3 January 2016

बर्धन होना एक बहुत मुश्किल काम है

का० बादल सरोज

वे जीवन भर पार्टी के होलटाइमर रहे । उनकी पत्नी कालेज पढ़ाकर घर चलाती रहीं। इस उम्मीद के साथ कि फंड और ग्रेच्युटी के पैसों से रिटायरमेंट के बाद का वक़्त गुजर जाएगा। रिटायरमेंट के बाद मिली पूरी रकम को यूटीआई की एक योजना में जमा कर दिया गया - और विडम्बना यह रही कि वह डूब गयी। इस हादसे की जानकारी बर्धन साब ने एक पत्रकारवार्ता में ठहाका लगाते हुए दी थी। स्थितप्रज्ञता इसी स्थिति को कहते हैंऐसी विरली शख्सियत - फिर भले वह कितनी भी पकी उम्र में क्यों न जाए- एक बड़ी रिक्ति , महाकाय शून्य पैदा करके जाती है। फ़िराक गोरखपुरी से रियायत लेते हुए यह कहने का मन है कि; "आने वाली नस्लें तुम से रश्क़ करेंगी हमअसरो जब उनको मालूम पडेगा तुमने बर्धन को देखा था"

भारतीय राजनीति की उस पीढ़ी की ऐसी धारा के - संभवतः आख़िरी - बुजुर्ग थे बर्धन जिसने शब्दशः खुद को मोमबत्ती की तरह जलाकर अँधेरे के गरूर को तोड़ा है, उजाले की आमद के प्रति उम्मीद बनाये रखी है। ऐसी विरली शख्सियत - फिर भले वह कितनी भी पकी उम्र में क्यों न जाए- एक बड़ी रिक्ति , महाकाय शून्य पैदा करके जाती है। 25 सितम्बर 1925 को जन्मे अर्धेन्दु भूषण बर्धन जब 15 साल के थे तब ही देश की आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गए थे । 1940 में वे आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के सदस्य बने, 1941 में नागपुर विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए । विद्यार्थियों के बड़े जत्थे के साथ उन्होंने 1942 के भारत छोडो आंदोलन में भाग लेते हुए जेल काटी । 17 वर्ष की नाबालिग उम्र से आंदोलनों और जेल के साथ उनका जो रिश्ता कायम हुआ वह तकरीबन आख़िरी सांस तक बना रहा । 1957 में वे महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए । स्थानीय श्रमिक आन्दोलनों से ऊपर उठते उठते वे आल इंडिया ट्रेड यूनियन के महासचिव और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारियों तक पहुंचे ।

यह तथ्यात्मक विवरण जीवनीकार के लिए उपयोगी हो सकता है । मगर यह बर्धन जैसे व्यक्तित्व को जानने के लिए बहुत नाकाफी है । वे बहुत बड़े कद के व्यक्तित्व थे और यह कद उन्होंने किसी सोने या चांदी की आरामदेह सीढ़ी पर चढ़कर नहीं गाँव शहर में छोटे बड़े संघर्षों में लड़ते भिड़ते हासिल किया था । बिना किसी तरह का समझौता किये, बिना कोई पतली गली या शार्ट कट ढूंढें। बर्धन जिस दिशा के प्रति ताउम्र समर्पित रहे, उस दिशा में कुछ और मजबूत कदम आगे बढ़के ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है। 

बर्धन साब के व्यक्तित्व में चमत्कारिक सरलता और चुम्बकीय आकर्षण दोनों थे । वे अथक प्रेरक थे । अमोघ वक्ता होना एक गुण है, मगर बोलते समय परिस्थितियों की कठिनता का हवाला देते हुए उनसे बाहर निकल आने का यकीन पैदा करना एक असाधारण योग्यता है । यह एकदम साफ़ समझ और अटूट समर्पण से पैदा होती है । बर्धन साब के तमाम भाषण आन्दोलनकर्ता (agitator) और प्रचारकर्ता (propagandist) का मेल हुआ करते थे । वे बाँध लेने वाली शैली में बोलते थे किन्तु रिझाने या सहलाने वाली अदा से काम नहीं लेते थे । उनकी स्टाइल कुरेदने और झकझोरने वाली हुआ करती थी । मगर उसमे भी एक निराली निर्मलता होती थी ।

