14 नवंबर 2016

हमारे समय के लिए नेहरु

राजमोहन गांधी 
इंडियन एक्सप्रेस, 14 नवम्बर 2016 


नेहरुजी के 17 साल के शासनकाल— 1947 से 1964—के दौरान यह लेखक 11 साल के स्कूल जाने वाले बच्चे की उम्र से 28  बरस का हो गया. यह नौजवान इतना गुस्ताख था कि 20 की उम्र में भी ‘पंडितजी’ की कुछ नीतियों में कमियाँ खोजता रहता था. उस समय लगभग हर कोई अपने अति-लोकप्रिय प्रधानमंत्री को इसी नाम से पुकारता था जिन्होंने ताउम्र भारत की आज़ादी के लिए कठोर परिश्रम किया था. 1950 के आखिरी सालों में, मैं यह समझने में अनभिज्ञ था कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का नेहरु जैसा प्रेमी सोवियत राज्य के दमन को कैसे नज़रंदाज़ कर सकता था. इसी तरह नेहरु जिस समाजवाद की हिमायत करते थे वह मुझे भी अपील करता था लेकिन राजाजी द्वारा नेहरु के नेतृत्व में लाये गए लाइसेंस-परमिट-कोटा राज की आलोचना भी मुझे आकर्षित करती थी.

हालांकि, एक स्वाभाविक प्रशंसा इन आलोचनाओं को बौना साबित कर देती थी और जब मैंने नेहरु से पहली बार गंभीर बातचीत की तो वह मेरे ह्रदय को छू गयी. यह मुलाक़ात 1963 की गर्मियों के अंत में उस जगह हुयी जो कुछ लोगों के लिए 1947 के ब्रिटिश राज की याद थी जहां ब्रिटिश कमांडर इन चीफ रहा करता था और जिसे आम तौर पर तीन मूर्ति भवन के नाम से जाना जाता है. इस मुलाक़ात के पहले भी मैंने पंडितजी को देखा था. लेकिन, अगर आधुनिक शब्दावली में कहें तो, मैं उनसे एक-पर-एक कभी नहीं मिला था.

अब मैं बताता हूँ कि मुझे उनसे क्यों मिलना था. हम कुछ लोग नवम्बर 1963 में अंतर्राष्ट्रीय नैतिक पुनरस्त्रीकरण (मोरल रिआर्मामेंट या एमआरए) नाम से एक आयोजन कराना चाहते थे. इसके लिए हम लोग आधे दिन के लिए विज्ञान भवन बुक करना चाहते थे लेकिन किसी भी सरकारी दफ्तर में कोई भी हमें इसका तरीका बताने में दिलचस्पी नहीं रखता था. अंततः हमें यह पता चला कि सिर्फ प्रधानमन्त्री ही तय कर सकते हैं कि यह जगह किसी गैर-सरकारी व्यक्ति द्वारा किराए पर ली जा सकती है या नहीं. इसीलिये मैंने नेहरूजी से मिलने का समय माँगा और खुशकिस्मती से मुझे वह मिल गया.

विमला सिन्धी ने मेरा स्वागत किया जो बहुतों के द्वारा एक हंसमुख स्वभाव की महिला के तौर पर याद की जाती हैं. मैंने उस जगह की ओर प्रस्थान किया जहां पंडितजी मौजूद थे. वो ग्राउंड फ्लोर के एक कमरे में सोफे पर बैठे हुए थे. मुझे उनके सामने बैठने की जगह दी गयी. नेहरु न सिर्फ अपने 74वे जन्मदिन के करीब थे बल्कि अस्वस्थ भी थे. एक साल पहले चीन के साथ हुए युद्ध ने उन पर बुरा प्रभाव डाला था.

“कहिये”, उन्होंने मुझ 28 बरस के युवा से कहा.

मैंने उन्हें जहमत देने की वजह बतायी. उन्होंने थोडा अचरज जताया कि यह भी भारत के प्रधानमन्त्री को ही तय करना था कि विज्ञान भवन ऑडिटोरियम किसी गैर-सरकारी व्यक्ति द्वारा भी बुक कराया जा सकता है या नहीं. यह पूछते हुए उन्होनें मुझे आयोजन की तारीख पूछी, उसे नोट किया और ओके कहकर बताया कि मुझे अब किससे मिलना होगा. यह मुलाक़ात महज़ कुछ मिनट चली होगी लेकिन मैं इससे रोमांचित था. उनकी सेहत को देखकर मैं चिंतित  हुआ और हालांकि मुझे उनकी सहायतापूर्ण प्रतिक्रिया की कम ही उम्मीद थी क्योंकि नेहरु को एमआरए को लेकर कुछ आपत्तियां थीं. इसके बावूद मैंने पाया कि वह चाहते थे कि यह आयोजन राजधानी के संभवतः सबसे अच्छे स्थान पर हो.

जब यह आयोजन हुआ, कई लोग इसमें उपस्थित रहे (राजाजी भी इनमें शामिल थे जो कि उस वक्त नेहरु के तीखे आलोचक थे). यही नहीं पंडितजी ने मेरी एक और प्रार्थना स्वीकार कर ली. यह प्रार्थना ब्रिटिश लेखक पीटर होवर्ड को मुलाक़ात का समय देने के बारे में थी.  जब होवर्ड के साथ मैं नेहरु से मिलने उनके साउथ ब्लोक ऑफिस गया, नेहरु दुर्बल दिख रहे थे. हमसे बात करते हुए उन्हें दवा की कुछ गोलियां निगलनी पडीं लेकिन होवर्ड जो भी कह रहे थे उसमें और उन युवा भारतीयों के फोटोग्राफ्स में उन्होनें काफी दिलचस्पी दिखाई जो एक “स्वच्छ, शक्तिशाली और एकजुट भारत” के अभियान में रूचि रखते थे.

छह महीने बाद, 27 मई 1964 को मैं कई युवा भारतीयों के साथ निलगिरी पर एक कैंप में था जब हमें नेहरु की मृत्यु के बारे में खबर मिली.  मेरी तो घिग्घी बांध गयी और हर कोई इस खबर से शोकसंतप्त था.

लगभग 52 साल बाद, मेरे जैसे लोग उस आश्चर्यचकित करने वाले व्यक्तित्व— जो लाखों का चहेता था और लोग जिस पर गर्व करते थे— के बारे में फैलाई जा रही झूठी कहानियों से व्यथित हैं जो भले ही इंसान ही था और उसमें भी कमियाँ थीं. अहम बात है भारतीय मेधा के बारे में नेहरु की निरंतर चिंताओं को नज़रंदाज़ कर दिया जाता है. वो चाहते थे कि दिमाग नए विचारों का संधान करने वाले, तार्किक और स्वतंत्र हों. जब भी कोई हिंसक ताकत देश-दुनिया में कहीं भी उभरती थी, नेहरु उसको गलत ठहराने के लिए खड़े हो जाते थे. जेलों में बिताये उनके 14 वर्ष, उनके अथक परिश्रम के 55 वर्ष, उपलब्धियों से भरे उनके 17 वर्ष से ज्यादा यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए यह उनका प्रेम था जिसे आज के भारत को सबसे ज्यादा याद करना चाहिये. और शब्दों के साथ उनके सुरुचि को भी. बहुत किताबें नहीं होंगी जिन्होंने भारत की कुछ पीढ़ियों को इस तरह प्रोत्साहित किया हो जिस तरह नेहरु की आत्मकथा और भारत एक खोज ने किया है. कुछ ही भाषण होंगे जो “नियति के साथ समझौता”  या “हमारे बीच से रौशनी चली गयी है” की तरह प्रभावित करते हैं. दोनों ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए उनके जूनून से जुडी हुई बातें हैं.

दुनिया जानती है कि एक राज्य आततायी हो सकता है या कि समाज के कुछ तत्व भी. एक सरकार भय पैदा करने वाले गैर-सरकारी लोगों को तब तक आगे बढ़ने दे सकती है हब तक राज्य द्वारा सीधे दमन का समय नहीं आ जाता— या जब तक भय फैलाने वाले सरकार पर कब्जा नहीं कर लेते. आज हम बहादुर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की आवाज़ को चुप कराने वाली या पाकिस्तानी अभिनेताओं के साथ फिल्म बनाने वालों को बर्बाद करने की धमकी देने वाली आवाजें सुनते हैं. हतोत्साहित करने वाली बातें की जाती हैं. पुलिसवालों का महिमामंडन किया जाता है जब वो “बुरे” आतंकवादियों के खिलाफ कदम उठाते हैं लेकिन अगर वो “अच्छे” आतंकियों के खिलाफ मोर्चा सँभालते हैं तो उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है. तथाकथित रूप से मुठभेड़ में हुयी हत्याओं की मांगों का मुंह बंद कराया जा सकता है.

हम अपने पडोसी देश का प्रतिबिम्ब बनते जा रहे हैं और यह भी हो सकता है कि अखबारों, टीवी चैनलों, फिल्मों, स्कूल और विश्वविद्यालयों से उन सामग्री को हटाने की मांग की जाए जो कि उपद्रवी समूहों को नापसंद हों.
स्वतंत्रता के प्रेमियों को तैयार रहना चाहिए.

(लेखक जो कि महात्मा गांधी के पौत्र हैं, सेंटर फॉर साउथ एशियन एंड मिडिल ईस्टर्न स्टडीज, यूनिवर्सिटी ऑफ़ इल्लीनोइस में शोध प्रवक्ता हैं होने के अलावा प्रसिद्ध जीवनीकार हैं.)

