9 April 2015

आधुनिक भारत के निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका

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शुभनीत कौशिक

[जिस दौर में पटेल को दोनों तरफ से-- धुर दक्षिणपंथ और धुर वामपंथ-- की ओर से संघी सिद्ध करने की कोशिशें तेज हों, उस दौर में उनकी ज़िंदगी का ब्यौरा पेश करना जरूरी है। शुभनीत ने सरदार पटेल की सीधी- सादी जीवन- यात्रा लिखी है। बिना किसी लाग- लपेट के, बगैर किसी ख़ास विश्लेषण के। यह ब्यौरा ही बता देता है, पटेल क्या थे।]

प्रस्तुत लेख में आधुनिक भारत के निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल (1875-1950) के योगदान का विश्लेषण किया गया है। सरदार पटेल और उनके योगदानों की चर्चा करने से पहले मैं ज़रूरी समझता हूँ कि इस बात को स्पष्ट करने की कोशिश करूँ कि आख़िरकार जिस ‘आधुनिक भारत’ के निर्माण की बात हो रही है, उसके निहितार्थ क्या हैं, वे कौन-सी बुनियादी बातें अथवा मूल्य हैं जो ‘आधुनिक भारत’ के निर्मिति में शामिल हैं और जो ‘आधुनिक भारत’ की अवधारणा में प्रतिबिंबित होती हैं या कि जिनका प्रतिनिधित्व ‘आधुनिक भारत’ करता है!

मेरी सीमित समझ में अगर कोई एक दस्तावेज़ है, जो इस ‘आधुनिक भारत’ की अवधारणा को, समूचे तौर पर, अपने में जज़्ब किए हुए है, तो वह है भारत के संविधान की प्रस्तावना। प्रस्तावना में भारत को ‘एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ बनाने की बात तो कही ही गयी, साथ ही, उसके सभी नागरिकों को ‘सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता’ उपलब्ध कराने और उन सभी में ‘व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता’ बढ़ाने का भी ज़िक्र किया गया। इस लेख में, आधुनिक भारत के निर्माण में सरदार पटेल के योगदान की बात करते हुए मैं अपना ध्यान, संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित इन बुनियादी बातों के इर्द-गिर्द केन्द्रित करने का प्रयास करूंगा। लेख के पहले भाग में, सरदार पटेल का संक्षिप्त जीवन परिचय देने के बाद, अगले हिस्सों में उनके व्यक्तित्त्व और कृतित्त्व के विविध पक्षों और राष्ट्रीय जीवन के विभिन्न पहलुओं पर उनके विचारों के साथ ही, राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में उनकी भूमिका का विश्लेषण किया जाएगा। 

सरदार वल्लभभाई पटेल: जीवन परिचय
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वल्लभभाई पटेल का जन्म गुजरात के खेड़ा जिले के नाडियाड में एक कृषक परिवार में 1875 में हुआ था। उनके पिता झवेरीभाई पटेल और माँ लाडबाई थीं। राष्ट्रवादी नेता विट्ठलभाई पटेल उनके बड़े भाई थे। उनकी आरंभिक शिक्षा करमसाड और पेतलाड में हुई और मैट्रिक की परीक्षा उन्होंने नाडियाड हाई स्कूल से उत्तीर्ण की। उनका विवाह 1893 में झवेरबाई से हुआ। कानून की पढ़ाई के लिए वे इंग्लैंड गए, जहां से उन्होंने बार-एट-लॉ की परीक्षा विशिष्ट योग्यता के साथ उत्तीर्ण की। वे फरवरी 1913 में अपनी कानून की पढ़ाई पूरी कर भारत वापस लौटे। वल्लभभाई फ़ौजदारी मामलों के विशेषज्ञ थे। 

