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6 जनवरी 2018

जिन क्रांतिकारियों के सहारे संघ गांधी पर निशाना साधता है, वे आरएसएस कैंप से नहीं आये थे

सौरभ बाजपेयी 29/11/2017

आरएसएस अगर आज़ादी की लड़ाई के बारे में बात करे तो वो क्या बताएगा? अगर वो सावरकर के बारे में बताएगा तो अंग्रेजों को लिखे गए सावरकर के माफ़ीनामे सामने आ जाते हैं.

mahatma gandhi dandimemorial.in
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(फोटो साभार: dandimemorial.in)

एक बार अमर्त्य सेन ने एक बड़े पते की बात कही थी, ‘जब मैं किसी एक चीज के बारे में बात कर रहा होता हूं तो उस वक्त दूसरी चीजों के बारे में बात नहीं कर रहा होता.’

यानी अगर कोई किसी गीत में गांधीजी के बारे में बात कर रहा है तो जाहिर है वो उस समय क्रांतिकारियों के बारे में बात नहीं कर रहा. संभव है वही व्यक्ति जब क्रांतिकारियों के बारे में बात कर रहा हो तो उस समय गांधी की बात न करे.

यह बात समझने में उन लोगों को दिक्कत होती है जिनके पास तर्कों की कमी है और कुतर्क ही जिनका सहारा हैं.

बात-बात में पूछने वाले कि ‘आप तब कहां थे’ या ‘आप उनके बारे में क्यों नहीं बोलते’ एक खास बौद्धिक फैक्ट्री के उत्पाद हैं. ये वो लोग हैं जो बौद्धिक विमर्श की अपनी दरिद्रता को छुपाने के लिए विमर्श को भटकाने की रणनीति अपनाते हैं.

उनकी स्थिति तब और दयनीय हो जाती है जब उनका अपना इतिहास किसी को बताने लायक नहीं होता.

आरएसएस अगर आज़ादी की लड़ाई के बारे में बात करे तो वो क्या बताएगा? अगर वो सावरकर के बारे में बताएगा तो अंग्रेजों को लिखे गए सावरकर के माफीनामे सामने आ जाते हैं.

अगर किसी को गांधी की हत्या ‘वध’ न लगती हो तो वो भी सावरकर पर लानत ही भेजेगा. भले ही अपनी जिंदगी के पहले कुछ साल तक वो वीर रहे हों, बाद के सालों में उन्होंने भीरुता और गद्दारी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए.

तो इस तरह आरएसएस की राजनीति के महानायक ‘वीर’ सावरकर भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महान क्रांतिकारियों के सामने महज अंग्रेजों के चाटुकार-भर रह जाते हैं.

फांसी की सजा का इंतजार करते हुए फख्र से जिन शहीदों का वजन बढ़ जाता हो, उनके सामने उस व्यक्ति की क्या बिसात जो महज जेल जाने से इस कदर टूट गया कि अंग्रेजों का पिट्ठू बन बैठा. हिंदू महासभा से उधार लिए इन्हीं सावरकर के अलावा आरएसएस के पास ऐसा कुछ नहीं है जिसे वो ‘अपना’ कह सकें.

कई बार लोग आपत्ति करते हैं कि आज़ादी की लड़ाई की विरासत पर सबका बराबर का अधिकार है. लेकिन क्या उनका भी उतना ही अधिकार है जो 1925 से संगठन चलाते हुए 22 साल तक लोगों को समझाते रहे कि अंग्रेज नहीं मुसलमान, कम्युनिस्ट और ईसाई उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं?

बहरहाल, अगर हरियाणा के मंत्री अनिल विज और कैलाश विजयवर्गीज सरीखे लोगों को लगता है कि कवि प्रदीप ने ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल’ लिखकर क्रांतिकारियों का अपमान किया था तो लगे हाथ हम भी पूछ सकते हैं कि जब क्रांतिकारी हंसते-हंसते फांसी के फंदे चूम रहे थे, तब आप कहां थे?

रह-रहकर क्रांतिकारियों और हिंसा के प्रति उमड़ रहे इनके प्रेम की पड़ताल बहुत जरूरी है.