10 नवंबर 2016

मौलाना आज़ाद: आज़ादी के दीवाने और साम्प्रदायिक सद्भाव के सिपाही

डा. असगर अली इंजीनियर
मौलाना अबुल कलाम आजाद एक अनूठी इस्लामिक शख्सियत थे। वे इस्लाम के अनन्य अध्येता, महान देशभक्त और सांप्रदायिक सद्भाव के अथक सिपाही थे। यह खेदजनक है कि देश  के प्रति उनकी सेवाओं को भुला दिया गया है। आज की पीढ़ी के स्कूली व कालेज विद्यार्थियों में से शायद एक प्रतिशत भी उनके या उनकी उपलब्धियों के बारे में कुछ विशेष नहीं जानते होंगे।  

इस पृष्ठभूमि में, शिमला स्थित “इंस्टीट्यूट आफ एडवांस स्टडीज“ की साधारण सभा की हालिया बैठक में संस्थान के अध्यक्ष प्रोफेसर मुंगेकर – जो कि राज्यसभा के सदस्य भी हैं – के इस सुझाव का मैंने स्वागत किया कि अंबेडकर की तरह, मौलाना आजाद पर भी कालेज शिक्षकों के लिए ‘समर स्कूल’ आयोजित किए जाने चाहिए, जिससे शिक्षकों को मौलाना के व्यक्तित्व व कृतित्व से परिचित करवाया जा सके। सच तो यह है कि मौलाना आजाद के अलावा खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे कई नेताओं पर “समर स्कूलों“ की दरकार है। मौलाना आजाद के बारे में देशवासियों को बताया जाना आवष्यक है। देश  की आजादी  के लिए उनका बलिदान किसी से कम नहीं था। 

नवंबर माह की 11 तारीख को मौलाना आजाद का जन्मदिन पड़ता है और इस साल, भारत सरकार ने मौलाना को उनके जन्मदिन पर याद किया। स्कूलों से कहा गया कि वे मौलाना का जन्मदिन – जो कि शिक्षा दिवस भी कहलाता है – मनाएं। परंतु अधिकांश  शिक्षणिक संस्थाओं में विद्यार्थियों के दीवाली की छुट्टियों के बाद अपने गृह नगरों से न लौटने के कारण यह दिन उतने अच्छे से न मनाया जा सका, जितना कि मनाया जाना था।   


मौलाना के पिता मौलाना खैरूद्दीन कलकत्ता के जाने-माने आलिम थे और उनके शिष्यों की संख्या हजारों में थी। मौलाना खैरूद्दीन ने मक्का की रहने वाली एक अरब महिला से विवाह किया था और मौलाना का जन्म मक्का में हुआ, जहाँ उनके माता-पिता उन दिनों रूके हुए थे। इस तरह, एक अर्थ में, अरबी, मौलाना की मातृभाषा थी और अरबी पर मौलाना का असाधारण अधिकार था। उनका लालन-पालन पारंपरिक इस्लामिक माहौल में हुआ और उनके पिता की इच्छा थी कि वे उनकी ही तरह आलिम बनें। अगर मौलाना ने अपने पिता की बात मान ली होती तो उनके भी हजारों शिष्य होते और वे भी अपने पिता की तरह प्रभावशाली इस्लामिक धार्मिक नेता होते। 

मौलाना, सर सैय्यद अहमद खान के प्रभाव में आ गए और सर सैय्यद के संपूर्ण लेखन को उन्होंने पूरे ध्यान से पढ़ डाला। परंतु वे स्वतंत्र सोच वाले व्यक्ति थे और जल्दी ही उनके सर सैय्यद से मतभेद हो गए।  यद्यपि वे सर सैय्यद के आधुनिक सोच व आधुनिक शिक्षा अपनाने के विचार से सहमत थे तथापि वे यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि मुसलमानों को अंग्रेज सरकार के प्रति वफादार रहना चाहिए। मौलाना की भारत की आजादी के प्रति संपूर्ण प्रतिबद्धता थी। उन्होंने बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल होने का प्रयास भी किया परंतु भूमिगत क्रांतिकारी दलों ने मुस्लिम होने के नाते उन्हें अपने साथ लेने से इंकार कर दिया। 

मौलाना के लिए, देशभक्ति एक इस्लामिक कर्तव्य था। कहा जाता है कि पैगंबर साहब ने फरमाया था कि अपने देश  से प्यार, हमारे ईमान का भाग है और देश  के प्रति प्यार का यह तकाजा था कि देश  को विदेशियों की गुलामी से मुक्त कराया जावे। अतः वे स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। मौलाना आजाद बहुत कम उम्र में काँग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गए। वे शायद काँग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष थे। 

गाँधीजी की तरह, मौलाना आजाद की भी यह मान्यता थी कि हिन्दू-मुस्लिम एकता के बगैर, भारत का स्वाधीन होना कठिन है। काँग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन में पार्टी का अध्यक्ष चुने जाने के बाद, अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा, “अगर स्वर्ग से कोई देवदूत भी उतर कर मुझसे यह कहे कि अल्लाह ने मेरे लिए भारत की स्वतंत्रता का उपहार भेजा है तब भी मैं उसे तब तक स्वीकार नहीं करूंगा जब तक हिंदुओं और मुसलमानों में एकता स्थापित नहीं हो जाती क्योकि भारत को स्वतंत्रता नहीं मिलने से केवल भारत का नुकसान होगा परंतु यदि हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित नहीं होती तो इससे संपूर्ण मानवता को क्षति पहॅुचेगी“।

ये बहुत गंभीर निहितार्थ वाले शब्द हैं। मौलाना के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता केवल एक नारा नहीं था। वे उसके प्रति गंभीर रूप से प्रतिबद्ध थे और यह प्रतिबद्धता, कुरआन की उनकी गहरी समझ पर आधारित थी। उन्होंने राँची में जेल में रहने के दौरान कुरआन की “तफसीर“ (टीका) लिखी थी। सन् 1920 के दशक  में लिखी गई इस तफसीर ने भारतीय उपमहाद्वीप के तफसीर साहित्य को समृद्ध किया। 

उन्होंने अपनी तफसीर के पहले खंड को “वहदत-ए-दीन“ (धर्मों की एकता) को समर्पित किया है। इस पुस्तक के पहले ख्ंड को उन्हें दो बार लिखना पड़ा क्योंकि उसकी मूल पांडुलिपि को ब्रिटिश पुलिस ने नष्ट कर दिया था। अंततः अपनी राजनैतिक व्यस्तताओं के चलते, वे इस पुस्तक को पूरा न कर सके। उनकी तफसीर से जाहिर होता है कि सभी धर्मों की मूल एकता में उनका दृढ विश्वास था और उन्होंने अपनी असाधारण मेधा का इस्तेमाल, इस विचार को पुष्ट करने के लिए किया। उनके लिए विभिन्न धर्मों की एकता, धार्मिक  विश्वास था न कि राजनैतिक नारा या अवसरवाद।

मौलाना महान जननायक थे। वे खिलाफत आंदोलन के पक्के समर्थक थे परंतु कमाल पाशा  के तुर्की में क्रांति के रास्ते खलीफा को अपदस्थ करने और खिलाफत की संस्था को  अनावश्यक करार दे दिए जाने के बाद, मौलाना ने खिलाफत के प्रति अपनी वफादारी को त्यागने में जरा देरी नहीं की। उन्होंने अतातुर्क के आधुनिक सुधारों का स्वागत किया और मुसलमानों को सलाह दी कि वे खिलाफत की संस्था को बचाने का प्रयास छोड़ दें क्योंकि तुर्की नेताओं ने ही उससे किनारा कर लिया था। 

काँग्रेस के सन् 1928 के अधिवेशन में, नेहरू समिति की रपट पर चर्चा के दौरान, मौलाना ने जिन्ना की इस माँग का विरोध किया कि संसद में मुसलमानों को एक-तिहाई प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उनका तर्क था कि प्रजातंत्र में किसी समुदाय को गैर-अनुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा सकता। जहां तक, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा का प्रश्न  है उसके लिए संविधान में  विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं, जैसे कि अंततः भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25-30 में किए गए। मौलाना एक दूरदृष्टा थे और सस्ती लोकप्रियता की खातिर उन्होंने कुछ नहीं किया।

उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के सन् 1937 में उत्तर प्रदेश  में चुनाव के बाद मुस्लिम लीग को, वायदे के अनुसार, केबिनेट में दो स्थान नहीं देने के निर्णय का भी विरोध किया। नेहरू का कहना था कि चूंकि चुनाव  में लीग की बुरी तरह हार हुई है इसलिए वह मंत्रिमंडल में स्थान पाने के योग्य नहीं है। मौलाना ने नेहरू को पत्र लिखकर यह सलाह दी कि वे लीग द्वारा नामांकित दोनों व्यक्तियों को मंत्री बनाएं क्योंकि ऐसा न करने के दूरगामी प्रतिकूल प्रभाव होंगे। मौलाना की चेतावनी सही साबित हुई। जिन्ना आगबबूला हो गए और यह कहने लगे कि काँगे्रस सरकार, “हिन्दू सरकार“ है जो मुसलमानों के साथ न्याय नहीं करेगी। अगर नेहरू ने मौलाना की सलाह मान ली होती तो शायद देश  का विभाजन रोका जा सकता था। वैसे नेहरू की इस निर्णय के पीछे अलग सोच थी। वे चाहते थे कि मुस्लिम लीग के नेताओं की जगह कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं को सरकार में अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए। परंतु मौलाना के विचार अलग थे। किसी भी निर्णय या घटना के दूरगामी प्रभावों को आंकने की मौलाना में अद्भुत क्षमता थी।

नेहरू और मौलाना केवल अच्छे दोस्त ही नहीं थे बल्कि वे एक-दूसरे का बहुत सम्मान भी करते थे। नेहरू ने मौलाना की विद्वता और कई भाषाओं पर उनके अधिकार की जमकर प्रशंसा की है। मौलाना आजाद सिर्फ इस्लाम ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों का भी गहरा ज्ञान रखते थे। महिला अधिकारों के बारे में उनके विचारों को पढ़कर तो ऐसा लगता है मानो हम 21वीं सदी के किसी व्यक्ति के विचार पढ़ रहे हों। यह सर्वज्ञात है कि मुस्लिम धर्मशास्त्री लैंगिक समानता का समर्थन नहीं करते और चाहते हैं कि महिलाएं घर की चहारदीवारी तक सीमित रहें। मौलाना इसके अपवाद थे। उन्होंने मिस्त्र में अरबी भाषा में प्रकाशित  एक पुस्तक “अल मीरात् अल मुस्लिमां“ अर्थात “वे मुस्लिम महिलाएं जो लैंगिक समानता की हामी हैं“ का अनुवाद किया था।  इस पुस्तक में तत्कालीन मिस्त्र में महिला अधिकारों पर चल रही राष्ट्रव्यापी बहस के प्रमुख मुद्दों को संकलित किया गया था। उन्होंने इस पुस्तक को अनुवाद के लिए इसलिए चुना क्योंकि वे लैंगिक समानता के पक्षधर थे। कुरान की आयत 2.228 के बारे में वे लिखते हैं “यह लैंगिक समानता का, 1300 साल पुराना घोषणापत्र है।

