30 सितंबर 2018

'हिन्दू पाकिस्तान’ हिन्दुओं के सामने एक चुनौती बनकर खड़ा है


‘हिंदुत्व आतंकवाद’ शब्द सुनते ही हिन्दुओं के कान खड़े हो जाने चाहिए. पिछले दिनों महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते ने सनातन संस्था के जिन कार्यकर्ताओं के पास से आठ ज़िंदा बम और बम बनाने की तमाम सामग्री पकड़ी है, वो हिन्दुओं के लिए एक और चेतावनी की तरह है.

यह पहला मौक़ा नहीं है जब ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ बेनक़ाब हुआ है. शहीद हेमंत करकरे ने पहली बार 2008 के मालेगाँव विस्फ़ोट की जाँच के दौरान ही यह उद्घाटित किया था कि इन विस्फ़ोटों के पीछे मुस्लिम नहीं बल्कि हिन्दू आतंकवादियों का हाथ है. करकरे को इस साहस की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी. मुंबई हमलों में उनकी शहादत के बावजूद सोशल मीडिया पर न सिर्फ़ उनके, बल्कि उनकी पत्नी के खिलाफ़ भी बहुत जहर उगला गया था.

2010 में तत्कालीन गृहमंत्री पी० चिदम्बरम ने आतंकी घुसपैठ के साथ-साथ “भगवा आतंकवाद” से भी सावधान रहने की हिदायत दी तो राजनीतिक हलकों में भूचाल-सा आ गया था. आपत्ति दर्ज कराई गयी थी कि यह ‘स्वभावतः उदार और शांतिप्रिय हिन्दू धर्म’ को बदनाम करने की साजिश है.

ज़ाहिर-सी बात है कि यह आपत्तियाँ सबसे तीख़े ढ़ंग से भाजपा की ओर से आयीं जो कि हिंदुत्व के राजनीतिक प्रोज़ेक्ट की चुनावी विंग है. आरएसएस-भाजपा हिन्दुओं से भी यह छुपाना चाहते हैं कि वो देश में संभावित आतंकियों की एक खेप तैयार कर रहे हैं.

लेकिन इस तरह की घटनाओं में उनकी सहमति इस बात से पता चलती है कि 2014 में सरकार बनते ही न सिर्फ़ इन्द्रेश कुमार जैसे लोगों को अत्यधिक ताक़तवर बना दिया गया बल्कि असीमानंद, प्रज्ञा सिंह और श्रीकांत पुरोहित जैसे लोगों के खिलाफ़ सबूत मिटाकर उन्हें जेल से बाहर भी निकाला गया.

हालाँकि हिंदुत्व आतंकवाद को “भगवा आतंकवाद” कहना शब्दों के गलत चयन का उदाहरण था. राजनीतिक शब्दावली में “सिलेक्शन ऑफ़ टर्म” यानि शब्दों का चयन, समझदारी का पैमाना है. हिंदुत्व सांप्रदायिकता को “भगवा” कहकर उसकी खिल्ली उड़ाने से अनजाने ही सांप्रदायिक दुष्प्रचार को बल मिलता है.

हिन्दू सांप्रदायिक विचारधारा हिन्दुओं के मन में डर फैलाती है कि बाकी सभी— मुस्लिम, ईसाई, कांग्रेसी, वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी— मिलकर हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाते हैं. हिंदुत्व आतंकवाद को भगवा आतंकवाद कहने से हिन्दुओं के मन में इसके प्रति कोई दुर्भावना पैदा नहीं होती.

आम धार्मिक हिन्दू— चाहे वो सांप्रदायिकता के प्रभाव में हो या नहीं— के लिए किसी भी चीज का भगवाकरण सहज भर्त्सना का विषय नहीं हो सकता. उसकी अपनी धार्मिक आस्था से जुडी सभी चीज़ें जैसे पौराणिक ऋषि-मुनि और देवी-देवताओं के वस्त्रों से लेकर रामचरितमानस को सहेजने वाले कपड़े तक का रंग सामान्यतः भगवा होता है. उनकी स्मृति से लेकर रामलीलाओं तक राम स्वयं भगवा वस्त्रधारी हैं. इस तरह भगवा रंग मूल रुप से एक सामान्य हिंदू की धार्मिक चेतना का हिस्सा बन जाता है. परिणाम कि भगवा रंग पर ऐतराज करके हम लोगों को सांप्रदायीकरण के अर्थ नहीं समझा सकते.

किस तरह से कठिन से कठिन बात शब्दों के सटीक चयन के मार्फत लोगों को बड़ी आसानी के साथ समझायी जा सकती है, इसकी तमाम मिसालें हैं. जैसे एनडीए-एक के दौरान शिक्षा के सांप्रदायीकरण को समझाने के लिए वीर सांघवी ने एक सटीक शब्द ईजाद किया, वो शब्द था— शिक्षा का तालिबानीकरण.

यह सांप्रदायिक परियोजना के लिए एक सटीक चोट थी. इसने एक तीर से दो निशाने साधे. यह वो समय था जब अफगानिस्तान में तालिबानी आतंकवादी इस्लाम की ‘प्रतिष्ठा’ और शरिया कानून लागू करने के लिए लोगों पर तरह-तरह के जुल्म ढा रहे थे. पूरी दुनिया में तालिबानी कट्टरपंथियों की कटु आलोचना हो रही थी. कहा जा रहा था कि इस्लाम के भले के नाम पर तालिबानियों द्वारा जो भी किया जा रहा है, उसका सबसे ज्यादा खामियाजा ख़ुद इस्लाम धर्म को ही भुगतना पडेगा.

स्कूली पाठ्यपुस्तकों के सांप्रदायीकरण को तालिबानीकरण कहने का साफ़ मतलब था कि तालिबानीकरण एक कट्टरतावादी प्रवृत्ति है जो किसी भी धर्म के भीतर पनप सकती है. और यह भी कि आरएसएस- भाजपा दिखने में कितने ही तालिबान-विरोधी क्यों न लगते हों, दोनों उसी तरह के धार्मिक कट्टरपंथ के पुजारी हैं. और, सबसे बढ़कर, यह कि हिन्दू धर्म और हिन्दुओं के भले के नाम पर जो कुछ भी किया जा रहा है, उसका सबसे ज्यादा नुकसान दरअसल ख़ुद हिन्दू धर्म को होगा.

वास्तव में, किसी भी तरह की विचारधारा लोगों की सहमति के बिना लम्बे समय तक टिक नहीं सकती. सांप्रदायिक और कट्टरपंथी तत्व लोगों की सहानुभूति बटोरने और उनसे जुड़ने के लिए किसी खास धर्म के पवित्र प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं. इस बाबत वे सिद्ध करना चाहते हैं कि उनका उद्देश्य हिंदू धर्म की भलाई और उसकी सर्वश्रेष्ठता को स्थापित करना है.

सनातन संस्था, अभिनव भारत या आरएसएस गठजोड़ के संगठन जिस तरह भगवा का इस्तेमाल करते हैं, वो वैसा ही है जैसे हाफिज़ सईद मौलाना का भेष धरकर लोगों को धर्म के नाम पर ठगने का प्रयास करता है. लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि ये लोग भगवा या हरे आतंकवादी हैं बल्कि यह है कि वे आतंकवादी हैं जो कि भगवा या हरे रंग को अपने सांप्रदायिक और आतंकी एजेण्डे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.

डी० आर० गोयल जो कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लिखी गई सबसे प्रामाणिक किताब “आरएसएस” के प्रख्यात लेखक हैं, “हिन्दू आतंकवाद” की श्रेणी से भी सहमत नहीं थे.  वे इसे कुछेक हिंदुओं की आतंकी गतिविधियों में संलिप्तता का साधारणीकरण मानते थे. उनके मुताबिक इसे “हिंदुत्व आतंकवाद” कहना ज्यादा मुनासिब है क्योंकि हिंदू एक धर्म का नाम है, जबकि ‘हिंदुत्व’ हिंदू धर्म का सहारा लेने वाली  सांप्रदायिक अवधारणा का परिचायक है.

यही बात उन आतंकवादियों पर भी लागू होती है जो इस्लाम का नाम बदनाम करते हैं. उन्हें इस्लामिक टेरेरिस्ट की बजाय इस्लामिस्ट टेरेरिस्ट कहना ज्यादा ठीक है. इस्लामिस्ट कहने से स्पष्ट होता है कि इस्लाम के नाम का उपयोग किया जा रहा है. जबकि इस्लामिक आतंकवाद से ऐसा लगता है कि जैसे यह इस्लाम की स्वाभाविक मूल प्रवृत्ति है.

ठीक इसी तरह प्रख्यात इतिहासकार बिपन चंद्र, मृदुला मुख़र्जी, आदित्य मुख़र्जी और सुचेता महाजन अपनी किताब आरएसएस, स्कूली पाठ्यपुस्तकें और महात्मा गाँधी की हत्या में सुझाते हैं कि आरएसएस को “संघ परिवार” कहने की बजाय “संघ गठजोड़” कहना ज्यादा सही होगा. क्योंकि परिवार एक सम्मानित सामाजिक इकाई है और संघ-गठजोड़ को संघ परिवार कहना आरएसएस को वैधानिकता प्रदान करना है।

बहरहाल, सनातन संस्था के वैभव राउत के पकड़े जाते ही संस्था ने अपने आपको उससे अलग कर लिया है. एक आधिकारिक बयान में संस्था ने कहा है कि वैभव राउत संगठन का सदस्य नहीं बल्कि संगठन के एक सदस्य का साथी है. लेकिन दूसरी तरफ़, यही सनातन संस्था वैभव राउत का मुकदमा लड़ने की तैयारी भी कर रहा है. ध्यान रहे यह वही सनातन संस्था है जिसे गौरी लंकेश, गोविन्द पानसरे, नरेन्द्र दाभोलकर और एम०एम० कलबुर्गी की हत्याओं का ज़िम्मेदार माना जाता है.

बहुत से हिन्दुओं के लिए यह स्वीकार कर पाना मुश्किल है कि उनके बीच से आतंकवादी जन्म ले रहे हैं. घृणा और हिंसा— दो चीज़ें मिलकर आतंक को जन्म देती हैं. जब यह दोनों मिलकर किसी विचारधारा का निर्माण करते हैं तो आतंक के किसी ख़ास वाद का जन्म होता है. लोगों को जोड़ने के लिए अक्सर ऐसे वाद धर्म की ओट लेते हैं. धर्म की यह ओट इस्लामिक भी हो सकती है, सिख भी और हिन्दू भी.

यानी आतंकवाद का अपना कोई मज़हब नहीं होता. जो धार्मिक समुदाय अपने भीतर से उपजे कट्टरपंथ को प्रभावी ढ़ंग से रोक नहीं पाता, आतंकवाद की ओर फ़िसल जाता है. जिन देशों में मुसलमानों के बीच से इस्लामिस्ट आतंकवाद उभरकर मजबूत हुआ, वहाँ उदारवादी तबकों ने ऐतिहासिक तौर पर अपनी असफ़लता स्वीकार की है.