1917 में वे पहली बार महात्मा गांधी के संपर्क में आए। इसी वक़्त गांधी गुजरात सभा के अध्यक्ष चुने गए, जिसका पहला राजनीतिक कान्फ्रेंस गोधरा में नवंबर 1917 में हुआ। वल्लभभाई इस कान्फ्रेंस के सचिव नियुक्त किए गए। इसी वर्ष, वल्लभभाई अहमदाबाद म्युनिसिपल बोर्ड के सदस्य चुने, आगे चलकर वे बोर्ड के अध्यक्ष भी बने। अध्यक्ष के रूप में उन्होंने महामारी, अकाल और बाढ़ से निबटने के लिए सफलतापूर्वक राहत कार्यक्रम चलाये। 1918 में खेड़ा सत्याग्रह में भागीदारी के जरिये वल्लभभाई राजनीति के क्षेत्र में आए। 1920 में जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन शुरू किया गया तो वल्लभभाई ने गुजरात में असहयोग आंदोलन के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। फरवरी 1922 में गांधीजी ने चौरी-चौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन को वापस लेने की घोषणा की। गांधीजी के गिरफ्तार होने और आंदोलन के वापस लिए जाने के बाद कांग्रेस में दो धड़े बन गए, एक दल था ‘परिवर्तनवादियों’ का, जिसका नेतृत्व कर रहे थे चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू, और दूसरा दल था, ‘अ-परिवर्तनवादियों’ का, जिसका नेतृत्व कर रहे थे सरदार पटेल और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी। 1923 के बोरसाड सत्याग्रह, नागपुर के झण्डा सत्याग्रह और बाद में, 1928 में बारदोली सत्याग्रह में भी वल्लभभाई ने अपने संगठन और नेतृत्व की क्षमता का अद्भुत प्रदर्शन किया। बारदोली सत्याग्रह के दौरान ही बारदोली की महिलाओं ने वल्लभभाई को ‘सरदार’ की उपाधि से नवाजा। 

1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया। गांधीजी ने दांडी मार्च की परिणति के रूप में, 6 अप्रैल 1930 को, नमक कानून तोड़ते हुए इस आंदोलन का आरंभ किया। इस आंदोलन के दौरान, सरदार पटेल गिरफ्तार किए जाने वाले पहले नेताओं में से थे। 1931 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। इसी वर्ष, मार्च के महीने में गांधी-इरविन समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत गांधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में शामिल हुए। गोलमेज़ सम्मेलन से लौटकर गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ किया, पर जल्द ही सभी राष्ट्रवादी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इस बार सरदार पटेल को गांधीजी के साथ यरवदा जेल में रखा गया। 

जब कांग्रेस ने केंद्रीय व्यवस्थापिका सभा का चुनाव लड़ने का निर्णय लिया तो संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष होने के नाते सरदार पटेल ने कांग्रेस के चुनाव अभियान में और चुनाव के बाद विभिन्न प्रान्तों के कांग्रेस मंत्रिमंडलों के बीच समन्वय स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभाई। 1938-39 के हरिपुरा और त्रिपुरी अधिवेशनों के दौरान कांग्रेस ने यह घोषित किया कि देसी रियासतों की जनता का संघर्ष राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन का ही हिस्सा है। इसी प्रक्रिया में, सरदार पटेल बड़ौदा और भावनगर के प्रजामंडलों के सम्मेलन के सभापति चुने गए। 
सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हुई। अगस्त 1942 में गांधीजी ने भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की। इसी बीच मुस्लिम लीग मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में पाकिस्तान की मांग करने लगी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन में क्लीमेंट एटली के नेतृत्व में लेबर पार्टी की सरकार बनी और तत्कालीन वाइसराय माउण्टबेटन द्वारा तैयार की गयी तीन जून योजना (1947) के अंतर्गत हिंदुस्तान का विभाजन कर दिया गया।