भारतीय उपमहाद्वीप के केवल दो अन्य धर्मशास्त्री लैंगिक समानता के हामी थे। वे थे मौलाना मुमताज अली खान जो सर सैय्यद अहमद खान के साथी थे और मौलाना उमर अहमद उस्मानी जिनकी हाल में करांची में मौत हुई। दोनों जाने-माने विद्वान थे और लैंगिक समानता के मुद्दे पर वे कोई समझौता करने को तैयार नहीं थे। मौलाना मुमताज अली खान ने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक  था “हकूक अल् निस्वान“ (महिलाओं के अधिकार) और मौलाना उमर अहमद उस्मानी ने आठ खंडों में “फिक्-अल्-कुरान“ (कुरान का विधिशास्त्र) लिखा है जिसमें उन्होंने अनेक तर्क देकर यह साबित किया है कि कुरान, लैंगिक समानता की पक्षधर है। 

मौलाना अबुल कलाम आजाद ने पाकिस्तान के जन्म के बहुत पहले उस घटनाक्रम की भविष्यवाणी की थी जिससे आज का पाकिस्तान गुजर रहा है। मौलाना आजाद का जितना जोर हिन्दू-मुस्लिम एकता पर था उतना ही इस बात पर भी था कि भारत को धार्मिक आधार पर विभाजित नहीं किया जाना चाहिए। जो अपने देश से प्यार करता है वह भला उसे बंटते हुए कैसे देख सकता है? उन्हें यह अच्छी तरह मालूम था कि किसी भी प्रजातंत्र को अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करनी ही पड़ती है और फिर, मुसलमान कोई छोटे-मोटे अल्पसंख्यक नहीं थे। विभाजन के पूर्व वे आबादी का 25 प्रतिशत थे और यदि विभाजन नहीं हुआ होता तो आज वे कुल जनसंख्या का लगभग 33 प्रतिशत होते। 

मौलाना ने स्वतंत्रता के पूर्व कहा था कि आज के मुसलमान यह सोचते हैं कि हिन्दू उनके  दुश्मन  हैं परंतु कल, जब पाकिस्तान बन जाएगा और हिन्दू न होंगे तब मुसलमान ही आपस में क्षेत्रीय, भाषाई और जातीय आधारों पर लड़ाई-झगड़े करेंगे। उन्होंने यह बात साफ-साफ शब्दों में मुस्लिम लीग के एक प्रतिनिधिमंडल से कही थी। आज पाकिस्तान में यही हो रहा है। पाकिस्तान में न केवल इस्लाम के अलग-अलग पंथों में विश्वास  करने वालों के बीच खूनी संघर्ष चल रहा है बल्कि वहां धार्मिक कट्टरता में भी तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। निर्दोषों का खून बहना रोजाना की बात हो गई है। सभी धर्मों का इतिहास यह बताता है कि जब भी धर्म और राजनीति का घालमेल होता है तब सत्ता पाना और उसे बचाए रखना, धर्म और धार्मिक मूल्यों से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। सत्ता साध्य बन जाती है और धर्म, साधन। मौलाना इस बात को अच्छी तरह समझते थे इसलिए वे धर्म आधारित राज्य की बजाए धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक राष्ट्र की स्थापना के पक्षधर थे। 

दुर्भाग्यवश , मौलाना की किसी ने नहीं सुनी और वे देश  को बंटने से नहीं रोक सके। शक्तिशाली निहित स्वार्थ, जिनमें शामिल थे उत्तरप्रदेश  और बिहार के बडे़ मुस्लिम जमींदार और मुस्लिम मध्यमवर्ग (जिसे यह डर था कि उसे नौकरियां नहीं मिलेंगी)। और इन लोगों की भरपूर सहायता की अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने जो भारत को एशिया  की महाशक्ति बनते देखना नहीं चाहते थे।

(लेखक मुंबई स्थित सेंटर फार स्टडी आफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म के संयोजक थे. वे एक जाने-माने इस्लामिक विद्वान होने के साथ ही कई दशकों तक साम्प्रदायिकता व संकीर्णता के खिलाफ संघर्ष करने वाले योद्धा रहे हैं।)

3 नवंबर 2016

मार्टिन लूथर किंग की भारत यात्रा

शुभनीत कौशिक

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने 1958 में अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांत के प्रति अपने लगाव और जुड़ाव की विस्तार से चर्चा करते हुए एक लेख लिखा था: “माई पिलग्रिमेज टू नॉन-वायलेंस”। जाहिर है कि सत्याग्रह और अहिंसा के अनुयायी मार्टिन लूथर किंग लंबे समय से महात्मा गांधी के देश भारत की यात्रा करना चाहते थे। 1956 में जब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अमेरिका गए तो उन्होंने किंग से मिलने की इच्छा जाहिर की और साथ ही, किंग को भारत आने का आमंत्रण भी दिया। इस आशय का एक पत्र, भारत में अमेरिका के राजदूत रहे चेस्टर बाउल्स ने भी मार्टिन लूथर किंग को लिखा। पर अपनी तमाम व्यस्तताओं और प्रतिबद्धताओं के चलते अगले तीन वर्षों तक किंग का भारत जाना संभव न हो सका। 


जनवरी 1959 में, गांधी स्मारक निधि के सदस्य जी. रामचंद्रन ने मार्टिन लूथर किंग को भारत आने का निमंत्रण दिया। जी. रामचंद्रन का यह ख़त अमेरिका में भारतीय दूतावास के अधिकारी हरीश्वर दयाल ने 12 जनवरी, 1959 को मार्टिन लूथर किंग को प्रेषित किया। रामचंद्रन ने मोंटगोमरी के आंदोलन से अपनी पूरी सहानुभूति जताई और अहिंसात्मक प्रतिरोध के रास्ते पर चलने के लिए अश्वेत समुदाय की सराहना की। रामचंद्रन ने गांधी स्मारक निधि के प्रतिनिधि के रूप में मार्टिन लूथर किंग को भारत आकर महात्मा गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के प्रयोगों के बारे में अधिक गहराई से जानने और गांधीवादी विनोबा भावे द्वारा चलाये जा रहे भूदान आंदोलन के बारे में भी जानने का न्यौता दिया।    

आखिरकार, फरवरी-मार्च 1959 में गांधी के देश को करीब से देखने-जानने का मार्टिन लूथर किंग का लंबा इंतज़ार खत्म हुआ। यह उनके लिए अपने एक सपने के हकीकत में बदलने जैसा अनुभव था। अपनी इस महीने भर लंबी यात्रा के बारे में किंग ने तुरंत एक लंबा आलेख लिखा, जिसका शीर्षक था: “माई ट्रिप टू द लैंड ऑफ गांधी”। यह आलेख ‘एबनी’ पत्रिका के जुलाई 1959 के अंक में छपा। 

इस यात्रा में मार्टिन लूथर किंग के साथ उनकी पत्नी कोरेटा स्कॉट किंग और उनके दोस्त डॉ. लारेंस रेडिक भी थे। डॉ. रेडिक ने तब तक किंग की एक जीवनी “क्रूसेडर विदाउट वायलेंस” भी लिख दी थी। किंग अपने साथियों के साथ, 3 फरवरी, 1959 को हवाई जहाज से न्यूयॉर्क से भारत के लिए रवाना हुए। रास्ते में वे पेरिस में रुके जहाँ उन्होंने रिचर्ड राइट से मुलाक़ात की और उनसे “नीग्रो प्रश्न” पर यूरोपीय राजनीतिक दलों और नेताओं की प्रतिक्रियाओं के बारे में जाना। 10 फरवरी, 1959 को किंग मुंबई (तब बंबई) पहुँचे। भारत में किंग का अभूतपूर्व स्वागत किया गया। अपनी भारत यात्रा के दौरान किंग प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन, तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों से मिले। साथ ही, वे सुचेता कृपलानी सरीखी सांसदों और विनोबा भावे आदि से भी मिले। 

किंग ने लिखा है कि हिंदुस्तान में वे जहाँ कहीं भी गए, लोगों ने उन्हें अपने भाई-बंधु के रूप में देखा। किंग के अनुसार, इस बंधुत्व का कारण था एशिया, अफ़्रीका और अमेरिका के उपनिवेशों के लोगों द्वारा नस्लवाद और साम्राज्यवाद के उन्मूलन के लिए संघर्ष की प्रबल भावना। इस एक महीने के दौरान किंग ने अनगिनत सार्वजनिक सभाओं और बैठकों में हिस्सा लिया, जहाँ वे नस्लवाद की समस्या पर और अमेरिका में अश्वेतों की स्थिति पर विस्तार से अपनी बात रखते। किंग ने लिखा है कि इन सभाओं में भारी संख्या में लोग मौजूद रहते और गंभीरता के साथ उनके विचारों को सुनते। इन सभाओं में किंग की पत्नी कोरेटा स्कॉट किंग अश्वेत समुदाय के प्रसिद्ध आध्यात्मिक गीत भी सुनाती थीं। किंग ने मोंटगोमरी के आंदोलन की ख़बरों से भारतीयों को परिचित कराने के लिए भारतीय समाचारपत्रों की सराहना की। उन्होंने भारत के चारों प्रमुख महानगरों, दिल्ली, कलकत्ता, बंबई और मद्रास की यात्राएं की, जहाँ वे आम हिंदुस्तानियों से तो मिलते ही, पत्रकारों, राजनीतिकों, विद्वानों से भी मिलते। इसके अतिरिक्त किंग अपनी यात्रा के दौरान आगरा, पटना, गया, हज़ारीबाग, बोलपुर, बर्दवान, महाबलीपुरम, मदुरै स्थित गांधी ग्राम, त्रिवेन्द्रम, बंगलोर, अहमदाबाद और किशनगढ़ आदि जगहों पर भी गए।    

