर्म से, पूर्ण स्वतन्त्रता का लक्ष्य हासिल करने में कोई असर नहीं होता। इन दो प्रश्नों के आलोक में, धर्म की भूमिका पर विचार करते हुए भगत सिंह को लगता है कि ‘धर्म हमारे रास्ते में एक रोड़ा है’। कारण कि यह लोगों को एक नहीं होने देता। मसलन, भगत सिंह कहते हैं कि सनातन धर्म छूत-अछूत के भेदभाव के पक्ष में खड़ा दिखता है; वे इस बात में विरोधाभास देखते हैं कि सिख एक ओर तो गुरुद्वारे में जाकर ‘राज करेगा खालसा’ कहे और बाहर आकर पंचायती राज की बातें करने लगे; एक ओर तो धर्म यह कहे कि इस्लाम पर विश्वास न करने वाले काफिर को तलवार के घाट उतार दो वहीं दूसरी ओर एकता की दुहाई दी जाए। भगत सिंह बेबाकी से यह बात कह देते हैं कि ऐसे धर्म के विरुद्ध कुछ न कहने का मतलब होगा चुप्पी साध कर घर में बैठ जाना, नहीं तो धर्म का विरोध करना होगा। धर्मों के कारण उपजने वाली अकर्मण्यता से छुटकारा पाने के लिए, भगत सिंह को ‘धर्मों के विरुद्ध सोचना ही पड़ता है’।

भगत सिंह टॉलस्टाय द्वारा अपनी पुस्तक ‘एसेज़ एंड लेटर्स’ में धर्म को तीन हिस्सों में बांट कर देखने की समझदारी से सहमत दिखते हैं। ये हिस्से हैं: धर्म का आधारभूत पक्ष, धर्म-दर्शन, धर्म का कर्मकांडी अथवा रीति-रिवाज वाला पक्ष। पहले पक्ष में, धर्म की जरूरी बातें, जैसे सच बोलना, चोरी न करना, गरीबों की सहायता करना जैसी बाते शामिल हैं। दूसरे पक्ष में, जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, संसार-रचना जैसी बातें शामिल हैं। तीसरे पक्ष में, धर्म संबंधी रस्मो-रिवाज आदि आते हैं। भगत सिंह के अनुसार यदि धर्म का मतलब, धर्म-दर्शन और रस्मो-रिवाज के साथ अंधविश्वास को मिलाना है तो ऐसे धर्म की ‘जरूरत नहीं’। हाँ, यदि धर्म के मायने, धर्म की जरूरी बातों और धर्म-दर्शन के साथ, स्वतंत्र विचार को मिलाना हो, तो वैसा धर्म ‘मुबारक’ है।     

भगत सिंह कहते हैं कि बेहतर तो यह होता कि इन धर्मों के दर्शन और रस्मो-रिवाज आदि में जो अंतर हैं, उनके विषय में और अपने-अपने विचारों के बारे में अलग-अलग धर्मों के मानने वाले ‘प्यार के साथ बैठकर बहस करें, एक-दूसरे के विचार जानें’। पर भगत सिंह असलियत से भी पूरी तरह वाकिफ़ हैं, उन्हें पता है कि जब ‘मसला-ए-तनासुक पर बहस होती है तो आर्यसमाजियों व मुसलमानों में लाठी चल जाती है’। इसके कारण को भी वे बखूबी समझते हैं, और वह यह है कि ‘दोनों पक्ष दिमाग को, बुद्धि को, सोचने-समझने की शक्ति को ताला लगाकर घर रख आते हैं। वे समझते हैं कि वेद भगवान में ईश्वर ने इसी तरह लिखा है और वही सच्चा है। वे कहते हैं कि कुरान शरीफ में खुदा ने ऐसे लिखा है और यही सच है। लोगों ने अपने सोचने की शक्ति को छुट्टी दी हुई होती है’। 

भगत सिंह धर्मों के विकास-क्रम को तब बिलकुल सही पहचानते हैं, जब वे यह कहते हैं कि ‘फ़िलॉसफी और रस्मो-रिवाज के छोटे-छोटे भेद बाद में जाकर ‘नेशनल रिलीजन’ बन जाते हैं और अलग-अलग संगठन बनने का कारण बनते हैं’। इसके दुष्परिणाम देश और समाज को भुगतने ही पड़ते हैं। इसलिए भगत सिंह के अनुसार जरूरत है हर किस्म के भेदभाव को जड़ से मिटाने की, तंगदिली छोडने की, जिससे असल एकता कायम हो सके। बकौल भगत सिंह, ‘हमारी आज़ादी का अर्थ केवल अंग्रेज़ी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं, वह पूर्ण स्वतन्त्रता का नाम है – जब लोग परस्पर घुल-मिलकर रहेंगे और दिमागी गुलामी से भी आज़ाद हो जाएंगे’। [भगत सिंह के ये दोनों लेख, प्रो चमन लाल द्वारा संपादित पुस्तक ‘भगत सिंह के राजनीतिक दस्तावेज़’ में संकलित हैं।]

इन लेखों के लिखे जाने के लगभग 15 वर्षों बाद, 1942 में दो समाजवादी नेताओं, अच्युत पटवर्धन और अशोक मेहता ने, भारत में सांप्रदायिकता की समस्या पर लिखी गई अपनी पुस्तक द कम्यूनल ट्रायंगल इन इंडिया में लिखते हुए सांप्रदायिक समस्या को बढ़ाने में धार्मिक समुदायों के अलावे तीसरे पक्ष यानि ब्रिटिश राज की भूमिका को भी रेखांकित किया। आज़ादी के बाद इस तीसरे पक्ष की भूमिका सत्ताधारियों और राजनीतिक दलों ने निभानी शुरू कर दी। इसी तीसरे पक्ष पर टिप्पणी करते हुए कवि धूमिल ने लिखा था: 
एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।
                                                     
(स्वाधीन ब्लॉग के सम्पादक शुभनीत कौशिक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज में पीएचडी शोधछात्र हैं और समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में लगातार पढ़े जा सकते हैं.)

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