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28 जनवरी 2018

क्या नेताजी के ज़िंदा होने की ख़बर नेहरू को घेरने के लिए फैलाई गई थी?

सौरभ बाजपेयी 
23/01/2018

लोगों को यक़ीन दिलाया गया कि नेताजी इसलिए भूमिगत रहे क्योंकि नेहरू ने ब्रिटिश सरकार से गुपचुप समझौता किया था कि अगर नेताजी कभी जीवित मिलते हैं तो उन्हें एक युद्ध अपराधी के रूप में तत्काल ब्रिटेन को सौंप दिया जाएगा.

Subhash-Chandra-Bose-Jawahar-Lal-Nehru-Wiki
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फोटो साभार: विकिपीडिया

एक बार तकरीबन सत्तर साल के एक बुजुर्ग मिले. घरों में अखबार डालने वाले इन बुजुर्ग की शर्ट पर एक बिल्ला टंका था. उस पर नेताजी की तस्वीर के साथ लिखा था- नेताजी जिंदा हैं.

यह बात लगभग आठ बरस पुरानी रही होगी. मैंने हिसाब लगाया कि 23 जनवरी 1897 को कटक में पैदा हुए नेताजी अगर वाकई जिंदा होते तो आज कितने बरस के होते? यकीनन उनकी उम्र तब लगभग 113 बरस होती. किसी भी व्यक्ति के लिए इतनी लम्बी उम्र तक सक्रिय रहना तो दूर, ठीक से जीना ही असंभव होता है.

लेकिन उन अर्धशिक्षित बुजुर्ग के लिए नेताजी अभी जिंदा थे. यह पूछने पर कि इतने निडर नेताजी आखिर किससे डरकर भूमिगत हैं, बड़ा भोला-सा जवाब मिला- वो अंदर ही अंदर तैयारी कर रहे हैं. जिस दिन उनकी तैयारी पूरी हो जायेगी, वो प्रकट हो जायेंगे.

उनसे पूछना बेकार था कि क्या तैयारी और किस चीज़ की तैयारी? भारत जैसे देशों में महानायक आस्था का विषय बन जाते हैं. नेताजी एक महानायक थे जिनके भीतर आम लोगों को एक मुक्तिदाता दिखाई देता था.

बाद के दिनों में यह समझने की भरसक कोशिश की कि नेताजी के जिंदा होने के पीछे का राज़ क्या है?

कई लोगों ने गांधी को अपने सीने पर तीन गोलियां खाते देखा था. कईयों ने गोलियों से छलनी उनके शरीर की फोटो देखी थी. लेकिन नेताजी की विमान दुर्घटना के बाद उनके न होने की सिर्फ खबर आयी थी. किसी ने उनकी लाश नहीं देखी, कोई उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुआ.

जब आज के ताइवान में ताईहोकू एरोड्रम पर उनका ओवरलोड प्लेन क्रैश हुआ तो उनके साथ कई लोग थे. जिनमें से कर्नल हबीबुर्रहमान और जापानी मेजर कोनो ने अपने बयानों में नेताजी के बुरी तरह झुलस जाने और फिर संघर्ष करते हुए अचेत हो जाने की पुष्टि की थी.

हबीबुर्रहमान का कहना है कि नेताजी ने अंतिम समय में उनसे कहा कि- “हबीब, मेरा अंत बहुत जल्द निकट आ रहा है. मैंने अपनी पूरी जिंदगी देश की आज़ादी के लिए लगा दी. मैं अपनी मातृभूमि भूमि के लिए ही प्राणों का उत्सर्ग भी कर रहा हूँ. जाओ और मेरे देशवासियों से कहो कि वो भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ते रहें. भारत बहुत जल्द आज़ाद होगा.”

नैनमोन आर्मी हॉस्पिटल के डॉ० तानेयोशी योशिमी ने उनकी मृत्यु के बाद उनका डेथ सर्टिफिकेट बनाया. जापानी भाषा में ‘चन्द्र बोस’ की मृत्यु का यह प्रमाणपत्र बाद में स्थानीय म्युनिसिपल ऑफिस में जमा किया गया. लेकिन बाद के दिनों में जब उसे खोजने की कोशिश की गयी तो नहीं मिला क्योंकि ताइवानी इतिहास के इस दौर के ज्यादातर जापानी रिकॉर्ड नष्ट कर दिए गए थे.