आज़ादी के बाद विभाजन की त्रासदी झेलते भारत के सामने कई चुनौतियां थीं, जिनमें से एक रजवाड़ों का भारत में विलय की समस्या भी थी। सरदार पटेल के कुशल नेतृत्व में करीब 560 देसी रियासतों का भारत में सफलतापूर्वक विलय संभव हो सका। सरदार पटेल आज़ाद भारत की पहली सरकार में गृह मंत्री, उप-प्रधानमंत्री और सूचना और प्रसारण मंत्री भी थे। संविधान सभा में भी सरदार पटेल ने अपने व्यापक अनुभव और व्यावहारिक सूझ का परिचय दिया। 15 दिसंबर 1950 को सरदार पटेल का निधन हो गया।                                 
खेड़ा से बारदोली तक: भारतीय किसान और सरदार पटेल
आज़ादी के कई दशक बीत जाने के बाद भी हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था रही। आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी किसी न किसी रूप में कृषि क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। आज़ादी से पूर्व कृषि पर यह निर्भरता कहीं और ज्यादे थी। राष्ट्रीय आंदोलन के नेतृत्व ने इस बात को बखूबी समझा था कि राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन को सर्वव्यापी बनाने के लिए और इसे जनांदोलन का चरित्र देने के लिए यह ज़रूरी है कि किसानों और श्रमिकों को इस आंदोलन में भागीदार बनाया जाये। हिंदुस्तान में गांधीजी के द्वारा चलाये गए आरंभिक आंदोलन किसानों और श्रमिकों की समस्याओं से सीधे जुड़े हुए थे। चाहे वह चंपारण सत्याग्रह हो या अहमदाबाद में मिल-मजदूरों की हड़ताल हो या फिर खेड़ा सत्याग्रह हो। 
खेड़ा के सत्याग्रह (1917) में सरदार पटेल ने अग्रणी भूमिका निभाई। इससे पूर्व भी वे खेड़ा में वेथ (बेगारी) व्यवस्था के विरुद्ध सफल आंदोलन चला चुके थे। खेड़ा जिले के किसान फ़सलों के बर्बाद होने के चलते काफी मुश्किलों का सामना कर रहे थे और भू-राजस्व माफ़ करने की उनकी मांग पर भी सरकार ने तनिक भी ध्यान नहीं दिया था। विट्ठलभाई पटेल और सरवेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी के सदस्यों द्वारा की गयी जांच में भी किसानों के मांगों को सही ठहराया गया था। जांच का निष्कर्ष था कि ‘चूंकि इस वर्ष फसल सामान्य वर्षों की एक-चौथाई ही थी इसलिए राजस्व नियमों के अंतर्गत किसान भू-राजस्व से पूरी छूट पाने के हक़दार थे’। गुजरात सभा ने किसानों के मुद्दे पर आंदोलन चलाया। इस आंदोलन में सरदार वल्लभभाई पटेल और इंदुलाल याज्ञिक ने किसानों को संगठित करने और उन्हें आंदोलनरत करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। अंततः सरकार को मजबूर होकर यह आदेश जारी करना पड़ा कि राजस्व केवल उन्हीं किसानों से वसूला जाये जो राजस्व देने में सक्षम हों। 

गुजरात के सूरत जिले का बारदोली तालुका असहयोग आंदोलन के दिनों में ही सिविल नाफ़रमानी के आंदोलन को शुरू करने के लिए गांधीजी द्वारा चुना गया था। पर उस समय चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधीजी द्वारा आंदोलन वापस लेने के बाद ऐसा संभव न हो सका था। पर बारदोली में दो स्थानीय नेताओं द्वारा, कल्याणजी और कुंवरजी मेहता, रचनात्मक कार्य जारी रखे गए। 1908 में ही इन दोनों ने पटीदार युवक मण्डल की स्थापना की थी। बारदोली स्वराज संघ ने, तालुका स्तर पर खली गयी कांग्रेस इकाई के साथ मिलकर, न केवल पटीदार किसानों को, बल्कि ‘कालिपराज’ कहे जाने वाले आदिवासी समूह को भी (जिन्हें गांधीजी ने ‘रानीपराज’ कहकर संबोधित किया), संगठित किया। 1927 में बंबई सरकार ने भू-राजस्व में 22 फीसदी की भारी बढ़ोतरी कर दी। और इस तरह धीरे-धीरे कर न देने के अभियान की ज़मीन तैयार हो चुकी थी। 

