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4 मार्च 2018

क्या गांधीजी वाकई कांग्रेस को भंग करना चाहते थे?


भाजपा अपने ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ अभियान को सही ठहराने के लिए बार-बार गांधीजी का सहारा लेती है. अभी कितने दिन बीते हैं जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गांधीजी की सार्वजनिक प्रशंसा करते हुए कहा था कि उनके द्वारा कांग्रेस को भंग करने की इच्छा दरअसल एक दूरदर्शी अपील थी.
उनके इसी भाषण में गांधीजी के साथ जातिसूचक प्रत्यय ‘चतुर बनिया’ जोड़ने पर उनका काफ़ी विरोध हुआ था. लेकिन गांधीजी ने कांग्रेस को भंग करने के संबंध में क्या कुछ कहा था, इसका कोई विरोध नहीं हुआ. आम तौर पर लोगों के दिल में यह धारणा बैठा दी गई है कि गांधीजी वास्तव में ऐसा ही चाहते थे.
दो दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में इसी मुद्दे को फिर गर्मा दिया. उन्होंने कहा कि वो तो सिर्फ़ गांधीजी के सपनों का भारत बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं. क्योंकि कांग्रेस-मुक्त भारत का विचार नरेंद्र मोदी का नहीं बल्कि ख़ुद गांधीजी का विचार था.
इस बार इस बात की बारीक़ी से जांच-पड़ताल करनी ज़रूरी है कि ऐतिहासिक रूप से सच क्या है?
यह सच है कि अपने अंतिम दिनों में गांधीजी आज़ाद भारत में कांग्रेस की बदली हुई भूमिका के बारे में गंभीरता से सोच रहे थे. गांधीजी ने अपनी हत्या के तीन दिन पहले यानी 27 जनवरी 1948 को एक नोट में लिखा था कि अपने वर्तमान स्वरूप में कांग्रेस ‘अपनी भूमिका पूरी कर चुकी है’. जिसे भंग करके एक लोकसेवक संघ में तब्दील कर देना चाहिए.
यह नोट एक लेख के रूप में 2 फ़रवरी 1948 को ‘उनकी अंतिम इच्छा और वसीयतनामा’ शीर्षक से हरिजन में प्रकाशित हुआ. यानी गांधीजी की हत्या के दो दिन बाद यह लेख उनके सहयोगियों द्वारा प्रकाशित किया था. यह शीर्षक गांधीजी की हत्या से दुखी उनके सहयोगियों ने दे दिया था.
इस शीर्षक को बिना यह संदर्भ देखे कुछ विद्वान बिना विश्लेषण जस-का-तस अपना लेते हैं.
उदाहरण के तौर पर राजनीति विज्ञानी लॉयड और सूज़न रुडोल्फ़ कहती हैं, ‘नाथूराम गोडसे के हाथों अपनी हत्या के 24 घंटे पहले गांधीजी अपनी अंतिम इच्छा और वसीयतनामे में प्रस्ताव करते हैं कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाना चाहिए और उसकी जगह लोकसेवक संघ की स्थापना करनी चाहिए जो जनता की सेवा के लिए बनाया गया संगठन होगा.’
यानी लेख को दिया गया शीर्षक और गांधीजी के मरणोपरांत उसके प्रकाशन ने इस नोट को उससे ज़्यादा प्रासंगिक बना दिया जितना गांधीजी ख़ुद चाहते थे.
जबकि ‘उनकी अंतिम इच्छा और वसीयतनामा’ को उसी दिन हरिजन में प्रकाशित एक और वक्तव्य के साथ जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए, ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जो कि सबसे पुराना राष्ट्रीय राजनीतिक संगठन है, जिसने कई अहिंसक संघर्षों के माध्यम से आज़ादी जीती है, को ख़त्म करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. यह सिर्फ़ राष्ट्र के साथ ही ख़त्म होगा.’
उनका यह बयान सिद्ध करता है कि गांधीजी उस समय भी कांग्रेस की भूमिका देखते थे और यह सोच रहे कि भविष्य में यह कैसी हो?
गांधीजी ने दरअसल जो लिखा था वो एक संविधान का मसौदा था न कि उनकी अंतिम इच्छा और वसीयतनामा. यदि गांधीजी जीवित रहते तो इस बात की पूरी संभावना थी कि इस मसौदे पर कांग्रेस के अंदर संपूर्णता से बहस होती.
उनकी यह टिप्पणी कांग्रेस और उसके संगठन की स्वातंत्र्योत्तर भारत के ज़रूरत के हिसाब से कैसे पुनर्गठन हो, इस पर चल रही बहस के संदर्भ में की गई थी.
आज़ादी मिलने के साथ आज़ादी दिलाने में पार्टी की ऐतिहासिक भूमिका समाप्त हो गई थी और अब उसे सामाजिक-आर्थिक क्रांति के लिए तैयार करना था. यह बहस पार्टी नेतृत्व द्वारा 1946 में तब शुरू की गई थी जब कांग्रेस कमेटियों को इस संबंध में एक सर्कुलर भेजकर अपनी राय व्यक्त करने को कहा गया था.
अगले कुछ महीनों में जयप्रकाश नारायण, रघुकुल तिलक, जेबी कृपलानी सहित तमाम कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं. तिलक कांग्रेस को भंग करने की हालत में पैदा होने वाले निर्वात के प्रति चिंतित थे जिसे उनके मुताबिक़ सांप्रदायिक दल तेज़ी से भरने का प्रयास करते.
कांग्रेस अध्यक्ष कृपलानी ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ चल रहे संघर्ष के समाप्त होने की हालत में कांग्रेस को एक नया स्वरूप देने की सलाह दी.
उन्होंने कांग्रेस की भूमिका सरकारी नीतियों को क्रियान्वित करने वाले और जनता तथा सरकार के बीच सेतु बनने वाले संगठन की देखी.
लोहिया चाहते थे कि कांग्रेस समाजवादी रास्ते को अपना ले और इस उद्देश्य से मज़दूर और किसान संगठनों से जुड़े.
गांधी ने कांग्रेस को भंग करने की बात कांग्रेस पर हावी सत्ता की राजनीति से मोहभंग के सीमित संदर्भों में नहीं की थी. बल्कि पार्टी को नई परिस्थितियों का प्रभावी ढंग से सामना करने के हिसाब से ढालने के संदर्भ में की थी.
गांधी नोआखाली के दिनों से ही भविष्य में पार्टी की भूमिका को लेकर चल रहे विचार-विमर्श में शामिल थे जो कि 1947 के अंत और 1948 की शुरुआत तक जारी था.
इस तरह अगर हम कांग्रेस की भूमिका पर बहस के उद्भव को देखें तो यह साफ़ हो जाता है कि यह गांधीजी की कोई ऐसी राय नहीं थी जो कांग्रेस के आधिकारिक पक्ष के विरुद्ध थी.
ऐसा लगता है कि यह दावा बार-बार इसलिए किया जाता है कि इस लोकप्रिय मिथ को सही सिद्ध किया जा सके कि अपने अंतिम दिनों में गांधीजी कांग्रेस और उसके नेताओं से दूर हो गए थे.
यह एक ऐसा मिथ है जो गांधीजी और अन्य राष्ट्रीय नेताओं की छवि को अपने मनमुताबिक गढ़ने और बाकी नेताओं की प्रतिष्ठा को धूलधूसरित करने की छूट देता है. यह और कुछ नहीं बल्कि हमारे राष्ट्रीय नेताओं की छवि विकृत करने के भाजपाई अभियान का हिस्सा है.
(प्रो. सुचेता महाजन इतिहासकार और जेएनयू में सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज़ की अध्यक्ष हैं. सौरभ बाजपेयी राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट नामक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक हैं.)
http://thewirehindi.com/33776/congress-mukt-bharat-bjp-agenda-mahatma-gandhi/?utm_source=socialshare&utm_medium=whatsapp, ४ मार्च २०१८. 


28 जनवरी 2018

क्या नेताजी के ज़िंदा होने की ख़बर नेहरू को घेरने के लिए फैलाई गई थी?

सौरभ बाजपेयी 
23/01/2018

लोगों को यक़ीन दिलाया गया कि नेताजी इसलिए भूमिगत रहे क्योंकि नेहरू ने ब्रिटिश सरकार से गुपचुप समझौता किया था कि अगर नेताजी कभी जीवित मिलते हैं तो उन्हें एक युद्ध अपराधी के रूप में तत्काल ब्रिटेन को सौंप दिया जाएगा.

Subhash-Chandra-Bose-Jawahar-Lal-Nehru-Wiki
Subhash-Chandra-Bose-Jawahar-Lal-Nehru-Wiki
फोटो साभार: विकिपीडिया

एक बार तकरीबन सत्तर साल के एक बुजुर्ग मिले. घरों में अखबार डालने वाले इन बुजुर्ग की शर्ट पर एक बिल्ला टंका था. उस पर नेताजी की तस्वीर के साथ लिखा था- नेताजी जिंदा हैं.

यह बात लगभग आठ बरस पुरानी रही होगी. मैंने हिसाब लगाया कि 23 जनवरी 1897 को कटक में पैदा हुए नेताजी अगर वाकई जिंदा होते तो आज कितने बरस के होते? यकीनन उनकी उम्र तब लगभग 113 बरस होती. किसी भी व्यक्ति के लिए इतनी लम्बी उम्र तक सक्रिय रहना तो दूर, ठीक से जीना ही असंभव होता है.

लेकिन उन अर्धशिक्षित बुजुर्ग के लिए नेताजी अभी जिंदा थे. यह पूछने पर कि इतने निडर नेताजी आखिर किससे डरकर भूमिगत हैं, बड़ा भोला-सा जवाब मिला- वो अंदर ही अंदर तैयारी कर रहे हैं. जिस दिन उनकी तैयारी पूरी हो जायेगी, वो प्रकट हो जायेंगे.

उनसे पूछना बेकार था कि क्या तैयारी और किस चीज़ की तैयारी? भारत जैसे देशों में महानायक आस्था का विषय बन जाते हैं. नेताजी एक महानायक थे जिनके भीतर आम लोगों को एक मुक्तिदाता दिखाई देता था.

बाद के दिनों में यह समझने की भरसक कोशिश की कि नेताजी के जिंदा होने के पीछे का राज़ क्या है?

कई लोगों ने गांधी को अपने सीने पर तीन गोलियां खाते देखा था. कईयों ने गोलियों से छलनी उनके शरीर की फोटो देखी थी. लेकिन नेताजी की विमान दुर्घटना के बाद उनके न होने की सिर्फ खबर आयी थी. किसी ने उनकी लाश नहीं देखी, कोई उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुआ.

जब आज के ताइवान में ताईहोकू एरोड्रम पर उनका ओवरलोड प्लेन क्रैश हुआ तो उनके साथ कई लोग थे. जिनमें से कर्नल हबीबुर्रहमान और जापानी मेजर कोनो ने अपने बयानों में नेताजी के बुरी तरह झुलस जाने और फिर संघर्ष करते हुए अचेत हो जाने की पुष्टि की थी.

हबीबुर्रहमान का कहना है कि नेताजी ने अंतिम समय में उनसे कहा कि- “हबीब, मेरा अंत बहुत जल्द निकट आ रहा है. मैंने अपनी पूरी जिंदगी देश की आज़ादी के लिए लगा दी. मैं अपनी मातृभूमि भूमि के लिए ही प्राणों का उत्सर्ग भी कर रहा हूँ. जाओ और मेरे देशवासियों से कहो कि वो भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ते रहें. भारत बहुत जल्द आज़ाद होगा.”

नैनमोन आर्मी हॉस्पिटल के डॉ० तानेयोशी योशिमी ने उनकी मृत्यु के बाद उनका डेथ सर्टिफिकेट बनाया. जापानी भाषा में ‘चन्द्र बोस’ की मृत्यु का यह प्रमाणपत्र बाद में स्थानीय म्युनिसिपल ऑफिस में जमा किया गया. लेकिन बाद के दिनों में जब उसे खोजने की कोशिश की गयी तो नहीं मिला क्योंकि ताइवानी इतिहास के इस दौर के ज्यादातर जापानी रिकॉर्ड नष्ट कर दिए गए थे.

सिर्फ़ आंखों को छोड़कर पूरे शरीर में लिपटी पट्टियों वाले नेताजी के शव की कोई फोटो भी नहीं खींची गयी थी. हालांकि उनके शरीर को संरक्षित करने के लिए होमोलिन के इंजेक्शन दिए गए थे. योजना यह थी कि उनके शव को सिंगापुर या टोकियो पहुंचाया जा सके.

लेकिन उस समय जापान आत्मसमर्पण की शर्तें तय कर रहा था और अमेरिका ने औपचारिक रूप से कब्ज़ा नहीं जमाया था, इसलिए अंततः उनका शव का ताइपे में ही 20 अगस्त 1945 को अंतिम संस्कार कर दिया गया.

नेताजी की मृत्यु पर यकीन न करने के पीछे कुछ और घटनाएं भी ज़िम्मेदार हैं. जिस तरह 1941 में अंग्रेजी खुफिया विभाग को धता बताकर नेताजी देश छोड़कर निकल भागे थे, उसने उन्हें चमत्कारिक नायक का दर्जा दे दिया था. फिर 1942 में खबर आयी कि एक प्लेन क्रेश में नेताजी की मृत्यु हो गयी है.