सिर्फ़ आंखों को छोड़कर पूरे शरीर में लिपटी पट्टियों वाले नेताजी के शव की कोई फोटो भी नहीं खींची गयी थी. हालांकि उनके शरीर को संरक्षित करने के लिए होमोलिन के इंजेक्शन दिए गए थे. योजना यह थी कि उनके शव को सिंगापुर या टोकियो पहुंचाया जा सके.

लेकिन उस समय जापान आत्मसमर्पण की शर्तें तय कर रहा था और अमेरिका ने औपचारिक रूप से कब्ज़ा नहीं जमाया था, इसलिए अंततः उनका शव का ताइपे में ही 20 अगस्त 1945 को अंतिम संस्कार कर दिया गया.

नेताजी की मृत्यु पर यकीन न करने के पीछे कुछ और घटनाएं भी ज़िम्मेदार हैं. जिस तरह 1941 में अंग्रेजी खुफिया विभाग को धता बताकर नेताजी देश छोड़कर निकल भागे थे, उसने उन्हें चमत्कारिक नायक का दर्जा दे दिया था. फिर 1942 में खबर आयी कि एक प्लेन क्रेश में नेताजी की मृत्यु हो गयी है.

यह खबर इतनी ज्यादा फ़ैली कि गांधीजी ने नेताजी की मां को चिठ्ठी लिखकर इस अफवाह पर अपनी चिंता प्रकट की. फिर बाद में यह खबर भी झूठ निकली और इस घटना ने नेताजी की छवि एक ऐसे नायक की बना दी जो अपने दुश्मन को बार-बार धता बताने में माहिर था.

इसीलिए जब 1945 में नेताजी की मृत्यु हुई तो आम जनमानस ने इसे सच मानने से सिरे से इनकार कर दिया. इसके बाद नेताजी के जीवित होने की खबरें उनके नायकत्व के प्रति अपार आदरभाव से भरे लोगों के लिए एक सच्चाई बन गयीं.

फिर भारत में तब तक एक ऐसी विचारधारा तैयार खड़ी हो गयी थी जो नेहरू को खलनायक बनाने पर तुली हुई थी. आरएसएस ने नेताजी की मृत्यु और गुमनामी की अफवाह में झूठ और फरेब का तड़का लगाकर उसे आम जनता के बीच सत्य बना देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.

आरएसएस ने सोचा कि इस ग़लतफ़हमी को ही वैकल्पिक इतिहास बनाकर परोसा जाए. एक ऐसा वैकल्पिक इतिहास जिसे नेहरू के प्रशंसक वामपंथी इतिहासकार जानबूझकर छिपा ले जाते हैं.

लोगों को यकीन दिलाया गया कि नेताजी इतने लंबे समय तक इसलिए भूमिगत रहे क्योंकि नेहरू ने ब्रिटिश सरकार से गुपचुप अंदरूनी समझौता कर लिया था. यह समझौता था कि अगर नेताजी कभी जीवित मिलते हैं तो उन्हें एक युद्ध अपराधी के रूप में तत्काल ब्रिटेन को सौंप दिया जाएगा.

दरअसल, ब्रिटिश सरकार नेताजी की मृत्यु की खबर को लेकर बहुत सतर्क थी. वो हर तरह से जांच-परखकर ही इस मुद्दे पर यकीन करना चाहती थी. इसलिए उसने अपने दो खुफिया अधिकारियों को खबर की सत्यता की जांच के लिए ताइवान भेजा था.

ब्रिटिश सरकार नेताजी की लोकप्रियता को देखते हुए यह तय करने की उधेड़बुन में थी कि विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद अगर कहीं नेताजी जीवित वापस आ गए तो उनके साथ क्या सलूक किया जाए?