बारदोली सत्याग्रह 4 फरवरी 1928 को सरदार पटेल द्वारा शुरू किया गया, वे उस समय गुजरात कांग्रेस समिति के अध्यक्ष थे। सरदार पटेल ने बारदोली तालुक को 13 छावनियों में बांटा। 1500 स्वयंसेवकों की सेना ने, जिनमें से अधिकांश छात्र थे, प्रदेश भर से जुटाये गए 150 राजनीतिक कार्यकर्ताओं के जरिये आंदोलन को सफल बनाने में अपना योगदान दिया। आंदोलन से जुड़ी खबरों को छापने के लिए एक दैनिक बारदोली सत्याग्रह पत्रिका भी निकाली गयी। आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी पर भी ज़ोर दिया गया, और इस दिशा में मिथुबेन पेटिट, भक्तिबा, मनीबेन पटेल, शारदाबेन शाह और शारदा मेहता ने प्रमुख भूमिका अदा की।  जल्द ही यह आंदोलन राष्ट्रीय अख़बारों की सुर्खियों में आ गया और देश भर में चर्चा का विषय बना। इस आंदोलन की तीव्रता को भांपकर सरकार ने एक न्यायिक जाँच बिठाई, जिसके सुझावों के आधार पर बढ़ी हुई राजस्व दरों को कम कर दिया गया, जब्त की गयी ज़मीनें लौटा दी गईं और कुछ समय तक राजस्व दरें बढ़ाने का विचार छोड़ दिया गया।             

करांची अधिवेशन (1931) और सरदार पटेल
सरदार पटेल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के करांची अधिवेशन (1931) के सभापति चुने गए थे। अपने संक्षिप्त अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने पूर्ण स्वराज, हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों, भारत-ब्रिटेन सम्बन्धों, ब्रिटिश भारत और देसी रियासतों के रिश्ते, और सांप्रदायिकता के सवाल पर अपनी राय ज़ाहिर की। अपने भाषण के आरंभ में, सरदार पटेल ने भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी देशभक्ति, बलिदान और अप्रतिम साहस की सराहना करते हुए भी उनके कार्य करने के तरीकों और क्रांतिकारी पद्धति से अपनी असहमति ज़ाहिर की। किसानों की शक्ति और उनके संगठनशीलता में अपना पूरा यक़ीन जतलाते हुए सरदार पटेल ने कहा कि किसानों ने उन सभी शंकाओं को निराधार साबित कर दिया है जो उन्हें संगठित होकर काम करने में अक्षम मानती हैं और यह भी जोड़ा कि हिंदुस्तान में अहिंसक आंदोलनों की सफलता ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि अहिंसक आंदोलन महज़ एक स्वप्न नहीं है और उसे हकीकत में बखूबी तब्दील करके दुनिया को दिखाया है। ‘पूर्ण स्वराज’ पर टिप्पणी करते हुए सरदार पटेल ने कहा कि सुरक्षा, विदेश मामले, वित्त और राजकोषीय नीति संबंधी मुद्दे भारत को सौंप दिये जाने चाहिए। उन्होंने जोड़ा कि आज़ादी के बाद ब्रिटेन या किसी अन्य देश के साथ परस्पर लाभ के आधार पर बराबरी के रिश्तों की बुनियाद रखी जाएगी।  

संघीय भारत में, सरदार पटेल के अनुसार, कुछ ऐसे साझा बुनियाद अधिकार होंगे जो सभी भारतीयों को उपलब्ध होंगे। संघ की अवधारणा को बेहतर बताते हुए पटेल ने सभी का ध्यान इस विषय में देसी रियासतों द्वारा खड़ी की जाने वाली दिक्कतों की ओर खींचा। बर्मा के सवाल पर पटेल का स्पष्ट मत था कि भारत में बर्मा के शामिल होने या स्वतंत्र रहने का फैसला, खुद बर्मा की जनता द्वारा किया जाना चाहिए और इसके लिए उन्होंने वहाँ जनमत संग्रह कराने का भी सुझाव दिया। पूर्वी अफ़्रीका और दक्षिण अफ़्रीका में रह रहे भारतीयों की दुर्दशा की ओर भी राष्ट्रीय कांग्रेस का ध्यान पटेल ने आकृष्ट किया। रचनात्मक कार्यक्रमों के अंतर्गत उन्होंने विदेशी वस्त्रों और मदिरा एवं अन्य नशीले पदार्थों के बहिष्कार, पिकेटिंग और खादी तथा चरखा चलाने पर ज़ोर दिया। आर्थिक मुद्दे पर बोलते हुए, पटेल ने, राष्ट्रवादियों की पुरानी मांग यानि सेना और सिविल सर्विस पर व्यय कम करने की बात भी दुहराई। सेना पर टिप्पणी करते हुए पटेल ने कहा कि इसका एकमात्र इस्तेमाल ब्रिटिश स्वार्थों और ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की रक्षा करने में होता है।  