यह खबर इतनी ज्यादा फ़ैली कि गांधीजी ने नेताजी की मां को चिठ्ठी लिखकर इस अफवाह पर अपनी चिंता प्रकट की. फिर बाद में यह खबर भी झूठ निकली और इस घटना ने नेताजी की छवि एक ऐसे नायक की बना दी जो अपने दुश्मन को बार-बार धता बताने में माहिर था.

इसीलिए जब 1945 में नेताजी की मृत्यु हुई तो आम जनमानस ने इसे सच मानने से सिरे से इनकार कर दिया. इसके बाद नेताजी के जीवित होने की खबरें उनके नायकत्व के प्रति अपार आदरभाव से भरे लोगों के लिए एक सच्चाई बन गयीं.

फिर भारत में तब तक एक ऐसी विचारधारा तैयार खड़ी हो गयी थी जो नेहरू को खलनायक बनाने पर तुली हुई थी. आरएसएस ने नेताजी की मृत्यु और गुमनामी की अफवाह में झूठ और फरेब का तड़का लगाकर उसे आम जनता के बीच सत्य बना देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.

आरएसएस ने सोचा कि इस ग़लतफ़हमी को ही वैकल्पिक इतिहास बनाकर परोसा जाए. एक ऐसा वैकल्पिक इतिहास जिसे नेहरू के प्रशंसक वामपंथी इतिहासकार जानबूझकर छिपा ले जाते हैं.

लोगों को यकीन दिलाया गया कि नेताजी इतने लंबे समय तक इसलिए भूमिगत रहे क्योंकि नेहरू ने ब्रिटिश सरकार से गुपचुप अंदरूनी समझौता कर लिया था. यह समझौता था कि अगर नेताजी कभी जीवित मिलते हैं तो उन्हें एक युद्ध अपराधी के रूप में तत्काल ब्रिटेन को सौंप दिया जाएगा.

दरअसल, ब्रिटिश सरकार नेताजी की मृत्यु की खबर को लेकर बहुत सतर्क थी. वो हर तरह से जांच-परखकर ही इस मुद्दे पर यकीन करना चाहती थी. इसलिए उसने अपने दो खुफिया अधिकारियों को खबर की सत्यता की जांच के लिए ताइवान भेजा था.

ब्रिटिश सरकार नेताजी की लोकप्रियता को देखते हुए यह तय करने की उधेड़बुन में थी कि विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद अगर कहीं नेताजी जीवित वापस आ गए तो उनके साथ क्या सलूक किया जाए?

लेकिन ब्रिटिश सरकार की नीति को आज़ाद भारत में नेहरू की सरकार पर भी मनमाने ढंग से थोप दिया गया क्योंकि इससे स्वाधीनता आंदोलन के दो कद्दावर साथियों को एक-दूसरे के बरक्स आसानी से खड़ा किया जा सकता था.

इस बात की फ़िक्र किसे थी कि आज़ाद हिन्द फौज के कैदियों पर दिल्ली के लालकिले में चले ऐतिहासिक मुकदमे के वक़्त सैनिकों के बचाव में नेहरू ने दशकों के बाद अपना बैरिस्टरी वाला कोट पहना था.

इसके अलावा यह इतिहास भी छिपा लिया गया कि 1920 के दशक के मध्य से ही नेहरू और सुभाष की जोड़ी ने ही बड़ी संख्या में युवाओं को राष्ट्रीय आंदोलन की ओर आकर्षित किया था. यह तथ्य भी गुमनाम हो गया कि दोनों ने मिलकर जाने कितनी बार कांग्रेस की बुजुर्ग पीढ़ी के सामने नयी ऊर्जा और तेवर वाली राजनीति की पैरवी की थी.

अव्वल तो नेताजी को ब्रिटेन को सौंपने की बात ही सरासर गप्प है. लेकिन अगर कुछ समय के लिए यह मान भी लें तो क्या इतनी बड़ी राजनीतिक हैसियत और अपार जनसमर्थन वाले नेताजी को नेहरू ब्रिटेन को सौंपने का जोखिम ले सकते थे?

या क्या दुनिया की सबसे ताकतवर सत्ता के टकराने का साहस रखने वाले नेताजी इतने बुजदिल हो सकते थे कि ब्रिटेन को सौंपे जाने के डर से भूमिगत रहकर गुमनामी की जिंदगी गुजार लेते?

अभी पिछले साल की तो बात है जब नेहरू द्वारा नेताजी की जासूसी सम्बन्धी फ़र्जी फाइलें दिखाकर भाजपा सरकार ने अपनी किरकिरी कराई थी.

नेताजी के दूरदराज के कुछ रिश्तेदारों को सत्ता की रेवड़ियां दिखाकर उन्हें आरएसएस के एजेंडे पर खेलने के लिए टीवी चैनल्स के सामने पेश किया गया था. जबकि उनके सबसे करीबी रिश्तेदार जिनमें प्रसिद्ध इतिहासकार सुगाता बोस भी शामिल हैं, बार-बार नेताजी की मृत्यु और जासूसी से जुड़ी खबरों का खंडन करते रहे.

जिन लोगों ने भी नेताजी को पढ़ा-समझा-जाना है वो जानते हैं कि नेताजी कुछ भी हो सकते थे, अप्रासंगिक नहीं हो सकते थे. चुपचाप या गुमनाम बैठकर तमाशा देखना उनकी फ़ितरत नहीं थी.

नेताजी अगर जिंदा होते तो सबके सामने अपने चिर-परिचित तेवरों के साथ खड़े होते भले ही वो नेहरू के साथ होते या स्वतंत्र भारत में नेहरू के विरुद्ध क्योंकि नेताजी, नेताजी थे. वो दिलों में जिंदा थे, हैं और रहेंगे. और जो दिलों में जिंदा रहते हैं वो जिंदा रहते हुए छुपकर हरगिज नहीं रहते.

(लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट नामक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक हैं.)

http://thewirehindi.com/32184/netaji-subhash-chandra-bose-rss-nehru-british-government/, २८ जनवरी २०१८. 

6 जनवरी 2018

जिन क्रांतिकारियों के सहारे संघ गांधी पर निशाना साधता है, वे आरएसएस कैंप से नहीं आये थे

सौरभ बाजपेयी 29/11/2017

आरएसएस अगर आज़ादी की लड़ाई के बारे में बात करे तो वो क्या बताएगा? अगर वो सावरकर के बारे में बताएगा तो अंग्रेजों को लिखे गए सावरकर के माफ़ीनामे सामने आ जाते हैं.

mahatma gandhi dandimemorial.in
mahatma gandhi dandimemorial.in
(फोटो साभार: dandimemorial.in)

एक बार अमर्त्य सेन ने एक बड़े पते की बात कही थी, ‘जब मैं किसी एक चीज के बारे में बात कर रहा होता हूं तो उस वक्त दूसरी चीजों के बारे में बात नहीं कर रहा होता.’

यानी अगर कोई किसी गीत में गांधीजी के बारे में बात कर रहा है तो जाहिर है वो उस समय क्रांतिकारियों के बारे में बात नहीं कर रहा. संभव है वही व्यक्ति जब क्रांतिकारियों के बारे में बात कर रहा हो तो उस समय गांधी की बात न करे.

यह बात समझने में उन लोगों को दिक्कत होती है जिनके पास तर्कों की कमी है और कुतर्क ही जिनका सहारा हैं.

बात-बात में पूछने वाले कि ‘आप तब कहां थे’ या ‘आप उनके बारे में क्यों नहीं बोलते’ एक खास बौद्धिक फैक्ट्री के उत्पाद हैं. ये वो लोग हैं जो बौद्धिक विमर्श की अपनी दरिद्रता को छुपाने के लिए विमर्श को भटकाने की रणनीति अपनाते हैं.

उनकी स्थिति तब और दयनीय हो जाती है जब उनका अपना इतिहास किसी को बताने लायक नहीं होता.

आरएसएस अगर आज़ादी की लड़ाई के बारे में बात करे तो वो क्या बताएगा? अगर वो सावरकर के बारे में बताएगा तो अंग्रेजों को लिखे गए सावरकर के माफीनामे सामने आ जाते हैं.

अगर किसी को गांधी की हत्या ‘वध’ न लगती हो तो वो भी सावरकर पर लानत ही भेजेगा. भले ही अपनी जिंदगी के पहले कुछ साल तक वो वीर रहे हों, बाद के सालों में उन्होंने भीरुता और गद्दारी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए.

तो इस तरह आरएसएस की राजनीति के महानायक ‘वीर’ सावरकर भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महान क्रांतिकारियों के सामने महज अंग्रेजों के चाटुकार-भर रह जाते हैं.

फांसी की सजा का इंतजार करते हुए फख्र से जिन शहीदों का वजन बढ़ जाता हो, उनके सामने उस व्यक्ति की क्या बिसात जो महज जेल जाने से इस कदर टूट गया कि अंग्रेजों का पिट्ठू बन बैठा. हिंदू महासभा से उधार लिए इन्हीं सावरकर के अलावा आरएसएस के पास ऐसा कुछ नहीं है जिसे वो ‘अपना’ कह सकें.

कई बार लोग आपत्ति करते हैं कि आज़ादी की लड़ाई की विरासत पर सबका बराबर का अधिकार है. लेकिन क्या उनका भी उतना ही अधिकार है जो 1925 से संगठन चलाते हुए 22 साल तक लोगों को समझाते रहे कि अंग्रेज नहीं मुसलमान, कम्युनिस्ट और ईसाई उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं?

बहरहाल, अगर हरियाणा के मंत्री अनिल विज और कैलाश विजयवर्गीज सरीखे लोगों को लगता है कि कवि प्रदीप ने ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल’ लिखकर क्रांतिकारियों का अपमान किया था तो लगे हाथ हम भी पूछ सकते हैं कि जब क्रांतिकारी हंसते-हंसते फांसी के फंदे चूम रहे थे, तब आप कहां थे?

रह-रहकर क्रांतिकारियों और हिंसा के प्रति उमड़ रहे इनके प्रेम की पड़ताल बहुत जरूरी है.

भगत सिंह क्रांतिकारी परंपरा के सबसे प्रबुद्ध चिंतक हैं. वो शायद नेहरू के अलावा दूसरे ऐसे स्वाधीनता सेनानी थे जो सांप्रदायिकता को वैज्ञानिक ढंग से समझने की कोशिश कर रहे थे. भले ही आरएसएस भगत सिंह को सरदार बनाकर उन्हें अपनाने की लाख कोशिश कर ले, भगत सिंह के विचार उसके धुर विरोधी हैं.

भगत सिंह गांधीजी की भारतीय राजनीति में सकारात्मक भूमिकाओं को पहचानते हुए उनकी बौद्धिक आलोचना करते थे. लेकिन वो यह कभी सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि कोई गांधी हत्या की बात तक जुबान पर लाये.

यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि लाला लाजपतराय के साथ अपने लाख मतभेदों के बावजूद भगत सिंह और उनके साथी उनके ऊपर हुए बर्बर लाठीचार्ज का बदला लेने निकल पड़े थे.

उन्होंने ‘सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ नामक लेख में साफ लिखा है कि लोगों को आपस में बांटने वाले संकीर्ण सांप्रदायिक विचार से बचाना और उसकी जगह साझा राष्ट्रवाद की भावना को बल देना जरूरी है.

सनद रहे कि भगत सिंह ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ में धर्म और ईश्वर की सत्ता को सिरे से ही नकार दिया था. जबकि दूसरी तरफ आरएसएस चाहता है कि आज़ादी की लड़ाई से निकले साझा राष्ट्रवाद की जगह सांप्रदायिक हिंदुत्व ही भारतीय राष्ट्र का एकमात्र दर्शन बन जाए.

हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सुप्रीम कमांडर चंद्रशेखर आज़ाद को तो एक बार सावरकर ने संदेश भिजवाया था कि क्रांतिकारियों को अंग्रेजों से लड़ना बंद करके जिन्ना और मुसलमानों की हत्या करनी चाहिए.

यशपाल ने अपनी किताब ‘सिंहावलोकन’ में लिखा है कि इस पर आज़ाद ने उनके दिए पचास हजार रुपये यह कहकर ठुकरा दिए थे कि ‘यह हम लोगों को भाड़े का हत्यारा समझता है. अंग्रेजों से मिला हुआ है. हमारी लड़ाई अंग्रेजों से है… मुसलमानों को हम क्यों मारेंगे? मना कर दो… नहीं चाहिए इसका पैसा’.

आज़ाद ने अपने एक कनिष्ठ साथी, जो कि हिंदू राष्ट्र के जुमलों से थोड़ा प्रभावित हो गया था, से स्पष्ट शब्दों में कहा था-

‘हे भगत! तेरी ये हिंदू राजतंत्र की कल्पना देश को बहुत बड़े खतरे में डालने वाली है… कुछ मुसलमान भी ऐसा ही स्वप्न देखते हैं. लेकिन यह तो पुराने शाही घरानों के हिंदुओं और मुसलमानों की खब्त है. हमें तो फ्रंटियर से लेकर बर्मा तक और नेपाल से लेकर कराची तक के हर हिंदुस्तानी को साथ लेकर एक तगड़ी सरकार बनानी है.’