इस क्रम में मार्टिन लूथर किंग ने गांधी के अनुयायियों, उनके निकट संबंधियों से भी मुलाकातें की। वे राजघाट स्थित गांधी की समाधि पर भी गए और गांधी से जुड़े आश्रमों में भी। किंग की भारत-यात्रा ने, शोषितों के स्वतन्त्रता-संघर्ष के लिए, सबसे कारगार औज़ार के रूप में अहिंसात्मक प्रतिरोध की पद्धति में उनके विश्वास को पहले से कहीं अधिक दृढ़ किया। किंग का यक़ीन था कि जहाँ एक ओर हिंसा के मार्ग की अनिवार्य परिणति घृणा, द्वेष और प्रतिशोध में ही होती है, वहीं अहिंसा प्रेम और करुणा पर आधारित समाज की बुनियाद रखती है। किंग ने इस बात पर प्रसन्नता जाहिर की कि गांधीवादियों ने मोंटगोमरी में अश्वेत समुदाय द्वारा किए गए अहिंसात्मक प्रयोग को खुले दिल से सराहा और इस प्रयोग को अहिंसात्मक प्रतिरोध के सिद्धांत के पश्चिमी समाजों में उपयोगी होने की एक संभावना के रूप में देखा। किंग ने यह विश्वास जताया कि अगर नियोजित ढंग से और सकारात्मक गतिविधियों के साथ अहिंसात्मक प्रतिरोध की तकनीक पर अमल किया जाए, तो वह निश्चित रूप से सर्वसत्तावादी ताकतों के सामने भी सफल सिद्ध होगी। 

अपनी भारत यात्रा के दौरान किंग भारत में पढ़ाई कर रहे अफ्रीकी छात्रों से भी मिले। इन छात्रों में कुछ ने किंग के सामने यह शंका जाहिर की कि अहिंसात्मक प्रतिरोध की तकनीक केवल उसी स्थिति में कारगर हो सकेगी, जब जिसके विरुद्ध प्रतिरोध किया जा रहा है, उसमें विवेक बचा हो। राइनहोल्ड नीबूर की तरह इन छात्रों का भी मानना था कि निष्क्रिय प्रतिरोध अंततः अप्रतिरोध ही है। किंग ने उन छात्रों को समझाया कि वे अहिंसात्मक प्रतिरोध की तकनीक को गलत ढंग से देख रहे हैं। किंग के अनुसार, सच्चा अहिंसात्मक प्रतिरोध कभी भी बुरी ताकत के सामने समर्पण करना नहीं है। असल में, अहिंसात्मक प्रतिरोध तो प्रेम के बल से बुरी ताकतों का एक साहसिक विरोध है। इसमें यह विश्वास निहित है कि हिंसा करने से कहीं बेहतर है हिंसा को झेलना और अहिंसात्मक प्रतिरोध करना। क्योंकि हिंसा के बदले में की गई हिंसा भी अंततः हिंसा को ही बढ़ावा देगी, जबकि अहिंसात्मक प्रतिरोध विपक्षी के हृदय-परिवर्तन की आशा और अपेक्षा के साथ की जाती है। 

अहिंसात्मक प्रतिरोध की तकनीक में प्रेम का तत्व अंतर्निहित है। पर यह प्रेम महज़ भावनात्मक प्रेम नहीं है, बल्कि यह ऐसा प्रेम है जो दृढ़ता के साथ सामूहिक गतिविधि के रूप में संगठित होता है, एक सकारात्मक बदलाव की इच्छा के साथ। किंग ने लिखा कि “मैं इस बात को समझता हूँ कि आख़िर क्यों शोषित वर्ग के लोग अपने स्वतंत्रता-संघर्ष में अक्सर हिंसा का रास्ता अख़्तियार करते हैं, पर मेरा दृढ़ विश्वास है कि अगर मानव प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता के लिए चल रहे संघर्ष में, जो अफ्रीका में अब अपने चरमोत्कर्ष पर है, गांधी के अहिंसात्मक प्रतिरोध के रास्ते को अपनाया गया तो इस संघर्ष का नतीजा पूरी दुनिया पर एक सकारात्मक प्रभाव डालेगा”। 

भारत से रवाना होने के एक दिन पूर्व, 9 मार्च, 1959 को, मार्टिन लूथर किंग ने आल इंडिया रेडियो पर एक वक्तव्य दिया। इस वक्तव्य में मार्टिन लूथर किंग ने गांधी स्मारक निधि जैसी संस्थाओं और विनोबा भावे सरीखे गांधीवादियों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि “पिछले एक महीने में हमने भारत से बहुत कुछ सीखा है। हम यह तो नहीं कह सकते कि हमने भारत के बारे में सब कुछ जान लिया है क्योंकि यह जटिल उपमहाद्वीप विविधताओं, अंतर्विरोधों, समस्याओं और उपलब्धियों से भरा हुआ है”। किंग ने दो बातें ज़ोर देकर कहीं। पहला, यह कि समय के साथ महात्मा गांधी के तरीकों में लोगों का विश्वास बढ़ रहा है और आगे भी बढ़ता ही जाएगा। दूसरा यह कि भारत को दुनिया भर में निःशस्त्रीकरण का अगुवा बनकर शांति का संदेश फैलाना चाहिए।    

मार्टिन लूथर किंग की दृष्टि में भारत की समस्याएँ   
गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और जाति-प्रथा को मार्टिन लूथर किंग ने भारत की प्रमुख समस्याओं के रूप में देखा। उन्होंने लिखा कि बंबई सरीखे शहर में पाँच लाख से अधिक लोग फुटपाथ पर सोने को अभिशप्त हैं, उनमें से अधिकांश बेरोजगार हैं, उनके पास न रहने के लिए घर है, न पहनने के लिए कपड़े और न खाने के लिए अन्न। किंग के अनुसार अमेरिका में 1930 की आर्थिक महामंदी के दौरान कहा जाता था कि एक-तिहाई जनता के पास न रहने के लिए घर है, न पहनने के लिए कपड़े और न खाने के लिए अन्न, वहीं भारत के लिए यह अनुपात कुल जनसंख्या का दो-तिहाई होगा। बेरोजगारी तब भी भारत के सामने एक बड़ी समस्या थी और आज 21वीं सदी में तो तब से कहीं और ज्यादे है। 

किंग के अनुसार हिंदुस्तान में काम करने योग्य आबादी का सत्तर फीसदी खेतिहर मजदूर था, जो वर्ष के अधिकांश महीनों में बेरोजगार रहता था। देश में फैली हुई जाति-प्रथा की कुरीति मार्टिन लूथर किंग के अनुसार एक और बड़ी समस्या थी, जिससे भारत जूझ रहा था। किंग ने जातिप्रथा की तुलना अमेरिका में व्याप्त नस्लवाद से की। किंग ने अस्पृश्यता-उन्मूलन के लिए भारतीय नेताओं और संविधान की सराहना की। जातिप्रथा के विरुद्ध गांधी के संघर्षों और अछूतोद्धार के लिए गांधी के प्रयासों को भी किंग ने सराहा और इन प्रयासों को अमेरिकी सरकारों और राजनीतिक दलों के लिए एक उदाहरण के रूप में देखा। हरिजनों को समाज में बराबरी का अधिकार दिलाने के लिए भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों को भी किंग ने सराहा। 

आज़ाद भारत के सामने उपस्थित परंपरा या आधुनिकीकरण में से किसी एक को चुनने के द्वंद्व पर भी किंग ने अपनी राय जाहिर की। किंग के अनुसार भारत में इस प्रश्न पर दो पक्ष थे, एक पक्ष का मानना था कि भारत को आधुनिकीकरण और पश्चिमीकरण की राह पर, बगैर कोई देरी किए चलना चाहिए ताकि लोगों की जीवनदशा में उल्लेखनीय सुधार हो सके। दूसरे पक्ष का विचार था कि आधुनिकीकरण से भारत में भौतिकवाद की बुराईयाँ प्रवेश कर जाएँगी, गलाकाट प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और लोग धीरे-धीरे व्यक्तिवादी होते चले जाएँगे। पर किंग के मतानुसार, नेहरू ने मध्यम मार्ग को अपनाया। मार्टिन लूथर किंग से हुई बातचीत में नेहरू ने कहा कि एक हद तक औद्योगीकरण पूर्णतः अनिवार्य है, पर वह राज्य के नियंत्रण में होगा। इसके साथ नेहरू ने दस्तकारी और ग्रामोद्योग को भी बढ़ावा देते रहने की बात कही।

मार्टिन लूथर किंग ने उस समय भारत में विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चलाये जा रहे भूदान आंदोलन के उद्देश्यों को न सिर्फ सराहा, बल्कि उसे एक संभावना के रूप में देखा। जिसमें आम सहमति और सम्मति के आधार पर एक बड़े आर्थिक-सामाजिक बदलाव की कोशिश की जा रही थी। भूदान आंदोलन के कार्यक्रम में बड़े भूस्वामियों द्वारा स्वेच्छा से अपनी जमीन का हिस्सा भूमिहीन किसानों को देने का आग्रह किया जा रहा था; छोटी जोतों के मालिक किसानों से अपनी जमीन सहकारी खेती के लिए साझे स्वामित्व में सौंपने की अपील की जा रही थी; और किसानों और ग्रामीणों से अपने वस्त्र खुद कातने-बुनने का आग्रह भी किया जा रहा था। इस तरह बेरोजगारी, वस्त्र-अभाव और खाद्यान्न संकट से जूझने का एक सकारात्मक प्रयास मार्टिन लूथर किंग के अनुसार भूदान आंदोलन द्वारा किया जा रहा था। 

किंग ने भारत सरकार की पंचवर्षीय योजनाओं की सीमाओं का भी उल्लेख किया। जो उनके अनुसार भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या और बेरोजगारी, भुखमरी और खाद्यान्न संकट सरीखी समस्याओं से सफलतापूर्वक नहीं निबट पा रही थी। भारत से अमेरिका लौटने पर, 18 मार्च, 1959 को, न्यूयॉर्क में दिये गए अपने एक प्रेस वक्तव्य में मार्टिन लूथर किंग ने अमेरिका से भारत को बगैर किसी शर्त के आर्थिक मदद और प्रौद्योगिकी सहायता देने का आग्रह किया। किंग के अनुसार ऐसी कोई भी मदद, राष्ट्रीय स्वार्थ से ऊपर उठाकर, अंतरराष्ट्रीय बंधुत्व की भावना को ध्यान में रखते हुए दी जानी चाहिए। भारत, किंग की नजरों में, दुनिया भर के लिए शांति और अहिंसा का संदेशवाहक था। उनके अनुसार, “अगर यह देश किसी गुट का हिस्सा बने बगैर अपनी चालीस करोड़ की आबादी की जीवन-दशा में सुधार लाने में सक्षम हो सका तो यह दुनिया भर में लोकतंत्र के लिए एक वरदान साबित होगा”।                           

26 अक्टूबर 2016

राष्ट्रीयता

गणेश शंकर विद्यार्थी 

[स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान कानपुर में भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों को शांत कराते हुए शहीद हुए लेखक-पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की आज (26 अक्टूबर) जयंती है. इस मौके पर ‘राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट’ उन्हें याद करते हुए 25 जून 1915 को साप्ताहिक ‘प्रताप’ में ‘राष्ट्रीयता’ शीर्षक से छपा उनका लेख ‘स्वाधीन’ के पाठकों के लिए पेश कर रहा है. इस समय देश में राष्ट्र प्रेम चर्चा में भी है, ऐसे में विद्यार्थी जी का यह लेख पढ़ा जाना चाहिए.]