इस्लाम की मानवीय और उदार परंपराओं को कुचलकर ही इस्लामिस्ट कट्टरपंथ सफ़ल हुआ है. इसलिए अगर कोई कहे कि हिन्दुओं के बीच से आतंकवादी पैदा हो रहे हैं तो हिन्दुओं को इससे नाराज़ होने की नहीं, सतर्क होने की ज़रूरत है. सतर्क इसलिए कि यह हिन्दुओं के पास अपने धर्म के उदार और मानवीय स्वरुप को बचाने के लिए एक चेतावनी की तरह है.

पिछले चार दशकों से हिन्दू धर्म का घनघोर साम्प्रदायीकरण प्रोजेक्ट चल रहा है. हिन्दू धर्म के धार्मिक प्रतीकों के उदार स्वरुप को मिटाकर उन्हें उग्र और हिंसक तरीक़े से पेश किया जा रहा है. भगवान् राम की मर्यादा पुरुषोत्तम वाली सौम्य छवि की जगह क्रुद्ध, हिंसक और युद्धोन्मत्त तस्वीर राममंदिर आंदोलन का प्रतीक-चिन्ह बन चुकी है.

हालिया उदाहरण गाड़ियों की विंड-स्क्रीन पर लगी एंग्री हनुमान की तस्वीर है जिसमें अपनी भौंहें ताने भगवान् जाने किस पर अपना क्रोध दिखा रहे हैं. धार्मिक समारोहों में हथियारों का खुल्लमखुला प्रदर्शन, भड़काऊ गीत और सिहरा देने वाला संगीत— यह सब हिन्दू धर्म की उदार परंपरा के खिलाफ़ सांप्रदायिक- कट्टरपंथी प्रोजेक्ट है.

पहले चरण में हिंदुत्व कट्टरपंथ सांप्रदायिक दंगों में अपने अमानवीय स्वरूपों में सामने आता रहा. जहाँ हिन्दुओं को एकजुट करने के नाम पर उनका शस्त्रीकरण किया गया, उनको अपने ‘शत्रुओं’ के प्रति क्रूर बनने की शिक्षा दी गयी और धर्म की रक्षा के नाम पर शस्त्र उठाने का आह्वान किया गया.

ज़ाहिर सी बात है कि यह एक बहुत बड़े राजनीतिक प्रोज़ेक्ट का हिस्सा है जिसका नेतृत्व सनातन संस्था और अभिनव भारत आदि अपवादों के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ करता है. छद्म नामों से चल रहे उसके तमाम संगठन और अन्य हिंदुत्ववादी संगठन दो कामों को बखूबी अंजाम देते रहे हैं: मुस्लिम समुदाय के प्रति हिन्दुओं के भीतर असीमित घृणा पैदा और उनके दिमाग़ ‘ठिकाने’ लगाने के लिए हिन्दुओं को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देना.

यही वजह है गोडसे के सह अभियुक्त नारायण आप्टे ने पाकिस्तानी नेताओं की हत्या, पाकिस्तान जाने वाली ट्रेन में विस्फोट और पाकिस्तानी संविधान सभा को उड़ाने जैसी योजनाएं बनायी थीं. आज की परिस्थितियों के हिसाब से देखें तो यह खालिस आतंकवादी योजनाएं हैं।

मुंजे कहते थे- हिंसा को वैज्ञानिक ढ़ंग से विकसित किये जाने की जरूरत है। राममंदिर विवाद के दौरान विहिप और बजरंग दल ने सस्ती दरों पर देशी तमंचे और कट्टे खुलेआम बेचे थे। शस्त्र-पूजा और त्रिशूल दीक्षा जैसे कार्यक्रम संघ के हिंसा में विश्वास की राजनीति का हिस्सा हैं। बजरंग दल के पास तो बड़ी मात्रा में बंदूकें-तलवारें और अन्य घातक हथियार रहते हैं.

बजरंग दल के पूर्व संयोजक और फिर बाद में गोधरा से भाजपा विधायक रहे हरेश भट्ट के मुताबिक अहमदाबाद में दंगों के दौरान प्रयुक्त बम उनकी अपनी बम निर्माण फैक्ट्री में बनाये गये थे और उनके पास राकेट लांचर तक मौजूद थे।

गाँधीजी और राष्ट्रीय आंदोलन की महान विरासत जब तक मजबूत रही, हिन्दुओं के सांप्रदायीकरण का यह प्रोज़ेक्ट हिन्दुओं के बीच हाशिये पर पड़ा रहा. गाँधीजी के पास हिन्दू राष्ट्र के बरक्स रामराज्य का ऐसा सपना था जो उदार, मानवीय और सहिष्णु था.

लिहाज़ा हिन्दू इस बात को बखूबी समझते रहे कि मुस्लिम लीग की राह चलकर तो हम भारत को भी पाकिस्तान बना देंगे. क्योंकि हमारे राष्ट्र-निर्माताओं सहित उनके प्रभाव में रहने वाले हिन्दू भी बखूबी जानते थे कि कट्टरपंथ एक फ़िसलन-भरी ढाल है.

हम देख सकते हैं कि पाकिस्तान सहित दुनिया के कट्टरपंथी देशों को किस नज़र से देखा जाता है. जबकि भारत की इज्ज़त पूरी दुनिया में इसीलिए है कि वो अपनी आत्मालोचना करके ख़ुद को लगातार बेहतर बनाने की कोशिश करता मुल्क है.

आज अगर हम भारत को पाकिस्तान बनने से रोकना चाहते हैं तो उसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी हिन्दुओं को अपने कंधों पर वहन करनी होगी. वरना सुनने में भले ही कितना ख़राब क्यों न लगे— हिन्दू पाकिस्तान हिन्दुओं के सामने एक चुनौती बनकर मुँह बाए खड़ा है.



सौरभ वाजपेयी

लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट के संयोजक और दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक हैं।

27 जुलाई 2018

महात्मा गांधी और राष्ट्रवाद की संकल्पना

प्रभा मजुमदार 

इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी भी राष्ट्र का निर्माण एक सतत प्रक्रिया है और इसकी गति, दिशा और राह को निर्धारित करने के लिए, उस समाज और देश के नेता, विचारक तथा सामान्य नागरिकों की राष्ट्रीयता की अवधारणा बड़ा महत्व रखती है। यह अवधारणा, धार्मिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक चेतना के परिपेक्ष्य में, विभिन्न घटकों- अवययों के विमर्श, विश्लेषण-संशोधनों से गुजरते हुए, एक लंबे वैचारिक आंदोलन के दौरान लगातार परिमार्जित होती है।   

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1857 की पहले आंदोलन में जन समुदाय की एक विशाल भागीदारी संगठित रूप में उभर कर आई थी जिसमें अलग अलग धर्मों, समुदायों, भाषाई क्षेत्रों के लोगों ने स्वाधीनता का स्वप्न देखा था और हिंदू-मुसलमानों ने मिलकर साम्राज्यवाद को चुनौती दे डाली थी। अंग्रेजों ने इन दोनों धर्मावलंबियों के आचार-व्यवहार-मान्यताओं-विश्वासों में अन्तर जान लिया था और अपनी सत्ता की निरंतरता के लिए , एक दूसरे के विरोध में उनका प्रयोग भी। 

भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर गांधी जी के उभरने से पहले ही बंगाल का विभाजन हो चुका था और परस्पर अविश्वास, नफरत की खाई काफी चौड़ी हो चुकी थी, जिसके और फैलने-गहराने की दिशा में , हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही संप्रदायों के स्वयंभू संकीर्ण विचारधारा के नेताओं ने अपने अपने संगठन भी बना लिए थे। 

महात्मा गांधी रातों-रात नेता नहीं बने थे, न ही उन्होंने जल्दबाजी में कोई आंदोलन खड़ा किया। वे देश के कोने कोने और गली-कूँचों में फिरे, भारत के असली जनमानस से मिले, समझे। दरिद्रता, अज्ञान, अशिक्षा, अंधविश्वास, धार्मिक-सामाजिक पाखंड, शोषण, छुआछूत जैसी जैसी बहुत गहराई तक धँसी समस्याओं और कुरीतियों को निकट से समझा और अनुभव भी किया। समाज के हाशिये पर पड़े पिछड़ी जातियों और महिलाओं के दर्द को महसूस किया। 

इस सारे परिप्रेक्ष्य में रची गई राष्ट्रवाद की अवधारणा, निश्चित ही संकीर्ण, कट्टर और द्वेषपूर्ण नहीं हो सकती, जिसमें विरोधियों को मिटाने या प्रताड़ित करने की सोच हो, कुछ गिनेचुने लोगों या समूह के स्वार्थ हों, असमानताओं की खाइयाँ हों, जाति-भाषा-लिंग के कारण किसी को वंचित करने के षडयंत्र हों और शासक की निरंकुशता हो। 

इतना ही नहीं, उनका यह राष्ट्रवाद, समग्र मानवतावाद से बहुत भिन्न भी नहीं हो सकता था- जिसमें कोई किसी का शत्रु नहीं होता और देशभक्ति साबित करने के लिए, किसी दूसरे देश को मुर्दाबाद कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आज के हिंसा, प्रतिशोध और नफरत से भरे माहौल में भले ही यह दुर्बलता का प्रतीक लगे, मगर यह वैश्विक दृष्टि संपन्न विचारक ही नहीं, जमीन से जुड़े कर्मठ कार्यकर्ता की, अपने राष्ट्र की प्रगति, शांति और एकता के लिए आवश्यक व्यावहारिक जीवनदृष्टि थी। एक सर्वसमावेशक उदार राष्ट्रवादी होने के नाते उनके जनआंदोलन में सभी धर्मों, वर्णों, वर्गों, विचारधाराओं केआर स्त्री पुरुष बराबरी के हिस्सेदार थे।  

देश की जड़ों से गहरे जुड़े होने पर भी गांधीजी, पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान एवं दर्शन से परिचित और कुछ हद तक प्रभावित थे, दक्षिण अफ्रीका में अध्ययन जीवनयापन और संघर्षों के दौरान उनकी सोच और समझ काफी परिपक्व और पैनी हो चुकी थी। एक विशाल, शक्तिशाली और समृद्ध  साम्राज्य के आगे टुकड़ों में बंटा  अंतर्कलह से जूझता समाज नहीं टिक सकेगा, साथ ही हिंसक आंदोलन को कुचलने में भी शासन देर नहीं करेगा- यह उन्होंने भालिभांति अनुभव कर लिया था। 

वे जानते थे की भूमिगत आंदोलनों की एक सीमा होती है, क्रांतिकारी कितने ही निडर और देशभक्त क्यों न हो- उनके व्यक्तिगत प्रयास, साम्राज्यवाद को जड़मूल से नहीं उखाड़ सकते, इसके लिए जनजन की भागीदारी आवश्यक है। जन जन की भागीदारी के इसी प्रयास में उन्होने दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिलाओं को जोड़ा-राष्ट्र की राजनीति में अपना स्थान और योगदान होने का अहसास कराया। 

शहरों की सुशिक्षित जनता, प्रबुद्ध लोगों और विद्यार्थियों के साथ ग्रामीण जन, किसान, बुनकर, हथकरघा मजदूर सभी उनके आंदोलन का हिस्सा बनें। वे स्वावलंबन तथा स्वाभिमान में गहरी आस्था रखते थे अतः चरखा और हस्तकला उद्योग भारतीयों के स्वावलंबन और सम्मान का प्रतीक बन गया, लोगों को शोषण और अन्याय का हर स्तर पर विरोध करना सिखाया- चंपारण में नील के खेतिहारों के लिए उनका संघर्ष इसकी मिसाल था। 