भगत सिंह क्रांतिकारी परंपरा के सबसे प्रबुद्ध चिंतक हैं. वो शायद नेहरू के अलावा दूसरे ऐसे स्वाधीनता सेनानी थे जो सांप्रदायिकता को वैज्ञानिक ढंग से समझने की कोशिश कर रहे थे. भले ही आरएसएस भगत सिंह को सरदार बनाकर उन्हें अपनाने की लाख कोशिश कर ले, भगत सिंह के विचार उसके धुर विरोधी हैं.

भगत सिंह गांधीजी की भारतीय राजनीति में सकारात्मक भूमिकाओं को पहचानते हुए उनकी बौद्धिक आलोचना करते थे. लेकिन वो यह कभी सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि कोई गांधी हत्या की बात तक जुबान पर लाये.

यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि लाला लाजपतराय के साथ अपने लाख मतभेदों के बावजूद भगत सिंह और उनके साथी उनके ऊपर हुए बर्बर लाठीचार्ज का बदला लेने निकल पड़े थे.

उन्होंने ‘सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ नामक लेख में साफ लिखा है कि लोगों को आपस में बांटने वाले संकीर्ण सांप्रदायिक विचार से बचाना और उसकी जगह साझा राष्ट्रवाद की भावना को बल देना जरूरी है.

सनद रहे कि भगत सिंह ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ में धर्म और ईश्वर की सत्ता को सिरे से ही नकार दिया था. जबकि दूसरी तरफ आरएसएस चाहता है कि आज़ादी की लड़ाई से निकले साझा राष्ट्रवाद की जगह सांप्रदायिक हिंदुत्व ही भारतीय राष्ट्र का एकमात्र दर्शन बन जाए.

हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सुप्रीम कमांडर चंद्रशेखर आज़ाद को तो एक बार सावरकर ने संदेश भिजवाया था कि क्रांतिकारियों को अंग्रेजों से लड़ना बंद करके जिन्ना और मुसलमानों की हत्या करनी चाहिए.

यशपाल ने अपनी किताब ‘सिंहावलोकन’ में लिखा है कि इस पर आज़ाद ने उनके दिए पचास हजार रुपये यह कहकर ठुकरा दिए थे कि ‘यह हम लोगों को भाड़े का हत्यारा समझता है. अंग्रेजों से मिला हुआ है. हमारी लड़ाई अंग्रेजों से है… मुसलमानों को हम क्यों मारेंगे? मना कर दो… नहीं चाहिए इसका पैसा’.

आज़ाद ने अपने एक कनिष्ठ साथी, जो कि हिंदू राष्ट्र के जुमलों से थोड़ा प्रभावित हो गया था, से स्पष्ट शब्दों में कहा था-

‘हे भगत! तेरी ये हिंदू राजतंत्र की कल्पना देश को बहुत बड़े खतरे में डालने वाली है… कुछ मुसलमान भी ऐसा ही स्वप्न देखते हैं. लेकिन यह तो पुराने शाही घरानों के हिंदुओं और मुसलमानों की खब्त है. हमें तो फ्रंटियर से लेकर बर्मा तक और नेपाल से लेकर कराची तक के हर हिंदुस्तानी को साथ लेकर एक तगड़ी सरकार बनानी है.’

पृथ्वीसिंह आज़ाद क्रांतिकारी गदर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में एक थे. उनके साहस और वीरता के किस्से देश भर में मशहूर थे. हिंसा और क्रांतिकारी साधनों में पूरे यकीन के बावजूद पृथ्वीसिंह गांधीजी को पितातुल्य मानते थे. एक बार उन्हें जानकारी मिली कि दो रजाकार गांधीजी की हत्या करने के उद्देश्य से भेजे गए हैं तो वो उन्हें बचाने आ गए.

लेकिन जब गांधीजी को इस बात का पता चला तो पृथ्वीसिंह बोले कि उनके रहते कोई गांधीजी का बाल भी बांका नहीं कर सकता. लेकिन गांधीजी ने जब पलटकर सवाल किया कि उनके रहते अगर पृथ्वीसिंह को कुछ हो गया तो वो क्या जवाब देंगे. यह सवाल सुनकर पृथ्वीसिंह सहित सभी आश्रमवासी निरुत्तर हो गए.

‘मुसलमानों को फुफकारते यवन सांप’ मानने की विचारधारा के लोग तो रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्लाह खान के आपसी रिश्तों को समझ ही नहीं सकते. एक बार अशफाक बीमार पड़े तो अचेतन अवस्था में राम-राम कहकर कराहने लगे.