लेकिन ब्रिटिश सरकार की नीति को आज़ाद भारत में नेहरू की सरकार पर भी मनमाने ढंग से थोप दिया गया क्योंकि इससे स्वाधीनता आंदोलन के दो कद्दावर साथियों को एक-दूसरे के बरक्स आसानी से खड़ा किया जा सकता था.

इस बात की फ़िक्र किसे थी कि आज़ाद हिन्द फौज के कैदियों पर दिल्ली के लालकिले में चले ऐतिहासिक मुकदमे के वक़्त सैनिकों के बचाव में नेहरू ने दशकों के बाद अपना बैरिस्टरी वाला कोट पहना था.

इसके अलावा यह इतिहास भी छिपा लिया गया कि 1920 के दशक के मध्य से ही नेहरू और सुभाष की जोड़ी ने ही बड़ी संख्या में युवाओं को राष्ट्रीय आंदोलन की ओर आकर्षित किया था. यह तथ्य भी गुमनाम हो गया कि दोनों ने मिलकर जाने कितनी बार कांग्रेस की बुजुर्ग पीढ़ी के सामने नयी ऊर्जा और तेवर वाली राजनीति की पैरवी की थी.

अव्वल तो नेताजी को ब्रिटेन को सौंपने की बात ही सरासर गप्प है. लेकिन अगर कुछ समय के लिए यह मान भी लें तो क्या इतनी बड़ी राजनीतिक हैसियत और अपार जनसमर्थन वाले नेताजी को नेहरू ब्रिटेन को सौंपने का जोखिम ले सकते थे?

या क्या दुनिया की सबसे ताकतवर सत्ता के टकराने का साहस रखने वाले नेताजी इतने बुजदिल हो सकते थे कि ब्रिटेन को सौंपे जाने के डर से भूमिगत रहकर गुमनामी की जिंदगी गुजार लेते?

अभी पिछले साल की तो बात है जब नेहरू द्वारा नेताजी की जासूसी सम्बन्धी फ़र्जी फाइलें दिखाकर भाजपा सरकार ने अपनी किरकिरी कराई थी.

नेताजी के दूरदराज के कुछ रिश्तेदारों को सत्ता की रेवड़ियां दिखाकर उन्हें आरएसएस के एजेंडे पर खेलने के लिए टीवी चैनल्स के सामने पेश किया गया था. जबकि उनके सबसे करीबी रिश्तेदार जिनमें प्रसिद्ध इतिहासकार सुगाता बोस भी शामिल हैं, बार-बार नेताजी की मृत्यु और जासूसी से जुड़ी खबरों का खंडन करते रहे.

जिन लोगों ने भी नेताजी को पढ़ा-समझा-जाना है वो जानते हैं कि नेताजी कुछ भी हो सकते थे, अप्रासंगिक नहीं हो सकते थे. चुपचाप या गुमनाम बैठकर तमाशा देखना उनकी फ़ितरत नहीं थी.

नेताजी अगर जिंदा होते तो सबके सामने अपने चिर-परिचित तेवरों के साथ खड़े होते भले ही वो नेहरू के साथ होते या स्वतंत्र भारत में नेहरू के विरुद्ध क्योंकि नेताजी, नेताजी थे. वो दिलों में जिंदा थे, हैं और रहेंगे. और जो दिलों में जिंदा रहते हैं वो जिंदा रहते हुए छुपकर हरगिज नहीं रहते.

(लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट नामक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक हैं.)

http://thewirehindi.com/32184/netaji-subhash-chandra-bose-rss-nehru-british-government/, २८ जनवरी २०१८. 

22 जनवरी 2016

नेताजी सुभाष चंद्र बोस : राजनेता और विचारक

शुभनीत कौशिक 

(नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती पर शुभनीत कौशिक का विशेष लेख. बहुत ही सटीक और सारगर्भित विश्लेषण.....)