एक राष्ट्र के रूप में वे कुछ बुनियादी मूल्यों के आग्रही थे। किसी भी हिंसा का विरोध कर सकने के नेतिक आग्रह ने  ही उन्हें चौराचोरी की हिंसा के बाद अपना आंदोलन ख़त्म कर देने का साहस दिया था। साधन की शुचिता का महत्व किसी भी  देश-समाज के अस्तित्व एवं गरिमा के लिए क्या मायने रखता है, नैतिक संबल के बगैर समृद्धि भी विनाशकारी हो जाती है और शोषण पर आधारित समाज किस तरह हिंसा और द्वेष से उफनता है- यह जान कर  ही वे कतार  के अंत में खड़े व्यक्ति, दलित कुचले वर्ग के हरदम साथ रहे।  

उनका स्वराज्य एक सत्ता हस्तांतरण मात्र नहीं था। पंचायत से लेकर सत्ता के सर्वोच्चम स्तर पर, वे सबकी भागीदारी चाहते थे जो कि एक व्यापक सामाजिक बदलाव के बगैर संभव नहीं था। इस लिए, उनकी दृष्टि में नवजागरण आंदोलन, स्वतंत्रता आंदोलन का ही हिस्सा था। शराब बंदी हो या अस्पृश्यता, अनेक सामाजिक बुराइयों की उन्होंने खुलकर आलोचना ही नहीं की वरन अपने व्यक्तिगत जीवन में विचारों और व्यवहार को एक-सा रखा। 

स्वच्छता अभियान हो या स्वावलंबन, उसका प्रचार के लिए उपयोग नहीं किया। स्वयं अपने हाथों से नालियों-शौचालयों की सफाई का कार्य एकदम सहज तरीके से किया। यह महत्वपूर्ण है कि उनकी स्वच्छता केवल शारीरिक स्तर तक नहीं थी –मन, विचार एवं क्रिया के स्तर से गुजरती हुई, अंतःकरण की स्वच्छता उनका ध्येय थी। कर्म की हिंसा ही नहीं, वे शब्द और सोच की हिंसा का उन्मूलन करने के लिए प्रतिबद्ध थे , इसीलिए किसी से घृणा भी नहीं कर सके और भयमुक्त रहे।  

आज तिरंगे में लिपटे शहीद जवानों की तादाद जैसे चिंता का विषय है, उतना भी गंभीर प्रश्न दंगे, आतंकी हमले, धर्म-जाति के नाम पर खुली हिंसा, वैचारिक भिन्नता पर धमकियाँ-हत्याएँ और अराजक तत्वों द्वारा किसी भी बात पर मनचाही लूट और हत्याएँ और इन सबको पोषित करती व्यवस्था हैं। 

क्या समता, न्याय और परस्पर सम्मान की हमारी राष्ट्रीयता की अवधारणा, हम एक सशक्त मगर दम्भी- जाहिल-असंस्कृत-असामाजिक-आत्ममुग्ध एवं दृष्टिशून्य गिरोह के हाथों गिरवी रख देंगे? तर्क-ज्ञान-विज्ञान और विचारबोध से संपन्न हो कर भी पिछड़ी, अमानवीय, स्वार्थ व अंधविश्वास पूर्ण मान्यताओं को आत्मगौरव कह कर स्वीकार कर लेंगे? हिंदु पाकिस्तान या हिंदु तालिबान जैसे शब्द बेशक आहत और अपमानित करने वाले हैं, मगर एक राष्ट्र के रूप में हमारे कदम किस दिशा में जा रहे हैं- क्या इस पर चिंतन और मंथन की जरूरत नहीं है? 

(लेखिका स्वाधीन की संपादक हैं।)

8 मई 2018

भारत विभाजन और गाँधी-नेहरु-पटेल व अम्बेडकर-जिन्ना-सावरकर

सुधांशु द्विवेदी

विभाजन का मूल कारण तो निःसंदेह एक ही था "हिन्दू –मुस्लिम अलगाव की अमिट भावना". हालांकि यह भावना सदियों पुरानी थी पर 1857 के बाद अंग्रेजों का एक ही मकसद था भारतीय लोगों में फूट डालकर अपने शासन को मजबूत करना. इसके लिये उन्होने मुस्लिमों , सिखों , दलितों , द्रविडों-- सबको अलग अलग भड़काये रखा. अब सवाल सिर्फ यह है कि वे कौन भारतीय लोग थे जो इस अलगाव को और बढ़ा रहे थे? वे कौन थे जो बस तटस्थ होने का मज़ा ले रहे थे? और वे कौन थे जिन्होंने इस अलगाव को ख़त्म करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया ?

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हम इतिहास का तटस्थ मूल्यांकन करें तो पाएंगे कि गाँधी , नेहरु , पटेल , मौलाना आज़ाद , खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे लोगों ने अंतिम समय तक अंग्रेजों की साजिश के विरुद्ध संघर्ष किया और जब अनेक विभाजनों की स्थिति बन गई तभी विवशता में विभाजन को स्वीकार किया. मौलाना और सीमान्त गाँधी ने तो उसे अंत तक स्वीकार नहीं किया. जबकि सावरकर और जिन्ना यह मानते रहे कि हिन्दू हित और मुस्लिम हित अलग चीजें हैं और वे विभाजन पर जोर देते रहे. विभाजन का समर्थन डॉ अम्बेडकर ने भी किया पर इस समर्थन की वजह स्थायी शांति की तलाश ही थी न कि कोई अन्य राजनीतिक मंतव्य.

गाँधी , नेहरु और पटेल में गाँधी पूरी तरह से विभाजन के खिलाफ थे तो सरदार पटेल 1946 तक विभाजन के मुखर समर्थक हो चुके थे. क्योंकि वे शेष भारत को संयुक्त रखने के लिए ऐसा करना ज़रूरी मानने लगे थे. जबकि नेहरु को अंत तक यही भरोसा था कि जिन्ना सिर्फ मुसलमानों के लिए बेहतर सौदे बाज़ी के लिए पाकिस्तान का शिगूफा छोड़ रहे हैं और अंततः अपना बेहतर हिस्सा लेकर शांत हो जायेंगे. पर यहाँ नेहरु का अनुमान गलत निकला. जिन्ना अन्ततः ज्यादा से ज्यादा आक्रामक रुख अपनाते गए जो अपने चरम रूप में सीधी कार्यवाही के रूप में आया . उनके मुकाबले गाँधी-नेहरु के मेल मिलाप के प्रयास बेहद कमजोर साबित हुए. 

विभाजन को लेकर कुछ प्रश्न कुछ भ्रान्तियाँ फैली हुई हैं उनका एक एक करके उत्तर दिया जा रहा है –

१) क्या गांधीजी विभाजन के लिए जिम्मेदार थे ?
यह संघियों द्वारा फैलाया गया सबसे बड़ा ऐतिहासिक झूठ है ताकि भारत विभाजन हेतु किये गए संघी धतकरमों पर पर्दा पड़ जाये ! विभाजन मेरी लाश पर होगा-- यह गाँधी जी का संकल्प था पर कांग्रेस के दक्षिणपंथी खेमे को अंततः गाँधी के लाश बन जाने की कोई चिंता न थी . वे विभाजन पर दृढ़ थे . इसलिए मजबूरी में अकेला पड़ जाने की वजह से गाँधी को विभाजन की बात विवशता में माननी पड़ी !

लिखित इतिहास का अध्ययन करने से पता चलता है कि बडी चालाकी से इसमें तथ्यों के साथ छेडखानी की गई है। उन दिनों चल रही उग्र एवं पतनशील तथा अव्यवस्थित राजनीति के कारण गांधी बहुत सक्रिय हो गए थे। देश के विभाजन के प्रस्ताव और उसके विरुद्ध हुई हिंसके प्रतिक्रिया ने तनाव पैदा कर दी थी जिसके कारण मानवीय इतिहास में दर्दनाक पृथकतावादी हत्याएँ हुई! कट्टर मुसलमानों की नजर में गांधी हिंदू थे जिन्होंने धार्मिक/सांप्रदायिक आधार पर पाकिस्तान के निर्माण का विरोध किया था। कट्टर हिंदुओं की नजर में वे हिंदुओं पर हुए अत्याचार का बदला लेने में बाधक थे। गोडसे इसी अतिवादी सोच की उपज था।

गांधी की हत्या दशकों से योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा मनःस्थिति में परिवर्तनो का परिणाम थी। कट्टरपंथी हिंदुओं के फलने-फुलने में गांधी बाधक थे और समय के साथ यह भावना पागलपन में बदल गई। वर्ष 1934 से लेकर लगातार 14 वर्ष़ों में गांधी पर छह बार प्राणघातक हमले हुए। गोडसे द्वारा 30 जनवरी 1948 को किया गया हमला सफल रहा। अन्य पाँच हमलों का समय है जुलाई 1934, जुलाई एवं सितंबर 1944, सितंबर 1946 और 20 जनवरी 1948। गोडसे पूर्ववर्ती दो हमलों में शामिल था। वर्ष 1934, 1944 एवं 1946 के असफल हमले जब हुए तब पाकिस्तान का निर्माण और उसे 55 करोड रुपये दिये जाने का प्रस्ताव अस्तित्व में नहीं थे। इसकी साजिश बहुत पहले ही रची गई थी। 

एक सभ्य समाज में मतभेदों का निराकरण खुले एवं स्पष्ट विचार-विमर्श के लोकतांत्रिक तरीकों से जनमत जागृति द्वारा किया जाता है। गांधी हमेशा इसके पक्षधर थे। गांधी ने बातचीत के लिए गोडसे को बुलाया था, पर इस अवसर का लाभ उठाने के लिए वह आगे नहीं आया। यह स्पष्ट करता है कि गोडसे का, मतभेदों को लोकतांत्रिक तरीके से निराकरण करने में, विश्वास का अभाव था (यानी विश्वास नहीं था)। ऐसे संकुचित मानसिकता के लोग अपने विरोधी को खत्म कर डालते हैं।

हिंदू मानसिकता भी पाकिस्तान के निर्माण की उतनी ही जिम्मेदार है जितना कि मुस्लिम कट्टरता। कट्टरवादी हिंदुओं ने मुसलमानों को `मलेच्छ` कहकर हेय दृष्टि से देखा और यह दृढ़विश्वास व्यक्त किया कि मुसलमानों के साथ उनका सह-अस्तित्व असंभव है। आपसी अविश्वास एवं आरोप प्रत्यारोप ने दोनों संप्रदायों के कट्टरपंथियों को बढावा दिया कि वे हिंदू एवं मुस्लिम दोनों की अलग राष्ट्रीयता बताएँ। इससे मुस्लिम लीग की इस मांग को बल मिला कि सांप्रदायिक प्रश्न का यही हल है। दोनों तरफ के लोगों के निहितार्थ़ों ने अलगाववादी मानसिकता को बढावा दिया और `नफरत` को उन्होंने बडी चालाकी से जायज बताते हुए इतिहास के तथ्यों से खिलवाड किया। यह गंभीर मामला है उस देश के लिए जिसकी सोच से आज भी यह प्रश्न गायब नहीं हुआ।