पृथ्वीसिंह आज़ाद क्रांतिकारी गदर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में एक थे. उनके साहस और वीरता के किस्से देश भर में मशहूर थे. हिंसा और क्रांतिकारी साधनों में पूरे यकीन के बावजूद पृथ्वीसिंह गांधीजी को पितातुल्य मानते थे. एक बार उन्हें जानकारी मिली कि दो रजाकार गांधीजी की हत्या करने के उद्देश्य से भेजे गए हैं तो वो उन्हें बचाने आ गए.

लेकिन जब गांधीजी को इस बात का पता चला तो पृथ्वीसिंह बोले कि उनके रहते कोई गांधीजी का बाल भी बांका नहीं कर सकता. लेकिन गांधीजी ने जब पलटकर सवाल किया कि उनके रहते अगर पृथ्वीसिंह को कुछ हो गया तो वो क्या जवाब देंगे. यह सवाल सुनकर पृथ्वीसिंह सहित सभी आश्रमवासी निरुत्तर हो गए.

‘मुसलमानों को फुफकारते यवन सांप’ मानने की विचारधारा के लोग तो रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्लाह खान के आपसी रिश्तों को समझ ही नहीं सकते. एक बार अशफाक बीमार पड़े तो अचेतन अवस्था में राम-राम कहकर कराहने लगे.

उनके परिवार वालों को यह समझ ही नहीं आया कि पांच समय का नमाजी राम-राम क्यों रट रहा है. बाद में पता चला कि वो रामप्रसाद बिस्मिल को पुकार रहे थे.

तो इस तरह क्रांतिकारी आंदोलन का पूरा नेतृत्व सांप्रदायिकता के खतरे को भली-भांति पहचानता था. बल्कि न सिर्फ पहचानता था, उससे लड़ने की प्रतिबद्धता भी रखता था.

भूलने नहीं देना है कि गुलाम भारत में इस सांप्रदायिक धारा की सबसे बड़ी प्रतिनिधि मुस्लिम लीग थी और दूसरी तरफ से उसका साथ देने के लिए हिंदू महासभा और आरएसएस मौजूद थे.

इस तरह ये तो साफ है कि जिन क्रांतिकारियों का सहारा लेकर आरएसएस-भाजपा से जुड़े लोग बार-बार गांधीजी पर निशाना साधते हैं, वो कोई आरएसएस के ओटीसी कैंप से निकलकर नहीं आये थे.

आरएसएस तो उस समय अपने प्रशिक्षण शिविरों में भविष्य में मुसलमानों के खिलाफ होने वाले किसी संभावित गृहयुद्ध की तैयारियों में लगी थी.

अपने विचारधारा के भीतर छिपी हिंसा को सही ठहराने के लिए वो क्रांतिकारियों की हिंसा को जायज ठहराते हैं तो इसी बहाने गांधी की अहिंसा को कायरता बताते हैं. अगर सिर्फ हिंसा की बात करें तो भी हिंसा-हिंसा में फर्क होता है. अंग्रेजी राज के दमन और शोषण से ऊबकर जिन क्रांतिकारियों ने हिंसा का सहारा लिया उनके दिल में मानवता के प्रति एक तड़प थी.

सांडर्स की हत्या के बाद लाहौर की गलियों में क्रांतिकारियों द्वारा लगाये गए पोस्टर याद करिए. उनकी हिंसा के भीतर छिपा गहन मानवतावाद साफ दिखता था.

कोई सोच सकता है कि चंद्रशेखर आज़ाद ने कई दिन प्रयास करने के बावजूद एक मंदिर में सिर्फ इसलिए डकैती नहीं डाली क्योंकि उसमें बेवजह का खून-खराबा हो सकता था. या कि बहरे कानों को सुनाने के लिए असेम्बली में बम सिर्फ उस जगह फेंका गया जहां कोई व्यक्ति मौजूद न हो.

याद रखना चाहिए कि भगत सिंह सहित सभी क्रांतिकारी अपने जीवन के बहुत शुरूआती दिनों में व्यक्तिगत हिंसक कार्यवाहियों में यकीन करते थे. लेकिन परिपक्व होने के साथ ही उन्होंने इस तरीके की सीमाएं भी समझ ली थीं जो कि ‘क्रांतिकारी कार्यक्रम के मसौदे’ से एकदम स्पष्ट हो जाता है.

ये क्रांतिकारी नौजवान पकी दाढ़ी की उम्र में एक निहत्थे अहिंसक बूढ़े की हत्या के लिए हिंसा को उकसाने वाले फिलॉसफर नहीं थे. हिंसा उनके लिए सामाजिक परिवर्तन का माध्यम हो सकता था, निर्दोषों और निहत्थों की हत्या का साधन नहीं.

यह सब छोड़ भी दें तो क्या कोई तथाकथित संघ विचारक क्रांतिकारी साहित्य से कोई एक छोटा पुर्जा भी दिखा सकता है जिसमें गांधीजी की हत्या की योजना शामिल हो?

अगर नहीं तो 1930 के दशक से ही वो कौन लोग थे जो गांधीजी की हत्या को ही राष्ट्र की सबसे बड़ी सेवा मान बैठे थे?

यह तो सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है जो भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु और सुखदेव आदि लाला लाजपतराय की हत्या का बदला लेने के लिए अपनी जान न्योछावर कर देते हैं, वो गांधीजी की हत्या होने पर क्या करते?

(लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट नामक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक हैं.)

http://thewirehindi.com/26587/sabarmati-ke-sant-mahatma-gandhi-rss-hate-speech/, 7 जनवरी २०१८. 

14 अक्टूबर 2017

आंदोलन जिसमें हर कोई नेता था

मृदुला मुखर्जी, प्रसिद्ध इतिहासकार

8 अगस्त, 2017

famous Historian Mridula Mukherjee
famous Historian Mridula Mukherjee

हमारे राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी लड़ाई थी अगस्त क्रांति और इस आंदोलन की विशेषताएं इसे आजादी की लड़ाई के दूसरे तमाम आंदोलनों से अलग करती हैं। यहां मैं यह स्पष्ट कर दूं कि अन्य आंदोलनों से इसके अलग कहने का मतलब किसी आंदोलन के अच्छे-बुरे की बात नहीं है, बल्कि इसकी अहमियत को बताना मेरा मकसद है। जैसे दांडी यात्रा का अपना एक अलग चरित्र था। असहयोग आंदोलन की अपनी विशेषताएं थीं, इसी तरह ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की भी थीं।

मगर यह आंदोलन इस मायने में सबसे खास था कि इसे देश भर के अवाम का स्वत:स्फूर्त समर्थन मिला। जब 8 अगस्त को कांग्रेस ने अंग्रेजों को यह कहने के लिए प्रस्ताव पारित किया कि आप भारत से जाएं, और गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया, तो असल में मकसद ठीक उसी समय से वह आंदोलन शुरू करना नहीं था, बल्कि इसके जरिये यह संदेश दिया जा रहा था कि हमें यह काम करना है। उस समय तो गांधी जी ने कहा था कि आंदोलन को विधिवत शुरू करने में दो-तीन हफ्ते लगेंगे, क्योंकि मैं पहले वायसराय से बात करूंगा, जैसा कि मैं हमेशा कोई आंदोलन शुरू करने से पहले करता आया हूं। गांधी जी हमेशा ब्रिटिश हुकूमत को यह बताते थे कि हम यह कार्यक्रम करने जा रहे हैं और उस पर अंगे्रजों की सकारात्मक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा भी करते थे। ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के प्रस्ताव पारित करने के वक्त गांधी की यही भावना थी। परंतु 8 अगस्त की रात और 9 तारीख की सुबह स्वतंत्रता संग्राम के राष्ट्रीय नेतृत्व को बड़े पैमाने पर गिरफ्तार कर लिया गया। मुंबई में गांधीजी और उनके सहयोगियों को हिरासत में ले लिया गया, तो राज्य स्तर पर भी कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को उठा लिया गया। जाहिर है, यह अचानक उठाया गया कदम नहीं था। ब्रिटिश सरकार ने पहले से ही अपनी रणनीति बना रखी थी।

देश के लोग इतने बड़े पैमाने पर अपने नेताओं की गिरफ्तारी से भौंचक रह गए। इस पर उनकी जबर्दस्त प्रतिक्रिया सामने आई और 9 अगस्त को ही देश के कई इलाकों में बड़ी-बड़ी रैलियां हुईं, खासकर शहरों में लोग हजारों की तादाद में सड़कों पर उमड़ आए। पटना, दिल्ली, बंबई (अब मुंबई) में खास तौर से छात्र और नौजवान आंदोलन करने लगे। 9 अगस्त को ही कई जगहों पर गोलियां भी चलीं, जिसमें अनेक लोग मारे गए। यह आंदोलन किसी के आह्वान पर नहीं शुरू हुआ था, क्योंकि कांग्रेस और गांधी जी ने अभी तो यह तय ही नहीं किया था कि किस दिन से आंदोलन का आह्वान किया जाए। उन्होंने उस वक्त सिर्फ संकल्प लिया था कि हमें आंदोलन करना है। साथ ही यह भी संकल्प लिया था कि अब पीछे नहीं हटना है, यानी ‘करो या मरो।’

उस समय तक देश की आजादी की आवाज भारत के कोने-कोने तक पहुंच गई थी और स्वतंत्रता संग्राम की पहुंच समाज के सभी तबकों तक बन चुकी थी। लोगों में यह भावना बलवती हो उठी थी कि अंग्रेजों को अब यह देश छोड़ना ही होगा और इसके लिए वे कोई लंबा इंतजार करने के मूड में भी नहीं थे। एक तरह से शीघ्र आजादी की भावना गहरी हो चली थी। इस आंदोलन ने दिखाया कि आजादी की राष्ट्रीय भावना अब किस चरम पर है।

आम तौर पर किसी भी आंदोलन की रूपरेखा बनती है। नेतृत्व अपने कैडर तैयार करता है कि एक खास तिथि से सत्याग्रह शुरू होगा और अमुक-अमुक लोग अपनी क्रमवार गिरफ्तारियां देंगे। फिर हम स्कूल-कॉलेजों का बहिष्कार करेंगे या विदेशी वस्त्रों का त्याग करेंगे, लेकिन अगस्त क्रांति में ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं बनाया गया था। यकीनन कांग्रेस के आंदोलन की तैयारी चल रही थी, लेकिन उसके नेताओं की अचानक गिरफ्तारी ने इसे तत्काल भड़का दिया। कांग्रेस की तैयारी का अंदाज इस बात से लगता है कि उसे मालूम था कि विश्व युद्ध के दौरान वह अंग्रेजों से मोर्चा लेने जा रही है और इस पर ब्रिटिश हुकूमत की प्रतिक्रिया काफी सख्त होगी। इसीलिए लोगों को क्या निर्देश देने हैं, यह भी सोच लिया गया था। गांधी जी ने अपने भाषण में कहा भी था कि ‘इच मैन विल बी ओन लीडर’ यानी हर सेनानी अपना नेता खुद होगा। वह अपनी बुद्धि और विवेक से काम करेगा। चूंकि उसे अच्छी तरह से प्रशिक्षित किया जा चुका है कि किस स्थिति में क्या करना चाहिए, इसलिए कोई भी कार्यकर्ता नेतृत्व के निर्देश का इंतजार नहीं करेगा। मैं मानती हूं कि यह इस आंदोलन की खास विशेषता थी।

पहले के आंदोलन में नेतृत्व को काफी वक्त मिल जाता था। अंग्रेज उन्हें तुरंत उठाकर जेल में नहीं डाल देते थे। नमक सत्याग्रह में ही गांधी जी कितने दिनों तक पैदल चले, 6 अप्रैल को दांडी में नमक बनाकर कानून तोड़ने के भी काफी दिनों के बाद उनको हिरासत में लिया गया। इसी तरह जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल को भी काफी समय मिला करता था, जिससे वे आंदोलन की दशा-दिशा तय कर पाते थे। मगर अगस्त क्रांति ने हर एक सेनानी को अपना नेता बना दिया था। इस आंदोलन में लोगों ने ब्रिटिश सत्ता के प्रतीकों जैसे थानों, स्टेशनों पर कब्जा कर लिया था, बडे़ पैमाने पर ग्रामीण नौजवानों ने इसे गांव-गांव में पहुंंचा दिया। जाहिर है, 1857 के बाद सबसे ज्यादा दमन इसी आंदोलन का हुआ। कांग्रेस का अपना आकलन था कि 10 हजार से ज्यादा भारतीय इसमें शहीद हुए थे। इन शहादतों ने आजादी की निर्णायक पटकथा लिख दी।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं) 

http://www.livehindustan.com/blog/latest-blog/story-mridula-mukherjee-article-in-hindustan-daily-newspaper-9th-of-august-1262337.html, 15 October 2017.

5 अक्टूबर 2017

क्या गांधीजी भगतसिंह को बचा सकते थे ?