करांची अधिवेशन में ही कांग्रेस ने ‘मौलिक अधिकारों और आर्थिक कार्यक्रम’ का मसौदा भी स्वीकार किया। इसके अंतर्गत मौलिक अधिकारों (जिसमें संगठन, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और सभी नागरिकों के समान अधिकारों की बात कही गयी थी और अल्पसंख्यकों की भाषा, संस्कृति एवं लिपि की सुरक्षा की गारंटी दी गयी थी) के साथ-साथ, राज्य द्वारा धार्मिक मामलों में उदासीनता, सार्वभौम वयस्क मताधिकार, मुफ्त प्राथमिक शिक्षा, श्रमिकों को वाज़िब पगार, महिला मज़दूरों की सुरक्षा, स्कूल जाने की उम्र के बच्चों से फैक्टरी में काम कराने पर पाबंदी, श्रमिकों को यूनियन बनाने का अधिकार, खेती पर लगान घटाने, सेना और सिविल सेवा के खर्च में कटौती करने, देशी कपड़ा मिलों को सुरक्षा देने, सूदखोरी पर नियंत्रण करने, और नशीले पेय और मादक पदार्थों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने जैसी बातें कहीं गईं थीं।                

आज़ादी, बंटवारा और भारत का एकीकरण
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य इस स्थिति में पहुँच चुका था, जहां वह अपने उस विशाल साम्राज्य को, जिसमें ‘कभी सूर्य अस्त नहीं होता था’, और अधिक दिनों तक अपने नियंत्रण में नहीं रख सकता था। भारत में अगस्त 1942 में शुरू हुए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ ने ब्रिटिश साम्राज्य के अंतिम दिनों की घोषणा कर दी थी, देश के अलग-अलग हिस्सों में समांतर सरकारों की स्थापना और रॉयल इंडियन नेवी में हुआ विद्रोह भी इसी की अगली कड़ी थे। वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार क्रिप्स मिशन और कैबिनेट मिशन आदि के जरिये सत्ता के स्थानांतरण के सवाल पर भारतीय नेताओं के विचार टटोल रही थी। ब्रिटेन में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद क्लीमेंट एटली के नेतृत्व में लेबर पार्टी की सरकार बनी। एटली ने 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश संसद में यह घोषणा किया कि भारत को सत्ता-स्थानांतरण की प्रक्रिया जून 1948 से पूर्व सम्पन्न हो जाएगी और इस उद्देश्य से लॉर्ड माउण्टबेटन को नया वाइसराय नियुक्त किया गया। माउण्टबेटन योजना के अंतर्गत भारत को आज़ादी तो मिली पर विभाजन का दंश भी झेलना पड़ा।

विभाजन के बाद भारत को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा उनमें प्रमुख थीं: शरणार्थियों की समस्या और देसी रियासतों का आज़ाद भारत में विलय। देसी रियासतों की संख्या पाँच सौ से भी ज्यादे थी। आकार-प्रकार में ये रियासतें भारी विविधता वाली थीं, इनमें से कुछ, मसलन हैदराबाद और कश्मीर किसी यूरोपीय राज्य जितने बड़े थे तो कुछ बहुत ही छोटे थे। सरदार पटेल ने इन सैकड़ों रियासतों का एकीकरण भारत में करने में दो चरणों में सफलता पाई। इनमें से कुछ रियासतें संविधान सभा में अप्रैल 1947 में ही शामिल हो चुकी थीं। पर अधिकांश रियासतें संविधान सभा से दूर रहीं और कुछ ने तो, जैसे त्रावणकोर, भोपाल और हैदराबाद ने स्वतंत्र रहने की मंशा जाहिर की। सरदार पटेल ने नवनिर्मित राज्य विभाग की ज़िम्मेदारी संभाली, जिसके सचिव वी पी मेनन थे। उन्होंने भारत संघ के क्षेत्र अंतर्गत आने वाले रियासतों से अपील किया कि रियासतें रक्षा, विदेश मामले और संचार संबंधी मुद्दे भारत को सौंप दें। 