शायर इकबाल, जिन्होंने प्रसिद्ध गीत `सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा` लिखा है, पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने 1930 में अलग देश के सिद्धांत को जन्म दिया। कहने की जरूरत नहीं है कि इस मनःस्थिति को हिंदू अतिवादियों ने ही मजबूत किया था। वर्ष 1937 में अहमदाबाद में हिंदू महासभा का खुला सत्र आयोजित हुआ जिसमें वीर सावरकर ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा `भारत एक देश आज नहीं समझा जा सकता यहाँ दो अलग-अलग राष्ट्र मुख्य रूप से हैं - एक हिंदू और दूसरा मुस्लिम (स्वातंत्र्यवीर सावरकर, खण्ड 6, पेज 296, महाराष्ट्र प्रांतीय हिंदू महासभा, पुणे) वर्ष 1945 में, उन्होंने कहा था - मेरा श्री जिन्ना से द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत से कोई विवाद नहीं है। हम, हिंदू स्वयं एक देश हैं और यह ऐतिहासिक तथ्य है कि हिंदू और मुस्लिम दो देश हैं (इंडियन एजुकेशनल रजिस्ट्रार 1943, खण्ड 2, पेज 10) यह अलगाववादी और असहमत अस्तित्व की मानसिकता दोनों पक्षों की थी जिससे पाकिस्तान के निर्माण को बल मिला।

इस मानसिकता के ठीक विपरीत , गांधी अपने जीवन पर्यंत इन पर दृढ़तापूर्वक जोर देते रहे कि - ईश्वर एक है, सभी धर्म़ों का सम्मान करो, सभी मनुष्य समान हैं और अहिंसा न केवल विचार बल्कि संभाषण और आचरण में भी। उनकी दैनिक प्रार्थनाओं में सूक्तियां, धार्मिक गीत (भजन) तथा विभिन्न धर्मग्रंथों का पाठ होता था। उनमें विभिन्न जातियों के लोग भाग लेते थे। अपनी मृत्यु के दिन तक गांधी का दृष्टिकोण यह था कि राष्ट्रीयता किसी भी व्यक्ति के निजी धार्मिक विचार से प्रभावित नहीं होती। अपने जीवन में अनेक बार अपनी जान को जोखिम में डालकर हिंदुओं तथा मुसलमानों में एकता के लिए काम किया। उन पर देश के विभाजन का आरोप लगाया जाता है जो गलत है। उन्होंने कहा था वे देश का विभाजन स्वीकारने के बदले जल्दी मृत्यु को स्वीकारेंगे। उनका जीवन खुली किताब की तरह है, इस संबंध में तर्क की आवश्यकता नहीं है।

गांधी के नेतृत्व में रचनात्मक कार्य़ों के जरिए सांप्रदायिक एकता ने कांग्रेस के कार्यकमों में महत्वपूर्ण स्थान पाया। राष्ट्रीय स्तर के मुस्लिम नेता एवं बुद्धिजीवी,मसलन; अब्दुल गफ्फार खान, मौलाना आजाद, डॉ. अंसारी हाकिम अजमल खान, बदरूद्दीन तैयबजी, यहाँ तक कि मो. जिन्ना कांग्रेस में पनपे। यह स्वाभाविक ही था कि कांग्रेस देश के विभाजन का प्रस्ताव नहीं मानती लेकिन कुछ हिंदुओं और मुसलमानों की उत्तेजना ने देश में अफरातफरी और कानून-व्यवस्था का संकट पैदा कर दिया। सिंध, पंजाब, बलूचिस्तान पूर्वोत्तर प्रांतों और बंगाल में कानून-व्यवस्था का संकट गहरा गया। जिन्ना ने अडियल रुख अपना लिया। लॉर्ड माउंटबेटन ब्रिटिश कैबिनेट द्वारा तय समय सीमा से बंधे थे और सभी प्रश्नों का त्वरित हल चाहते थे। फलतः जिन्ना की जिद से पाकिस्तान बना।

विभाजन एकमात्र हल माना गया। वर्ष 1946 में हुए राष्ट्रीय चुनाव में मुस्लिम लीग को 90 प्रतिशत सीटें मिली । ऐसे में कांग्रेस के लिए अपनी बात रखना मुश्किल हो रहा था। गांधी ने 5 अप्रैल 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन को कहा कि अगर जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने पर देश का विभाजन नहीं होगा तो वे अंग्रेजों की यह इच्छा स्वीकार लेंगे। लेकिन दूसरी तरफ लॉर्ड माउंटबेटन कांग्रेस को देश का विभाजन के लिए मनाने में सफल रहे। गांधी को इसके बारे में अंधेरे में रखा गया। उनको जब इसका पता चला तो वे हैरान हो गए। उनके पास एकमात्र उपाय आमरण अनशन था। आत्मचिंतन के बाद वे इस नतीजे पर पहुँचे कि इससे हालात और बिगडेंगे तथा कांग्रेस एवं पूरा देश शर्मिंदा होगा।

यह कहा जाता है कि जिन्ना पाकिस्तान के सबसे बडे पैरोकार थे और लॉर्ड माउंटबेटन की प्रत्यक्ष या परोक्ष कृति से वे अपने लक्ष्य में सफल रहे। तब दोनों को अपना निशाना बनाने के बदले गोडसे ने सिर्फ गांधी की हत्या क्यों की जो अपने जीवन के अंतिम दिन तक, कांग्रेस द्वारा विभाजन का प्रस्ताव माने जाने का विरोध कर रहे थे ? कांग्रेस ने 3 जून 1947 को विभाजन का प्रस्ताव स्वीकारा था और पाकिस्तान अस्तित्व में आया। या फिर, जैसा कि वीर सावरकर ने कहा है कि जिन्ना के द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत से उनका कोई विरोध नहीं है -तो क्या सिर्फ और सिर्फ गांधी से उनका विरोध था!

इस दृष्टि से गांधी उस स्थिति में बिना विरोध के सब कुछ मान लिये गए। यह आवश्यक है कि गांधी के व्यक्तित्व के उस पक्ष को जाना जाय जिसके कारण वे कट्टर हिंदुओं की आँखों की किरकिरी बने। हालांकि वे निष्ठावान हिंदू थे, उनके अनेक अनन्य मित्र गैर हिंदू थे। इसके कारण वे `एक ईश्वर , सर्व धर्म समभाव`, के सिद्धांत तक पहुँचे और उसे अपने आचरण में ढाला। उन्होंने वर्णभेद, छुआछूत को हिंदू समाज से दूर किया, अंतर्जातीय विवाह को बढावा दिया। उन्होंने उन विवाहों को आशीर्वाद दिया जिसमें वर या वधू में से कोई एक अछूत हो। सवर्ण हिंदुओं ने इस सुधारवादी पहल को गलत अर्थ़ों में लिया। इसने पागलपन की राह पकडी और वे (गांधी) उनके शिकार हुए।

२) क्या कश्मीर में पाकिस्तानी अतिक्रमण के बावजूद गांधी ने भारत सरकार को बाध्य किया कि वह पाकिस्तान को बकाया 55 करोड रुपए दे ?
संपत्ति एवं दायित्वों के बँटवारे की शर्त़ों के मुताबिक भारत को 55 करोड रुपए की दूसरी किश्त चुकानी थी। कुल 75 करोड रुपए पाकिस्तान को दिया जाना था जिसकी एक किश्त के रूप में 20 करोड रुपए उसे पहले ही दिये जा चुके थे। पाकिस्तानी सेना के परोक्ष समर्थन से कश्मीर में उग्र हुए कथित स्वाधीनता संग्रामियों ने यह हरकत दूसरी किश्त दिये जाने के पहले ही शुरू कर दी थी। तब भारत सरकार ने दूसरी किश्त रोकने का निर्णय लिया और लॉर्ड माउंटबेटन ने इसे परस्पर समझौते का उल्लंघन माना था। उन्होंने अपने विचारों से महात्मा गांधी को अवगत भी करा दिया था। गांधी की नजर में `जैसे को तैसा` की नीति अनुचित थी और हालांकि वायसराय के नजरिए से वे सहमत थे कि समझौते का उल्लंघन हुआ है। इसका मिश्रण उन्होंने अपने शुरू किये अनशन में दिखा। उन्होंने उपवास दिल्ली में सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए किया था। गांधी सितंबर 1947 में कलकत्ता से दिल्ली आए थे और शांति स्थापना के लिए पंजाब जाने वाले थे। जब सरदार पटेल ने दिल्ली की विस्फोटक स्थिति की जानकारी उन्हें दी तो उन्होंने अपनी आगे की यात्रा रद्द कर दी और दिल्ली में शांति बनाए रखने के कारण `करो या मरो` के दृढ़संकल्प के साथ दिल्ली में रुकने का निश्चय कर लिया।

पाकिस्तान से भागकर दिल्ली आए हिंदुओं - जिन्होंने अपने संबंधियों की हत्याएँ देखीं, उन्हें लापता पाया, जिनकी औरतों के साथ बलात्कार हुआ और जिनकी संपत्तियाँ छीनी गई थीं - उन्होंने विस्फोटक स्थितियाँ बना दी थीं तब !स्थानीय हिंदू अपने शहर में आए हिंदुओं के प्रति पाकिस्तान में हुए बर्ताव से व्यथित थे तो मुस्लिमों में अतिरंजना जिससे दिल्ली विस्फोट के मुहाने पर पहुँच गई थी। इससे हत्याएँ, बलात्कार/छेडखानी, घरों एवं संपत्तियों की लूट बढ गई जिससे गांधी रोष से भर उठे। इसका सबसे दर्दनाक पहलू यह था कि यह सब उस भारत भूमि पर घटित हो रहा था जिसने अहिंसा के जरिए विदेशी साम्राज्यवाद को समाप्त कर दिया था। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में उन्होंने दिल्ली में सांप्रदायिक सद्भाव एवं शांति के लिए आमरण अनशन शुरू कर दिया। इसी दौरान भारत सरकार ने पाकिस्तान को बकाया 55 करोड रुपए देने का फैसला लिया। इस घालमेल में गांधी आलोचना के पात्र बन गए।

ये तथ्य बताते हैं कि गांधी ने उपवास, भारत सरकार पर नैतिक दबाव बनाने के लिए शुरू नहीं किया था।

डॉ. सुशीला नायर ने जब गांधी का निर्णय सुना तो वह भागकर अपने भाई प्यारेलाल के पास पहुँची और उन्हें सूचित किया कि गांधी ने दिल्ली के लोगों का पागलपन जब तक खत्मे नहीं होता तब तक उपवास करने का फैसला लिया है। उन विपरीत परिस्थितियों में भी पाकिस्तान को 55 करोड रुपए दिये जाने की बात न होना यह बताता है कि गांधी की उपवास का मकसद दिल्ली में शांति की स्थापना कराना था, न कि पाकिस्तान को पैसा दिलाना।

गांधी ने 12 जनवरी 1947 को प्रार्थना सभा में इसका कोई उल्लेख नहीं किया। अगर पाकिस्तान को पैसा दिलाना उपवास की शर्त होती तो वे जरूर उसका उल्लेख करते। 13 जनवरी को प्रवचन में भी उन्होंने इसकी कोई चर्चा नहीं की। 15 जनवरी को, उनके उपवास से संबंधित एक विशेष प्रश्न के उत्तर में भी उन्होंने इसका उल्लेख नहीं किया था। भारत सरकार की प्रेस विज्ञप्ति में इसका कोई उल्लेख नहीं है। गांधी पर उपवास त्यागने के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में गठित कमेटी द्वारा दिये गए आश्वासन में भी इस बात की चर्चा नहीं है। हमें आशा है कि इन तथ्यों से गांधी के उपवास से पाकिस्तान को दिये गए 55 करोड रुपए का जोडा गया विवाद अब समाप्त हो जाएगा ।

३) क्या गांधी की तुष्टिकरण नीति के कारण मुस्लिम आक्रामक हुए?

