12 July 2015

भारत भाग्यविधाता?

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कुलदीप कुमार
12 जुलाई, जनसत्ता 

जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार केंद्र में सत्ता में आई है, राष्ट्रीय जीवन के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में फासीवादी हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। अब तो इस बात पर किसी को आश्चर्य भी नहीं होता कि भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद हो या नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट हो या पुणे का फिल्म एवं टेलीविज़न इंस्टीट्यूट, सभी जगह राष्ट्रवादियों को थोपा जा रहा है। सत्ता का चरित्र ही ऐसा है। जो भी सत्ता में आता है, वह बात तो जनता की सेवा करने की करता है---हमारे प्रधानमंत्री भी अपने को जनता का प्रधानसेवक कहलाना अधिक पसंद करते हैं---लेकिन असल में उसका मकसद सत्ता का सुख भोगना और पूरी-हलवा खाना-खिलाना होता है। कांग्रेसी सरकार ने भी इससे अलग आदर्श स्थापित नहीं किया। अगर किया होता तो लोग मोदी सरकार की इन कारगुजारियों को यूं खामोशी से बर्दाश्त न कर लेते। फिल्म इंस्टीट्यूट के छात्र-छात्राएँ अभी युवा हैं, उनका खून अभी ठंडा नहीं हुआ है, इसलिए वे विरोध करने के लिए सड़क पर आए हैं। वरना वे भी औरों की तरह चुप ही रहते।

नियुक्तियों तक तो फिर भी ठीक है। मेरे जैसे आदमी को अब हकीकत का इतना तो ज्ञान हो ही गया है कि जो भी सरकार में आता है, वह मनमानी करता है। अपने लोगों को उपकृत करता है और अपनी नीतियाँ थोपता है। लेकिन भाजपा और उसके नेता जो कर रहे हैं, वह इससे कहीं आगे की चीज है। वह संघ का दूरगामी एजेंडा है जिसको हासिल करने के लिए राजसत्ता केवल एक साधन मात्र है। संघ के कुछेक नेता भले ही सत्ता की फिसलनभरी राह पर रपट जाएँ, पर एक संगठन के रूप में वह अपने रास्ते पर अडिग है। और वह रास्ता भारत को पूरी तरह से एक हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करने की मंजिल की तरफ जाता है। संघ भारत को पाकिस्तान का प्रतिबिंब बना देना चाहता है। यह मेरा मौलिक चिंतन नहीं है। अनेक लोग इसके बारे में लिख-बोल चुके हैं।

यह संयोग नहीं है कि जब भी भाजपा सत्ता में आती है, उसके कुछ बड़े नेता राष्ट्रीय नायकों के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर देते हैं। उनके अपने संघ परिवार में कोई भी राष्ट्र नायक नहीं है, क्योंकि संघ की दृढ़ मान्यता थी कि अंग्रेज़ शासकों से लड़ने के बजाए हिन्दू समाज को संगठित करना अधिक आवश्यक है ताकि मुस्लिम आक्रांताओं को मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके। यह हमारे देश में ही संभव है कि आजादी की लड़ाई में भाग न लेने वाले यह दावा करें कि सबसे बड़े देशभक्त वे ही हैं। यही नहीं, जिन महापुरुषों ने इस लड़ाई का नेतृत्व किया, उन पर  बिना किसी संकोच के कीचड़ उछाली जाए और उनका चरित्रहनन किया जाए। वह भी एक ऐसे संगठन के द्वारा जिसका दावा है कि वह अपनी शाखाओं में चरित्र निर्माण पर सबसे अधिक ज़ोर देता है।