देश में कहीं-कहीं राष्‍ट्रीयता के भाव को समझने में गहरी और भद्दी भूल की जा रही है। आये दिन हम इस भूल के अनेकों प्रमाण पाते हैं। यदि इस भाव के अर्थ भली-भाँति समझ लिये गये होते तो इस विषय में बहुत-सी अनर्गल और अस्‍पष्‍ट बातें सुनने में न आतीं। राष्‍ट्रीयता जातीयता नहीं है। राष्‍ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा नहीं है। राष्‍ट्रीयता सामाजिक बंधनों का घेरा नहीं है। राष्‍ट्रीयता का जन्‍म देश के स्‍वरूप से होता है। उसकी सीमाएँ देश की सीमाएँ हैं। प्राकृतिक विशेषता और भिन्‍नता देश को संसार से अलग और स्‍पष्‍ट करती है और उसके निवासियों को एक विशेष बंधन-किसी सादृश्‍य के बंधन-से बाँधती है। राष्‍ट्र पराधीनता के पालने में नहीं पलता। स्‍वाधीन देश ही राष्‍टों की भूमि है, क्‍योंकि पुच्‍छ-विहीन पशु हों तो हों, परंतु अपना शासन अपने हाथों में न रखने वाले राष्‍ट्र नहीं होते। राष्‍ट्रीयता का भाव मानव-उन्‍नति की एक सीढ़ी है। उसका उदय नितांत स्‍वाभाविक रीति से हुआ। योरप के देशों में यह सबसे पहले जन्‍मा। मनुष्‍य उसी समय तक मनुष्‍य है, जब तक उसकी दृष्टि के सामने कोई ऐसा ऊँचा आदर्श है, जिसके लिए वह अपने प्राण तक दे सके। समय की गति के साथ आदर्शों में परिवर्तन हुए। धर्म के आदर्श के लिए लोगों ने जान दी और तन कटाया। परंतु संसार के भिन्‍न-भिन्‍न धर्मों के संघर्षण, एक-एक देश में अनेक धर्मों के होने तथा धार्मिक भावों की प्रधानता से देश के व्‍यापार, कला-कौशल और सभ्‍यता की उन्नति में रुकावट पड़ने से, अंत में धीरे-धीरे धर्म का पक्षपात कम हो चला और लोगों के सामने देश-प्रेम का स्‍वाभाविक आदर्श सामने आ गया। जो प्राचीन काल में धर्म के नाम पर कटते-मरते थे, आज उनकी संतति देश के नाम पर मरती है। पुराने अच्‍छे थे या ये नये, इस पर बहस करना फिजूल ही है, पर उनमें भी जीवन था और इनमें भी जीवन है। वे भी त्‍याग करना जानते थे और ये भी और ये दोनों उन अभागों से लाख दर्जे अच्‍छे और सौभाग्‍यवान हैं जिनके सामने कोई आदर्श नहीं और जो हर बात में मौत से डरते हैं। ये पिछले आदमी अपने देश के बोझ और अपनी माता की कोख के कलंक हैं।

देश-प्रेम का भाव इंग्‍लैंड में उस समय उदय हो चुका था, जब स्‍पेन के कैथोलिक राजा फिलिप ने इंग्‍लैंड पर अजेय जहाजी बेड़े आरमेड़ा द्वारा चढ़ाई की थी, क्‍योंकि इंग्‍लैंड के कैथोलिक और प्रोटेस्‍टेंट, दोनों प्रकार के ईसाइयों ने देश के शत्रु का एक-सा स्‍वागत किया। फ्रांस की राज्‍यक्रांति ने राष्‍ट्रीयता को पूरे वैभव से खिला दिया। इस प्रकाशमान रूप को देखकर गिरे हुए देशों को आशा का मधुर संदेश मिला। 19वीं शताब्‍दी राष्‍ट्रीयता की शताब्‍दी थी। वर्तमान जर्मनी का उदय इसी शताब्‍दी में हुआ। पराधीन इटली ने स्‍वेच्‍छाचारी आस्ट्रिया के बंधनों से मुक्ति पाई। यूनान को स्‍वाधीनता मिली और बालकन के अन्‍य राष्‍ट्र भी कब्रों से सिर निकाल कर उठ पड़े। गिरे हुए पूर्व ने भी अपनी विभूति दिखाई। बाहर वाले उसे दोनों हाथों से लूट रहे थे। उसे चैतन्‍यता प्राप्‍त हुई। उसने अँगड़ाई ली और चोरों के कान खड़े हो गये। उसने संसार की गति की ओर दृष्टि फेरी। देखा, संसार को एक नया प्रकाश मिल गया है और जाना कि स्‍वार्थपरायणता के इस अंधकार को बिना उस प्रकाश के पार करना असंभव है। उसके मन में हिलोरें उठीं और अब हम उन हिलोरों के रत्‍न देख रहे हैं। जापान एक रत्‍न है - ऐसा चमकता हुआ कि राष्‍ट्रीयता उसे कहीं भी पेश कर सकती है। लहर रुकी नहीं। बढ़ी और खूब बढ़ी। अफीमची चीन को उसने जगाया और पराधीन भारत को उसने चेताया। फारस में उसने जागृति फैलाई और एशिया के जंगलों और खोहों तक में राष्‍ट्रीयता की प्रतिध्‍वनि इस समय किसी न किसी रूप में उसने पहुँचाई। यह संसार की लहर है। इसे रोका नहीं जा सकता। वे स्‍वेच्‍छाचारी अपने हाथ तोड़ लेंगे - जो उसे रोकेंगे और उन मुर्दों की खाक का भी पता नहीं लगेगा - जो इसके संदेश को नहीं सुनेंगे। भारत में हम राष्‍ट्रीयता की पुकार सुन चुके हैं। हमें भारत के उच्‍च और उज्‍ज्‍वल भविष्‍य का विश्‍वास है। हमें विश्‍वास है कि हमारी बाढ़ किसी के रोके नहीं रुक सकती। रास्‍ते में रोकने वाली चट्टानें आ सकती हैं। बिना चट्टानें पानी की किसी बाढ़ को नहीं रोक सकतीं, परंतु एक बात है, हमें जान-बूझकर मूर्ख नहीं बनना चाहिए। ऊटपटाँग रास्‍ते नहीं नापने चाहिए।

कुछ लोग 'हिंदू राष्‍ट्र' - 'हिंदू राष्‍ट्र' चिल्‍लाते हैं। हमें क्षमा किया जाय, यदि हम कहें-नहीं, हम इस बात पर जोर दें - कि वे एक बड़ी भारी भूल कर रहे हैं और उन्‍होंने अभी तक 'राष्‍ट्र' शब्‍द के अर्थ ही नहीं समझे। हम भविष्‍यवक्‍ता नहीं, पर अवस्‍था हमसे कहती है कि अब संसार में 'हिंदू राष्‍ट्र' नहीं हो सकता, क्‍योंकि राष्‍ट्र का होना उसी समय संभव है, जब देश का शासन देशवालों के हाथ में हो और यदि मान लिया जाय कि आज भारत स्‍वाधीन हो जाये, या इंग्‍लैंड उसे औपनिवेशिक स्‍वराज्‍य दे दे, तो भी हिंदू ही भारतीय राष्‍ट्र के सब कुछ न होंगे और जो ऐसा समझते हैं - हृदय से या केवल लोगों को प्रसन्‍न करने के लिए - वे भूल कर रहे हैं और देश को हानि पहुँचा रहे हैं। वे लोग भी इसी प्रकार की भूलकर रहे हैं जो टर्की या काबुल, मक्‍का या जेद्दा का स्‍वप्‍न देखते हैं, क्‍योंकि वे उनकी जन्‍मभूमि नहीं और इसमें कुछ भी कटुता न समझी जानी चाहिए, यदि हम य‍ह कहें कि उनकी कब्रें इसी देश में बनेंगी और उनके मर्सिये - यदि वे इस योग्‍य होंगे तो - इसी देश में गाये जाएँगे, परंतु हमारा प्रतिपक्षी, नहीं, राष्‍ट्रीयता का विपक्षी मुँह बिचका कर कह सकता है कि राष्‍ट्रीयता स्‍वार्थों की खान है। देख लो इस महायुद्ध को और इंकार करने का साहस करो कि संसार के राष्‍ट्र पक्‍के स्‍वार्थी नहीं है? हम इस विपक्षी का स्‍वागत करते हैं, परंतु संसार की किस वस्‍तु में बुराई और भलाई दोनों बातें नहीं हैं? लोहे से डॉक्‍टर का घाव चीरने वाला चाकू और रेल की पटरियाँ बनती हैं और इसी लोहे से हत्‍यारे का छुरा और लड़ाई की तोपें भी बनती हैं। सूर्य का प्रकाश फूलों को रंग-बिरंगा बनाता है पर वह बेचारा मुर्दा लाश का क्‍या करें, जो उसके लगते ही सड़कर बदबू देने लगती है। हम राष्‍ट्रीयता के अनुयायी हैं, पर वही हमारी सब कुछ नहीं, वह केवल हमारे देश की उन्‍नति का उपाय-भर है।

21 अक्टूबर 2016

मार्टिन लूथर किंग की विचार-यात्रा

शुभनीत कौशिक

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने सितंबर 1958 में महात्मा गांधी, अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांत के प्रति अपने लगाव और जुड़ाव की विस्तार से चर्चा करते हुए एक लेख लिखा, जिसका शीर्षक था: “माई पिलग्रिमेज टू नॉन-वायलेंस”। यह लेख फ़ेलोशिप पत्रिका के 1 सितंबर 1958 के अंक में छपा। इस लेख में मार्टिन लूथर किंग ने महात्मा गांधी के अतिरिक्त कार्ल मार्क्स, नित्शे और राईनहोल्ड नीबूर सरीखे विचारकों के चिंतन की गहराई से समीक्षा की। और विचारों की उपयोगिता की समीक्षा के इस क्रम में, अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते को सर्वाधिक योग्य रास्ता पाया।