मुस्लिमों का तुष्टीकरण के आरोपों के संबंध में कहना है कि यह समझा जाना चाहिए कि देश में हिंदू एवं मुसलमानों में मतभेद शुरू से ही रहे हैं जिसका साम्राज्यवादी ताकतों ने बडी चालाकी से इस्तेमाल किया जिसका परिणाम देश के विभाजन के रूप में सामने आया। गांधीजी के बहुत पहले बाल गंगाधर तिलक सरीखे नेताओं ने राष्ट्रीय संघर्ष के दौरान मुसलमानों के विभाजन की दिशा में ठोस कदम उठाए थे जो लखनऊ घोषणापत्र में दिखता है। लोकमान्य तिलक, एनी बेसेंट और मोहम्मद जिन्ना ने एक फार्मूला तैयार किया था जिसमें मुसलमानों को उनकी आबादी की तुलना में अधिक प्रतिशतता दी गई थी। लखनऊ घोषणा पत्र के पक्ष में तिलक के स्पष्ट एवं दृढ़ बयान सिद्ध करते हैं कि गांधीजी से बहुत पहले तिलक ने मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपनायी थी। ...

1857 के बाद से अंग्रेज भी यही नीति अपनाकर देश को बांटे हुए थे. बाद में अंग्रेज दलित तुष्टीकरण के काम में भी जुट गए . गाँधी इस देश के एकमात्र नेता थे जो ईमानदारी और निःस्वार्थ भाव से भारत की आज़ादी और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए लड़ना चाहते थे. इस काम में अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति सबसे बड़ी बाधा थी. यही वजह रही कि गाँधी इस नीति को निष्फल बनाने पर जुट गए. पर अंग्रेजों के पिट्ठू राजनेता उनके इस महती प्रयास को विफल बनाने में जुट गए. कट्टरपंथी हिन्दू और मुस्लिम दोनों गाँधी के खिलाफ थे (और हैं ) क्योंकि गाँधी उनकी घृणा की राजनीति में सबसे मज़बूत बाधा थे. पर गाँधी की जनता में जो महात्मा वाली छवि थी उसकी वजह से वे खुलकर सामने नहीं आ पाते थे. 

पर आज़ादी के बाद इन लोगों ने न केवल गाँधी के भौतिक शरीर की हत्या की बल्कि कई करोड़ मुहों से प्रतिदिन झूठ फ़ैलाने का घृणित काम वे आज भी कर रहे हैं. उनकी अश्लील कोशिशों से पूरा इंटरनेट गंधा रहा है. ऐसे दुष्कृत्यों को रोंकने के लिए ही मैं यह सीरीज लिखकर वास्तविक तथ्यों को सामने लाना चाहता हूँ. विभाजन भारतीय इतिहास की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी ...इस घटना से हम सबक सीख सकें इसके लिए वास्तविक इतिहास को जानना ज़रूरी है ...इसी कड़ी में आज विभाजन में गाँधी जी की भूमिका पर बात की गई है. अगले लेख में नेहरू और पटेल की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की जाएगी ....

( ५ भागों में यह पहला भाग कैसा लगा ? इस प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा ....विपरीत पर सतर्क मतों का स्वागत है सार्थक संवाद के लिए )

22 मार्च 2018

साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज

शहीद-ए-आज़म भगत सिंह

1919 के जालियँवाला बाग हत्याकाण्ड के बाद ब्रिटिष सरकार ने साम्प्रदायिक दंगों का खूब प्रचार शुरु किया। इसके असर से 1924 में कोहाट में बहुत ही अमानवीय ढंग से हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। इसके बाद राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना में साम्प्रदायिक दंगों पर लम्बी बहस चली। इन्हें समाप्त करने की जरूरत तो सबने महसूस की, लेकिन कांग्रेसी नेताओं ने हिन्दू-मुस्लिम नेताओं में सुलहनामा लिखाकर दंगों को रोकने के यत्न किये। इस समस्या के निश्चित हल के लिए क्रान्तिकारी आन्दोलन ने अपने विचार प्रस्तुत किये। प्रस्तुत लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में छपा। यह लेख इस समस्या पर शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के विचारों का सार है। 



भारत वर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है। यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें। किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिन्दुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह मार-काट इसलिए नहीं की गयी कि फलाँ आदमी दोषी है, वरन इसलिए कि फलाँ आदमी हिन्दू है या सिख है या मुसलमान है। बस किसी व्यक्ति का सिख या हिन्दू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था। जब स्थिति ऐसी हो तो हिन्दुस्तान का ईश्वर ही मालिक है।

ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नजर आता है। इन ‘धर्मों’ ने हिन्दुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है। और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। इन दंगों ने संसार की नजरों में भारत को बदनाम कर दिया है। और हमने देखा है कि इस अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं। कोई बिरला ही हिन्दू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठण्डा रखता है, बाकी सब के सब धर्म के यह नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रौब को कायम रखने के लिए डण्डे लाठियाँ, तलवारें-छुरें हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सर-फोड़-फोड़कर मर जाते हैं। बाकी कुछ तो फाँसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिये जाते हैं। इतना रक्तपात होने पर इन ‘धर्मजनों’ पर अंग्रेजी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने आ जाता है।

यहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्रा कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं। जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं। और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।

दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अखबार वाले हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था। आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो।

अखबारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’

जो लोग असहयोग के दिनों के जोश व उभार को जानते हैं, उन्हें यह स्थिति देख रोना आता है। कहाँ थे वे दिन कि स्वतन्त्राता की झलक सामने दिखाई देती थी और कहाँ आज यह दिन कि स्वराज्य एक सपना मात्रा बन गया है। बस यही तीसरा लाभ है, जो इन दंगों से अत्याचारियों को मिला है। जिसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया था, कि आज गयी, कल गयी वही नौकरशाही आज अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर चुकी हैं कि उसे हिलाना कोई मामूली काम नहीं है।

यदि इन साम्प्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है। असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्राकारों ने ढेरों कुर्बानियाँ दीं। उनकी आर्थिक दशा बिगड़ गयी थी। असहयोग आन्दोलन के धीमा पड़ने पर नेताओं पर अविश्वास-सा हो गया जिससे आजकल के बहुत से साम्प्रदायिक नेताओं के धन्धे चौपट हो गये। विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल जरूर होता है। कार्ल मार्क्स के तीन बड़े सिद्धान्तों में से यह एक मुख्य सिद्धान्त है। इसी सिद्धान्त के कारण ही तबलीग, तनकीम, शुद्धि आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, जो अवर्णनीय है।

बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है दरअसल भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा इतनी खराब है कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता है। भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धान्त ताक पर रख देता है। सच है, मरता क्या न करता। लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होेना अत्यन्त कठिन है क्योंकि सरकार विदेशी है और लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती। इसीलिए लोगों को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिये और जब तक सरकार बदल न जाये, चैन की सांस न लेना चाहिए।

लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत है। गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथों मंे लेने का प्रयत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्राता मिलेगी।

जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि जार के समय वहाँ भी ऐसी ही स्थितियाँ थीं वहाँ भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर जूत-पतांग करते रहते थे। लेकिन जिस दिन से वहाँ श्रमिक-शासन हुआ है, वहाँ नक्शा ही बदल गया है। अब वहाँ कभी दंगे नहीं हुए। अब वहाँ सभी को ‘इन्सान’ समझा जाता है, ‘धर्मजन’ नहीं। जार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही खराब थी। इसलिए सब दंगे-फसाद होते थे। लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गयी है और उनमें वर्ग-चेतना आ गयी है इसलिए अब वहाँ से कभी किसी दंगे की खबर नहीं आयी।

इन दंगों में वैसे तो बड़े निराशाजनक समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन कलकत्ते के दंगों मंे एक बात बहुत खुशी की सुनने में आयी। वह यह कि वहाँ दंगों में ट्रेड यूनियन के मजदूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन् सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारखानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी यत्न करते रहे। यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे। वर्गचेतना का यही सुन्दर रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है।

यह खुशी का समाचार हमारे कानों को मिला है कि भारत के नवयुवक अब वैसे धर्मों से जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे हैं। उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नजर से-हिन्दू, मुसलमान या सिख रूप में नहीं, वरन् सभी को पहले इन्सान समझते हैं, फिर भारतवासी। भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता है कि भारत का भविष्य सुनहला है। भारतवासियों को इन दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए। उन्हें यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने, और दंगे हों ही नहीं।

1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं। न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए क्योंकि यह सरबत को मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता। इसलिए गदर पार्टी जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फाँसियों पर चढ़े और हिन्दू मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।

इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान में उतरे हैं जो धर्म को राजनीति से अलग करना चाहते हैं। झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुन्दर इलाज है और हम इसका समर्थन करते हैं।

यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते है। धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें।

हमारा ख्याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताये इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमे बचा लेंगे।

भगत सिंह और गांधी

अशोक भारत

भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 को बंगा, लायलपुर, पंंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ था। देशभक्ति उन्हे विरासत में मिली थी। जिस दिन भगत सिंह का जन्म हुआ था उसी दिन उनके पिता सरदार किशन सिंह, चाचा सरदार अजीत सिंह, सरदार स्वर्ण सिंह जेल से रिहा हुए थे । इसलिए उनकी दादी ने उनका नाम भागो वाला रखा जो आगे चल कर भगत सिंह के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उनके चाचा सरदार अजीत सिंह और सरदार स्वर्ण सिंह का जुड़ाव क्रांतिकारी आन्दोलन से था। पिता सरदार किशन सिंह कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे।


देशभक्ति भगत सिंह में कूट-कूट कर भरी थी। देश के लिए जीना और मरना उनके जीवन का मकसद हो गया था। देश का राजनैतिक माहौल तेजी से बदल रहा था। तिलक के बाद कांग्रेस की कमान गांधी जी ने संभाली थी। असहयोग आन्दोलन ने आजादी की लड़ाई में जान फूंक दी थी। देश उबाल पर था। इस माहौल में भगत सिंह का तरुण मन भला कैसे चुपचाप बैठे रह सकता था। भगत सिंह इस आंदोलन में शरीक हुए । उन्होने डी ए वी कॉलेज छोड़ कर नेशनल स्कूल में दाखिला लिया। लेकिन गांधीजी ने अचानक चौरी चौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। पूरा देश गांधी जी के इस फैसले से अवाक, हतप्रभ रह गया। इसका प्रभाव भगत सिंह के मन पर भी पड़ा। इस अप्रत्याशित घटना ने भगत सिह को क्रांतिकारी आंदोलन की ओर मोड़ दिया। 