उनके परिवार वालों को यह समझ ही नहीं आया कि पांच समय का नमाजी राम-राम क्यों रट रहा है. बाद में पता चला कि वो रामप्रसाद बिस्मिल को पुकार रहे थे.

तो इस तरह क्रांतिकारी आंदोलन का पूरा नेतृत्व सांप्रदायिकता के खतरे को भली-भांति पहचानता था. बल्कि न सिर्फ पहचानता था, उससे लड़ने की प्रतिबद्धता भी रखता था.

भूलने नहीं देना है कि गुलाम भारत में इस सांप्रदायिक धारा की सबसे बड़ी प्रतिनिधि मुस्लिम लीग थी और दूसरी तरफ से उसका साथ देने के लिए हिंदू महासभा और आरएसएस मौजूद थे.

इस तरह ये तो साफ है कि जिन क्रांतिकारियों का सहारा लेकर आरएसएस-भाजपा से जुड़े लोग बार-बार गांधीजी पर निशाना साधते हैं, वो कोई आरएसएस के ओटीसी कैंप से निकलकर नहीं आये थे.

आरएसएस तो उस समय अपने प्रशिक्षण शिविरों में भविष्य में मुसलमानों के खिलाफ होने वाले किसी संभावित गृहयुद्ध की तैयारियों में लगी थी.

अपने विचारधारा के भीतर छिपी हिंसा को सही ठहराने के लिए वो क्रांतिकारियों की हिंसा को जायज ठहराते हैं तो इसी बहाने गांधी की अहिंसा को कायरता बताते हैं. अगर सिर्फ हिंसा की बात करें तो भी हिंसा-हिंसा में फर्क होता है. अंग्रेजी राज के दमन और शोषण से ऊबकर जिन क्रांतिकारियों ने हिंसा का सहारा लिया उनके दिल में मानवता के प्रति एक तड़प थी.

सांडर्स की हत्या के बाद लाहौर की गलियों में क्रांतिकारियों द्वारा लगाये गए पोस्टर याद करिए. उनकी हिंसा के भीतर छिपा गहन मानवतावाद साफ दिखता था.

कोई सोच सकता है कि चंद्रशेखर आज़ाद ने कई दिन प्रयास करने के बावजूद एक मंदिर में सिर्फ इसलिए डकैती नहीं डाली क्योंकि उसमें बेवजह का खून-खराबा हो सकता था. या कि बहरे कानों को सुनाने के लिए असेम्बली में बम सिर्फ उस जगह फेंका गया जहां कोई व्यक्ति मौजूद न हो.

याद रखना चाहिए कि भगत सिंह सहित सभी क्रांतिकारी अपने जीवन के बहुत शुरूआती दिनों में व्यक्तिगत हिंसक कार्यवाहियों में यकीन करते थे. लेकिन परिपक्व होने के साथ ही उन्होंने इस तरीके की सीमाएं भी समझ ली थीं जो कि ‘क्रांतिकारी कार्यक्रम के मसौदे’ से एकदम स्पष्ट हो जाता है.

ये क्रांतिकारी नौजवान पकी दाढ़ी की उम्र में एक निहत्थे अहिंसक बूढ़े की हत्या के लिए हिंसा को उकसाने वाले फिलॉसफर नहीं थे. हिंसा उनके लिए सामाजिक परिवर्तन का माध्यम हो सकता था, निर्दोषों और निहत्थों की हत्या का साधन नहीं.

यह सब छोड़ भी दें तो क्या कोई तथाकथित संघ विचारक क्रांतिकारी साहित्य से कोई एक छोटा पुर्जा भी दिखा सकता है जिसमें गांधीजी की हत्या की योजना शामिल हो?

अगर नहीं तो 1930 के दशक से ही वो कौन लोग थे जो गांधीजी की हत्या को ही राष्ट्र की सबसे बड़ी सेवा मान बैठे थे?

यह तो सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है जो भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु और सुखदेव आदि लाला लाजपतराय की हत्या का बदला लेने के लिए अपनी जान न्योछावर कर देते हैं, वो गांधीजी की हत्या होने पर क्या करते?

(लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट नामक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक हैं.)

http://thewirehindi.com/26587/sabarmati-ke-sant-mahatma-gandhi-rss-hate-speech/, 7 जनवरी २०१८. 