इस लेख का आरंभ, मार्टिन लूथर किंग अटलांटा में बिताए अपने बचपन से करते हैं, जहाँ उन्होंने अपनी आँखों से अश्वेतों पर हो रहे अमानवीय व्यवहार को देखा और कु-क्लक्स-क्लैन सरीखे घोर नस्लवादी संगठन द्वारा अश्वेतों पर किए जा रहे बर्बर अत्याचारों के साक्षी बने। वे लिखते हैं कि ‘एक वक़्त ऐसा भी आया जब मैं सभी गोरों के प्रति द्वेषभाव रखने के करीब जा पहुँचा था’। अपनी युवावस्था में, उन्होंने कुछ ऐसी जगहों पर काम किया जहाँ गोरे और काले दोनों ही समुदायों के लोग काम करते थे और जहाँ किंग ने आर्थिक अन्याय को बेहद करीब से देखा और समझा। उस दौरान ही किंग को इस बात का एहसास हुआ कि गरीब गोरे भी उतने ही शोषित हैं, जितने कि काले लोग। इस तरह, जब 1944 में किंग का दाख़िला अटलांटा के मोरहाउस कॉलेज में हुआ तो वे नस्ली और आर्थिक भेद-भाव को लेकर जागरूक हो चले थे। अपने कॉलेज के दिनों में ही किंग ने पहली बार विचारक हेनरी डेविड थोरो (1817-1962) की किताब “एस्से ऑन सिविल डिसओबिडिएन्स” पढ़ी। बुरी व्यवस्था के साथ असहयोग करने का थोरो का विचार किंग को इतना भाया कि उन्होंने थोरो की यह किताब कई दफ़े पढ़ी। अहिंसात्मक प्रतिरोध के सिद्धांत से यह किंग का पहला परिचय था। 

1948 में जब किंग क्रोज़र थियोलॉजिकल सेमिनारी में दाख़िल हुए तो नस्लभेद जैसी सामाजिक बुराईयों से लड़ने और उनके उन्मूलन के लिए एक कारगर पद्धति की उनकी वैचारिक तलाश शुरू हुई। इसी दौरान, किंग ने वाल्टर रौशेन्बुश की किताब “क्रिश्चियानिटी एंड द सोशल क्राइसिस” पढ़ी, जिसने उनके चिंतन पर अमिट छाप छोड़ी। रौशेन्बुश द्वारा मानव को उसकी समग्रता में, जिसमें उसके जीवन का सामाजिक-आर्थिक पक्ष भी शामिल हो, जानने-समझने की कोशिश ने किंग को गहरे प्रभावित किया। रौशेन्बुश को पढ़ने के बाद किंग ने प्लेटो (अफलातून), अरस्तू से लेकर रूसो, हॉब्स, बेंथम, मिल और लॉक सरीखे विचारकों को पढ़ा। 

पने इस लेख में, किंग ने साम्यवाद की सीमाओं की व्याख्या की और साम्यवादी विचारधारा से अपनी असहमतियाँ भी दर्ज की। किंग मुख्यतः साम्यवादी विचारधारा की तीन प्रमुख अवधारणाओं से असहमत थे: पहला, किंग ने साम्यवादी विचारकों द्वारा की गई इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या को नकारा; दूसरा, उन्होंने साम्यवाद के ‘नैतिक मूल्यों के सापेक्ष होने’ के सिद्धांत की आलोचना की और कहा कि “सृजनात्मक साध्य होने भर से विध्वंसात्मक साधन को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि अंततः साध्य साधन में अंतर्निहित होता है”। तीसरा, किंग ने साम्यवाद की राजनीतिक सर्वसत्तावाद की धारणा की आलोचना करते हुए लिखा कि इस विचारधारा में व्यक्ति को आखिरकार राज्य के अधीन कर दिया जाता है। सिद्धांत में राज्य को कमजोर करने की बात करते हुए भी साम्यवाद राज्य को ध्येय/साध्य के रूप में देखता है और व्यक्ति उस साध्य को हासिल करने का साधन भर रह जाता है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता में अपना विश्वास जताते हुए किंग ने कहा कि “मनुष्य राज्य के लिए नहीं बने हैं, बल्कि राज्य मनुष्यों के लिए बने हैं। मानव-जाति को कभी भी राज्य के ध्येय को हासिल करने वाले साधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए वरन मानव-जाति को ख़ुद एक ध्येय/साध्य के रूप में समझा जाना चाहिए”। पर इन असहमतियों के बावजूद किंग ने स्वीकार किया कि मार्क्स को पढ़कर वे सामाजिक न्याय के जरूरी सवाल को लेकर अधिक जागरूक हुए। जहाँ अपनी युवावस्था में ही किंग समाज में दिखाई देने वाले आर्थिक भेदभाव और गरीबों और अमीरों के बीच फर्क को समझने लगे थे, वहीं मार्क्स को पढ़ते हुए उनकी यह समझ और परिपक्व हुई। किंग ने यह भी लिखा कि ऐतिहासिक रूप से, जहाँ एक ओर पूंजीवाद ने सामूहिक उद्यम की सच्चाई और महत्त्व को नहीं समझा, वहीं दूसरी ओर मार्क्सवाद ने व्यक्तिगत उद्यम की प्रासंगिकता को नहीं समझा।                       

क्रोज़र सेमिनारी के अपने दिनों में ही मार्टिन लूथर किंग ने ए.जे. मुस्टे सरीखे शांतिवादी विचारकों के व्याख्यान सुने और साथ ही, ‘द जिनियालॉजी ऑफ मॉरल्स’ और ‘द विल टू पावर’ सरीखी किताबें लिखने वाले दार्शनिक नित्शे (1844-1900) के विचारों को भी पढ़ा। इसी दौरान किंग ने 1950 में फ़िलाडेल्फिया में डॉ. मोर्दकाई जॉनसन को सुना। तब डॉ. जॉनसन भारत से होकर लौटे ही थे और यह अकारण नहीं कि उन्होंने फ़िलाडेल्फिया फ़ेलोशिप हाउस में दिये अपने भाषण में महात्मा गांधी के जीवन और दर्शन की चर्चा की। डॉ. जॉनसन के वक्तव्य से किंग इतने प्रभावित हुए कि व्याख्यान से छूटते ही उन्होंने गांधी पर लिखी गई कई किताबें खरीद लीं और उन्हें पढ़ना शुरू किया। किंग ने लिखा है कि वे गांधी के अहिंसात्मक प्रतिरोध के सिद्धांत से बहुत प्रभावित हुए; ख़ासकर नमक सत्याग्रह और गांधी द्वारा किए गए अनेक उपवासों से। ‘सत्याग्रह’ के सिद्धांत की चर्चा करते हुए मार्टिन लूथर किंग ने ठीक ही लिखा है कि सत्याग्रह प्रेम के बल पर सत्य के बल पर आधारित है। गांधी को और गहराई से पढ़ते हुए किंग को सामाजिक सुधार के क्षेत्र में सत्याग्रह के सिद्धांत की अहमियत का एहसास हुआ। 

अपनी साफ़गोई के लिए जाने जाने वाले किंग ने लिखा है कि गांधी को पढ़ने और जानने से पहले उन्हें लगता था कि यीशुमसीह के सिद्धांत महज व्यक्तिगत सम्बन्धों में ही कारगर साबित हो सकते हैं। किंग के अनुसार गांधी वह पहले शख्स थे जिन्होंने यीशु के प्रेम के सिद्धांतों और मूल्यों को व्यक्तिगत सम्बन्धों के स्तर से उठाकर एक व्यापक पैमाने पर एक बड़ी ही प्रभावी और शक्तिशाली सामाजिक शक्ति में तब्दील कर दिया। और फिर किंग ने पाया कि सामाजिक सुधार के लिए वह जिस प्रभावी पद्धति की तलाश कर रहे थे, वह असल में, गांधी की प्रेम और अहिंसा की पद्धति ही हो सकती है। किंग की आत्म-स्वीकृति है कि “जो बौद्धिक और नैतिक संतोष उन्हें बेंथम और मिल के उपयोगितावादी सिद्धांतों में नहीं मिला, न ही मार्क्स और लेनिन के क्रांतिकारी चिंतन में, न ही हॉब्स, रूसो और नित्शे सरीखे विचारकों में, वह संतुष्टि उन्हें गांधी के अहिंसात्मक प्रतिरोध के दर्शन में मिली”। धीरे-धीरे किंग को इस बात में पुख्ता यकीन होता गया कि गांधी का अहिंसात्मक सत्याग्रह ही शोषित वर्ग के लोगों की स्वतन्त्रता-संघर्ष में काम आने वाला एकमात्र नैतिक और व्यावहारिक सिद्धांत है। 

क्रोज़र सेमिनारी के आखिरी वर्षों में मार्टिन लूथर किंग का साक्षात्कार राईनहोल्ड नीबूर के विचारों से हुआ। राईनहोल्ड नीबूर ने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘मॉरल मैन एंड इमोरल सोशायटी’ में यह विचार रखा कि हिंसात्मक और अहिंसात्मक प्रतिरोध में तात्विक रूप से कोई नैतिक अंतर नहीं है। नीबूर का यह भी मानना था कि अहिंसात्मक प्रतिरोध केवल उन्हीं समूहों के समक्ष कारगर साबित हो सकते हैं, जिनमें कुछ अंशों में ही सही नैतिक विवेक बचा हो। यानी नीबूर के अनुसार अहिंसात्मक प्रतिरोध एक सर्वसत्तावादी निरंकुश शासन का सफलतापूर्वक प्रतिरोध नहीं कर सकता। 