भगत सिंह की लड़ाई साम्राज्यवाद और साम्प्रदायिकता दोनो के खिलाफ थी। वे एक एेसे राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे जिसमें व्यक्ति के व्यक्ति का और राष्ट्र के द्वारा का शोषण नहीं हो। गांधी जी के लिए स्वराज्य का मतलब समाज के अंतिम व्यक्ति को यह एहसास हो कि वह आजाद है और देश के विकास में उसका महत्वपूर्ण योगदान है। जाहिर है स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य को ले कर दोनो में कोई मतभेद नहीं था। भगत सिंह का युवा मन अंग्रेजों के अत्याचार से उद्वेलित हो जाता है। वे उसे सबक सिखाने और बदला लेना अनुचित नहीं मानते हैं। तभी तो लाला लाजपत राय के खिलाफ अभियान चलाने वाले भगत सिंह लाठी चार्ज के कारण लाला जी की मृत्यु का बदला लेने की योजना की अगुवाई करते हैं, जो उनके शहादत का कारण बना। । दूसरी तरफ अहिंसा के अनन्य उपासक महात्मा गांधी अहिंसा के माध्यम से स्वराज्य प्राप्त करना चाहते थे जिसे भगत सिंह असंभव सपना मानते थे। 

स्वराज्य प्राप्ति के तरीकों में मतभेद के बाबजूद भगत सिंह यह मानते थे कि स्वराज्य के लिए लोगों में जागरण का जितना काम गांधी जी ने किया उतना किसी अन्य ने नहीं किया। इसलिए वे गांधी जी की बहुत इज्जत करते थे। गांधी जी भी भगत सिंह की बहादुरी और देशभक्ति के कायल थे। 

इतिहास अतीत से सबक सीखने के लिए है, बदला लेने अथवा महापुरूषों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने और लड़ाने के लिए नहीं है। मगर कुछ संक्रीर्ण मानसिकता वाले गांधी बनाम भगत सिंह की नकली विवाद खड़ा कर रहे हैं। खासकर युवाओं को गुमराह कर रहें हैं। जनता का ध्यान मूल सवाल से हटाने के लिए वे लोग फर्जी बहस एवं मुद्दे खड़ा करते हैं। विशेषकर युवाओं में यह भ्रम फैलाया गया है कि अगर गांधी चाहते तो भगत सिंह को बचा सकते थे। जो लोग यह बात कह रहे हैं उन्होने न तो गांधी को समझा है और न भगत सिंह को। क्या वे समझते हैं कि भगत सिंह जिनका मिशन ब्रिटिश हुकूमत को देश से उखाड़ फेंकने के लिए देश को जगाना था ,वह स्वाभिमानी देशभक्त युवा भगत सिंह क्या अंग्रेजों की भीख दी हुई जिंदगी जीना पसंद करते। इस संदर्भ में भगत सिंह का 22 मार्च 1931 को अपने साथियों को लिखा पत्र गौर करने लायक है। उन्होंने लिखा ' साथियो, स्वभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें होनी चाहिए,मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिन्दा रह सकता हूं कि कैद हो कर या पाबंद हो कर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दलों के आदर्शों और और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है- इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा हरगिज नहीं हो सकता। आज मेरी कमजोरियां जनता के समने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया तो वे जाहिर हो जाएंगी और क्रांति का प्रतीक चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवत: मिट ही जाए। 

दूसरा भगत सिंह को फांसी एसेम्बली बम कांड के लिए नहीं हुई थी, इस कांड में उन्हे आजीवन कारावास हुआ था। उन्हे फांसी दिलवाने में उनके एच एस आर ए के क्रांतिकारी साथियों, जय गोपाल और हंसराज वोहरा का हाथ था जो सरकारी गवाह बन गये थे सैण्डर्स हत्याकाण्ड में। इसकी चर्चा प्राय: नहीं होती है, क्यों? इसकी चर्चा करने से तो झूठ और पाखण्ड का भंडाफोड़ हो जायेगा। इस संर्दभ में यह प्रसंग गौर करने लायक है । "इधर मुकदमें की कार्रवाई प्रारंभ हो गई थी ।सामने भगत सिंह ने जय गोपाल को देखा जो अपनी मूंछें ऐंठ रहा था, जब भगत सिंह से उसकी आँख मिली उल्टे उसने भगत सिंह पर गालियों की बौछार की शुरूआत कर दी। .....भगत सिंह अचरज से जय गोपाल को देख रहे थे जिनके बारे में कभी भगत सिंह ने कहा था कि वह एच एस आर ए का गहना है।" भगत सिंह ही क्या किसी क्रतिकारी ने कभी कल्पना में भी नहीं सोचा था कि उनके अपने दल के साथी उन्हे फांसी के फंदा तक पहुंचाने के कारण बनेंगे। 

खुद भगत सिंह गांधी के बारे में क्या सोचते थे ,अब जरा इस पर गौर करें। भगत सिंह जब जेल में राजनैतिक बंदियों पर राजनैतिक बंदियों जैसा बर्ताव किया जाय के प्रश्न पर अनशन कर रहे थे इस अनशन में क्रांतिकारी जतिन दास की मृत्यु हो गई थी। भगत सिंह की हालत बिगड़ रही थी। देश में चिंताएं बढ रही थीं। कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित कर भगत सिंह से अनशन तोड़ने का आग्रह किया। कांग्रेस का प्रस्ताव लेकर उनके पिता सरदार किशन सिंह भगत सिंह के पास गए। उन्होने भगत सिंह से कहा "बेटा कांग्रेस पार्टी ने तुमसे आग्रह किया है कि तुम लोग इस अनशन को छोड़ दो।" भगत सिंह ने कहा कि हम सभी क्रांतिकारी इस पार्टी की इज्जत करते हैं, क्योंकि हम सब को पता है कि इसने देश की आजादी के लिए कितने संघर्ष किए है। पर हाँ, यह भी सही है कि महात्मा गांधी के अहिंसापूर्ण तरीके से देश की आजादी प्राप्त करने को मैं असंभव सपना मानता हूँ। ......मगर इस बात से कौन इनकार करेगा करेगा कि भारत में किसी ने जागरण लाया है तो यह काम गांधी जी ने किया है। ......इस कारण मैं उनकी इज्जत करता हूँ।" स्पष्ट है अंग्रेजो से लड़ाई के तरीकों को लेकर भगत सिंह और गांधी में मतभेद थे। मगर इसके साथ ही भगत सिंह गांधी के काम को सर्वाधिक महत्त्व का मानते थे और इस कारण उनकी बहुत इज्जत करते थे। 

इस बारे में सुभाष चंद्र बोस का बयान महत्त्वपूर्ण है। सुभाष चंद्र बोस कहते हैं कि " जैसे ही मुम्बई की ट्रेन से हम लोग दिल्ली पहुंचे कि महात्माजी को खबर मिली कि सरकार ने लाहौर षड्यंत्र के सरदार भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी पर चढ़ाने का फैसला कर लिया है। इन युवकों को बचाने के लिए महात्मा जी से कहा गया और उन्होंने उन्हें बचाने के लिए अधिक से अधिक कोशिश की। वायसराय ने स्वयं गांधीजी से कहा था कि मुझे तीन बंदियों की फांसी की सजा को रद्द करने के बारे में बहुत से लोगों के हस्ताक्षरसहित अर्जी मिली है।फिलहाल मैं इस फांसी की सजा को स्थगित कर दे रहा हूँ और बाद में इस मामले पर गम्भीरता से विचार करूँगा। लेकिन इससे अधिक मुझ पर इस समय और अधिक दबाव न डाला जाय।"

स्वयं गांधीजी ने कांग्रेस के कराची अधिवेशन में, जो भगत सिंह के फांसी के तुरंत बाद में हुई थी, एक प्रश्न के उत्तर में कहा था " मैं वायसराय को जिस तरह से समझा सकता था , उस तरह से समझाया। समझाने की जितनी क्षमता मुझमें थी, सब मैंने उनपर आजमा कर देखी। भगत सिंह के परिवार वालों के साथ निश्चित आखिरी मुलाकात के दिन अर्थात 23 मार्च को सबेरे मैंने वायसराय को एक खानगी खत लिखा। उसमें मैंने अपनी सारी आत्मा उंड़ेल दी, सब बेकार गया। आप कहेंगे कि मुझे एक बात और करनी चाहिए थी - सजा को घटाने के लिए समझौते में एक शर्त रखनी चाहिए थी पर फांसी की सजा समझौते के बाद सुनाई गई। अब ऐसा नहीं हो सकता था।" 

स्पष्ट है जो लोग यह प्रचार कर रहे है कि गांधी जी ने भगत सिंह को बचाने का प्रयास नहीं किया इसका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है, यह पूरी तरह भ्रामक और असत्य है। वे कौन लोग हैं जो सुनियोजित ढंग है गांधी के बारे में झूठ और भ्रम फैलाकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। ये वो लोग हैं जिन्होने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों का साथ दिया था ,अब अपना खोटापन को छिपाने के लिए गांधी के खिलाफ समाज में जहर फैलाने के कुत्सित प्रयास में लगे हैं। इस अभियान में दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनो विचार से जुड़े कुछ लोग शामिल हैं। 

भगत सिंह साम्प्रदायिकता को भी उतनी ही बड़ी दुश्मन मानते थे, जितना साम्राज्यवाद को। भगत सिंह ने जिस नौजवान सभा की संरचना की उसने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव भगत सिंह की अगुआई में पारित किया कि किसी भी धार्मिक संगठन से जुड़े नौजवान को उसमें शामिल नहीं किया जा सकता क्योकि धर्म व्यक्ति का निजी मामला है और साम्प्रदायिकता हमारी दुश्मन है जिसका हर हालत में विरोध किया जाना चाहिए।

1919 में जालियांवाला बाग हत्याकाण्ड के बाद ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक दंगों का खूब प्रचार शुरू किया। इसके असर से 1924 में कोहाट में बहुत ही अमानवीय ढंग से हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। उसके बाद राष्ट्रीय राजनीति चेतना में साम्प्रदायिक दंगों पर लम्बी बहस चली। इस मौके पर भगत सिंह ने जो विचार व्यक्त किए वह गौर करने लायक है। "भारतवर्ष की दशा इस समय अत्यन्त दयनीय है । एक धर्म के अनुनायी दूसरे धर्म के अनुयायियों को जान के दुश्मन हैं। .....यह मार-काट इसलिए नहीं है कि फलां आदमी दोषी है, वरना इसलिए कि फलां आदमी हिन्दू है या सिख है या मुसलमान है। ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य अंधकारमय नजर आता है। इन दंगों ने संसार की नजर में भारत को बदनाम किया है। इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबार का हाथ है।" भगत सिंह लाला लाजपत राय की बहुत इज्जत करते थे। यह मालूम होते ही कि लाला लाजपत राय का रुझान साम्प्रदायिक होने लगा है तो उन्होंने उनकी विचार धारा के खिलाफ एक मुहिम छेड़ दी।...जिसमें बडे- बड़े बैनरों पर लाला जी का चित्र बना कर उन्हे मरा हुआ नेता लिख कर लाहौर में बंटवाया।