आज़ादी के बाद के दशकों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक बड़ी रूढ़ छवि गढ़ दी गई। एक सेनानायक की छवि। सैनिक भेष-भूषा में, बूट पहने, सावधान की मुद्रा में खड़े, सुभाष चंद्र बोस की छवि। यह छवि किसने गढ़ी, क्यों गढ़ी, यह उतना महत्त्वपूर्ण सवाल नहीं है, जितना यह कि आखिर क्यों आज़ादी के बाद की पीढ़ियों ने नेताजी की इस रूढ़ और भ्रामक छवि को जस-का-तस स्वीकार कर लिया। इस रूढ़ छवि का फायदा, आज वे राजनीतिक दल और संगठन उठाना चाहते हैं, जिन्होंने न तो राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लिया और न उनके पास कोई राष्ट्रीय नायक ही है। जाहिर है कि सुभाष बाबू की सेनानायक वाली यह छवि रोमांचित करने वाली और साहसिक होने के साथ ही, विचार, चिंतन के लिए कोई जगह नहीं छोड़ती। कहने की जरूरत नहीं कि विचाररहित-चिंतनहीन इस रूढ़ छवि के प्रचार से, नेताजी के वैचारिक पक्ष को, उनके समाजवादी विचारधारा के प्रति रुझान को और उनके सांप्रदायिकता विरोध को बड़ी आसानी से भुलाया जा सकता है या उसकी उपेक्षा की जा सकती है।
इस रूढ़ छवि का प्रभाव इतना अधिक है कि जब श्याम बेनेगल सरीखे समर्थ निर्देशक ने सुभाष बाबू पर, “बोस द फारगाटेन हीरो” सरीखी फ़िल्म बनाई, तो उसमें भी बेनेगल ने बोस के उन्हीं आखिरी वर्षों को चुना, जो उन्होंने हिंदुस्तान से बाहर बिताए थे, आज़ाद हिन्द फ़ौज के संगठन और मुक्ति-संग्राम के प्रयास में। सुभाष बाबू का नजरबंदी से फरार होना, अफगानिस्तान से होते हुए जर्मनी जाना, और फिर वहाँ से जापान जाकर रासबिहारी बोस और मोहन सिंह के साथ, भारतीय युद्धबंदियों को संगठित करके आज़ाद हिन्द फ़ौज का नेतृत्व करना, सब कुछ रोमांचित करने वाली साहसिक दास्तान है। पर इस दास्तान में; “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” की गूँज में, उस सुभाष चंद्र बोस को भुला दिया जाता है, जो राजनेता था, चिंतक था, विचारक था।
नेताजी के विचारक पक्ष को जानना हो, तो और कुछ नहीं, तो कम-से-कम 1938 में, हरिपुरा कांग्रेस में दिया गया उनका अध्यक्षीय भाषण ही पढ़ लेना चाहिए। देश के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक मसलों पर ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक मुद्दों की बारीक समझ और सुभाष बाबू की सुलझी हुई भावी दृष्टि का परिचायक है ये भाषण। अपने इस भाषण में, नेताजी ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विश्वव्यापी ढांचे की कमियों और शक्तियों का विस्तृत विश्लेषण किया। इसमें आज़ाद हिंदुस्तान के सामाजिक-आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए समतावादी दृष्टि भी है। जहाँ वे साम्राज्यवाद को खुली चुनौती देते हैं, वहीं इस बात पर ज़ोर देते हैं कि साम्राज्यवाद से संघर्ष का मतलब साम्राज्यवादी देशों और उनकी जनता के प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना या विद्वेष की भावना रखने की मनोवृत्ति से उबरना भी है।
अपने अध्यक्षीय भाषण में, बोस ने भारत सरकार अधिनियम (1935) के संघीय भाग की जमकर आलोचना की। उन्होंने अपने भाषण में अल्पसंख्यकों और दलितों के भी मुद्दे उठाए, और धार्मिक, आर्थिक तथा राजनीतिक मुद्दों पर आपसी समझ और “जियो और जीने दो” की नीति को अपनाने की सलाह दी। पूरे हिंदुस्तान के लिए एक साझी संपर्क भाषा के सवाल पर, सुभाष बाबू ने रोमन लिपि में लिखी ‘हिन्दुस्तानी’ की वकालत की। उस समय, नेहरू और बोस दोनों ही, भारतीय भाषाओं के लिए रोमन लिपि की हिमायत कर रहे थे, और इसकी प्रेरणा उन्हें मिली थी, तुर्की में मुस्तफ़ा कमाल पाशा के उस सफल प्रयोग से, जिसमें तुर्की भाषा के लिए रोमन लिपि का प्रयोग किया जा रहा था।