किंग ने लिखा है कि गांधी को पढ़ने के बाद उन्हें नीबूर के चिंतन की सीमाएँ स्पष्ट होने लगीं और उन्हें यह बात महसूस हुई कि नीबूर का यह मान लेना कि शांतिवाद एक तरह से बुराई के साथ निष्क्रिय अप्रतिरोध है, सिरे-से गलत है। किंग ने पाया कि शांतिवाद, बुराई के साथ अप्रतिरोध नहीं बल्कि बुराई के साथ अहिंसात्मक प्रतिरोध है। कहने की जरूरत नहीं कि इन दोनों स्थितियों में जमीन-आसमान का फर्क है। असल में, गांधी ने बुराई का उतना ही जोरदार और शक्तिशाली विरोध किया, जितना कोई हिंसक प्रतिरोधी करेगा; पर गांधी के प्रतिरोध में प्रेम का तत्व निहित है, वहाँ घृणा या द्वेष के लिए कोई जगह नहीं है।

नीबूर के चिंतन की स्पष्ट सीमाओं के बावजूद मार्टिन लूथर किंग ने नीबूर से काफी कुछ सीखा। किंग के अनुसार, नीबूर के विचारों से उन्हें मानव-प्रकृति के साथ-साथ राष्ट्रों और सामाजिक समूहों के व्यवहारों के बारे में भी अंतर्दृष्टि मिली। नीबूर के लेखन ने मनुष्य के सामाजिक जुड़ावों की जटिलता और सामूहिक बुराईयों के ज्वलंत यथार्थ से भी किंग का परिचय कराया। बोस्टन विश्वविद्यालय में दर्शन की पढ़ाई करते हुए मार्टिन लूथर किंग एग्गर एस. ब्राइटमान और एल. हेरोल्ड डीवोल्फ सरीखे शिक्षकों के सान्निध्य में आए और वहीं किंग ने प्रसिद्ध विचारक हेगेल (1770-1831) की पुस्तकों जैसे ‘फिनामनालॉजी ऑफ माइंड’, ‘फिलोसफ़ी ऑफ हिस्ट्री’ और ‘फिलोसफ़ी ऑफ राईट’ का भी अध्ययन किया। 

बोस्टन विश्वविद्यालय में अपनी शिक्षा पूरी होने तक किंग धीरे-धीरे वैचारिक परिपक्वता भी हासिल कर रहे थे और एक सकारात्मक सामाजिक दर्शन का विकास भी। उनका इस बात में दृढ़ विश्वास हो चला था कि अहिंसात्मक प्रतिरोध ही सामाजिक न्याय के लिए शोषित-वंचित वर्ग द्वारा किए जाने वाले संघर्ष के लिए एकमात्र कारगर उपाय है। किंग ने लिखा है कि उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि एक दिन वे एक ऐसे संघर्ष में भागीदार होंगे जिसमें अहिंसात्मक प्रतिरोध का प्रयोग किया जाएगा। 

किंग के अनुसार मोन्टगोमरी का प्रतिरोध न उन्होंने शुरू किया था न ही यह उनके सुझाव पर हुआ था। उन्होंने तो बस लोगों द्वारा महसूस की जा रही अपने एक प्रवक्ता की जरूरत को पूरा किया था। प्रतिरोध के बिलकुल आरंभ से अंत तक किंग को यीशुमसीह का ‘सरमन ऑन द माउंट’ और उसमें दी गई उदात्त प्रेम की शिक्षा और गांधी के अहिंसात्मक प्रतिरोध के सिद्धांत की याद बराबर बनी रही। मोन्टगोमरी के प्रतिरोध के वास्तविक अनुभवों से गुजरते हुए मार्टिन लूथर किंग ने यह पाया कि अहिंसा उनके लिए सिर्फ़ एक सिद्धांत नहीं है, जिसका वे अनुसरण कर रहे हैं, बल्कि यह उनके लिए यह एक जीवन-शैली और उसके प्रति प्रतिबद्धता का सवाल बन गया।   

29 सितंबर 2016

भगत सिंह और सांप्रदायिकता का सवाल

शुभनीत कौशिक 

सांप्रदायिकता के सवाल पर विचार करते हुए क्रांतिकारी विचारक भगत सिंह ने ‘किरती’ पत्रिका में मई-जून 1928 में दो विचारोत्तेजक लेख लिखे थे। ये लेख न सिर्फ़ अपने ऐतिहासिक संदर्भ और सांप्रदायिकता के प्रश्न पर अंतर्दृष्टि देने के लिए पढ़े जाने चाहिए, बल्कि भारत की वर्तमान स्थिति में ये लेख तो पहले से ज़्यादा प्रासंगिक हो जाने के कारण और पठनीय हो चले हैं। 


आइए, सबसे पहले पढ़ते हैं और सिलसिलेवार ढंग से विचार करते हैं, जून 1928 में ‘किरती’ पत्रिका में छपे उनके लेख पर, जिसका शीर्षक था: ‘सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज’। इस लेख की पहली पंक्तियों में यह आशावादी क्रांतिकारी विचारक कुछ निराश-सा जान पड़ता है तत्कालीन हिंदुस्तान की दशा से। वे लिखते हैं, ‘भारतवर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म के होना ही दूसरे धर्म के कट्टर शत्रु होना है’। वे देखते हैं कि किसी व्यक्ति का हिन्दू, मुस्लिम या सिख होना भर ही काफी है उसके मारे जाने के लिए। ऐसी स्थिति में, भगत सिंह को भारत का भविष्य अंधकारमय नजर आता है। क्या आज 2015 के भारत में हम ठीक ऐसी ही परिस्थितियों से दो-चार नहीं हो रहे हैं।

इन ‘धर्मों’ ने, भगत सिंह के अनुसार, ‘हिंदुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है’। वे चिंता जताते हैं कि आखिर धार्मिक दंगे भारत का पीछा कब छोड़ेंगे। वे इस बात पर दुखी हैं कि ‘अंधविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं’। ऐसे विरले ही लोग होते हैं, जो अंधविश्वास की धारा के प्रतिकूल अपने दिमाग और तर्क में विश्वास को बरकरार रख पाते हैं। सांप्रदायिक दंगों के लिए, भगत सिंह सांप्रदायिक नेताओं और अखबारों को जिम्मेदार ठहराते हैं। वे कहते हैं कि “इस समय हिंदुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने का बेड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज-स्वराज’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाए बैठे हैं या इसी धर्मांधता के बहाव में बह चले हैं’। 

धर्मांधता के बहाव में बह जाने वालों नेताओं में से एक, भगत सिंह के आदरणीय नेता लाला लाजपत राय खुद थे। लाला लाजपत राय के हिंदू महासभा में शामिल होने और सांप्रदायिक राजनीति के प्रति उनके झुकाव का विरोध करने के लिए भगत सिंह ने एक नायाब तरीका अपनाया। भगत सिंह ने एक पैम्फलेट छापा, जिसमें उन्होंने राबर्ट ब्राउनिंग की प्रसिद्ध कविता ‘द लॉस्ट लीडर’ को उद्धृत किया। ब्राउनिंग ने अपनी यह कविता स्वतन्त्रता के विरुद्ध हो जाने पर विलियम वर्ड्सवर्थ की आलोचना करते हुए लिखी थी। इसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थीं: ‘Just for a handful of silver he left us’, ‘Blot out his name, then, record one lost soul more’। इस पूरे पैम्फलेट में, लाला लाजपत राय के विरुद्ध एक शब्द नहीं कहा गया था, बस आवरण-पृष्ठ पर उनकी तस्वीर ही छाप दी गयी थी! [बिपन चंद्र, इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस, पृ. 257] भगत सिंह मानते हैं कि ऐसे नेता जरूर हैं जो अपने हृदय से सबका भला चाहते हैं, पर उनकी संख्या इतनी कम है कि वे ‘सांप्रदायिकता की प्रबल बाढ़ को’ रोक पाने में समर्थ नहीं है। ऐसी दशा में उद्विग्न होकर भगत सिंह कह उठते हैं कि लगता है ‘भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है’। 

सांप्रदायिक दंगों को भड़काने के लिए, भगत सिंह, अख़बारों को भी समान रूप से दोषी ठहराते हैं। उन्हें दुख है कि पत्रकारिता का व्यवसाय ‘गंदा’ हो चला है। दंगों में अखबारों की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए भगत सिंह कहते हैं कि ये अखबार ‘एक-दूसरे के विरुद्ध मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएं भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौवल करवाते हैं’। ध्यान रहे कि भगत सिंह स्वयं भी एक पत्रकार थे। गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र ‘प्रताप’, पंजाब से छपने वाली पत्रिका ‘किरती’ और हिंदी की पत्रिकाओं जैसे ‘चाँद’, ‘अभ्युदय’, ‘भविष्य’, ‘मतवाला’ में उन्होंने लगातार लेख लिखे थे। इस संदर्भ में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आख़िर यह युवा विचारक पत्रकारिता के बारे में, अखबारों और उनके संपादकों के कर्तव्य और जिम्मेदारियों की चर्चा करते हुए किन बातों पर खास तौर पर ज़ोर देता है। 

बकौल भगत सिंह, अखबारों का असली कर्तव्य है: शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना। पर उन्हें दुख है कि अपने इस असल कर्तव्य का पालन करने की बजाय, अखबार ठीक इसके उलट, अज्ञान फैलाने, संकीर्णता का प्रचार करने, लोगों को सांप्रदायिक बनाने और इस तरह भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करने जैसा काम कर रहे हैं। इस सबसे भगत सिंह के मन में एक सवाल कौंधता है, और वह सवाल यह है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’ वे पाते हैं कि असहयोग आंदोलन के दौरान जहाँ ऐसा लगता था कि स्वतन्त्रता मिलने में बस थोड़ी ही देर है, वहीं अब ऐसी दिन आ गए हैं कि ‘स्वराज्य एक सपना मात्र’ बनकर रह गया है। 

आज से लगभग नौ दशक पहले कही गई भगत सिंह की ये बातें, 21वीं सदी के भारत में भी अखबारों की मौजूदा दशा पर कितनी सही साबित होती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अज्ञान, सांप्रदायिकता, संकीर्णता फैलाने और साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करने के इस (कु)कर्तव्य में अब अखबारों-पत्रिकाओं के साथ, इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया भी शामिल हो गया है।

एक परिपक्व विचारक की भांति भगत सिंह, सांप्रदायिकता के समस्या की जड़ में जाने की कोशिश करते हैं और पाते हैं कि इसके मूल में आर्थिक कारण ही हैं। वे कहते हैं कि ‘विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल जरूर होता है’। उनके अनुसार, तबलीग़, तंज़ीम, शुद्धि आदि जो संगठन शुरू हुए उनमें कहीं-न-कहीं आर्थिक कारण निहित थे। भगत सिंह इस समस्या का निदान सुझाते हुए, भारत की आर्थिक दशा में सुधार लाने पर ज़ोर देते हैं क्योंकि जब तक मुल्क की आर्थिक दशा नहीं सुधरेगी, तब तक कोई ‘एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता है’। भूख और दुख से पीड़ित किसी इंसान के लिए सिद्धांतों की बात बेमानी है। वे कहते हैं आर्थिक सुधारों के लिए औपनिवेशिक शासन को समाप्त करना जरूरी है और इसके लिए लोगों को चाहिए कि वे हाथ धोकर औपनिवेशिक सरकार के पीछे पड़ जाएँ और ‘जब तक सरकार न बदल जाये, चैन की सांस न लें’!