बर्धन वाम आंदोलन में उस वक़्त शामिल हुए थे जब दुनिया में समाजवाद की विजय यात्रा चल रही थी। वे जिस दौर में जवान हुए वह दौर फासिज्म की ऐतिहासिक शिकस्त का दौर था। इंक़लाब की आहटों से विश्व - खासतौर से तीसरी दुनिया - गूँज रही थी। बर्धन जिस दौर में प्रौढ़ और बुजुर्ग हुए वह एक तरह से दुःस्वप्न की वापसी का दौर था। दुनिया को एक गाँव में बदल देने वाला फलसफा सिर्फ आर्थिक वर्चस्व तक ही महदूद नहीं रहा था। वह जीवन शैली, (कु) विचार, मानवता विरोधी मूल्यों के विस्तार में भी हावी हो रहा था। बर्धन साब की महानता इस बात में निहित थी कि वे पूर्णिमा के अमावस में तब्दील होजाने की स्थिति से घबराये नहीं। सामाजिक विकास की वैज्ञानिक समझ ने उन्हें कभी लड़खड़ाने नहीं दिया। समाज इस तरह की वैचारिक प्रतिबद्दताओं से - जब भी बदलता है - ही बदलता है। इस तरह की परीक्षा से गैलीलियो, कोपरनिकस, सुकरात, बृहस्पति, चार्वाक, कबीर यहां तक कि बुद्द तक को गुजरना पड़ा। अग्निपरीक्षा बर्धन साब पर भी गुज़री - मगर उसके ताप से डरकर उन्होंने छाँव नहीं ढूंढी। इतिहास घनी छाया में बैठने वाले नहीं, तपती धूप में नंगे पाँव विचरने वाले लिखते हैं। बर्धन उन्ही में से एक थे। 

वे उन कुछ नेताओं में से एक थे जो कम्युनिस्ट पार्टियों के विभाजन के बाद के दौर के तीखे क्लेशपूर्ण वातावरण के बावजूद दोनों ही पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच मकबूल थे । (राजेन्द्र शर्मा प्रलेस वालों से मिली कुछ आत्मकथाओं में से एक चिटनीस साब की आत्मकथा में बर्धन साब के बारे में लिखी बातों को पढ़कर महसूस हुआ कि उनकी इस स्वीकार्यता ने उन्हें डांगे साब के कुछ अति करीबियों की गुस्सा और आक्रोश तक का शिकार बना दिया था । सही रुख पर कायम रहने की जहमत जोखिम तो होती ही हैं ।)

का० एबी बर्धन 

इस अवसर पर कामरेड बर्धन के साथ के तीन अनुभव साझे करने के साथ उनके कुछ यादगार शिक्षाप्रद पहलू रखना उचित होगा। 

एक :