नरेश  बारिया  स्वदेशी 

आज  के  दौर  का  युवा  ना  कभी  लायब्रेरी  में  जाकर  इतिहास  का  एक  पन्ना  पढ़ता  है , ना ही  कभी  कोई तथ्यों  को  सच्चाई  की  कसौटी  पर  खंगालता  है ।  बस  उसके  मोबाइल  में  जो  झूठ  किसी ने  पेश  किया  होता  है,  वो  उसी  झूठ  को  सच  मानकर  महाज्ञानी  बन  जाता  है ।  आज  के  ज़माने  में  सोशल  मीडिया  सबसे  बड़ा  झू्ठ  फैलाने  का  अड्डा  है ।  और  हैरत  की  बात  यह  है  की  ज़्यादातर  गांधीजी  के  विषय  पर  झू्ठ  फैलाने  उन्हें  गालियाँ  देने  का  काम  वो  लोग  करते  है  जो  अपने  आपको  सबसे  बड़े  धार्मिक  होने  का  दावा  करते  हैं  ।



जो  व्यक्ति  इंसान  तो  क्या  चींटी मारने  को  भी  महापाप  समझता  हो , उस  व्यक्ति  पर  भारत  के  कुछ  लोग  भगत सिंह  और  उनके  साथियों  को  मरवाने  का  आरोप  लगा  रहे  है  !  गांधीजी  कभी  खूनी , चोर , लुटेरे  के  भी  फांसी  के  पक्ष  में  नही  रहे , ऐसे  व्यक्ति  पर   भगतसिंह  जैसे  देशभक्त  को  नहीं  बचाने  का  आरोप  ?  बापू  पर  ऐसे  घटिया  आरोप  लगाने वाले  किस  विचारधारा  के  हैं,  वो  कहने  की  आवश्कता  नहीं।

भगत सिंह  और  उनके  साथियों  पर  एसएसपी  जे.पी  सांडर्स  की  हत्या  का  मुकदमा  चल  रहा  था ।  सांडर्स  हत्या कांड  में  भगत सिंह  के  अपने  ही  साथी  जय गोपाल  और  हंसराज  वोहरा  ने  सरकारी  गवाह  बनकर  अदालत  में  गवाही  दी  थी । ( जब  एसेम्बली  में  बम  फोड़ा  गया  था  तब  भी  भगतसिंह  के  खिलाफ  उनके  अपने  आदमी ने  ही  गवाही  दी  थी । ) सांडर्स  हत्या  में  अंग्रेजों  की  दिखावे  की  अदालत  ने  भगत सिंह , सुख देव  और  राजगुरु जी  को  २४  मार्च  १९३१  सुबह  ७  बजे  फांसी  देने  का  हुकुम  सुनाया  था।
  
'भगतसिंह  की  फांसी  रुक  सकती  थी  यदि  गांधी  चाहते  तो '-- इस  विचार  को  फैलाने वालों  को  शायद  यह  नहीं  मालूम  की  महात्मा  गांधी  ने  खुद  का  बचाव  भी  कभी  नहीं  किया , अपने  जीवनकाल  में  जब -जब  गांधीजी  को  सज़ा  सुनाई  गई , उन्होंने  हंमेशा  अंग्रेजी  हुकुमत  से  यही  कहा  कि-- ' हाँ , मैंने  ये  जुर्म  किया  है . . . अपने  देशवासियों  को  जगाया  है ।'  यही  नही , चौरी - चौरा  कांड  में  वो  २३  पुलिसकर्मी  (ज़्यादातर  भारतीय मूल  के )  मारे  गये  थे  तब  वो  हत्याकांड  की  सारी  ज़िम्मेदारी  गांधीजी ने  अपने  आप  पर  लेते  हुए कोर्ट  में  यह  मांग  की  कि  मुझे  कड़ी  से  कड़ी  सज़ा  दी  जाए । ' ( जो  व्यक्ति  हमारे  विचारों  का  नही  होता , उसका  बचाव  हम  सार्वजनिक  स्थानों  पर  तो  क्या  उनका  बचाव  हम  सोशल  मीडिया  पर  भी  नहीं  करते , मगर  फिर  भी  गांधीजी ने  भगतसिंह  का  बचाव  किया । )  क्रांतिकारीयों  में  और  गांधीजी  में  हिंसा  और  अहिंसा  के  मुद्दे  पर  मतभेद  था , मनभेद  तो  लेषमात्र  भी  न  था । 

गांधीजी  की  सोच  यह  थी  कि  क्रांतिकारी  गतिविधि  का  सामना  करने  के  लिए  अंग्रेज़  सरकार  फौजी  खर्च  बढाती  है , जो  हम  गरीबों  के  पैसों  से  वसूला  जाता  है ।  इतनी  भिन्न  सोच  होने  के  बावजूद  गांधीजी  क्रांतिकारीयों को  बचाने  आगे  आए । 

सांडर्स  हत्या  और  भगतसिंह  की  फांसी  की  परिस्थितीयाँ  कैसे  निर्माण  हुई  उस  पर  नज़र  डालते  है ।

१९२८  में  अंग्रेजों  ने  जॉन  सायमन  को  भारतीय  स्थिति  पर  रिपोर्ट  देने  और  राजनीतिक  सुधारों  की  सिफारिश  के  लिए  नियुक्त  किया,  जिसे  सायमन  कमिशन  से  जाना  जाता  है ।  सायमन  कमिशन  भारत  के  भाग्य  का  फैसला  करने वाला  था , परंतु  आश्चर्य  तो  इस  बात  का  था  कि  इस  कमिशन  में  एक  भी  भारतीय  नहीं  था । महात्मा  गांधी ने  निश्र्चय  कर  लिया  सायमन  की  इतनी  अधिक  उपेक्षा  कर  देनी  है  कि  मानो  हमने  उनके  अस्तित्व  को  ही  नकार  दिया  हो ।  गांधीजी  की  घोषणा  का  असर  ये  हुआ  कि  पूरे  भारत  में  जॉन  सायमन  को  विरोध  का  सामना  करना  पड़ा ।  जगह  जगह  काले  झंडे  दिखाए  जा  रहे  थे ।  सायमन  गो  बैक , सायमन  वापस  जाओ  के  गगन भेदी  नारे  लग  रहे  थे ।  गांधीजी  का  बहिष्कार  इतना  बुलंद  था  कि  उन्होंने  कमिशन  का  कभी  नाम  तक  अपनी  ज़ुबान  से  नहीं  लिया ।

इसमें  ये  बात  तो  निश्चित  थी  कि  ये  विरोध  पूरे  अहिंसक  तरीके  से  हो  रहा  था ।  अंग्रेजों  की  लाठियों  की  बौछार  से  पं०  नेहरुजी  लखनऊ  में  बुरी  तरह  घायल  हो  गए ।  लाहौर  में  बुज़ुर्ग  लालालाजपत  रायजी  पर  अंग्रेजों  ने  इतनी  बेरहमी  से  लाठियाँ  बरसाईं  की  लालाजी  वहीं  पर  शहीद  हो  गए ।  ये  नज़ारा  भगतसिंह  से  देखा  नहीं  गया ।  भगतसिंह ने  लालाजी  के  चरणों  को  चूमते  हुए  लाठी  बरसाने वाले  जेम्स  स्कोर्ट  को  मारने  का  निर्णय  किया । 

क्रांतिकारीयों  ने  स्कोर्ट  को  मारने  की  रणनीति  बनाई ।  स्कोर्ट  पुलिस  स्टेशन  से  कब  बाहर  आए  उस  बात  की  जानकारी  देने का  काम  जयगोपाल  को  दिया  गया ।  मगर  पुलिस  स्टेशन  से  स्कोर्ट  की  जगह  सांडर्स  बाहर  आया  और  जयगोपाल ने  सांडर्स  को  पहचानने  में  गलती  कर  दी  और  गलत  सिग्नल  दे  दिया ।  भगत सिंह  कुछ  समझे  उसके  पहले  राजगुरु ने  अपनी  पिस्तौल  से  गोली  चला  दी ।  ये  देखकर  भगत सिंह ने  भी  सांडर्स  पर  गोलियों  की  बौछार  कर दी ।  इस  तरह  गलती  से  स्कोर्ट  की  जगह  सांडर्स  मारा  गया ।

ये  गलती  क्रांतिकारीयों  को  मन  ही  मन  खाए  जा  रही  थी , क्योंकि  स्कोर्ट  को  मारकर  लालाजी  की  हत्या  का  बदला  लेने वाला  बैनर  क्रांतिकारीयों  ने  पहले  ही  बनाकर  रखा  था ।  सांडर्स  हत्याकांड  के  बाद  अंग्रेजों  को  चकमा  देकर  भगतसिंह , चन्द्रशेखर  आझाद  और  राजगुरु  लाहौर  से  कलकता  आने  में  सफल  रहे । उस  घटना  के  बाद  क्रांतिकारीयो ने  एक  साल  तक  कोई  गतिविधि  नहीं  की । अंग्रेज़  क्रांतिकारीयों  को  हत्यारा  कह  रही  थी ।  अपने  माथे  पर  लगा  हत्यारे  का  लेबल  क्रांतिकारीयों  को  बर्दाश्त नहीं  हो  रहा  था ।  वे  हत्यारे  नहीं  बल्कि  जनता  को  जागरूक  करने वाले  क्रांतिकारी  थे ।  अपनी  बात  जनता  तक  पहुंचाने के लिए  भगतसिंह ने  असेम्बली  में  बम  फैका ।

यहाँ  गौर  करने वाली  बात  यह  है  कि  जान  लेने  और  जान  देने वाले  नवयुवक  इस  बार  किसी  की  जान  नहीं  जाए  ऐसी  परवाह  कर  रहे  थे ।  भगतसिंह ने  जानबूझकर  बेअसर ( अहिंसक ) बम  बनाया , वो  भी  असेम्बली  में  रिक्त  स्थान  पर  फेंका  जहाँ  पर  कोई  मौजूद  नहीं  था ।  जबकि  लालाजी  की  मौत  का  कारण  सायमन  उसी  असेम्बली  में  मौजूद  था ।  भगतसिंह  चाहते  तो  बम  सायमन  पर  फैंककर  लालाजी  की  मौत  का  बदला  ले  सकते  थे  फिर  भी  भगतसिंह ने  इस  बार  मौका  होने  के  बावजूद   अहिंसक  तरीका  अपनाया ।

चाहे  जो  हो , भले  ही  क्रांतिकारी  गांधी  की  अहिंसा  को  उस  हद  तक  नही  पसंद  करते  थे , पर  इस  बात  से  इन्कार  नही  किया  जा  सकता  है  कि  अहिंसा  अपना  काम  धीरे धीरे  कर  रही  थी ।  जेल  में  भारतीय  कैदियों  के  साथ  हो  रहे  भेदभाव  के  खिलाफ  भगतसिंह ने  जो  रास्ता  चुना  वो  भी  संपूर्ण  तरीके  से  अहिंसक  ही  था , वो  था  गांधीजी  का  सबसे  बड़ा  हथियार  अनशन ।  जेल  में  मिल  रही  असुविधा  के  विषय  पर  भगतसिंह ने  बहुत  सौम्य  रूप  में  पत्र  लिखा  था ।

जब  अनशन  लंबा  चला  उसमें  एक  साथी  जतिन  दास  की  मौत  हो  गई  तब  कांग्रेस  की  विनती  को  मान  देकर  भगतसिंह ने  अपना  अनशन  छोड़ा  था । गांधीजी  के  करीबी  मित्रों  में  से  एक  प्राणजीवन  मेहता  भगतसिंह जी  को  जेल  में  मिलने  गए  तब  भगतसिंह जी ने  प्राणजीवन  मेहता  से  पंडित  नेहरुजी  और  सुभाषचंद्र  का  विशेष  तौर  से  धन्यवाद  माना , क्योंकि  नेताजी  और  नेहरुजी  शुरुआत  से  ही  भगतसिंह जी  के  केस  में  रूचि  ले  रहे  थे  |  नेहरुजी ने  ही  अंग्रेज़  सरकार  से  भगतसिंह  को  राजकीय  कैदी  घोषित  करने  की  मांग  की  थी  |

भगतसिंह , सुखदेव , राजगुरु  को  ७  अक्टूम्बर  १९३०  के  दिन  फांसी  की  सज़ा  सुनाई  गई  थी ।  मुकदमा  ११  फरवरी  १९३१  तक  चला , फैसले  में  कोई  बदलाव  नही  आया ।

दरअसल  १९३०  में  गांधीजी ने  नमक  सत्याग्रह  आंदोलन  किया  था ।  उस  अहिंसक  आंदोलन  की  दुनियाभर  में  चर्चा  हुयी  थी  और  उसे  अंग्रेजी  हुकुमत  की  काफी  किरकिरी  हुई ।  अंग्रेजों  ने  गुस्से  में  आकर  कांग्रेस  पार्टी  को  असंवैधानिक  पार्टी  घोषित  कर  दिया ।  कांग्रेस  के  सभी  दफ़्तरों  में  छापे  डाले  गये , गांधीजी  समेत  कई  बड़े  कांग्रेसी  नेताओं  को  जेल  में  डाला  गया ।  आजादी  की  लड़ाई  लड़ने वाली  प्रमुख  कांग्रेस  पार्टी  को  अपना  अस्तित्व  बचाना  मुश्किल  हो  गया  था ।  