सांप्रदायिकता की समस्या से निबटने के लिए भगत सिंह ने किसानों और मजदूरों में वर्ग-चेतना जगाने पर ज़ोर दिया। ताकि वे समझ सकें कि उनके असली दुश्मन पूंजीपति हैं और वे इनके हथकंडों और षडयंत्रों से सावधान रह सकें। भगत सिंह गरीबों से जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के भेदभाव के बिना एकजुट होने और सत्ता अपने हाथ में लेने का आह्वान करते हैं। और जब मजदूरों और किसानों को संबोधित करते हुए वे यह कहते हैं, ‘इन यत्नों में तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जाएंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्रता मिलेगी’, तो वे असल में कार्ल मार्क्स की प्रसिद्ध उक्ति को ही प्रतिध्वनित करते हैं। 

वे इस बात पर खुशी जाहिर करते हैं कि अब भारतीय नवयुवकों के लिए कोई भी व्यक्ति पहले इंसान है, फिर भारतवासी। किसी व्यक्ति के धर्म को तरजीह न देने वाले इन युवकों को भगत सिंह साहस देते हुए कहते हैं, ‘दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए, बल्कि तैयार-बर-तैयार हो यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने’। वे इस संदर्भ में गदर पार्टी के क्रांतिकारियों के विचारों को भी याद करते हैं। स्मरणीय है कि इन क्रांतिकारियों में से एक करतार सिंह सराभा थे, जिन्हें भगत सिंह अपना आदर्श मानते थे। गदर पार्टी के क्रांतिकारियों की समझ में ‘धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला था, जिसमें दूसरे का कोई दखल नहीं और न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए’। भगत सिंह के मतानुसार ‘यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते हैं, धर्मों में चाहे हम अलग-अलग ही रहें’।

‘किरती’ पत्रिका में ही, एक महीने पहले यानि मई 1928 में छपे अपने एक अन्य लेख, ‘धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम’ में, भगत सिंह ने अमृतसर में अप्रैल 1928 में हुई नौजवान सभा की कान्फ्रेंस के संदर्भ में राष्ट्रीय आंदोलन और धर्म के मुद्दे पर अपने विचार जाहिर किए। कान्फ्रेंस में कुछ लोगों का मत था कि धर्म के सवाल को छेड़ा ही न जाए। भगत सिंह कहते हैं कि प्रथमदृष्टया यह भले ही बड़ी ‘नेक सलाह’ जान पड़े पर, असल अनुभव तो कुछ और ही कहानी बयान करते हैं। वे इस संदर्भ में असहयोग आंदोलन का उदाहरण देते हैं, जब राजनीतिक मंचों पर धर्मों को पूरी आज़ादी दी गई। पर इसका नतीजा क्या निकाला! धार्मिक संकीर्णता घटने की बजाय और बढ़ गई। इस दुष्परिणाम को समझकर ही, ‘पूर्ण स्वतन्त्रता’ के हामी कुछ राष्ट्रवादी नेताओं ने यह कहना शुरु किया कि धर्म एक तरह की ‘दिमागी गुलामी’ है और यह भी कि ‘बच्चों से यह कहना कि ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है, मनुष्य कुछ भी नहीं – बच्चों को हमेशा के लिए कमजोर बनाना है’। 

धर्म की प्रासंगिकता के संदर्भ में भगत सिंह दो सवाल उठाते हैं। पहला यह कि यदि धर्म घर तक ही सीमित हो, तब भी क्या यह लोगों के दिलों में भेदभाव नहीं बढ़ाता? दूसरा सवाल यह कि क्या धर्म द्वारा होने वाले भेदभाव से और खुद धर्म से, पूर्ण स्वतन्त्रता का लक्ष्य हासिल करने में कोई असर नहीं होता। इन दो प्रश्नों के आलोक में, धर्म की भूमिका पर विचार करते हुए भगत सिंह को लगता है कि ‘धर्म हमारे रास्ते में एक रोड़ा है’। कारण कि यह लोगों को एक नहीं होने देता। मसलन, भगत सिंह कहते हैं कि सनातन धर्म छूत-अछूत के भेदभाव के पक्ष में खड़ा दिखता है; वे इस बात में विरोधाभास देखते हैं कि सिख एक ओर तो गुरुद्वारे में जाकर ‘राज करेगा खालसा’ कहे और बाहर आकर पंचायती राज की बातें करने लगे; एक ओर तो धर्म यह कहे कि इस्लाम पर विश्वास न करने वाले काफिर को तलवार के घाट उतार दो वहीं दूसरी ओर एकता की दुहाई दी जाए। भगत सिंह बेबाकी से यह बात कह देते हैं कि ऐसे धर्म के विरुद्ध कुछ न कहने का मतलब होगा चुप्पी साध कर घर में बैठ जाना, नहीं तो धर्म का विरोध करना होगा। धर्मों के कारण उपजने वाली अकर्मण्यता से छुटकारा पाने के लिए, भगत सिंह को ‘धर्मों के विरुद्ध सोचना ही पड़ता है’।

भगत सिंह टॉलस्टाय द्वारा अपनी पुस्तक ‘एसेज़ एंड लेटर्स’ में धर्म को तीन हिस्सों में बांट कर देखने की समझदारी से सहमत दिखते हैं। ये हिस्से हैं: धर्म का आधारभूत पक्ष, धर्म-दर्शन, धर्म का कर्मकांडी अथवा रीति-रिवाज वाला पक्ष। पहले पक्ष में, धर्म की जरूरी बातें, जैसे सच बोलना, चोरी न करना, गरीबों की सहायता करना जैसी बाते शामिल हैं। दूसरे पक्ष में, जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, संसार-रचना जैसी बातें शामिल हैं। तीसरे पक्ष में, धर्म संबंधी रस्मो-रिवाज आदि आते हैं। भगत सिंह के अनुसार यदि धर्म का मतलब, धर्म-दर्शन और रस्मो-रिवाज के साथ अंधविश्वास को मिलाना है तो ऐसे धर्म की ‘जरूरत नहीं’। हाँ, यदि धर्म के मायने, धर्म की जरूरी बातों और धर्म-दर्शन के साथ, स्वतंत्र विचार को मिलाना हो, तो वैसा धर्म ‘मुबारक’ है।     

भगत सिंह कहते हैं कि बेहतर तो यह होता कि इन धर्मों के दर्शन और रस्मो-रिवाज आदि में जो अंतर हैं, उनके विषय में और अपने-अपने विचारों के बारे में अलग-अलग धर्मों के मानने वाले ‘प्यार के साथ बैठकर बहस करें, एक-दूसरे के विचार जानें’। पर भगत सिंह असलियत से भी पूरी तरह वाकिफ़ हैं, उन्हें पता है कि जब ‘मसला-ए-तनासुक पर बहस होती है तो आर्यसमाजियों व मुसलमानों में लाठी चल जाती है’। इसके कारण को भी वे बखूबी समझते हैं, और वह यह है कि ‘दोनों पक्ष दिमाग को, बुद्धि को, सोचने-समझने की शक्ति को ताला लगाकर घर रख आते हैं। वे समझते हैं कि वेद भगवान में ईश्वर ने इसी तरह लिखा है और वही सच्चा है। वे कहते हैं कि कुरान शरीफ में खुदा ने ऐसे लिखा है और यही सच है। लोगों ने अपने सोचने की शक्ति को छुट्टी दी हुई होती है’। 

भगत सिंह धर्मों के विकास-क्रम को तब बिलकुल सही पहचानते हैं, जब वे यह कहते हैं कि ‘फ़िलॉसफी और रस्मो-रिवाज के छोटे-छोटे भेद बाद में जाकर ‘नेशनल रिलीजन’ बन जाते हैं और अलग-अलग संगठन बनने का कारण बनते हैं’। इसके दुष्परिणाम देश और समाज को भुगतने ही पड़ते हैं। इसलिए भगत सिंह के अनुसार जरूरत है हर किस्म के भेदभाव को जड़ से मिटाने की, तंगदिली छोडने की, जिससे असल एकता कायम हो सके। बकौल भगत सिंह, ‘हमारी आज़ादी का अर्थ केवल अंग्रेज़ी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं, वह पूर्ण स्वतन्त्रता का नाम है – जब लोग परस्पर घुल-मिलकर रहेंगे और दिमागी गुलामी से भी आज़ाद हो जाएंगे’। [भगत सिंह के ये दोनों लेख, प्रो चमन लाल द्वारा संपादित पुस्तक ‘भगत सिंह के राजनीतिक दस्तावेज़’ में संकलित हैं।]

इन लेखों के लिखे जाने के लगभग 15 वर्षों बाद, 1942 में दो समाजवादी नेताओं, अच्युत पटवर्धन और अशोक मेहता ने, भारत में सांप्रदायिकता की समस्या पर लिखी गई अपनी पुस्तक द कम्यूनल ट्रायंगल इन इंडिया में लिखते हुए सांप्रदायिक समस्या को बढ़ाने में धार्मिक समुदायों के अलावे तीसरे पक्ष यानि ब्रिटिश राज की भूमिका को भी रेखांकित किया। आज़ादी के बाद इस तीसरे पक्ष की भूमिका सत्ताधारियों और राजनीतिक दलों ने निभानी शुरू कर दी। इसी तीसरे पक्ष पर टिप्पणी करते हुए कवि धूमिल ने लिखा था: 
एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।
                                                     
(स्वाधीन ब्लॉग के सम्पादक शुभनीत कौशिक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज में पीएचडी शोधछात्र हैं और समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में लगातार पढ़े जा सकते हैं.)

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