2 अप्रैल 1995 । चंडीगढ़ में हुयी पार्टी की 15 वीं कांग्रेस (महाधिवेशन) की शुरुआत की सुबह । झंडारोहण की जगह पर विशिष्ट अतिथियों और वेटरन्स (वरिष्ठो) के लिए कोई एक डेढ़ दर्जन कुर्सियां रखी गयी थी । हम लोग, अनधिकृत ही, इनकी सबसे पहली कतार में अपने दोनों बड़े वरिष्ठों -यमुना प्रसाद शास्त्री और सुधीर मुखर्जी को बिठा आये । सुधीर दादा सीपीआई के देश के प्रमुख और मप्र के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे, कुछ ही समय पहले वे सीपीआई (एम) में शामिल हुए थे । (यूं इन दोनों स्थापित नेताओं का मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होना, वह भी मध्यप्रदेश में, एक बड़ी और विरल राजनीतिक घटना थी । सुधीर दा के निर्णय के दोनों वाम पार्टियों के बीच अन्योन्यान्य असर भी हुए थे । बहरहाल यहां प्रसंग चंडीगढ़ है ।) जहां हम सुधीर दा को बिठा कर आये थे, थोड़ी ही देर में एकदम उनकी बगल की सीट पर सीपीआई के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव आकर बैठ गये । कुछ ही समय पहले अपनी पार्टी छोड़कर जाने वाले कामरेड के एकदम पास बैठना, दोनों ही के लिए, एक असुविधाजनक स्थिति हो सकती थी । मगर, बजाय चिड़चिड़ाने या मुंह मोड़कर बैठने के उन्होंने सुधीर दा का हाथ थामा । बोले, तबियत कैसी है ? सुधीर दा ने कहा ठीक है । वे बोले, "बहुत अच्छे और फ्रेश लग रहे हैं ।" इसी के साथ जोड़ा कि " जहां मन अच्छा रहे, वहीँ रहना चाहिए ।" इस वाक्य के बाद दोनों ने इतनी जोर का ठहाका लगाया कि ज्योति बसु, सुरजीत सहित नजदीक बैठे सभी नेता उन दोनों की ओर देखने लगे । ऐसे थे कामरेड ए बी बर्धन । बर्फ पिघली तो सुधीर दा ने कामरेड शैली को बुलाया और बर्धन साब से परिचय कराते हुए बताया कि ये हैं हमारे यंग सेक्रेटरी । बर्धन साब शैली से बोले : टेक केअर ऑफ़ दिस ओल्ड यंग मैन !!

दो :

10-15 साल पहले कभी गांधी भवन भोपाल । ट्रेड यूनियनो का संयुक्त सम्मेलन । हर संयुक्त सम्मेलनों की तरह साझा भी, विभाजित भी । अपने अपने वक्ता का नाम आने पर सभागार के अलग अलग कोनो से उठती ज़िंदाबाद की पुकारें । बर्धन साब का नाम आते ही जिस हिस्से में एटक का समूह बैठा था वहां से नारे शुरू हुए । जाहिर तौर पर झुंझलाए दिख रहे बर्धन साब ने अपने संगठन के कार्यकर्ताओं को फटकारने के बहाने सभी की जोरदार खिंचाई करते हुए कहा कि इस हॉल में गला फाड़ प्रतियोगिता में जीतने में ताकत खर्च करने की बजाय उसे बाहर मध्यप्रदेश के शहरों गाँवों मे जो करोड़ों मजदूर हैं, उन्हें संगठित करने में खर्च करो । जीत हार का फैसला उसी रणक्षेत्र में होना है । उनके कहे पर फिर नारे उठे, तालियां बजी । मगर इस बार किसी एक समूह से नहीं, समूचे हॉल से, जिसकी गूँज बाहर तक सुनाई दी।

तीन :

वे जीवन भर पार्टी के होलटाइमर रहे । उनकी पत्नी कालेज पढ़ाकर घर चलाती रहीं। इस उम्मीद के साथ कि फंड और ग्रेच्युटी के पैसों से रिटायरमेंट के बाद का वक़्त गुजर जाएगा। रिटायरमेंट के बाद मिली पूरी रकम को यूटीआई की एक योजना में जमा कर दिया गया - और विडम्बना यह रही कि वह डूब गयी। इस हादसे की जानकारी बर्धन साब ने एक पत्रकारवार्ता में ठहाका लगाते हुए दी थी। स्थितप्रज्ञता इसी स्थिति को कहते हैं। 

बर्धन होना एक बहुत मुश्किल काम है। सलाम कामरेड बर्धन। आपके बाद की पीढ़ी आपके श्रम और कुर्बानी को व्यर्थ नहीं जाने देगी।

[यह आलेख विजय राज बली माथुरजी के ब्लॉग "क्रान्तिस्वर" से साभार लिया गया है. इसके लेखक मध्य प्रदेश सीपीएम के प्रदेश सचिव हैं.] 

No comments:

Post a Comment

अनुवाद करें