15 अगस्त 2017

अगर तिरंगा फहराना ही देशभक्ति है तो संघ पंद्रह साल पहले ही देशभक्त हुआ है

सौरभ बाजपेयी 
द वायर, 14/08/2017

आज़ादी के 70 साल: क्या 2002 के पहले तिरंगा भारतीय राष्ट्र का राष्ट्रध्वज नहीं था या फिर आरएसएस खुद अपनी आज की कसौटी पर कहें तो देशभक्त नहीं था?

New Delhi: File photo of RSS Chief Mohan Bhagwat (C) during the RSS function. Khaki shorts, the trademark RSS dress for 91 years, is on its way out, making way for brown trousers, the significant makeover decision was taken here at an RSS conclave in Nagaur, Rajasthan on Sunday. PTI Photo (PTI3_13_2016_000268B)
(फोटो: पीटीआई)
15 अगस्त को मदरसों पर तिरंगा फहराने संबंधी योगीजी का हालिया आदेश सिर-आंखों पर है. उन्हें पूरी तसल्ली हो जाए इसलिए तिरंगा फहराने की वीडियो रिकॉर्डिंग कराने में भी हमें कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए.

आखिर देशभक्ति मापने का जो पैमाना उन्होंने तैयार किया है उस पर खरा उतरना हमारा फर्ज है. लेकिन इस प्राथमिक सहमति के बाद क्या हमें योगीजी सहित सभी नवदेशभक्तों को प्रसिद्ध नागपुर केस नंबर 176 की याद दिलाने की इजाजत है? आखिर जब पैमाना बनाया ही गया है तो क्यों न हम सब उस पर खड़े होकर अपनी-अपनी देशभक्ति माप लें?

अगस्त 2013 को नागपुर की एक निचली अदालत ने वर्ष 2001 के एक मामले में दोषी तीन आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया था. इन तीनों आरोपियों बाबा मेंढे, रमेश कलम्बे और दिलीप चटवानी का जुर्म तथाकथित रूप से सिर्फ इतना था कि वे 26 जनवरी 2001 को नागपुर के रेशमीबाग स्थित आरएसएस मुख्यालय में घुसकर गणतंत्र दिवस पर तिरंगा झंडा फहराने के प्रयास में शामिल थे.

राष्ट्रप्रेमी युवा दल के यह तीनों सदस्य दरअसल इस बात से क्षुब्ध थे कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे अवसरों पर भी आरएसएस के दफ्तरों में कभी तिरंगा नहीं फहराया जाता.

सवाल यह है कि जिस भवन पर यह युवक तिरंगा फहराना चाहते थे वो कोई मदरसा नहीं था. वो तो आरएसएस का राष्ट्रीय मुख्यालय था जिसकी देशभक्ति पर आज कोई भी सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता. तब फिर क्या वजह थी कि संघ इस कोशिश पर इतना तिलमिला गया कि तीनों युवकों पर मुकदमा दर्ज हो गया और 12 साल तक वो लड़के संघ के निशाने पर बने रहे.

यह भी पूछना लाजमी है कि नागपुर की अदालत में यह मुकदमा दर्ज होने के बाद 2002 में आरएसएस मुख्यालय पर तिरंगा झंडा फहराने का निश्चय क्यों किया गया? क्या इसलिए कि आरएसएस यह समझ गया था कि इस मुकदमे का हवाला देकर उसकी देश के प्रति निष्ठा पर सवाल खड़े किये जायेंगे? या इसलिए कि भगवा झंडे के बजाय तिरंगे से जुड़ी जनभावनाओं का सहारा लेकर उसे अपना प्रभाव-क्षेत्र बढ़ाना आसान लगने लगा था?

क्या यह कहा जा सकता है कि अगर तिरंगा फहराना ही देशभक्ति है तो आरएसएस तो अभी जुम्मा-जुम्मा पंद्रह साल पहले ही देशभक्त हुआ है. अगर ऐसा नहीं है तो क्या 2002 के पहले तिरंगा भारतीय राष्ट्र का राष्ट्रध्वज नहीं था या फिर आरएसएस खुद अपनी आज की कसौटी पर कहें तो देशभक्त नहीं था?

जिस देश में आधुनिक संदर्भ में झंडे का इतिहास तकरीबन सौ साल पुराना हो, वहां देशभक्ति के मामले में इतनी लेट लतीफी पर यह सवाल तो बनता है.