सरदार पटेल और उनके विभाग के प्रयासों के चलते 15 अगस्त 1947 तक, जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर की तीन रियासतों को छोडकर बाकी सभी रियासतों का भारत में एकीकरण किया जा चुका था। अक्तूबर 1947 में कबाइली फ़ौजों द्वारा कश्मीर पर हमले को रोक पाने में असफल रहने पर आखिरकार, 26 अक्तूबर 1947 को महाराजा हरी सिंह ने कश्मीर के भारत में विलय संबंधी दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए। जनमत संग्रह के जरिये फरवरी 1948 में, जूनागढ़ भारत में शामिल हुआ। हैदराबाद पर अपने विचार जाहिर करते हुए सरदार पटेल ने कहा कि ‘भारत हैदराबाद के रूप में एक ऐसी जगह कतई स्वीकार नहीं करेगा जो उस संघ को ही नष्ट कर देगा, जिसे हमने अपने खून पसीने से खड़ा किया है’। हैदराबाद में, हैदराबाद राज्य कांग्रेस ने 7 अगस्त 1947 को एक शक्तिशाली सत्याग्रह शुरू किया। जून 1948 आते-आते सरदार पटेल हैदराबाद के निज़ाम की करतूतों से अपना आपा खो बैठे थे, देहारादून से अपनी बीमारी की हालत में उन्होंने पंडित नेहरू को लिखा कि ‘मैं इस बात को शिद्दत से महसूस कर रहा हूँ कि हमें निज़ाम को स्पष्ट बता देना चाहिए कि हम भारत में हैदराबाद के विलय और वहाँ एक उत्तरदाई सरकार के निर्माण से कम किसी सूरत के लिए तैयार नहीं हैं’। हैदराबाद के निज़ाम और रजाकारों के अत्याचार से जनता त्रस्त हो चुकी थी। आखिरकार, 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना को हैदराबाद में हस्तक्षेप करना पड़ा और तीन दिनों बाद निज़ाम ने आत्म-समर्पण कर दिया और नवंबर 1948 में हैदराबाद का विलय भारत में हो गया।                

सांप्रदायिकता, हिन्दू-मुस्लिम समस्या और सरदार पटेल
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर ही, सांप्रदायिकता की समस्या भी उठ खड़ी हुई। ब्रिटिश राज के विभाजनकारी चरित्र ने, जो सबसे स्पष्ट रूप में उनकी ‘बांटो और राज करो’ की नीति से स्पष्ट होता था, सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं उठा रखी थी। 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों के जरिये पृथक निर्वाचन मण्डल का गठन किया गया, जिसने सांप्रदायिकता की समस्या को नासूर बना दिया। 1919 के मोंटेग्यु-चेम्सफोर्ड सुधारों और 1932 के सांप्रदायिक पंचाट ने सांप्रदायिक तत्त्वों के तुष्टीकरण के जरिये उन्हें शक्तिशाली बनाया। मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा जैसे सांप्रदायिक संगठनों ने ‘द्वि-राष्ट्रवाद’ के सिद्धान्त की पैरवी कर और औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार ने उन्हें प्रश्रय देकर भारत के विभाजन को अवश्यंभावी बना दिया था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अन्य नेताओं की तरह ही सरदार पटेल सांप्रदायिकता के कट्टर विरोधी थे। करांची अधिवेशन के अपने अध्यक्षीय भाषण में सांप्रदायिकता के प्रश्न पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने लाहौर कांग्रेस में पारित किए गए एक प्रस्ताव को दुहराया था, जिसमें यह कहा गया था कि कांग्रेस द्वारा ऐसा कोई फैसला नहीं लिया जाएगा जिसमें सभी संबंधित दलों की सहमति न हो। सांप्रदायिक एकता के लिए उनका जोर किसी कागज़ी समझौते से पनपने वाली एकता पर न होकर दिलों की एकता पर था। 30 जनवरी 1948 को एक धर्मांध हिन्दू द्वारा, जो राष्ट्रीय सेवक संघ के विचारों से प्रेरित था, महात्मा गांधी की हत्या के बाद, गृहमंत्री सरदार पटेल ने राष्ट्रीय सेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था। सरदार पटेल धर्मनिरपेक्षता, आपसी भाईचारे और सामाजिक सहिष्णुता के हामी थे। उनके अनुसार सांप्रदायिकता जैसी विभाजनकारी शक्तियाँ राष्ट्र-निर्माण में हमेशा बाधक होती हैं, इसलिए सचेत नागरिकों और सरकार द्वारा हमेशा सांप्रदायिक प्रवृत्तियों पर राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए अंकुश लगाया जाना चाहिए।          