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जब कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने यह मौलिक विचार प्रकट किया था कि भारतवर्ष इतना प्राचीन देश है, फिर महात्मा गांधी को हम राष्ट्रपिता कैसे कह सकते हैं? वे तो असल में राष्ट्रपुत्र थे, भारतमाता की संतान थे। जब यह पता चला कि गांधी को सबसे पहले राष्ट्रपिता नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था-- वह भी तब जब वे गांधी के विरोध के कारण कई साल पहले कांग्रेस छोड़ कर अलग पार्टी बना चुके थे और जर्मनी एवं जापान के समर्थन से आजाद हिन्द फौज बना कर ब्रिटिश सेना से युद्ध के मैदान में लोहा ले रहे थे—तो कल्याण सिंह समेत अन्य संघियों की बोलती बंद हो गई क्योंकि जिस तरह इन दिनों वे सरदार वल्लभभाई पटेल और बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर को अपनी गिरफ्त में ले रहे हैं, उसी तरह वे दशकों पहले नेताजी को अपने नायकों की पंक्ति में जगह दे चुके थे। बिना किसी शर्म-लिहाज के, क्योंकि नेताजी विचारों से पक्के धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए किसी भी साधन का इस्तेमाल करने के लिए तत्पर थे, जबकि संघ ने हमेशा अपने को इस लड़ाई से दूर रखा।

नरेंद्र मोदी भले ही महात्मा गांधी के चित्र पर फूल चढ़ाएँ, और संघ भले ही दिखावे के लिए उनका नाम अपने प्रातःस्मरणीय महापुरुषों की सूची में शामिल कर ले, लेकिन असलियत यह है कि जब तक गांधी जनमानस में जिंदा और समादृत हैं, तब तक संघ को अस्थाई सफलता ही मिल सकती है। स्थायी रूप से वह अपनी विचारधारा को जनता के मन में स्थापित नहीं कर सकता। यही बात जवाहरलाल नेहरू और अंबेडकर के बारे में लागू होती है। इसलिए बाहर से अनेक तरह का दिखावा करने के बावजूद संघ और उसके कार्यकर्ताओं का हमेशा प्रयास रहेगा कि इन महापुरुषों की छवि पर कालिख पोती जाये।

अब कल्याण सिंह को इल्हाम हुआ है कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का गीत जन गण मन अधिनायक जय हे, जो भारत का राष्ट्रगान है, दरअसल ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम की स्तुति में लिखा गया  था। फिर वह स्वाधीन भारत का राष्ट्रगान कैसे हो सकता है? कल्याण सिंह तो संघ की शाखा से निकले हैं। उनके इस बयान पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता। आश्चर्य होता है सुप्रीम कोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश जस्टिस मार्कन्डेय काटजू पर जिन्होंने अपने ब्लॉग में रवीन्द्रनाथ ठाकुर को अंग्रेज शासकों का टहलुआ कहकर गाली दी है और एक विलक्षण खोज की है कि 1937 में जब उन्हें अपने-आपको देशभक्त सिद्ध करना था, तब उन्होंने यह स्पष्टीकरण दिया कि यह गीत तो उन्होंने भारतवर्ष के भाग्यविधाता यानि ईश्वर के लिए लिखा था। आश्चर्य इस बात पर भी होता है कि कैसे अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में भूमिका निभाने वाले कैलाशनाथ काटजू के परिवार को कोई सदस्य इस प्रकार की जाहिलाना बात कह सकता है, और कैसे इतने अपढ़ किस्म के लोग सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच सकते हैं? कोई जस्टिस काटजू से पूछे कि जब 1919  में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जलियाँवाला बाग के नरसंहार का विरोध करते हुए ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई सर की उपाधि वापस की थी, तब क्या वे उस सरकार के टहलुए की भूमिका अदा कर रहे थे? उन्हें 1937 में जाकर खुद को देशभक्त सिद्ध करने की जरूरत पड़ी? क्या तब तक उन्हें देशभक्त नहीं माना जाता था? ये वही काटजू साहब हैं जिनकी राय में देश के अधिकांश पत्रकार अनपढ़ हैं !