इसके पहले ऐसा सिर्फ दो बार हुआ था. पहला 15 अगस्त 1947 को और दूसरा 1950 में तब जब सरदार पटेल ने गांधीजी की हत्या में संलिप्तता के मामले में संघ पर लगा प्रतिबंध हटाने के पहले तिरंगे को राष्ट्रध्वज मानने के लिए गोलवलकर को मजबूर किया था.

क्या किसी देशभक्त को तिरंगा फहराने के लिए या उसे अपना राष्ट्रध्वज फहराने के लिए मजबूर करना पड़ता है? जैसे आज संदेहास्पद रूप से देशद्रोही लोगों को झंडा फहराने के लिए देशभक्त सरकार मजबूर कर रही है.

अगर नहीं तो क्या वजह थी कि गोलवलकर को तिरंगे को राष्ट्रध्वज मानने के लिए सरदार पटेल को ‘मजबूर’ करना पड़ा? दरअसल यह मजबूरी ही वो गुत्थी है जिसे सुलझाने में समूचा संघ परिवार हाल-फिलहाल लगा हुआ है.

rss PM


मजबूरी यह है कि आज भी इस देश में आपको अपनी राष्ट्रभक्त सिद्ध करते हुए बताना पड़ेगा कि भारतीय स्वाधीनता संघर्ष में आपने क्या और कितना बलिदान दिया?

भले ही पिछले सात दशकों से दिन-रात गांधी-नेहरू के बहाने पूरी आज़ादी की लड़ाई को बदनाम करने में कोई कोर-कसर न छोड़ी गयी हो, अभी भी आम भारतीय की जनचेतना में यह देशभक्ति की सबसे पहली कसौटी है.

भले ही पिछले कई दशकों में सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे कद्दावर कांग्रेसी नायकों को चुराकर अपना बनाने के प्रयास किये गए हों, लोग पूछते हैं कि आपने आज़ादी की लड़ाई में कहां-कहां और कितनी बार जेल काटी?

मजबूरी यह है कि आज भी एक आम भारतीय को तिरंगा हाथ में लेकर देश के नाम पर भावुक किया जा सकता है क्योंकि तिरंगा भारत की स्वतन्त्रता और संप्रभुता का सबसे महान प्रतीक है. भारत की संविधान सभा ने 22 जुलाई 1947 को जिस तिरंगे को अंगीकार किया था वो दरअसल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के झंडे का संशोधित संस्करण था.

राष्ट्रध्वज पर प्रस्ताव को रखते हुए नेहरू जानते थे कि आरएसएस और हिंदू महासभा जैसे सांप्रदायिक दल झंडे की सांप्रदायिक व्याख्या करने का प्रयास करेंगे. इसलिए पहले की व्याख्याओं से इतर वो तिरंगे के तीनों रंगों की एक धर्मेतर व्याख्या करना चाहते थे ताकि सांप्रदायिक दल इसकी आड़ में अपना विभाजनकारी एजेंडा आगे न बढ़ा सकें.

क्योंकि तिरंगे झंडे के खिलाफ आरएसएस और हिंदू महासभा के नेता आग उगलते घूम रहे थे.

आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर ने गुरु पूर्णिमा के अवसर पर एक आम सभा को संबोधित करते हुए साफ़ कहा था कि ‘सिर्फ और सिर्फ भगवा ध्वज ही भारतीय संस्कृति को पूरी तरह प्रतिबिंबित करता है’ . ‘हमें पूरा यकीन है’, उन्होंने आगे कहा था, ‘अंततः पूरा देश भगवा ध्वज के सामने ही अपना सिर झुकाएगा.’

इसी तरह, हिंदू महासभा के नेता वीडी सावरकर ने  संविधान सभा में कहा था कि ‘भारत का प्रतीक सिर्फ भगवा-गेरू रंग ही हो सकता है.’ उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर किसी झंडे में ‘कम से कम एक पट्टी भी भगवा नहीं होगी, हिन्दू उसे अपना झंडा नहीं मानेंगे.’

सवाल उठता है कि जब केसरिया रंग झंडे में पहले से ही मौजूद था, सावरकर और गोलवलकर आदि उस रंग की अलग व्याख्या क्यों करना चाहते थे? या अगर वो अलग व्याख्या करना चाह ही रहे थे तो उसमें गलत क्या था?