गांधीजी  जब  जेल  में  थे  तब  अदालत  भगतसिंह  को  फांसी  का फैसला  सुना  चुकी  थी ।  फैसले  पर  वायसराय  की  अंतिम  मुहर  लगनी  बाकी  थी । गांधीजी  जैसे  ही  २६  जनवरी  १९३१  में  जेल  से  रिहा  हुए  उन  पर  भगतसिंह  की  फांसी  रुकवाने  का  दबाव  बन  गया । १७  फरवरी  और  ५  मार्च  १९३१  के  दौरान  गांधीजी  का  तत्कालीन  वायसराय  इरविन  के  साथ  ऐतिहासिक  करार  चल  रहा  था ।  उस  करार  को  " गांधी - इरविन  समझौता "  के  नाम  से  भी  जाना  जाता  है । उस  समझौते  के  मुताबिक  गांधीजी ने  अंग्रेजों की  कुछ  शर्तें  मानकर  भारत  के  ९०  हज़ार  से  ज़्यादा  कैदियों  को  जेल  से  छुड़वाया  था । सभी  देश प्रेमी  ये  चाहते  थे  कि  गांधीजी  अपने  प्रभाव  का  इस्तेमाल  करके  भगतसिंह , सुखदेव , राजगुरु  को  बचाए ।

समझौते  में  हिंसा  के  आरोपी  कैदियों  को  छोड़ने  के  लिए  अंग्रेज़  राज़ी  नहीं  थे ।  भगतसिंह  की  फांसी  पर  वायसराय  इरविन  की  मुहर  लगनी  अभी  बाकी  थी । वैसे  भी  गांधीजी  फांसी  की व्यवस्था  में  यकीन  नहीं  रखते  थे ।  इसलिए  गांधीजी ने  वॉइसरॉय  इरविन  को  फांसी  को  उम्र कैद  में  बदलने  हेतु  १८  फरवरी, १९  मार्च  और  २३  मार्च  के  तीन  चिट्ठियाँ  लिखी  थीं  |  गांधीजी ने  वायसराय  के  सामने  अपनी  बात  रखते  हुए  कहा  कि  यदि  आप  फांसी  के  फैसले  को  सज़ा  में  परिवर्तित  करते  हैं  तो  आप  क्रांतिपक्ष  को  बहुत  हद  तक  शांत  कर  सकते  है ।  ये  रोज़ रोज़  का  खूनखराबा  रुक  सकता  है ।  वायसराय  ने  कहा  कि  ये  मुमकिन  नही  है  क्योंकि  भगतसिंह ने  हमारे  पुलिस  ऑफिसर  की  हत्या  की  है ।

इस  पर  गांधीजी ने  कहा  कि  जान  के  बदले  जान  लेना  हमे  धर्म  नहीं  सिखाता ।  वैसे  भी  फांसी  उस  व्यक्ति  को  सुधरने  का  एक भी  मौका  नही  देती  ! भगतसिंह ने  जो  किया  वो  अपनी  मानसिक  अस्थिरता  के  कारण  किया ।  वैसे  भी  कानून  कहता  है , मानसिक  अस्थिरता  वाले  को  फांसी  की  नहीं  इलाज  की  ज़रूरत  होती है ।  गांधीजी ने  ईसाई धर्म  और  प्रभु इशु  का  वास्ता  देते  हुए  कहा  कि  यदि  बच्चों  ने  अपनी  नासमझी  में  कोई  अपराध  किया  भी  है  तो  जान  लेने  का  हक  केवल  ईश्वर  को  है ।  यही  बात  प्रभु  यीशु  भी  मानते  थे ।  वायसराय  ने  फांसी  पर  नरमी  अपनाने  का  गांधीजी  को  आश्वासन  दिया  था । समझौते  के  दौरान  ये  तय  हुआ  था  कि  जेल  से  निकलने  के  बाद  कोई  भी  क्रांतिकारी  या  सत्याग्रही  ब्रिटिश  सरकार  के  विरुद्ध  काम  नही  करेगा ।   सरकार- विरुद्ध  किसी  भी  गतिविधि  में  शामिल  नही  होगा ।


किन्तु  गांधी  को  बदनाम  करने  हेतु  " गांधी - इरविन  समझौते "  को  " लिजंट   ऑफ़  भगतसिंह "  फिल्म  में  बहुत  ही  घटिया  तरीके  से  दर्शाया  गया  ! ! !  उस  वक्त  के  मशहूर  लेखक  वीर  सावरकर ने  भी  अपने  किसी  भी  पत्रक  में  भगत सिंह  की  फांसी  रद्द  करवाने  की  बात  नहीं  लिखी . . . .  उल्टा  तत्कालीन  सरसंघसंचालक  " केशव  बलीराम  हेडगेवार जी "  ने  अपने  मुख पत्र  में  फरमान  जारी  किया  कि  गांधी  के  सत्याग्रह  से  सभी  को  अलिप्त ( दूर )  रहना ।  हेडगेवार  ने  तो  यहाँ  तक  कह  दिया  था  कि  नौजवानों  को  भगतसिंह  जैसे  छिछोरे  देशभक्त  से  दूर  ही  रहना  चाहिए ।

१९२०  में  ब्रिटिश  सरकार  की  ऐसी  ही  कुछ  शर्तें  मनवाकर   गांधीजी ने  लोक मान्य तिलक , वल्लभ भाई  के  बड़े  भाई  विठ्ठल भाई  पटेल और  वीर  सावरकर  की  कालापानी  की  सज़ा  रद्द  करवाने  की  मांग  की  थी । और  यही  अंग्रेजों  की  शर्तें  सावरकर ने  मान  ली  और  १९२१  कालापानी  तथा  १९२४  में  वे  जेल  से  रिहा  कर  दिए  गए । भगत सिंह  की  फांसी  रद्द  होने  की  सुगबुगाहट  को  फैलते  ही  सिविल सर्विस ऑफिसर  में  रोष  फैल  गया ।  तत्कालीन  पंजाब  के  गवर्नर  केडर ने   गवर्नर  पद  से  इस्तीफा  देने  की  धमकी  ब्रिटिश  सरकार  को  दे  दी  !

ब्रिटिश  सरकार  की  गणित  के  मुताबिक़  यदि  गवर्नर  केडर  अपने  पद  से  इस्तीफा  देता  है  तो  उनके  बहुत  सारे  सहयोगी  जो  म्यांमार , अफगानिस्तान , अरब  देशो  में  ब्रिटिश  सरकार  की  नौकरीयाँ  करते  हैं  वे  सामूहिक  तौर पर  इस्तीफा  दे  सकते  हैं ।  वे  सारे  ब्रिटिश  युवक  स्वदेश  लौट  सकते  है ।  नए  युवको  को  ब्रिटेन  से  नौकरी  पर  लाना  मुश्किल  हो  सकता  है ।  गांधीजी  को  इस  बात  की  भनक  लगते  ही  वे २२  मार्च  को  वायसराय  इरविन  से  मिलने  पहुँच  गए  और  इरविन  को  अपना  आश्वासन  याद  दिलाया ।  २३  मार्च  को  गांधीजी ने  वायसराय  को  चिठ्ठी  भी  लिखी  थी , चिठ्ठी  में  लिखा  था  कि  फांसी  के  फैसले  को  अनिश्चित  काल  तक  अमल  में  न  लाया  जाय । कृपया  भगत सिंह  और  उनके  साथियों  को  जीवन  का  एक  मौका  दीजिए ।  ( ये  बात  लॉर्ड इरविन  ने  अपनी  डायरी  में  लिखी  थी )

अंग्रेज़  सरकार  गांधीजी  की  हर  बात  माने  उसके  लिए  वो  बाध्य  नहीं  थी ।  वैसे  भी  अंग्रेज़  सरकार  भगतसिंह  की  फांसी  रद्द  करवाकर  गांधी  को  जनता  की  नज़र  में  हीरो  क्यों  बनाती  ?  वो  तो  आए  ही  थे  देश  में  फूट  पैदाकर  राज  करने  के  लिए  !  और  उन्होंने  यही  किया , भगतसिंह  और  उनके  साथियो  को  तय  तारीख  के  पहले ,  यानि  २४  मार्च  के  पहले  २३  मार्च  शाम  ७:३३  को  ही  फांसी  दे  दी  . . . . !

सभी  मुद्दे  पर  अपना  नफा - नुकसान  देखने वाली  अंग्रेज़  सरकार ने  भगत सिंह  की  फांसी  से  अपना  दो  प्रकार  का  फायदा  कर  लिया  !  एक  भगत सिंह  जैसे  क्रांतिकारी  की  जान  ले  ली  और  गांधी  जैसे  सत्यवादी  को  जनता  की  नज़र  में  गिराने  की  कौशिश  की  ! अंग्रेज़  की  कूटनिति  का  परिणाम  यह  आया  की  आज  भी  कुछ  लोग  भगतसिंह जी  की  फांसी  को  लेकर  के  गांधीजी  को  दोषी  मान  रहे  है . . . .  मनगढ़ंत  आरोप  लगाकर  गांधीजी  को  बदनाम  कर  रहे  है .  ( आरोप  लगाने वाले  उन  मूर्खों  को  सोचना  चाहिए  कि  गांधीजी ने  अंग्रेजों  से  कहा  था  कि  आप  भारत  छोडकर  चले  जाइये , क्या  उसी  वक्त  गांधीजी  की  बात  मानकर  अंग्रेज़  भारत  छोडकर  चले  गये  थे  ? ? ? )

किन्तु  सच  तो  यह  है  कि  भगतसिंह  स्वयं  के  लिए  किसी  भी  प्रकार  की  क्षमा  याचना  नहीं  चाहते  थे ।  उन्हें  दृढ़विश्वास  था  कि  उनकी  शहादत  देश  के  हित  में  होगी ।  भगतसिंह  जी  स्वयं  जानते  थे  कि  जिस  रास्ते  पर  वे  चल  रहे  हैं  उसका  आखिरी  अंजाम  फांसी  ही  है ।  इसीलिए  वे  किसी  से  भी  अपने  जीवन  की आस  नहीं  रखते  थे ।  भगतसिंहजी  के  पिता  किशनसिंह जी ने  फांसी  की  सजा  रद्द  करने  की  ब्रिटिश  सरकार  से  गुहार  लगाई  तो  भगत सिंह  अपने  पिता  पर  गुस्सा  हो  गए ।  उन्होंने  अपने  पिता  को  यहाँ  तक  कह  दिया  कि  आपने  मेरी  पीठ  में  छुरा  घोंपा  है । अपने  जीवन  के  अंतिम  दिनो  में  भगत सिंह ने  अपने  साथी  कैदियों  से  कहा  था  कि  मुझे  फांसी  के  फंदे  तक  जाने  से  कोई  नहीं  रोक  सकता ।

दूसरा  सच  यह  है  कि  भगतसिंह  के  हिंसा  के  मार्ग  का  समर्थन  खुद  उनके  पिता  किशनसिंह जी  भी  नहीं  करते  थे ।  किशनसिंह जी  भगतसिंह  को  समझाते  थे  कि  हमें  गांधीजी  के  अहिंसा  मार्ग  से  अंग्रेजों  से  आजादी  लेनी  चाहिए । भगतसिंह ने  अपने  पिता  से  जवाब  में  ये  कहा  कि  गांधीजी  महान  है  उसमें  कोई  दोराय  नही  लेकिन  अंग्रेज़  जैसे  ज़ालिमो  से  अहिंसा  के रास्ते  से  नहीं  लड़ा  जा  सकता । 

लालालाजपत  राय  कट्टर  हिन्दूवादी  थे ।  भगत सिंह  रूस  के  नेता  लेनिन  को  अपना  आदर्श  मानते  थे ।  भगतसिंह  ईश्वरी  शक्ति  में  विश्वास  नहीं  रखते  थे ।  वे  नास्तिक  थे ।  इस  बात  को  लेकर  भगतसिंह  के  खुद  अपने  साथियों  एवं  लालालाजपत  राय  के  बीच  स्पष्ट  मतभेद  थे ।  भगत सिंहजी ने  अपने  अंतिम  दिनों  में  "  मैं  नास्तिक  क्यों  हूँ "  नामक  निबंध  लिखा  था ।  लालाजी ने  भगतसिंह  को  रुसी  एजंट  तक  कह  दिया  था ।  लालाजी ने  कहा  कि  ये  क्रांतिकारियों  के  नाम  पर  कुछेक  बेरोज़गारों  की  टोली  है  और  अगर  इन्हें  अभी  पचास-पचास  रुपए  की  नौकरी  दे  दी  जाय  तो  ये  लोग  सारी  देशभक्ति  भूल  जाएंगे । क्रांतिकारियों  की  सोच  भी  लालाजी  के  प्रति  कुछ  ठीक  नही  थी , क्रांतिकारियों  ने  लालाजी  को  मरा  हुआ  नेता  कह  दिया  था ।  लाहौर  की  गलियो  में  पर्चे  भी  बांटे  थे ।

गांधीजी  ने  कभी  किसी  क्रांतिकारी  को  आतंकवादी  नहीं  कहा ।  गांधीजी ने  कभी  किसी  विदेशी  कानून  का  समर्थन  नहीं  किया ।  गांधीजी  का  कोई  भी  परिवार  का  सदस्य  " ईस्ट  इंडिया  कंपनी "  में  काम  नही  करता  था । जो  लोग  ईस्ट  इंडिया  कंपनी  में  काम  करते  थे ,  जिन्होंने  कभी  आज़ादी  के  आंदोलन  में  कभी  भाग  नहीं  लिया ,  जिन्होंने  देश  का  तिरंगा  झंडा  फाड़  दिया  था ।  उन  लोगो  को  भी  गांधीजी  ने  कभी  देशद्रोही  या  देश  का  गद्दार  नहीं  कहा ।