बढ़ती आबादी के नियंत्रण हेतु, नेताजी ने जनसंख्या नियंत्रण की नीति अपनाने पर ज़ोर दिया। राष्ट्र के पुनर्निर्माण और देश की निर्धनता दूर करने के लिए नेताजी ने अपने भाषण में ये सुझाव दिये थे: भूमि-व्यवस्था में सुधार; जमींदारी प्रथा का खात्मा; किसानों को ऋण-माफी और उन्हें कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराना; और राज्य द्वारा निर्देशित औद्योगिक विकास। राष्ट्र-निर्माण की इस प्रक्रिया में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की महती भूमिका से भी बोस वाकिफ थे, और इसलिए उन्होंने ‘विज्ञान और राजनीति के बीच परस्पर व्यापक सहयोग’ की जरूरत बताई थी।
अक्तूबर 1938 में, नेताजी ने “राष्ट्रीय योजना समिति” (National Planning Committee) के गठन की घोषणा की। 19 अक्तूबर 1938 को जवाहरलाल नेहरू को लिखे एक खत में, बोस ने लिखा “मुझे आशा है कि आप योजना समिति का अध्यक्ष बनना स्वीकार करेंगे। यदि इसे सफल बनाना है, तो आपको इसका अध्यक्ष बनना चाहिए”। “राष्ट्रीय योजना समिति” के अंतर्गत 29 उप-समितियां थीं, जिनकी रिपोर्टों ने आज़ाद हिंदुस्तान के विकास और पुनर्निर्माण की योजना का खाका तैयार किया। ये उप-समितियां आठ समूहों में रखी गई थीं: कृषि एवं प्राथमिक उत्पादन; उद्योग एवं द्वितीयक उत्पादन; मानव श्रम और जनसंख्या; विनिमय, व्यापार और वित्त; यातायात और संचार; सामाजिक सेवाएँ (स्वास्थ्य और आवास); शिक्षा (सामान्य और तकनीकी); नियोजित विकास में महिलाओं की भूमिका।
आज स्वतंत्र भारत में, वे लोग और संगठन जो नेताजी को अपना आदर्श बताते हुए भी, सांप्रदायिकता की ओछी राजनीति करने से कभी बाज नहीं आते, वे शायद भूल जाते हैं या सुविधानुसार यह बात भुला देते हैं कि सांप्रदायिक सौहार्द्र और हिन्दू-मुस्लिम एकता नेताजी के लिए सर्वोपरि थी। उनके लिए यह हिन्दू-मुस्लिम एका, सिर्फ साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष के लिए ही नहीं बल्कि आज़ाद हिंदुस्तान में धार्मिक और भाषाई स्वतंत्रता और बराबरी के लिए भी जरूरी थी।
इसके लिए सुभाष चंद्र बोस ने, कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से, मई-दिसंबर 1938 के दौरान मुहम्मद अली जिन्ना को कई खत लिखे और हिन्दू-मुस्लिम सवाल पर समझौते का प्रयास भी किया। पर जिन्ना इस बात पर अड़े रहे कि कोई भी वार्ता इसी शर्त पर होगी जब कांग्रेस स्वीकार करेगी कि मुस्लिम लीग हिंदुस्तान में मुस्लिमों का आधिकारिक और प्रतिनिधि संगठन है और कांग्रेस हिंदुओं की प्रतिनिधि संगठन है। 14 मई 1938 को जिन्ना को लिखे अपने जवाबी खत में सुभाष बाबू ने लिखा कि “कांग्रेस खुद को किसी खास समुदाय का प्रतिनिधि नहीं मान सकती और न ही उसके अनुरूप काम ही कर सकती है...कांग्रेस के दरवाजे सभी समुदायों के लिए खुले रहने चाहिए और इसे अपनी आम नीति और तरीकों से सहमत होने वाले सभी भारतीयों का स्वागत करना चाहिए। यह किसी एक समुदाय के प्रतिनिधित्व और इस तरह खुद के लिए एक सांप्रदायिक संगठन बन जाने की स्थिति स्वीकार नहीं कर सकती”।