सव्यसाची भट्टाचार्य समेत अनेक शीर्षस्थ इतिहासकार इस प्रकरण के बारे में तथ्य प्रस्तुत कर चुके हैं। शायद कल्याण सिंह और मार्कन्डेय काटजू जैसे देशभक्त अंग्रेजी पढ़ना पसंद न करते हों। लेकिन यदि वे हिन्दी के शीर्षस्थ विद्वान, अद्भुत उपन्यासकार और भारतीय संस्कृति के अप्रतिम व्याख्याता आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का इस विषय पर लेख पढ़ लेते, तो उनके दिमाग के कुछ जाले तो जरूर साफ हो जाते। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक भाषा साहित्य और देश में आचार्य द्विवेदी का वह लेख संकलित है जो उन्होंने देश को आजादी मिलने के कुछ ही समय बाद लिखा था। उस समय तक संविधान सभा ने यह तय नहीं किया था कि वंदे मातरम राष्ट्रगान होगा या जन गण मनयहाँ याद दिला दूँ कि उन्हें स्वयं रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शांतिनिकेतन में हिन्दी भवन की स्थापना के लिए आमंत्रित किया था और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में आने से पहले उन्होंने लंबे समय तक रवीन्द्रनाथ के सान्निध्य में रह कर शांतिनिकेतन में पढ़ाया था। इस लेख में आचार्य द्विवेदी ने लिखा है: रवीन्द्र-साहित्य का साधारण विद्यार्थी भी जानता है कि रवीन्द्रनाथ राजा या राजराजेश्वर किसे कहते हैं। साधारण जनता जिसे ईश्वर या भगवान कहती है उसी को रवीन्द्रनाथ ने राजा, राजेन्द्र, राजराजेश्वर आदि कहा है। उनकेराजा’, ‘डाकघर’, ‘अरूपतनआदि नाटकों में यही राजा अदृश्य पात्र होता है। एक शक्ति कविता में उन्होने इसीराजेन्द्रको सीमाहीन काल का नियन्ता कहा है।28 दिसंबर, 1911 के अंग्रेजी समाचारपत्र बंगाली में प्रकाशित रिपोर्ट से भी स्पष्ट है कि कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ का देशभक्तिपूर्ण गीत गाया गया था और उसके बाद ब्रिटिश सम्राट के प्रति राजभक्ति प्रकट करने वाला एक हिन्दी गीत गाया गया। काटजू साहब और कल्याण सिंह क्या बताएँगे कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने हिन्दी गीत कब लिखे?


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जन गण मन अधिनायक जय हे

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आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

देश का राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम’ गान हो या ‘जनगणमन अधिनायक’, इस प्रश्न पर आज-कल बहुत वाद-विवाद हो रहा है। भारतीय विधान-सभा शीघ्र ही इस बात पर भी विचार करेगी। दोनों गानों के पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ कहा गया है। मुझे इन बातों पर यहाँ विचार करना अभीष्ट नहीं हैं। प्रन्तु इधर हाल ही में कुछ लोगों ने यह बात उड़ा दी है कि यह ‘जनगण’ वाला गान कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सम्राट जार्ज पंचम की स्तुति में लिखा था और वह पहले पहल सन १९१२ ई० के दिल्ली दरबार में गाया गया था। इस सम्बन्ध में मेरे पास अनेक सज्जनों ने पूछताछ की है। भारत का राष्ट्रगीत चाहे जो भी स्वीकार कर लिया जाय, वह हम लोगों के लिए पूजनीय और वन्दनीय होगा, पर किसी असत्य बात का प्रचार करना अनुचित है। मैंने विश्व भारती संसद (गवर्निंग बॉडी) के सदस्य की हैसियत से अन्य अनेक मित्रों के साथ एक वक्तव्य ३० नवम्बर, १९४८ को दिया था। परन्तु उस वक्तव्य के प्रकाशित होने के बाद भी पत्र आते रहे। इसलिए एक बार फिर मैं साधारण जनता के चित्त से इस भ्रान्त धारणा को दूर करने के उदेश्य से यह वक्तव्य प्रकाशित करा रहा हूँ।