जिन  लोगो ने  गांधी  के  सत्याग्रह  में  कभी  भाग  नहीं  लिया , भारत  छोड़ो  आंदोलन  के  खिलाफ  रहे , आंदोलन  की  रणनीतियाँ  अंग्रेजो  को  बताकर  आंदोलन  को  नाकामयाब  करने  की  कोशिशें  करते  रहे ।  उन्हें  भी  गांधीजीने  कभी  देशद्रोही  या  देश  के  गद्दार  नहीं  कहा ।  और  आज  कुछ  पाखंडियों  द्वारा  इतना  बड़ा  झूठ  फैलाया  जाता  है  कि  गांधीजी  ने  क्रांतिकारियों  को  आतंकवादी  कहा  था । यदि  गांधीजीने  किसी  को  आतंकवादी  या  देशद्रोही  कहा  होता  तो  आज  के  वक्त  गांधीजी  द्वारा  लगाए  गए  उन  आरोपों  से  पिंड  छुड़ाना  मुश्किल  होता  !  न्यूज़  चैनलो  में  दिनरात  चर्चा  की  होड़  लगी  होती ।

चंद्रशेखर  आज़ाद  के  ख़ुफ़िया  ठिकाने  पर  सिपाही  लाने  वाला  ना  तो  वो  कांग्रेसी  था  ना  ही  वो  गांधीवादी  था  !  वो  चन्द्रशेखर  आज़ाद  का  अपना  आदमी  " वीरभद्र तिवारी "  था  ! भगतसिंह  के  खिलाफ  गवाही  देने  वाले  ना  तो  वो  कांग्रेसी  थे  ना  ही  वो  गांधीवादी  थे ।  वे  दोनों  भगतसिंह  के  क्रांतिकारी  जोड़ीदार " जय गोपाल  और  घोष बाबू "  थे  ! बटुकेश्वर  दत्त  के  खिलाफ  गवाही  देने वाले  शोभा सिंह  और  शादी लाल  थे  जो  कांग्रेस  के  घोर  विरोधी  थे!  बटुकेश्वर  दत्त  जब  आजीवन  कारावास  की  सज़ा  भुगत  रहे  थे  तब  गांधीजी  के  ही  प्रयासों  से  बटुकेश्वर  दत्त  की  १९३८  में  जेल  से  रिहाई  हुई  थी ।  फिर  यही  बटुकेश्वर  दत्त  १९४२  में  गांधीजी  का  अंग्रेजो  भारत   छोड़ो  आंदोलन  में  शामिल  हुए  |

शुरुआत  के  दिनों  में  चन्द्रशेखर  आज़ाद , भगतसिंह ,  राजगुरु  ये  तीनों  क्रांतिकारीयों  में  देशभक्ति  की  भावना  गांधीजी  के  प्रभाव  के  कारण  ही  आई ।  फिर  भी  उस  दुबले पतले  बूढ़े  गांधी  को  इतनी  गालियाँ  ? जो  लोग  भगतसिंह  के  कंधे  पर  बंदूक  रखकर  गांधीजी  को  गालियाँ  दे  रहे  हैं  उन  लोगो  को  भगतसिंह  के  गांधीजी  के  सम्मान  में  लिखे  हुए  लेख  पढ़  लेने  चाहिए ।

यदि  हिंसा  से  ही  आजादी  आती ,  तो  १८५७  में  ही  आजादी  मिल  गयी  होती  क्योंकि  भारतीयों  ने  अंग्रेजों  की  जान माल  का  जितना  नुकसान  १८५७  के  गदर  में  किया  था  उतना  कभी  किसी  ने  भी  नही  किया  था ।  १८५७  में  अंग्रेजो  के  मुद्दे  पर  सभी  राजे रजवाड़े  एक  हो  गए  थे ।  किन्तु  १९३१  तक आते-आते  ज़्यादातर  राजे रजवाड़े  अंग्रेजो  के  अंग  बन  चुके  थे ।

गांधीजी  की  सोच थी  कि  यदि  हिंसा  का  मार्ग  लोकप्रिय  हो  गया  तो  आने वाले  आजाद  भारत  में  भी  अपनों  से  न्याय  पाने  के  लिए  लोग  हिंसा  का  मार्ग  ही  चुनेंगे ।  अहिंसा  कागज़ी  बात  बनकर  रहे  जाएगी ।
भगतसिंह  और  सुभाषचंद्र  बोस  के  गांधीजी  से  हिंसा  और  अहिंसा  को  लेकर  मतभेद  थे ।  बाकी  वे  दोनों  ही  गांधीजी  का  सम्मान  करते  थे ।  आजकल  कुछ  लोगों  द्वारा  गांधीजी  विरुद्ध  भगतसिंह  बनाने  की  कोशिश  हो  रही  है  वैसा   खुद  भगतसिंह  भी  नहीं  करते  थे ।  फरवरी  १९३१  में  अपने  एक  लेख  में  भगतसिंह  लिखते  है  कि  गांधीजी ने  मजदूरों  को  सत्याग्रह  आंदोलन  में  भागीदार  बनाकर  मज़दूर  क्रांति  की  नई  शुरुआत  कर  दी  है ।  क्रांतिकारीयों  को  इस  अहिंसा  के  फरिश्ते  को  उनका  योग्य  स्थान  देना  चाहिए ।

दूसरी  बात  भगतसिंह ने  ये  भी  कही  थी  कि  हिंसा  अंतिम  क्षण  में  इस्तमाल  करने  की  चीज़  है  वर्ना  अहिंसा  के  मार्ग  से  ही  क्रांति  लाई  जानी  चाहिए । तो  ये  थी  शहीदे  आज़म  भगतसिंह  की  वाणी ।  यदि गांधीजी  के  मन  में  भगत  सिंह  को  लेकर  कोई  खोट  होती  तो  फांसी  के  तीन  दिन  बाद  कांग्रेस  अधिवेशन  में  भगतसिंहजी  के  पिता  सरदार  किशनसिंहजी  और  सुखदेवजी  के  भाई  मथुरादासजी  गांधीजी  से  मिलने  क्यों  आते  ?

फांसी  के  बाद  भगतसिंहजी ने  तो  गांधीजी  के  लिए  कोई  संदेश  नही छोड़ा  मगर  सुखदेवजी ने  गांधीजी  के  नाम  ज़रुर  एक  चिठ्ठी  लिखी  थी । उस  चिठ्ठी  की  शुरुआत  करते  हुए  सुखदेवजी ने  लिखा  था  " आदर्णीय  महात्माजी " । सुखदेवजी  की  चिठ्ठी  गांधीजी  के  प्रति  थोड़ी  नाराज़गी  भरी  थी  लेकिन  उस  चिठ्ठी  का  सार  कोई  समझ  नही  पा  रहा  था  तब  गांधीजी  अपनी  जगह  से  उठकर  चिठ्ठी  अपने  हाथ  में  लेकर  वहां  बैठे  लोगो  को  समझाते  हुए  कहते  हैं  कि  ये  बच्चा  चिठ्ठी  के  जरिए  यह  कहना  चाहता  है  कि  मैंने  उन्हे  फांसी  से  बचाने  का  उचित  प्रयास  नहीं  किया . . . .  गांधीजी  का  मनोबल  इतना  मजबूत  था  कि  उन्होने  सुखदेव जी  की  ये  चिठ्ठी  दूसरे  दिन  यंग  इंडिया  अखबार  के  पहले  पन्ने  पर  छपवाई ।

गांधीजी  वो  विभूति  थे  जो  प्यार  से  मिली  हुई  चीज़  के  साथ-  साथ  नफरत  से  मिली  भेंट  भी  विनम्रतापूर्वक  स्वीकार  कर  लेते  थे  । अधिवेशन  में  पहुँचने  के  पहले  कुछ  लोगो  ने  भगतसिंह  के  समर्थन  में  और  गांधीजी  के  ख़िलाफ़  नारे  लगाए  और  उन्हें  कपड़े  की  बनावट  के  काले  फूल  दिए  गए।  गांधीजी ने  वो  नफरत रुपी  काले  फूल  सहज भाव  से  स्वीकारते  हुए  अपने  आश्रम  भेज  दिए  ।

इस  घटना  को  ध्यान  में  रखते  हुए  पार्टी ने  गांधीजी  को  सुरक्षा  देने  का  फैसला  किया  मगर  बुराई  में  भी  अच्छाई  देखने वाले  गांधीजी ने  ये  कहते  हुए  सुरक्षा  लेने  से  इंकार  कर  दिया  कि  नौजवानों  का  विरोध  बहुत  ही  संयमित  था ।  अगर  वे  चाहते  तो  मुझ  पर  हिंसा  भी  कर  सकते  थे  कपड़े  के  काले  फूल  मेरे  मुंह  पर  फेंक  कर  मेरा  अपमान  कर  सकते  थे  लेकिन  उन  नौजवानों  ने  मेरे  साथ  ऐसी  कोई  हरकत  नहीं  की  जिससे  कि  मुझे  सुरक्षा  लेनी  पड़े ।

नेताजी  सुभाषचंद्र  बोस  ने  जब  आजाद  हिंद  फ़ौज  बनाई  तब  उस  सेना  की  पहली  टुकड़ी  का  नाम  गांधी ब्रिगेड  रखा  था ।  जब  नेताजी  से  उनके  अपने  एक  साथी ने  पूछा-- आजादी  मिलने  के  बाद  हम  क्या  करेंगे  ?  नेताजी ने  उत्तर  दिया ,  हम  गांधीजी  की  तरह  दीन - दुखियों  की  सेवा  करेंगे ।  यह  भी  ध्यान  रखिये  कि  गांधीजी  को  सबसे  पहले  राष्ट्रपिता  सुभाषचंद्र बोस  जी ने  ही  कहा  था ।  

जिन  देशभक्तों  ने  देश  के  लिए  अपनी  जान  दी , वे  भी  कभी  गांधीजी  को  कटुवचन  नहीं  बोले , मगर  जिन  लोगों  ने  देश  के  लिए  अपना  नाख़ून  तक  नही  कटवाया  वो  लोग  आज  गांधीजी  को  गालियाँ  देते  हैं।   समझ  में  नहीं  आता  कि  कौनसा  धर्म  इंसान  को  अपने  ही  बुजुर्गों  को  गालियाँ   देना  सिखाता  है  ?

जो  व्यक्ति  लोगों  को  श्री राम  जैसी  मर्यादा  सिखाता  हो;  श्री  कृष्ण  जैसा  प्रेम  करना  सिखाता  हो;  हरीशचन्द्र  जैसी  सत्यता  सिखाता  हो;  बुद्ध  और  महावीर  की  तरह  अहिंसा  का  पालन  करना  सिखाता  हो -- क्या  वो  व्यक्ति  किसी  क्रांतिकारी  को  मरवा  सकता  है ?  जो  व्यक्ति  अपने  भजनो  में  ये  गाता  फिरता  हो  कि  " पर  दुःखे  उपकार  करे  तो ,  मन  अभिमान  ना  आवे  रे "  उस  पर  अपनी  लोकप्रियता  बचाने  का  आरोप  ?

गांधीजी  वैष्णव  थे  इसलिए  कहते  थे  कि  वैष्णव  जन  उसे  कहते  हैं  जो  पराई  पीड़ा  जानता  है । किन्तु  भारत  जैसा  आध्यात्मिक  देश  गांधी  जैसे  सत्यवादी  का  सत्य  जानने  में  नाकाम  हो  रहा  है ।

(लेखक  प्रतिबद्ध  गाँधीवादी  हैं  और  राष्ट्रीय  आन्दोलन  फ्रंट  के  महत्त्वपूर्ण  सदस्य  हैं.)


9 सितंबर 2017

ऐसे 'बहादुर’, 'चरित्रवान’ और 'देशभक्त’ थे गांधी के हत्यारे

ऐसे 'बहादुर’, 'चरित्रवान’ और 'देशभक्त’ थे गांधी के हत्यारे




नाथूराम एक टपोरी किस्म का व्यक्ति था जिसे कतिपय हिंदू उग्रवादियों ने गांधी की हत्या के लिए भाडे पर रखा हुआ था। जेल में उसकी चिकित्सा रपटों से पता चलता है कि उसका मस्तिष्क अधसीसी के रोग से ग्रस्त था...

अनिल जैन, वरिष्ठ पत्रकार

महात्मा गांधी के हत्यारे गिरोह के सरगना नाथूराम गोडसे को महिमामंडित करने के जो प्रयास इन दिनों किए जा रहे हैं, वे नए नहीं हैं। गोडसे का संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बताया जाता रहा है और इसीलिए गांधीजी की हत्या के बाद देश के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था।

हालांकि संघ गोडसे से अपने संबंधों को हमेशा नकारता रहा है और अपनी इस सफाई को पुख्ता करने के लिए वह गोडसे को गांधी का हत्यारा भी मानता है और उसके कृत्य को निंदनीय करार भी देता है। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के सत्तारूढ होने के बाद ही गोडसे को महिमामंडित करने का सिलसिला तेज हो गया?

इस सिलसिले में एकाएक उसका मंदिर बनाने के प्रयास शुरू हो गए। उसकी 'जयंती’ और 'पुण्यतिथि’ मनाई जाने लगी। उसे 'चिंतक’ और यहां तक कि 'स्वतंत्रता सेनानी’ और 'शहीद’ भी बताया जाने लगा। सवाल है कि तीन साल पहले केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के साथ ही गोडसे भक्तों के इस पूरे उपक्रम के शुरू होने को क्या महज संयोग माना जाए या कि यह सबकुछ किसी सुविचारित योजना के तहत हो रहा है?