संविधान सभा और सरदार पटेल
भारत का संविधान सामाजिक क्रांति का एक ऐसा दस्तावेज़ है जो एकता और लोकतन्त्र के मूल्यों को भी अपने भीतर समाए हुए है। इसका उद्देश्य एक लोकतान्त्रिक और समतामूलक समाज की स्थापना और राष्ट्रीय एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखना है। अपने नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिलाने की भारतीय संविधान की प्रतिबद्धता स्पष्ट है और साथ ही, स्पष्ट है स्वतन्त्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धान्त में भारतीय संविधान का विश्वास। भारतीय संविधान में लोकतन्त्र के आधारभूत सिद्धांतों और मानवीय संवेदना को तो जगह मिली ही है, साथ ही यह व्यावहारिकता और प्रशासनिक ब्योरों से भी भरा पड़ा है। संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई। सरदार पटेल गृह मंत्री, कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति के सदस्य होने के साथ ही, संविधान सभा की चार समितियों के सदस्य थे। इनमें से दो समितियों, सलाहकार समिति और प्रांतीय संविधान समिति, के वे अध्यक्ष थे और अन्य दो समितियों, संचालन समिति और राज्य समिति, में वे सदस्य की हैसियत से शामिल थे। 

सरदार पटेल का पूरा ज़ोर, संविधान सभा के बाहर और भीतर, भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने, राष्ट्र के एकीकरण और देश में कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर था। कुछ लोगों द्वारा यह आरोप लगाए जाने पर कि संविधान सभा में अल्पसंख्यकों के हितों का ध्यान नहीं रखा जाएगा, पटेल ने प्रत्युत्तर में कहा कि ‘यह एक झूठा दावा है, हिंदुस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की चिंता हम लोगों से अधिक शायद ही किसी और को होगी, हमारा मिशन है कि हम उनमें से हरेक को आश्वस्त और संतुष्ट कर सकें’। हथियार रखने के अधिकार का सरदार पटेल ने यह कहकर विरोध किया कि ‘आज के हालात में हथियार रखने का अधिकार खतरनाक होगा’। उन्होंने ज़मींदारी उन्मूलन का भी समर्थन किया। न्यायिक नियुक्ति के सवाल पर उनका मानना था कि ‘न्याय-तंत्र संदेह से परे और किसी भी प्रकार के राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होना चाहिए’। संविधान के अनुच्छेद 277 (क) के निर्माण में भी, जिसके अंतर्गत यह कहा गया कि राज्यपाल का अधिकार यहीं तक सीमित होगा कि वह राज्य में शांति-व्यवस्था पर भारी संकट की स्थिति में राष्ट्रपति को सूचित करे, जो अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए उचित निर्णय लेगा; सरदार पटेल और बी आर अंबेडकर और उनके मंत्रालयों क्रमशः गृह और विधि मंत्रालय की प्रमुख भूमिका थी। 