सबसे बड़ी समस्या यह थी कि हिंदू महासभा और आरएसएस उसी ढर्रे पर सोच रहे थे जिस पर चलकर मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के नाम पर पाकिस्तान बना लिया था. उनकी देश की परिभाषा बेहद संकुचित थी जिसमें पाकिस्तान बन जाने जैसे ही खतरे छुपे हुए थे.

उनका भगवा भारत के अन्य सभी अल्पसंख्यकों के ऊपर हिंदुओं के प्रभुत्व का हामी था जिसमें ईसाई और मुसलमान सहित सभी गैर हिंदू दोयम दर्जे के नागरिक बन जाने थे.

बहरहाल, सावरकर के हिसाब से हिंदुस्थान (हिंदुस्तान नहीं, हिंदू और स्थान की संधि) का ‘आधिकारिक झंडा सिर्फ़ और सिर्फ़ कुण्डलिनी और कृपाण के साथ भगवा ध्वज ही हो सकता था.’ साथ ही उन्होंने साफ़ घोषित कर दिया कि ‘हिंदू किसी भी कीमत पर वफादारी के साथ अखिल हिंदू ध्वज यानी भगवा ध्वज के सिवा किसी और ध्वज को सलाम नहीं कर सकते.’

इसी तर्ज पर गोलवलकर ने चेताया था कि ‘यह (तिरंगा) कभी भी हिंदुओं के द्वारा न अपनाया जायेगा और न ही सम्मानित होगा’. उनके मुताबिक़ ‘तीन का शब्द तो अपने आप में ही अशुभ है और तीन रंगों का ध्वज निश्चय ही बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालेगा और देश के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा’.

यही वजह है कि आरएसएस कभी भी तिरंगे को भारतीय राष्ट्र का ध्वज नहीं मानता. आज़ादी के बाद भी आरएसएस और हिंदू महासभा ने खुद को विभाजन और भगवा ध्वज को राष्ट्रध्वज न मानने की वजह से उत्सवों से दूर रखा.

जब तक आरएसएस देश की राजनीति के मुख्य विमर्श से दूर रही, तिरंगे और भारतीय स्वाधीनता संघर्ष को लेकर उसकी राय का कोई बड़ा महत्त्व न रहा. लेकिन एक बार राजनीतिक परिदृश्य पर हावी होते ही उसने देश का रुख समझ न सिर्फ तिरंगा बल्कि स्वाधीनता संघर्ष को लेकर अपनी आपत्तियों को भी कालीन के नीचे सरका देने में भलाई समझी.

इसीलिए यह नवदेशभक्त हर जगह तिरंगे को उसके विचार, भावना और प्रतीकात्मक महत्त्व से ज्यादा उसकी लंबाई-चौड़ाई और ऊंचाई पर ध्यान देते हैं. वो लोगों को इतनी बार तिरंगा दिखा देना चाहते हैं कि लोगों को यकीन हो जाए कि वो ही इस देश में इकलौते देशभक्त हैं. यह उनके भीतर का भय और आत्मविश्वासहीनता है जो उन्हें हद से ज्यादा दिखावटी बनाती है.

अब चूंकि तिरंगे को लेकर खुद आरएसएस का इतिहास भी कोई साफ-सुथरा नहीं है, इसलिए उसे और उसके द्वारा नियंत्रित सरकारों को भी आत्मसुधार का प्रयास करना चाहिए.

अगर आपके पास इस बात के पुख्ता सबूत है कि कुछ मदरसे तिरंगे को अपना राष्ट्रध्वज नहीं मानते तो आपका फर्ज है कि आप उनको ऐसा करने के लिए मजबूर करें. लेकिन साथ ही यह प्रार्थना भी है कि तिरंगा फहराने और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग करने का आदेश आरएसएस के दफ्तरों को भी दिया जाए तो ही देशभक्ति की भावना के साथ पूरा न्याय होगा.

(लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट के संयोजक हैं)

http://thewirehindi.com/15834/indian-independence-and-rss/, 16 August 2017.

स्वाधीनता आंदोलन की दीर्घकालिक रणनीति

लोगों की संघर्ष करने की क्षमता न केवल उन पर होने वाले शोषण और उस शोषण की उनकी समझ पर निर्भर करती है बल्कि उस रणनीति पर भी निर्भर करती है जिस...