कुछ दिनों पहले तक इस प्रकार के अपप्रचार का क्षेत्र बंगाल तक ही सीमित रहा है। कवि की जीवितावस्था में ही इस प्रकार की कानाफूसी चलने लगी थी। किसी किसी ने उनसे पत्र लिखकर यह जानने का प्रयत्न भी किया था कि इस कानाफूसी में कुछ तथ्य है या बिलकुल निराधार है। कवि ने बड़ी व्यथा के साथ सुधारानी देवी को अपने २३ मार्च,१९३९ के पत्र में लिखा था कि “मैंने चतुर्थ या पंचम जार्ज को ‘मानव इतिहास के युग-युग धावित पथिकों के रथयात्रा का चिरसारथी’ कहा है, इस प्रकार की अपरिमित मूढ़ता का सन्देह जो लोग मेरे विषय में कर सकते हैं, उनके प्रश्नों का उत्तर देना आत्मावमानना है।”

रवीन्द्र-साहित्य का साधारण विद्यार्थी भी जानता है कि रवीन्द्रनाथ राजा या राजराजेश्वर किसे कहते हैं। साधारण जनता जिसे ईश्वर या भगवान कहती है उसी को रवीन्द्रनाथ ने राजा, राजेन्द्र, राजराजेश्वर आदि कहा है। उनके ‘राजा’, ‘डाकघर’, ‘अरूपतन’ आदि नाटकों में यही राजा अदृश्य पात्र होता है। एक शक्ति कविता में उन्होने इसी ‘राजेन्द्र’ को सीमाहीन काल का नियन्ता कहा है। एक गान में उन्होने लिखा है कि तेरे स्वामी ने तुझे जो कौड़ी दी है उसे ही तू हँश कर ले ले, हजार-हजार खिंचावों में पड़ा मारा-मारा न फिर। ऐसा हो कि तेरा हृदय जाने कि तेरे राजा हृदय में ही विद्यमान हैं।

जे कड़ि तोर स्वामीर देवा सेइ कड़ि तुइनिस रे हेसे।
लोकेर कथा जिसने काने फिरिसने आट हजार टाने।
जेन रे तोर हृदय जाने हृदय तोर आद्येन राजा॥

जो लोग सरल भाव से विश्वास कर सकते हैं कि रवीन्द्रनाथ ने राजेश्वर कहकर किसी पंचमजार्ज की स्तुति की है, वे यदि गान की पँक्तियों पर थोड़ा भी विचार करते तो उन्हे अपना भ्रम स्पष्ट हो जाता। कैसे कोई किसी पंचम या षष्ठ जार्ज को—

“विकट पन्थ उत्थान पतन मय युग युग धावित यात्री
हे चिर सारथि तव रथचक्रे मिखरित पथ दिन रात्री
दारुण विप्लव माँझे, तब शंखध्वनि बाजे
संकट दुख परित्राता” (हिन्दी अनुवाद से)

कह सकता है? फिर कोई पंचम या अपंचम जार्ज को किस प्रकार—

"घोर अन्धतम विकल निशा भयमूर्छित देश जनों में
जागृत था तव अविचल मंगल नत अनिमिष नयनों में
दुःस्वप्ने आतंके आश्रय तव मृदु अंके,
स्नेहमयी तुम माता।”

कहकर उसे जनगण संकट त्राटक कह सकता है? और रवीन्द्रनाथ जैसे मनस्वी कवि से जो लोग आशा करते हैं कि किसी नरपति को वह इतना सम्मान देगा कि सम्पूर्ण भारत उसके चरणों में ‘नतमाथ’ होगा, उसे क्या कहा जाय!