पर त्रिपुरी कांग्रेस में जिस तरह सुभाष बाबू को अध्यक्ष चुने जाने के बाद उन्हें अलग-थलग कर दिया गया, और कार्यकारिणी समिति के सदस्यों ने सहयोग के आश्वासन के बावजूद जिस तरह सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया, वह राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास में काले धब्बे की तरह है। पर इसके बावजूद अगर आप सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी और नेहरू के खत पढ़ें, जो नेताजी वांग्मय के अंतिम खंड में संकलित हैं तो आप पाएंगे कि असहमतियाँ होने के बावजूद, कांग्रेस नेतृत्व और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर विचारों में गहरी दरार उभर आने के बावजूद, इन तीनों राष्ट्रीय नेताओं में कोई मनमुटाव नहीं था। याद रहे कि यह सब कुछ घटित होने के बावजूद ये सुभाष बाबू ही थे, जिन्होंने 6 जुलाई, 1944 को आज़ाद हिंद रेडियो पर दिये गए वक्तव्य में, महात्मा गांधी को पहली बार “राष्ट्रपिता” कहा था और उनसे हिंदुस्तान की आज़ादी की आखिरी लड़ाई के लिए और इस मुक्ति-संग्राम में विजय पाने के लिए आशीर्वाद मांगा था।
“नेताजी संपूर्ण वांग्मय”, शिशिर बोस और सुगता बोस द्वारा संपादित, 9 खंडों में, हिन्दी में, प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित किया गया है। इसमें सुभाष बाबू के भाषण, पत्र और उनकी दो पुस्तकों “द इंडियन स्ट्रगल” और उनकी आत्मकथा “एन इंडियन पिलग्रिम” के अनुवाद भी संकलित हैं। हिंदी में, सुभाष बाबू की जीवन-यात्रा और उनके चिंतन के बारे में पढ़ना चाहें तो शिशिर बोस द्वारा लिखी सुभाष बाबू की जीवनी पढ़िये। आने वाली पीढ़ियाँ, शिशिर बोस और कोलकाता स्थित ‘नेताजी रिसर्च ब्यूरो’ की कृतज्ञ रहेंगी, कि उनके प्रयासों से नेताजी के भाषण, लेख, किताबें हमारे सामने हैं और आने वाले समय में भी हमें प्रेरणा देती रहेंगी।
जो लोग अंग्रेज़ी में पढ़ सकते हों, उन्हें बोस बंधुओं (शरत चंद्र बोस एवं सुभाष चंद्र बोस) के बारे में लियोनार्ड गॉर्डन की किताब “ब्रदर्स अगेन्स्ट द राज़ : ए बायोग्राफी ऑफ इंडियन नेशनलिस्ट्स शरत एंड सुभाष चंद्र बोस” और सुगता बोस की किताब “हिज मेजेस्टीज़’ अपोनेंट्स सुभाष चंद्र बोस एंड इंडियाज़’ स्ट्रगल अगेन्स्ट एंपायर” पढ़नी चाहिए।
कृतघ्न हिंदुस्तानियों ने नेताजी की पत्नी, एमिली शेंकल (Emilie Schenkl) और उनकी बेटी अनीता की भी कभी कोई खोज-खबर नहीं ली। बहुत-से लोग तो जानते भी नहीं हैं कि दिसंबर 1937 में ही नेताजी एमिली शेंकल से शादी कर ली थी। नेताजी वांग्मय के सातवें खंड में सुभाष बाबू के वे खत शामिल हैं, जो उन्होंने 1934-1942 के दौरान, एमिली शेंकल को लिखे थे।
अंत में, सुभाष बाबू के लिए सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की ये पंक्तियाँ, जो उन्होंने डॉ लोहिया के प्रति लिखी थीं:
“बर्फ़ में गीली लकड़ियाँ
अपना तिल-तिल जलाकर 
वह गरमाता रहा
और जब आग पकड़ने ही वाली थी
खत्म हो गया उसका दौर
ओ मेरे देशवासियो
एक चिंगारी और”। 
-शुभनीत कौशिक