सरदार पटेल और पंडित नेहरू आज़ादी के तुरंत बाद की स्थितियों में भाषाई आधार पर प्रान्तों के गठन के पक्ष में नहीं थे, उनका मानना था कि इससे विभाजनकारी प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलेगा। जहाँ तक राष्ट्रभाषा का सवाल था तो पटेल हिन्दी के पक्ष में थे, पर उनका ज़ोर इस बात पर था कि यह हिन्दी संस्कृतनिष्ठ नहीं होनी चाहिए। उन्होंने भाषा विवाद को हल करने के लिए बनाए गए ‘मुंशी-आयंगर फार्मूले’ का समर्थन किया। 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा को संबोधित करते हुए सरदार पटेल ने कहा कि ‘1935 के भारत सरकार अधिनियम के विपरीत, जोकि लोकतन्त्र और राजशाही के बीच एक गठजोड़ था, हमारा संविधान भारतीय लोगों का वास्तविक संघ है जो लोगों की संप्रभुता की मौलिक अवधारणा पर आधारित है’।         

सरदार पटेल: सिनेमा और साहित्य में
सिनेमा और साहित्य राष्ट्र के निर्माण में और एकीकरण की भावना को सुदृढ़ करने में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। सरदार पटेल जैसे व्यक्तित्व इन दोनों विधाओं के लिए पर्याप्त आकर्षण का केंद्र होते है, जिन्हें ध्यान में रखकर साहित्यिक कृतियां और प्रेरणादायी जीवनीपरक फिल्में बनाई जा सकती हैं। यहाँ मैं कुछ ऐसी ही कृतियों का उल्लेख भर करना चाहूँगा। हिन्दी के उपन्यासकार राजेन्द्र मोहन भटनागर ने सरदार पटेल के जीवन को आधार बनाकर ‘सरदार’ शीर्षक से एक उपन्यास लिखा है। इस पुस्तक की भूमिका में वे यह सवाल उठाते हैं कि अहिंसक क्रांति करने वाला देश भारत, आखिरकार क्यों “आज अहिंसा के मार्ग पर चलने से कतरा रहा है और हिंसक मार्ग की ओर तेजी से बढ़ रहा है...क्यों हम स्वतंत्र देश में भी पराधीनता के अभिशाप से ग्रस्त होते जा रहे हैं?”  गुजराती के लेखक दिनकर जोशी ने भी सरदार पटेल के आखिरी पाँच वर्षों को केंद्र में रखकर एक उपन्यास लिखा है।  फिल्म निर्देशक केतन मेहता ने भी सरदार पटेल के आखिरी पाँच वर्षों में घटित घटनाओं को आधार बनाकर ‘सरदार’ शीर्षक से 1993 में एक फिल्म का निर्माण किया, जिसे राष्ट्रीय एकता पर बनी सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए नर्गिस दत्त अवार्ड दिया गया। इस फिल्म की पटकथा प्रख्यात नाटककार विजय तेंदुलकर ने लिखी थी। 

अंततः 
सरदार पटेल एक बेहतरीन वक्ता, कुशल संगठनकर्ता, प्रशासक और राजनेता थे। आज़ाद भारत के निर्माण में और उसके सुदृढीकरण में उन्होंने बखूबी अपनी भूमिका निभाई। किसानों की समस्या, उनके दुख-दर्द सरदार पटेल के चिंता का विषय थीं, किसानों की भलाई सुनिश्चित करना और उनके हितों के लिए लड़ने को उन्होंने अपना कर्तव्य माना। हिन्दू-मुस्लिम एकता, सामाजिक सहिष्णुता और सांप्रदायिक सौहार्द्र ऐसे विषय थे, जो उनके हृदय के निकट थे। उनके लंबे राजनीतिक अनुभव और व्यावहारिक बुद्धि का लाभ संविधान सभा को भी मिला। सरदार पटेल की दूरदृष्टि और उनकी कर्तव्यनिष्ठा ने भारत के एकीकरण का भी मार्ग प्रशस्त किया।   

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