वस्तुतः यह गाना दिल्ली दरबार में नहीं बल्कि सन १९११ ई० में हुए कांग्रेस के कलकत्ते वाले अधिवेशन में गाया गया था। सन १९१४ ई० में जॉन मुरे ने ‘दि हिस्टारिकल रेकार्ड ऑफ़ इम्पीरियल विज़िट टु इण्डिया, १९११’ नाम से दिल्ली दरबार का एक अत्यन्त विशद विवरण प्रकाशित किया था। उसमें इस गान की कहीं चर्चा नहीं है। सन १९१४ में रवीन्द्रनाथ की कीर्ति समूचे विश्व में फैल गई थी। अगर यह गान दिल्ली दरबार में गाया गया होता तो अंग्रेज प्रकाशक ने अवश्य उसका उल्लेख किया होता, क्योंकि इस पुस्तिका का प्रधान उद्देश्य प्रचार ही था।

असल में १९११ के कांग्रेस के मॉडरेट नेता चाहते थे कि सम्राट दम्पती की विरुदावली कांग्रेस मंच से उच्चारित हो। उन्होने इस आशय की रवीन्द्रनाथ से प्रार्थना भी की थी, पर उन्होने अस्वीकार कर दिया था। कांग्रेस का अधिवेशन ‘जनगणमन’ गान से हुआ और बाद में सम्राट दम्पती के स्वागत का प्रस्ताव पारित हुआ। प्रस्ताव पास हो जाने के बाद एक हिन्दी गान बंगाली बालक बालिकाओं ने गाया था, यही गान सम्राट की स्तुति में था। सन १९११ के २८ दिसम्बर के ‘बंगाली’ में कांग्रेस अधिवेशन की रिपोर्ट इस प्रकार छपी थी—

The proceedings commnenced witha patriotic song composed by Babu Rabindranath Tagore, the leading poet of Bengal (Janaganamana..) of which we give the English translation (यहाँ अँग्रेज़ी में इस गान का अनुवाद दिया गया था) Then after passing of the loyalty resolution, a Hindi song paying heartfelt homage to their imperial majesties was sung by Bengali boys and girls in chorus.

विदेशी रिपोर्टरों ने दोनों गानों को गलती से रवीन्द्रनाथ लिखित समझ कर उसी तरह की रिपोर्ट छापी थी। इन्ही रिपोर्टों से आज यह भ्रम चल पड़ा है।

मैं स्पष्ट रूप से बता दूँ कि मैं वन्दे मातरम गान का कम भक्त या प्रशंसक नहीं हूँ। यह वक्तव्य इस उद्देश्य से दिया गया है कि असत्य बात प्रचारित न हो और इस महान कवि के सिर व्यर्थ का ऐसा दोषारोप न किया जाय जिसने भारतवर्ष की संस्कृति को सम्पूर्ण जगत में प्रतिष्ठा दिलाई। रवीन्द्र मनस्वी कवि थे, वे कभी किसी विदेशी नरपति की स्तुति में इतना मनोहर गान लिख ही नहीं सकते थे।

(भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित 'भाषा साहित्य और देश' में संकलित तथा nirmal-anand.blogspot.in से साभार)


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रवींद्र नाथ टैगोर के 'अधिनायक' के मायने
एम राजीवलोचन
प्रोफ़ेसर (इतिहास), पंजाब विश्वविद्यालय
8 जुलाई 2015, बीबीसी हिंदी

राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने भारत के राष्ट्र गान 'जन गण मन' पर सवाल उठाकर एक नई बहस को हवा दे दी है. कल्याण सिंह ने हाल में राजस्थान विश्वविद्यालय के 26वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए पूछा था कि 'जन गण मन अधिनायक जय हो' में अधिनायक किसके लिए है. उन्होंने कहा था कि यह ब्रिटिश समय के अंग्रेज़ी शासक का गुणगान है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रगान में संशोधन होना चाहिए. अब जरा, एक नज़र इस गाने के इतिहास पर भी डाल लेते हैं.

गद्दारी का गाना?
यही वह गाना था जिसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज के लड़ाकों ने राष्ट्रगान के तौर पर अपनाया था. स्वतंत्रता से पहले 1937 में प्रांतों में पहली चुनी हुई सरकारों ने भी इसे अपनाया. स्वतंत्र भारत के गणराज्य ने काफी चिंतन-मनन के बाद इसे 1950 में अपनाया. 2004 में साध्वी ऋतंभरा ने भी 'जन गण मन अधिनायक जय हे' को ‘गद्दारी का गाना’ का दर्जा दे डाला था.