गांधी के जिस हत्यारे को इस तरह महिमामंडित किया जा रहा है, उसके बारे में यह जानना दिलचस्प है कि वह गांधी की हत्या से पहले तक क्या था? क्या वह चिंतक था, ख्याति प्राप्त राजनेता था, हिंदू महासभा का जिम्मेदार पदाधिकारी या स्वतंत्रता सेनानी था?

दरअसल नाथूराम गोडसे कभी भी इतनी ऊचाइयों के दूर-दूर तक भी नहीं पहुंच पाया था। पुणे शहर के उसके मोहल्ले सदाशिव पेठ के बाहर उसे कोई नहीं जानता था, जबकि तब वह चालीस वर्ष की आयु के समीप था। नाथूराम स्कूल से भागा हुआ छात्र था। नूतन मराठी विद्यालय में मिडिल की परीक्षा में फेल हो जाने पर उसने पढ़ाई छोड दी थी। उसका मराठी भाषा का ज्ञान कामचलाऊ था। अंग्रेजी का ज्ञान होने का तो सवाल ही नहीं उठता।

उसके पिता विनायक गोडसे डाकखाने में बाबू थे, जिनकी मासिक आय पांच रुपए थी। नाथूराम अपने पिता का लाडला था क्योंकि उसके पहले जन्मे उनके सभी पुत्र मर गए थे। इसीलिए अंधविश्वास के वशीभूत होकर मां ने नाथूराम की परवरिश बेटी की तरह की। उसे नाक में नथ पहनाई जिससे उसका नाम नाथूराम हो गया। उसकी आदतें और हरकतें भी लडकियों जैसी हो गई।

नाथूराम के बाद उसके माता-पिता को तीन और पुत्र पैदा हुए थे जिनमें एक था गोपाल, जो नाथूराम के साथ गांधी-हत्या में सह अभियुक्त था। नाथूराम की युवावस्था किसी खास घटना अथवा विचार के लिए नहीं जानी जाती। उस समय उसके हमउम्र लोग भारत में क्रांति का अलख जगा रहे थे, जेल जा रहे थे, शहीद हो रहे थे। स्वाधीनता संग्राम की इस हलचल से नाथूराम का जरा भी सरोकार नहीं था।

अपने नगर पुणे में वह रोजी-रोटी के ही जुगाड में लगा रहता था। इस सिलसिले में उसने सांगली शहर में दर्जी की दुकान खोल ली थी। उसके पहले वह बढ़ई का काम भी कर चुका था और फलों का ठेला भी लगा चुका था।

पुणे में मई 191० में जन्मे नाथूराम के जीवन की पहली खास घटना थी सितम्बर 1944 में जब हिंदू महासभा के नेता लक्ष्मण गणेश थट्टे ने सेवाग्राम में धरना दिया था। उस समय महात्मा गांधी भारत के विभाजन को रोकने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना से वार्ता करने मुंबई जाने वाले थे। चौतीस वर्षीय नाथूराम थट्टे के सहयोगी प्रदर्शनकारियों में शरीक था। उसका इरादा खंजर से बापू पर हमला करने का था, लेकिन आश्रमवासियों ने उसे पकड लिया था।

उसके जीवन की दूसरी बडी घटना थी एक वर्ष बाद यानी 1945 की, जब ब्रिटिश वायसराय ने भारत की स्वतंत्रता पर चर्चा के लिए राजनेताओं को शिमला आमंत्रित किया था। तब नाथूराम पुणे की किसी अनजान पत्रिका के संवाददाता के रूप मे वहां उपस्थित था।

गांधीजी की हत्या के बाद जब नाथूराम के पुणे स्थित आवास तथा मुंबई में उसके के घर पर छापे पडे थे तो मारक अस्त्रों का भंडार पकडा गया था जिसे उसने हैदराबाद के निजाम पर हमला करने के नाम पर बटोरा था। यह अलग बात है कि इन असलहों का उपयोग कभी नहीं किया गया। मुंबई और पुणे के व्यापारियों से अपने हिंदू राष्ट्र संगठन के नाम पर नाथूराम ने बेशुमार पैसा जुटाया था जिसका उसने कभी कोई लेखा-जोखा किसी को नहीं दिया।

उपरोक्त सभी तथ्यों का बारीकी से परीक्षण करने पर निष्कर्ष यही निकलता है कि अत्यंत कम पढा-लिखा नाथूराम एक टपोरी किस्म का व्यक्ति था जिसे कतिपय हिंदू उग्रवादियों ने गांधी की हत्या के लिए भाडे पर रखा हुआ था। जेल में उसकी चिकित्सा रपटों से पता चलता है कि उसका मस्तिष्क अधसीसी के रोग से ग्रस्त था। यह अडतीस वर्षीय बेरोजगार, अविवाहित और दिमागी बीमारी से त्रस्त नाथूराम किसी भी मायने में सामान्य मन:स्थिति वाला व्यक्ति नहीं था।

उसने गांधीजी की हत्या का पहला प्रयास 2०जनवरी, 1948 को किया था। अपने सहयोगी मदनलाल पाहवा के साथ मिलकर नई दिल्ली के बिडला भवन पर बम फेंका था, जहां गांधीजी दैनिक प्रार्थना सभा कर रहे थे। बम का निशाना चूक गया था। पाहवा पकड़ा गया था, मगर नाथूराम भागने में सफल होकर मुंबई में छिप गया था।

दस दिन बाद वह अपने अधूरे काम को पूरा करने करने के लिए फिर दिल्ली आया था। नाथूराम को उसके प्रशंसक एक धर्मनिष्ठ हिंदू के तौर पर भी प्रचारित करते रहे हैं लेकिन तीस जनवरी की ही शाम की एक घटना से साबित होता कि नाथूराम कैसा और कितना धर्मनिष्ठ था। गांधीजी पर पर तीन गोलियां दागने के पूर्व वह उनका रास्ता रोककर खडा हो गया था।

पोती मनु ने नाथूराम से एक तरफ हटने का आग्रह किया था क्योंकि गांधीजी को प्रार्थना के लिए देरी हो गई थी। धक्का-मुक्की में मनु के हाथ से पूजा वाली माला और आश्रम भजनावाली जमीन पर गिर गई थी। लेकिन नाथूराम उसे रौंदता हुआ ही आगे बढ गया था 2०वीं सदी का जघन्यतम अपराध करने।

जो लोग नाथूराम गोडसे से जरा भी सहानुभूति रखते हैं उन्हें इस निष्ठुर हत्यारे के बारे में एक और प्रमाणित तथ्य पर गौर करना चाहिए। गांधीजी को मारने के दो सप्ताह पहले नाथूराम ने काफी बडी राशि का अपने जीवन के लिए बीमा करवा लिया था ताकि उसके पकडे और मारे जाने पर उसका परिवार आर्थिक रूप से लाभान्वित हो सके।

एक कथित ऐतिहासिक मिशन को लेकर चलने वाला व्यक्ति बीमा कंपनी से हर्जाना कमाना चाहता था। अदालत में मृत्युदंड से बचने के लिए नाथूराम के वकील ने दो चश्मदीद गवाहों के बयानों में विरोधाभास का सहारा लिया था। उनमें से एक ने कहा था कि पिस्तौल से धुआं नहीं निकला था। दूसरे ने कहा था कि गोलियां दगी थी और धुआं निकला था। नाथूराम के वकील ने दलील दी थी कि धुआं नाथूराम की पिस्तौल से नहीं निकला, अत: हत्या किसी और की पिस्तौल से हो सकती है। माजरा कुछ मुंबइयां फिल्मों जैसा रचने का एक भौंडा प्रयास था। मकसद था कि नाथूराम संदेह का लाभ पाकर छूट जाए।

नाथूराम का मकसद कितना पैशाचिक रहा होगा, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि गांधीजी की हत्या के बाद पकडे जाने पर खाकी निकर पहने नाथूराम ने अपने को मुसलमान बताने की कोशिश की थी। इसके पीछे उसका मकसद देशवासियों के रोष का निशाना मुसलमानों को बनाना और उनके खिलाफ हिंसा भडकाना था।

ठीक उसी तरह जैसे इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के साथ हुआ था। पता नहीं किन कारणों से राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हत्यारे के नाम का उल्लेख नहीं किया लेकिन उनके संबोधन के तुरंत बाद गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने आकाशवाणी भवन जाकर रेडियो पर देशवासियों को बताया कि बापू का हत्यारा एक हिंदू है। ऐसा करके सरदार पटेल ने मुसलमानों को अकारण ही देशवासियों का कोपभाजन बनने से बचा लिया।

कोई भी सच्चा क्रांतिकारी या आंदोलनकारी जेल में अपने लिए सुविधाओं की मांग नहीं करता है। लेकिन नाथूराम ने गांधीजी को मारने के बाद अंबाला जेल के भीतर भी अपने लिए सुविधाओं की मांग की थी, जिसका कि वह किसी भी तरह से हकदार नहीं था। वैसे भी उसे स्नातक या पर्याप्त शिक्षित न होने के कारण पंजाब जेल नियमावली के मुताबिक साधारण कैदी की तरह ही रखा जाना था।

नाथूराम और उसके सह अभियुक्तों की देशभक्ति के पाखंड की एक और बानगी देखिए: वह आजाद भारत का बाशिंदा था और उसे भारतीय कानून के तहत ही उसके अपराध के लिए मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी। फिर भी उसने अपने मृत्युदंड के फैसले के खिलाफ लंदन की प्रिवी कांउसिल में अपील की थी। उसका अंग्रेज वकील था जान मेगा। अंग्रेज जजों ने उसकी अपील को खारिज कर दिया था। गांधीजी की हत्या का षडयंत्र रचने में नाथूराम का भाई गोपाल गोडसे भी शामिल था, जो अदालत में जिरह के दौरान खुद को गांधी-हत्या की योजना से अनजान और बेगुनाह बताता रहा।

अदालत ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। गोपाल जेल में हर साल गांधी जयंती के कार्यक्रम में बढ-चढकर शिरकत करता था। ऐसा वह प्रायश्चित के तौर पर नहीं बल्कि अपनी सजा की अवधि में छूट पाने के लिए करता था, क्योंकि जेल के नियमों के मुताबिक ऐसा करने पर सजा की अवधि में छूट मिलती है। तो इस तरह गोपाल गोडसे अपनी सजा की पूरी अवधि के पहले ही रिहाई पा गया था।

महात्मा गांधी को मुस्लिम परस्त मानने वाले इस तथाकथित हिंदू ह्दय सम्राट के पुणे में सदाशिव पेठ स्थित घर का नंबर 786 था जिसके मायने होते हैं : बिस्मिल्लाहिर रहमानिर्रहीम। सदाशिव पेठ में वह अक्सर गुर्राता था कि उसका भाई नाथूराम शहीद है। वह खुद को भी एक राष्ट्रभक्त आंदोलनकारी बताता था और बेझिझक कहा करता था कि एक अधनंगे और कमजोर बूढे की हत्या पर उसे कोई पश्चाताप अथवा अफसोस नहीं है।

नाथूराम के साथ जिस दूसरे अभियुक्त को फांसी दी गई थी वह था नारायण आप्टे। नाथूराम का सबसे घनिष्ठ दोस्त और सहधर्मी। ब्रिटिश वायुसेना में नौकरी कर चुका आप्टे पहले पहले गणित का अध्यापक था और उसने अपनी एक ईसाई छात्रा मनोरमा सालवी को कुंवारी माँ बनाने का दुष्कर्म किया था। हालांकि उसकी पत्नी और एक विकलांग पुत्र भी था। शराबप्रेमी आप्टे ने गांधी हत्या से एक दिन पूर्व यानी 29 जनवरी, 1948 की रात पुरानी दिल्ली के एक वेश्यालय में गुजारी थी और उस रात को उसने अपने जीवन की यादगार रात बताया था। यह तथ्य उससे संबंधित अदालती दस्तावेजों में दर्ज है।

गांधी हत्याकांड का चौथा अभियुक्त विष्णु रामकृष्ण करकरे हथियारों का तस्कर था। उसने अनाथालय में परवरिश पाई थी। गोडसे से उसका परिचय हिंदू महासभा के कार्यालय में हुआ था। एक अन्य अभियुक्त दिगम्बर रामचंद्र बडगे जो सरकारी गवाह बना और क्षमा पा गया, पुणे में शस्त्र भण्डार नामक दुकान चलाता था। नाटे, सांवले और भेंगी आंखों बडगे ने अपनी गवाही में विनायक दामोदर सावरकर को हत्या की साजिश का सूत्रधार बताया था लेकिन पर्याप्त सबूतों के अभाव में सावरकर बरी हो गए थे।

इन दिनों कुछ सिरफिरे और अज्ञानी लोग योजनाबद्ध तरीके से नाथूराम गोडसे को उच्चकोटि का चिंतक, देशभक्त और अदम्य नैतिक ऊर्जा से भरा व्यक्ति प्रचारित करने में जुटे हुए हैं। यह प्रचार सोशल मीडिया के माध्यम से चलाया जा रहा है। उनके इस प्रचार का आधार नाथूराम का वह दस पृष्ठीय वक्तव्य है जो बडे ही युक्तिसंगत, भावुक और ओजस्वी शब्दों में तैयार किया गया था और जिसे नाथूराम ने अदालत में पढा था। इस वक्तव्य में उसने बताया था कि उसने गांधीजी को क्यों मारा। कई तरह के झूठ से भरे इस वक्तव्य में दो बडे और हास्यास्पद झूठ थे।