23 सितंबर 2015

Stop pitting Nehru versus Bose

Rajdeep Sardesai, in this video, bluntly criticizes attempts of pitting Subhas Chandra Bose against Jawaharlal Nehru. Recent declassification of files in Bengal by Mamata Banerjee has created an uproar on this issue. Rashtriya Swayamsevak Sangh has been trying to appropriate Bose for a long time. It is believed or, it can be said it, RSS and its cohorts wants to make people believe that Nehru and Bose were fighting against each other rather than fighting against British imperialism. There were differences. True, But most importantly there was a larger consensus within the differences. This five minutes video is a must watch. 
    

11 नवंबर 2014

सुभाष चन्द्र बोस का राष्ट्र के नाम वक्तव्य (१९४३)

Courtesy All India Radio and Ministry of Information and Broadcasting


सुभाष चन्द्र बोस आज़ादी की लड़ाई के सबसे लोकप्रिय नेताओं में एक थे। गाँधी के बाद वो और नेहरू भारत के युवा वर्ग की प्रेरणा बन गए थे। क्रांतिकारी आन्दोलन में उनके जैसा नाम चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह ने ही कमाया था। आईसीएस से इस्तीफ़ा देकर वो भारत आये थे। उन्होंने और नेहरू ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को वामपंथ की तरफ़ मोड़ने का प्रयास किया। उन्हें लोग नेताजी के नाम से पुकारते थे। उनके और गाँधीजी के सम्बन्धों की हमेशा गलत व्याख्या की गयी है। दोनों के बीच कोई व्यक्तिगत लड़ाई नहीं थी। दोनों एक दूसरे से बेहद प्रेम करते थे। गाँधी ने हमेशा उन्हें बेटा माना और सुभाष के लिए गाँधी पिता के समान थे। लड़ाई विचारधारा के स्तर पर थी। सुभा १९३८ में ही अंग्रेजों के खिलाफ गाँधी के नेतृत्व में आखिऱी लड़ाई छेड़ देना चाहते थे। गाँधी के मुताबिक़ वो समय मुनासिब नहीं था। दोनों का परिस्थितियों का आकलन भिन्न था। इसलिए ही सुभाष ने अलग होकर फॉरवर्ड ब्लॉक का निर्माण किया। उन्होंने देश के बाहर जाकर आज़ाद हिन्द फ़ौज़ बनाई। इस फ़ौज़ की टुकड़ियों के नाम गाँधी और मौलाना आज़ाद सरीखे नेताओं के नाम पर भी रखे गए। जब भारतीय सीमा पर वो अपने सैनिकों को सम्बोधित कर रहे थे, उन्होंने गाँधी को "राष्ट्रपिता" कहकर पुकारा। यानी गाँधी को राष्ट्रपिता का ओहदा सुभाष ने दिया था।

नेताजी जीते-जी एक मिथक बन गए थे। १९४२ में एक बार उनके निधन की ख़बर फैल गयी थी। उनके परिवार को तमाम शोक- सन्देश मिलने लगे उनमें गाँधी का पत्र भी शामिल था। लेकिन नेताजी  की मौत की खबर जल्द ही झूठी साबित हुयी। तबसे लोगों के दिल में ये यकीन बैठ गया कि नेताजी मर नहीं सकते। सही समय होने पर वो सामने आएंगे। आज भी नेताजी की लोकप्रियता का अंदाजा उनसे जुड़े तमाम मिथकों और विश्वासों से लगाया जा सकता है। पेश 1943 में नेताजी द्वारा दिया गया यह ऐतिहासिक भाषण... 
         

स्वाधीनता आंदोलन की दीर्घकालिक रणनीति

लोगों की संघर्ष करने की क्षमता न केवल उन पर होने वाले शोषण और उस शोषण की उनकी समझ पर निर्भर करती है बल्कि उस रणनीति पर भी निर्भर करती है जिस...