यह गाना पहली बार 27 दिसंबर 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के दूसरे दिन का काम शुरू होने से पहले गाया गया था. 'अमृत बाज़ार पत्रिका' में यह बात साफ़ तरीके से अगले दिन छापी गई. पत्रिका में कहा गया कि कांग्रेसी जलसे में दिन की शुरुआत गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर द्वारा रचित एक प्रार्थना से की गई. 'बंगाली' नामक अखबार में खबर आई कि दिन की शुरुआत गुरुदेव द्वारा रचित एक देशभक्ति के गीत से हुई. टैगोर का यह गाना संस्कृतनिष्ठ बंग-भाषा में था यह बात बॉम्बे क्रॉनिकल नामक अखबार में भी छपी.

शासक का गुणगान!
यही वह साल था जब अंग्रेज सम्राट जॉर्ज पंचम अपनी पत्नी के साथ भारत के दौरे पर आए हुए थे. तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग्स के कहने पर जॉर्ज पंचम ने बंगाल के विभाजन को निरस्त कर दिया था और उड़ीसा को एक अलग राज्य का दर्जा दे दिया था. इसके लिए कांग्रेस के जलसे में जॉर्ज की प्रशंसा भी की गई और उन्हें धन्यवाद भी दिया गया.

'जन गण मन' के बाद जॉर्ज पंचम की प्रशंसा में भी एक गाना गाया था. यह दूसरा गाना रामभुज चौधरी द्वारा रचा गया था, सम्राट के आगमन के लिए. यह हिंदी में था और इसे बच्चों ने गाया: बोल थे, ‘बादशाह हमारा’. कुछ अखबारों ने इसके बारे में भी खबर दी. शायद आप रामभुज के बारे में न जानते हों. उस वक्त भी लोग कम ही जानते थे. दूसरी ओर, टैगोर जाने-माने कवि और साहित्यकार थे. सो सत्ता-समर्थक अख़बारों ने खबर कुछ इस तरह दी कि जिससे लगा कि सम्राट की प्रशंसा में जो गीत गाया गया था वह टैगोर ने लिखा था. तबसे लेकर आज तक, यह विवाद चला आ रहा है कि कहीं गुरुदेव ने यह गाना अंग्रेज़ों की प्रशंसा में तो नहीं लिखा था?

टैगोर की सफ़ाई
इस गाने के बारे में इसके रचियता टैगोर ने 1912 में ही स्पष्ट कर दिया कि गाने में वर्णित भारत भाग्य विधाता के केवल दो ही मतलब हो सकते हैं: देश की जनता, या फिर सर्वशक्तिमान ऊपर वाला—चाहे उसे भगवान कहें, चाहे देव. टैगोर ने इसे खारिज़ करते हुए साल 1939 में एक पत्र लिखा, ''मैं उन लोगों को जवाब देना अपनी बेइज्जती समझूँगा जो मुझे इस मूर्खता के लायक समझते हैं.''

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इस गाने की बड़ी खासियत यह थी कि यह उस वक़्त व्याप्त आक्रामक राष्ट्रवादिता से परे था. इसमें राष्ट्र के नाम पर दूसरों को मारने-काटने की बातें नहीं थीं. गुरुदेव ने इसी दौरान एक छोटी सी पुस्तक भी प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक था ‘नेशनलिज़्म’. यहाँ उन्होंने अपने गीत 'जन गण मन अधिनायक जय हे' की तर्ज पर यह समझाया कि सच्चा राष्ट्रवादी वही हो सकता है तो दूसरों के प्रति आक्रामक न हो. आने वाले सालों में 'जन गण मन अधिनायक जय हे' ने एक भजन का रूप ले लिया. कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशनों की शुरुआत इसी गाने से की जाने लगी. 1917 में टैगोर ने इसे धुन में बंधा. धुन इतनी प्यारी और आसान थी कि जल्द ही लोगों के मानस पर छा गई.

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