एक यह कि गांधीजी गोहत्या का विरोध नहीं करते थे और दूसरा यह कि वे राष्ट्रभाषा के नहीं, अंग्रेजी के पक्षधर थे। दरअसल, यह वक्तव्य खुद गोडसे का तैयार किया हुआ नहीं था। वह कर भी नहीं सकता था, क्योंकि न तो उसे मराठी का भलीभांति ज्ञान था, न ही हिंदी का, अंग्रेजी का तो बिल्कुल भी नहीं।

अलबत्ता उस समय दिल्ली में ऐसे कई हिंदूवादी थे जिनका हिंदी और अंग्रेजी पर समान अधिकार और प्रवाहमयी शैली का अच्छा अभ्यास था। इसके अलावा वे वैचारिक तार्किकता में भी पारंगत थे। माना जा सकता है कि उनमें से ही किसी ने नाथूराम की ओर से यह वक्तव्य तैयार कर जेल में उसके पास भिजवाया होगा और जिसे नाथूराम ने अदालत में पढा होगा।

आप्टे की फांसी के दिन (15 नवम्बर 1949) अम्बाला जेल के दृश्य का आंखों देखा हाल न्यायमूर्ति जीडी खोसला ने अपने संस्मरणों में लिखा है, जिसके मुताबिक गोडसे तथा आप्टे को उनके हाथ पीछे बांधकर फांसी के तख्ते पर ले जाया जाने लगा तो गोडसे लड़खड़ा रहा था। उसका गला रूधा था और वह भयभीत और विक्षिप्त दिख रहा था। आप्टे उसके पीछे चल रहा था।

उसके भी माथे पर डर और शिकन साफ दिख रही थी। तो ऐसे 'बहादुर’, 'चरित्रवान’ और 'देशभक्त’ थे ये हिंदू राष्ट्र के स्वप्नदृष्टा, जिन्होंने एक निहत्थे बूढे, परम सनातनी हिंदू और राम के अनन्य-आजीवन भक्त का सीना गोलियों से छलनी कर दिया। ऐसे हत्यारों को प्रतिष्ठित करने के प्रयास तो शर्मनाक हैं ही, ऐसे प्रयासों पर सत्ता में बैठे लोगों की चुप्पी भी कम शर्मनाक और खतरनाक नहीं।


http://www.janjwar.com/post/nathuram-godase-and-gandhi-murderers-by-anil-jain, 10 September 2017.

14 अगस्त 2017

1942 में इसी समय गांधी की अपनों से ही हुई यह बहस बताती है कि हमें आजादी किन मूल्यों पर मिली है

उस समय राजगोपालाचारी महात्मा गांधी की खुली आलोचना कर रहे थे और गांधी जी उनका विरोध करने के साथ-साथ पंडित नेहरू से भी बहस कर रहे थे.

1942 में इसी समय गांधी की अपनों से ही हुई यह बहस बताती है कि हमें आजादी किन मूल्यों पर मिली है

09 अगस्त 2017
अपूर्वानंद


आज अगस्त क्रांति दिवस है. अगस्त, 1942 के पहले हफ्ते में तब की बंबई में हुई कांग्रेस की कार्य समिति की बैठक ने वह प्रस्ताव पारित किया था जिसे ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव के नाम से जाना गया. नौ अगस्त से इस आंदोलन की शुरुआत हो गई.

लेकिन इस प्रस्ताव तक पहुंचना और उस पर कांग्रेस में एकमत कायम करना आसान न था जैसा आम तौर पर आज समझा जाता है. इसके पीछे एक लंबी तैयारी और आपसी विचार विमर्श और बहस-मुबाहिसा का दौर था.

यह प्रस्ताव तब लिया जा रहा था जब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था. फासिस्ट जर्मनी के साथ-साथ जापान के आक्रामक विस्तार ने युद्ध को भारत की चौखट पर पहुंचा दिया था. खतरा पैदा हो गया था कि जापान भारत पर हमला कर सकता है और उस पर कब्जा भी कर सकता है. सुभाषचंद्र बोस पहले ही हिटलर और जापान के तब के प्रधानमंत्री जनरल तोजो से समझौता कर चुके थे कि भारत की आज़ादी के लिए वे इनका सहयोग लेंगे. उनके कारण भारत के लोगों में जापान के प्रति एक प्रकार की सहानुभूति थी. इसलिए यह आशंका थी कि उसकी सेना अगर भारत में घुस आए तो लोग यह सोचकर उसका स्वागत करेंगे कि वह उन्हें अंग्रेज़ी गुलामी से छुटकारा दिला देगी. दूसरी तरफ रूस पहले ही जर्मन हमले की चपेट में आ चुका था. चीन जापानी साम्राज्यवाद से लड़ रहा था.

कांग्रेस पार्टी पर इस विश्व-परिस्थिति का दबाव था. इंग्लैंड का कहना था कि वह फासिस्ट खतरे से लड़ रहा है. फ़ासीवाद मानव सभ्यता की सारी उपलब्धियों को नष्ट कर सकता है, इसे लेकर दुनिया भर में सहमति थी. वह मनुष्यता का शत्रु है, इसलिए हिटलर को किसी भी कीमत पर रोका जाना था.

अंग्रेज़ी हुकूमत ने यह ऐलान कर दिया कि भारत इस युद्ध में शामिल हो गया है. इस तरह के किसी फैसले के बारे में कहना कि वह भारत का फैसला है, हास्यास्पद था क्योंकि वह भारत के नाम पर, उस पर काबिज, इंग्लैंड का निर्णय था. अब विश्व जनमत के सामने भारत पर एक नैतिक दबाव था - क्या इस समय अपनी आज़ादी का सवाल उठाकर वह इस युद्ध में बाधा पहुंचाएगा या अभी अपनी स्वतंत्रता के प्रश्न को व्यापक मानवता के हित में स्थगित करेगा!

जापान के भारत में घुस आने का खतरा असली था, कोई वहम नहीं. इस बात पर बहस छिड़ गई थी कि अगर ऐसा हुआ तो क्या किया जाना चाहिए. राजा राजगोपालाचारी और जवाहरलाल नेहरू का कहना था कि जापान के मुकाबले के लिए हर संभव उपाय किया जाना चाहिए. छापामार युद्ध से लेकर जापानी सेना को रसद आदि न मिले, इसलिए खेतों की खड़ी फसलों और अन्न भंडार को नष्ट किया जाना तक इन उपायों में शामिल थे.

गांधी अपने मित्रों से सहमत न थे. राजगोपालाचारी और उनका मतभेद सार्वजनिक हो गया था. राजाजी गांधी की आलोचना कर रहे थे और गांधी भी उनका विरोध कर रहे थे. नेहरू से भी उनकी बहस चल रही थी. गांधी अहिंसा के अपने सिद्धांत से समझौता करने को तैयार न थे. कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व इस परिस्थिति में अहिंसा पर गांधी के जोर से सहमत नहीं हो पा रहा था.

अहिंसा के इस सिद्धांत की बुनियाद हर कार्रवाई के खुला और घोषित होने में थी. कुछ भी गोपनीय न होगा और न अचानक किया जाएगा. दक्षिण अफ्रीका से ही गांधी ने यह नीति अपनाई थी. हिंसा की किसी भी घटना का, भले ही उसमें उनके पक्ष के लोग शामिल हों गांधी ने हमेशा खुलकर विरोध किया था. चौरी चौरा कांड के कारण अपने आंदोलन को वापस ले लेना इसका सबसे बड़ा उदाहरण था.

कांग्रेस ने ‘करो या मरो’ के नारे के साथ अपना प्रस्ताव पारित किया, साथ ही ब्रिटिश सरकार से संवाद की पेशकश की. गांधी का कहना था कि इस बातचीत के बाद ही कांग्रेस के प्रस्ताव की रोशनी में कार्रवाई की घोषणा की जाएगी. लेकिन गांधी समेत कांग्रेस के तमाम नेताओं को प्रस्ताव के तुरंत बाद गिरफ्तार कर लिया गया. देश भर में उत्तेजना फैल गई.

गिरफ्तारी का पहले से अंदेशा था. इसीलिए कांग्रेस ने जनता को कहा था कि नेताओं के सामने न रह जाने की हालत में हरेक व्यक्ति खुद को जिम्मेदार समझे और कांग्रेस की स्वीकृत पद्धति के अनुसार काम करे. लेकिन जगह-जगह हिंसा भड़क उठी. रेल की पटरियां उखाड़ी गईं, सरकारी अमलों पर हमले हुए, संचार-व्यवस्था बाधित की गई.

अंग्रेज़ी हुकूमत ने इस हिंसा के लिए कांग्रेस नेतृत्व को जवाबदेह ठहराया. लेकिन गांधी ने इसे मानने से इनकार किया. उनका कहना यह था कि सरकार ही इस हिंसा के लिए जवाबदेह ठहरती है क्योंकि उसने कांग्रेस के सारे नेतृत्व को गिरफ्तार करके खुद ही हिंसक कृत्य किया और लोगों को पागलपन की हद तक उकसाया.

सरकार का आरोप था कि कांग्रेस ने भारत को असुरक्षित कर दिया था. सिविल नाफ़रमानी के आवाहन से ही साफ़ था कि कांग्रेस लोगों को उकसा रही थी. गांधी ने कहा कि गांधी-इरविन समझौते को पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि सिविल नाफ़रमानी के सिद्धांत को ब्रिटिश सरकार स्वीकार करती है और भारत के लोगों के इस रास्ते को अपनाने के हक को भी.

1942 के आंदोलन पर चर्चा उस उत्तेजना से आज तक मुक्त नहीं हो पाई है जो उस दौर में महसूस की गई होगी. लेकिन वीरता के किस्सों का बखान करने से अधिक दिलचस्प है नौ अगस्त के पहले की कांग्रेस के भीतर की तीखी और समझौताविहीन बहस. दल अपने सबसे बड़े नेता से असहमत हो रहा था और गांधी का कहना था कि अगर कांग्रेस को उनकी अहिंसा पर यकीन नहीं है तो उन्हें संतुष्ट करने के लिए उसे मानना बेईमानी होगी. वे राजाजी को भी कहते हैं कि वे उनसे सहमत होने को तैयार हैं अगर वे उनके तर्क में कमजोरी दिखा सकें.

उस दौर में जब दुनिया को फासिज़्म से बचाने को पहला कर्तव्य माना जा रहा था, तुरंत आज़ादी की मांग के गांधी जी के तर्क जानने लायक हैं. गांधी ने तब दुनिया भर में फैले अपने समर्थकों से कहा कि भारत इस युद्ध में मानवता की ओर से अपना योगदान करना चाहता है लकिन उसकी पूरी ऊर्जा अभी अवरुद्ध है. वह खुले दिल से और उत्साह से ऐसा तभी कर सकता है जब एक खुदमुख्तार मुल्क हो और इंग्लैंड और अमरीका के साथ समान धरातल पर खड़ा हो. भारत की आज़ादी सिर्फ उसके लाभ के लिए नहीं है. गुलाम लोगों से स्वतंत्रता और जनतंत्र जैसे मूल्यों की रक्षा के नाम पर, उत्साह और स्फूर्ति से, ऐसे लोगों के सहयोग की अपेक्षा करना गलत है जिन्होंने उसे गुलाम बना कर रखा है.

गांधी पर विदेशी प्रेस में तीखे हमले हुए. एक संवाददाता ने कहा कि वे रोम के नीरो की तरह हैं. उन्होंने आग लगा दी है और अब सेवाग्राम में वे तमाशा देख रहे हैं.

गांधी ने इसका जवाब दिया - अपने स्कूलों में हमारे हुक्मरान हमें गाने को कहते हैं कि ‘अंगरेज कभी गुलाम न होंगे’ इस टेक से उनके गुलाम क्योंकर उत्साहित हों? अंगरेज पानी की तरह खून बहा रहे हैं और धूल की तरह सोना लुटा रहे हैं कि उनकी आज़ादी बची रहे. क्या भारत और अफ्रीका को गुलाम रखना उनका अधिकार है? क्यों भारतवासी खुद को बंधन से आज़ाद करने के लिए ज़्यादा सक्रिय न हों? यह भाषा का दुरूपयोग है जब उस शख्स की तुलना नीरो से की जाती है जो अपनी ज़िंदा मौत से बचने के लिए खुद अपनी चिता सजाता है कि उसकी यातना खत्म हो सके?’

1942 को राजनीतिक भाषा के शानदार प्रयोग के लिए भी फिर से पढ़ा जाना चाहिए. खुद गांधी की भाषा इस समय अग्नि में पड़े कुंदन की तरह दमकने लगती है.

https://satyagrah.scroll.in/article/108811/1942-quit-india-movement-gandhi-nehru-rajgopalchari-debate

स्वाधीनता आंदोलन की दीर्घकालिक रणनीति

लोगों की संघर्ष करने की क्षमता न केवल उन पर होने वाले शोषण और उस शोषण की उनकी समझ पर निर्भर करती है बल्कि उस रणनीति पर भी निर्भर करती है जिस...