आज एक बार फिर देश का साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ रहा है। जो काम कभी अंग्रेजी हुकूमत करती थी वही काम इस समय देश का शासकवर्ग कर रहा है। देश का साम्प्रदायिक वातावरण बिगाड़ने, लोगों को बांटने और शासन करने की साजिशें परवान चढ़ रही हैं। ऐसे में भगत सिंह का साम्प्रदायिकता पर स्पष्ट विचार इस घने अंधकार में प्रकाशपुंज की तरह हमारा मार्गदर्शन कर सकता है। आजादी के दौर और उसके बाद के वर्षों में जिस दृष्टि, मूल्य, विचार एवं कार्यक्रम पर राष्ट्रीय सहमति थी उसको चुनौती देने वाली,और राष्ट्र को विपरीत में ले जाने वाली कटिबद्ध ताकतें आज हाशिए से केन्द्र में आ गई हैं। उग्र राष्ट्रवादी एवं पुनरुत्थानवादी ताकतें आज उभार पर हैं । प्राचीन सभ्यता वाले देशों में भारत ही अकेला है जिसके जीवन में आज भी उसकी पुरानी संस्कृति के उदात्त मानवीय मूल्य एवं समता वाली दृष्टि की छाप मौजूद है। संयम,सहअस्तित्व एवं समन्वय भारतीय संस्कृति की आत्मा है।

भगत सिंह ने साम्राज्यवाद को इस देश से उखाड़ फेंकने तथा इसके लिए देश, विशेषकर युवाओं को जगाने के लिए आपना आत्मबलिदान दिया। आज साम्राज्यवाद पहले से ज्यादा खतरनाक रूप में देश को अपने चपेट में ले चुका है। साम्प्रदायिक एवं फासीवादी शक्तियां देश का साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ने तथा सदियों से कायम गंगा-यमुनी संस्कृति को खत्म करने में लगी हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि भगत सिंह के विचार को मानने वाले, उनसे प्रेरणा लेने वाले युवा क्या आज भगत सिंह की विरासत संभालने के लिए तैयार है? देश को इन्तजार है ऐसे देशभक्त सपूतों का जो भगत सिंह के विचार एवं देशभक्ति की परम्परा को आगे बढ़ाएं ।

(लेखक सर्वसेवा संघ के पूर्व राष्ट्रीय संयोजक और युवा संवाद के राष्ट्रीय संयोजक हैं इनसे निम्न ईमेल आईडी और मोबाइल नंबर पर संपर्क किया जा सकता है...bharatashok@gmail.com, mob. 9430918152) 

संदर्भ : 1. गांधी और भगत सिंह , ले. सुजाता, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, राजघाट, वाराणसी 
2. गांधी और सुभास, ले. सुजाता , सर्व सेवा संघ प्रकाशन, राजघाट, वाराणसी 
3. भगत सिंह से दोस्ती , सं. विकास नारायण राय, इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद

4 मार्च 2018

क्या गांधीजी वाकई कांग्रेस को भंग करना चाहते थे?


भाजपा अपने ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ अभियान को सही ठहराने के लिए बार-बार गांधीजी का सहारा लेती है. अभी कितने दिन बीते हैं जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गांधीजी की सार्वजनिक प्रशंसा करते हुए कहा था कि उनके द्वारा कांग्रेस को भंग करने की इच्छा दरअसल एक दूरदर्शी अपील थी.
उनके इसी भाषण में गांधीजी के साथ जातिसूचक प्रत्यय ‘चतुर बनिया’ जोड़ने पर उनका काफ़ी विरोध हुआ था. लेकिन गांधीजी ने कांग्रेस को भंग करने के संबंध में क्या कुछ कहा था, इसका कोई विरोध नहीं हुआ. आम तौर पर लोगों के दिल में यह धारणा बैठा दी गई है कि गांधीजी वास्तव में ऐसा ही चाहते थे.
दो दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में इसी मुद्दे को फिर गर्मा दिया. उन्होंने कहा कि वो तो सिर्फ़ गांधीजी के सपनों का भारत बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं. क्योंकि कांग्रेस-मुक्त भारत का विचार नरेंद्र मोदी का नहीं बल्कि ख़ुद गांधीजी का विचार था.
इस बार इस बात की बारीक़ी से जांच-पड़ताल करनी ज़रूरी है कि ऐतिहासिक रूप से सच क्या है?
यह सच है कि अपने अंतिम दिनों में गांधीजी आज़ाद भारत में कांग्रेस की बदली हुई भूमिका के बारे में गंभीरता से सोच रहे थे. गांधीजी ने अपनी हत्या के तीन दिन पहले यानी 27 जनवरी 1948 को एक नोट में लिखा था कि अपने वर्तमान स्वरूप में कांग्रेस ‘अपनी भूमिका पूरी कर चुकी है’. जिसे भंग करके एक लोकसेवक संघ में तब्दील कर देना चाहिए.
यह नोट एक लेख के रूप में 2 फ़रवरी 1948 को ‘उनकी अंतिम इच्छा और वसीयतनामा’ शीर्षक से हरिजन में प्रकाशित हुआ. यानी गांधीजी की हत्या के दो दिन बाद यह लेख उनके सहयोगियों द्वारा प्रकाशित किया था. यह शीर्षक गांधीजी की हत्या से दुखी उनके सहयोगियों ने दे दिया था.
इस शीर्षक को बिना यह संदर्भ देखे कुछ विद्वान बिना विश्लेषण जस-का-तस अपना लेते हैं.
उदाहरण के तौर पर राजनीति विज्ञानी लॉयड और सूज़न रुडोल्फ़ कहती हैं, ‘नाथूराम गोडसे के हाथों अपनी हत्या के 24 घंटे पहले गांधीजी अपनी अंतिम इच्छा और वसीयतनामे में प्रस्ताव करते हैं कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाना चाहिए और उसकी जगह लोकसेवक संघ की स्थापना करनी चाहिए जो जनता की सेवा के लिए बनाया गया संगठन होगा.’
यानी लेख को दिया गया शीर्षक और गांधीजी के मरणोपरांत उसके प्रकाशन ने इस नोट को उससे ज़्यादा प्रासंगिक बना दिया जितना गांधीजी ख़ुद चाहते थे.
जबकि ‘उनकी अंतिम इच्छा और वसीयतनामा’ को उसी दिन हरिजन में प्रकाशित एक और वक्तव्य के साथ जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए, ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जो कि सबसे पुराना राष्ट्रीय राजनीतिक संगठन है, जिसने कई अहिंसक संघर्षों के माध्यम से आज़ादी जीती है, को ख़त्म करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. यह सिर्फ़ राष्ट्र के साथ ही ख़त्म होगा.’
उनका यह बयान सिद्ध करता है कि गांधीजी उस समय भी कांग्रेस की भूमिका देखते थे और यह सोच रहे कि भविष्य में यह कैसी हो?
गांधीजी ने दरअसल जो लिखा था वो एक संविधान का मसौदा था न कि उनकी अंतिम इच्छा और वसीयतनामा. यदि गांधीजी जीवित रहते तो इस बात की पूरी संभावना थी कि इस मसौदे पर कांग्रेस के अंदर संपूर्णता से बहस होती.
उनकी यह टिप्पणी कांग्रेस और उसके संगठन की स्वातंत्र्योत्तर भारत के ज़रूरत के हिसाब से कैसे पुनर्गठन हो, इस पर चल रही बहस के संदर्भ में की गई थी.
आज़ादी मिलने के साथ आज़ादी दिलाने में पार्टी की ऐतिहासिक भूमिका समाप्त हो गई थी और अब उसे सामाजिक-आर्थिक क्रांति के लिए तैयार करना था. यह बहस पार्टी नेतृत्व द्वारा 1946 में तब शुरू की गई थी जब कांग्रेस कमेटियों को इस संबंध में एक सर्कुलर भेजकर अपनी राय व्यक्त करने को कहा गया था.
अगले कुछ महीनों में जयप्रकाश नारायण, रघुकुल तिलक, जेबी कृपलानी सहित तमाम कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं. तिलक कांग्रेस को भंग करने की हालत में पैदा होने वाले निर्वात के प्रति चिंतित थे जिसे उनके मुताबिक़ सांप्रदायिक दल तेज़ी से भरने का प्रयास करते.
कांग्रेस अध्यक्ष कृपलानी ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ चल रहे संघर्ष के समाप्त होने की हालत में कांग्रेस को एक नया स्वरूप देने की सलाह दी.
उन्होंने कांग्रेस की भूमिका सरकारी नीतियों को क्रियान्वित करने वाले और जनता तथा सरकार के बीच सेतु बनने वाले संगठन की देखी.
लोहिया चाहते थे कि कांग्रेस समाजवादी रास्ते को अपना ले और इस उद्देश्य से मज़दूर और किसान संगठनों से जुड़े.
गांधी ने कांग्रेस को भंग करने की बात कांग्रेस पर हावी सत्ता की राजनीति से मोहभंग के सीमित संदर्भों में नहीं की थी. बल्कि पार्टी को नई परिस्थितियों का प्रभावी ढंग से सामना करने के हिसाब से ढालने के संदर्भ में की थी.
गांधी नोआखाली के दिनों से ही भविष्य में पार्टी की भूमिका को लेकर चल रहे विचार-विमर्श में शामिल थे जो कि 1947 के अंत और 1948 की शुरुआत तक जारी था.
इस तरह अगर हम कांग्रेस की भूमिका पर बहस के उद्भव को देखें तो यह साफ़ हो जाता है कि यह गांधीजी की कोई ऐसी राय नहीं थी जो कांग्रेस के आधिकारिक पक्ष के विरुद्ध थी.
ऐसा लगता है कि यह दावा बार-बार इसलिए किया जाता है कि इस लोकप्रिय मिथ को सही सिद्ध किया जा सके कि अपने अंतिम दिनों में गांधीजी कांग्रेस और उसके नेताओं से दूर हो गए थे.
यह एक ऐसा मिथ है जो गांधीजी और अन्य राष्ट्रीय नेताओं की छवि को अपने मनमुताबिक गढ़ने और बाकी नेताओं की प्रतिष्ठा को धूलधूसरित करने की छूट देता है. यह और कुछ नहीं बल्कि हमारे राष्ट्रीय नेताओं की छवि विकृत करने के भाजपाई अभियान का हिस्सा है.
(प्रो. सुचेता महाजन इतिहासकार और जेएनयू में सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज़ की अध्यक्ष हैं. सौरभ बाजपेयी राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट नामक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक हैं.)
http://thewirehindi.com/33776/congress-mukt-bharat-bjp-agenda-mahatma-gandhi/?utm_source=socialshare&utm_medium=whatsapp, ४ मार्च २०१८. 


28 जनवरी 2018

क्या नेताजी के ज़िंदा होने की ख़बर नेहरू को घेरने के लिए फैलाई गई थी?

सौरभ बाजपेयी 
23/01/2018

लोगों को यक़ीन दिलाया गया कि नेताजी इसलिए भूमिगत रहे क्योंकि नेहरू ने ब्रिटिश सरकार से गुपचुप समझौता किया था कि अगर नेताजी कभी जीवित मिलते हैं तो उन्हें एक युद्ध अपराधी के रूप में तत्काल ब्रिटेन को सौंप दिया जाएगा.

Subhash-Chandra-Bose-Jawahar-Lal-Nehru-Wiki
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फोटो साभार: विकिपीडिया

एक बार तकरीबन सत्तर साल के एक बुजुर्ग मिले. घरों में अखबार डालने वाले इन बुजुर्ग की शर्ट पर एक बिल्ला टंका था. उस पर नेताजी की तस्वीर के साथ लिखा था- नेताजी जिंदा हैं.

यह बात लगभग आठ बरस पुरानी रही होगी. मैंने हिसाब लगाया कि 23 जनवरी 1897 को कटक में पैदा हुए नेताजी अगर वाकई जिंदा होते तो आज कितने बरस के होते? यकीनन उनकी उम्र तब लगभग 113 बरस होती. किसी भी व्यक्ति के लिए इतनी लम्बी उम्र तक सक्रिय रहना तो दूर, ठीक से जीना ही असंभव होता है.

लेकिन उन अर्धशिक्षित बुजुर्ग के लिए नेताजी अभी जिंदा थे. यह पूछने पर कि इतने निडर नेताजी आखिर किससे डरकर भूमिगत हैं, बड़ा भोला-सा जवाब मिला- वो अंदर ही अंदर तैयारी कर रहे हैं. जिस दिन उनकी तैयारी पूरी हो जायेगी, वो प्रकट हो जायेंगे.

उनसे पूछना बेकार था कि क्या तैयारी और किस चीज़ की तैयारी? भारत जैसे देशों में महानायक आस्था का विषय बन जाते हैं. नेताजी एक महानायक थे जिनके भीतर आम लोगों को एक मुक्तिदाता दिखाई देता था.

बाद के दिनों में यह समझने की भरसक कोशिश की कि नेताजी के जिंदा होने के पीछे का राज़ क्या है?

कई लोगों ने गांधी को अपने सीने पर तीन गोलियां खाते देखा था. कईयों ने गोलियों से छलनी उनके शरीर की फोटो देखी थी. लेकिन नेताजी की विमान दुर्घटना के बाद उनके न होने की सिर्फ खबर आयी थी. किसी ने उनकी लाश नहीं देखी, कोई उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुआ.

जब आज के ताइवान में ताईहोकू एरोड्रम पर उनका ओवरलोड प्लेन क्रैश हुआ तो उनके साथ कई लोग थे. जिनमें से कर्नल हबीबुर्रहमान और जापानी मेजर कोनो ने अपने बयानों में नेताजी के बुरी तरह झुलस जाने और फिर संघर्ष करते हुए अचेत हो जाने की पुष्टि की थी.

हबीबुर्रहमान का कहना है कि नेताजी ने अंतिम समय में उनसे कहा कि- “हबीब, मेरा अंत बहुत जल्द निकट आ रहा है. मैंने अपनी पूरी जिंदगी देश की आज़ादी के लिए लगा दी. मैं अपनी मातृभूमि भूमि के लिए ही प्राणों का उत्सर्ग भी कर रहा हूँ. जाओ और मेरे देशवासियों से कहो कि वो भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ते रहें. भारत बहुत जल्द आज़ाद होगा.”

नैनमोन आर्मी हॉस्पिटल के डॉ० तानेयोशी योशिमी ने उनकी मृत्यु के बाद उनका डेथ सर्टिफिकेट बनाया. जापानी भाषा में ‘चन्द्र बोस’ की मृत्यु का यह प्रमाणपत्र बाद में स्थानीय म्युनिसिपल ऑफिस में जमा किया गया. लेकिन बाद के दिनों में जब उसे खोजने की कोशिश की गयी तो नहीं मिला क्योंकि ताइवानी इतिहास के इस दौर के ज्यादातर जापानी रिकॉर्ड नष्ट कर दिए गए थे.

सिर्फ़ आंखों को छोड़कर पूरे शरीर में लिपटी पट्टियों वाले नेताजी के शव की कोई फोटो भी नहीं खींची गयी थी. हालांकि उनके शरीर को संरक्षित करने के लिए होमोलिन के इंजेक्शन दिए गए थे. योजना यह थी कि उनके शव को सिंगापुर या टोकियो पहुंचाया जा सके.

लेकिन उस समय जापान आत्मसमर्पण की शर्तें तय कर रहा था और अमेरिका ने औपचारिक रूप से कब्ज़ा नहीं जमाया था, इसलिए अंततः उनका शव का ताइपे में ही 20 अगस्त 1945 को अंतिम संस्कार कर दिया गया.

नेताजी की मृत्यु पर यकीन न करने के पीछे कुछ और घटनाएं भी ज़िम्मेदार हैं. जिस तरह 1941 में अंग्रेजी खुफिया विभाग को धता बताकर नेताजी देश छोड़कर निकल भागे थे, उसने उन्हें चमत्कारिक नायक का दर्जा दे दिया था. फिर 1942 में खबर आयी कि एक प्लेन क्रेश में नेताजी की मृत्यु हो गयी है.

यह खबर इतनी ज्यादा फ़ैली कि गांधीजी ने नेताजी की मां को चिठ्ठी लिखकर इस अफवाह पर अपनी चिंता प्रकट की. फिर बाद में यह खबर भी झूठ निकली और इस घटना ने नेताजी की छवि एक ऐसे नायक की बना दी जो अपने दुश्मन को बार-बार धता बताने में माहिर था.

इसीलिए जब 1945 में नेताजी की मृत्यु हुई तो आम जनमानस ने इसे सच मानने से सिरे से इनकार कर दिया. इसके बाद नेताजी के जीवित होने की खबरें उनके नायकत्व के प्रति अपार आदरभाव से भरे लोगों के लिए एक सच्चाई बन गयीं.

फिर भारत में तब तक एक ऐसी विचारधारा तैयार खड़ी हो गयी थी जो नेहरू को खलनायक बनाने पर तुली हुई थी. आरएसएस ने नेताजी की मृत्यु और गुमनामी की अफवाह में झूठ और फरेब का तड़का लगाकर उसे आम जनता के बीच सत्य बना देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.

आरएसएस ने सोचा कि इस ग़लतफ़हमी को ही वैकल्पिक इतिहास बनाकर परोसा जाए. एक ऐसा वैकल्पिक इतिहास जिसे नेहरू के प्रशंसक वामपंथी इतिहासकार जानबूझकर छिपा ले जाते हैं.

लोगों को यकीन दिलाया गया कि नेताजी इतने लंबे समय तक इसलिए भूमिगत रहे क्योंकि नेहरू ने ब्रिटिश सरकार से गुपचुप अंदरूनी समझौता कर लिया था. यह समझौता था कि अगर नेताजी कभी जीवित मिलते हैं तो उन्हें एक युद्ध अपराधी के रूप में तत्काल ब्रिटेन को सौंप दिया जाएगा.

दरअसल, ब्रिटिश सरकार नेताजी की मृत्यु की खबर को लेकर बहुत सतर्क थी. वो हर तरह से जांच-परखकर ही इस मुद्दे पर यकीन करना चाहती थी. इसलिए उसने अपने दो खुफिया अधिकारियों को खबर की सत्यता की जांच के लिए ताइवान भेजा था.

ब्रिटिश सरकार नेताजी की लोकप्रियता को देखते हुए यह तय करने की उधेड़बुन में थी कि विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद अगर कहीं नेताजी जीवित वापस आ गए तो उनके साथ क्या सलूक किया जाए?

लेकिन ब्रिटिश सरकार की नीति को आज़ाद भारत में नेहरू की सरकार पर भी मनमाने ढंग से थोप दिया गया क्योंकि इससे स्वाधीनता आंदोलन के दो कद्दावर साथियों को एक-दूसरे के बरक्स आसानी से खड़ा किया जा सकता था.

इस बात की फ़िक्र किसे थी कि आज़ाद हिन्द फौज के कैदियों पर दिल्ली के लालकिले में चले ऐतिहासिक मुकदमे के वक़्त सैनिकों के बचाव में नेहरू ने दशकों के बाद अपना बैरिस्टरी वाला कोट पहना था.

इसके अलावा यह इतिहास भी छिपा लिया गया कि 1920 के दशक के मध्य से ही नेहरू और सुभाष की जोड़ी ने ही बड़ी संख्या में युवाओं को राष्ट्रीय आंदोलन की ओर आकर्षित किया था. यह तथ्य भी गुमनाम हो गया कि दोनों ने मिलकर जाने कितनी बार कांग्रेस की बुजुर्ग पीढ़ी के सामने नयी ऊर्जा और तेवर वाली राजनीति की पैरवी की थी.

अव्वल तो नेताजी को ब्रिटेन को सौंपने की बात ही सरासर गप्प है. लेकिन अगर कुछ समय के लिए यह मान भी लें तो क्या इतनी बड़ी राजनीतिक हैसियत और अपार जनसमर्थन वाले नेताजी को नेहरू ब्रिटेन को सौंपने का जोखिम ले सकते थे?

या क्या दुनिया की सबसे ताकतवर सत्ता के टकराने का साहस रखने वाले नेताजी इतने बुजदिल हो सकते थे कि ब्रिटेन को सौंपे जाने के डर से भूमिगत रहकर गुमनामी की जिंदगी गुजार लेते?

अभी पिछले साल की तो बात है जब नेहरू द्वारा नेताजी की जासूसी सम्बन्धी फ़र्जी फाइलें दिखाकर भाजपा सरकार ने अपनी किरकिरी कराई थी.

नेताजी के दूरदराज के कुछ रिश्तेदारों को सत्ता की रेवड़ियां दिखाकर उन्हें आरएसएस के एजेंडे पर खेलने के लिए टीवी चैनल्स के सामने पेश किया गया था. जबकि उनके सबसे करीबी रिश्तेदार जिनमें प्रसिद्ध इतिहासकार सुगाता बोस भी शामिल हैं, बार-बार नेताजी की मृत्यु और जासूसी से जुड़ी खबरों का खंडन करते रहे.

जिन लोगों ने भी नेताजी को पढ़ा-समझा-जाना है वो जानते हैं कि नेताजी कुछ भी हो सकते थे, अप्रासंगिक नहीं हो सकते थे. चुपचाप या गुमनाम बैठकर तमाशा देखना उनकी फ़ितरत नहीं थी.

नेताजी अगर जिंदा होते तो सबके सामने अपने चिर-परिचित तेवरों के साथ खड़े होते भले ही वो नेहरू के साथ होते या स्वतंत्र भारत में नेहरू के विरुद्ध क्योंकि नेताजी, नेताजी थे. वो दिलों में जिंदा थे, हैं और रहेंगे. और जो दिलों में जिंदा रहते हैं वो जिंदा रहते हुए छुपकर हरगिज नहीं रहते.

(लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट नामक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक हैं.)

http://thewirehindi.com/32184/netaji-subhash-chandra-bose-rss-nehru-british-government/, २८ जनवरी २०१८. 

स्वाधीनता आंदोलन की दीर्घकालिक रणनीति

लोगों की संघर्ष करने की क्षमता न केवल उन पर होने वाले शोषण और उस शोषण की उनकी समझ पर निर्भर करती है बल्कि उस रणनीति पर भी निर्भर करती है जिस...