25 मार्च 2017

गणेशशंकर विद्यार्थी और 'प्रताप': स्वाधीनता संघर्ष का स्वर्णिम अध्याय

अटल तिवारी

बीसवीं सदी के दूसरे दशक में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को जिन विभूतियों ने गति दी उसमें गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम अग्रिम पंक्ति के सेनानियों में है। विद्यार्थी जी ने सब कुछ दांव पर लगाकर आजादी के लिए पत्रकारिता को ध्येय बनाया। लोगों को आंदोलन के लिए प्रेरित किया। विद्यार्थी जी ने एक तरफ अपने साप्ताहिक अखबार ‘प्रताप’ के जरिए अंग्रेज सरकार को पग-पग पर चुनौती दी तो दूसरी ओर देश की सामंती ताकतों को कठघरे में खड़ा करने में भी लेश मात्र का संकोच नहीं किया। क्रांतिकारी एवं मुखर राजनीतिक विचारों को लेकर ‘प्रताप’ हिन्दी प्रदेश का ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत का प्रमुख अखबार बना। उसका राजनीतिक स्वर क्रांतिकारी था, लेकिन इसके साथ कांग्रेस की नीतियों का भी पक्षधर था। अपनी इस पत्रकारिता के कारण उस पर छापे, जमानत, जब्ती, चेतावनी, धमकी एवं संचालकों को कारावास तक झेलना पड़ा। इन परिस्थितियों में भी संपादक विद्यार्थी जी देश के उत्थान और आजादी की मशाल लिए पत्रकारिता के युद्ध क्षेत्र में डटे रहे। 

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उस समय अखबारनवीसी पेशा नहीं था। देश और समाज सेवा के लिए अखबार निकाले जाते थे। पत्रकारिता में वही लोग आते थे जो हर तरह के त्याग और बलिदान के लिए तैयार रहते थे। इसी भावना को केन्द्र में रखकर ‘प्रताप’ में समाचार, संपादकीय टिप्पणी, राजनीतिक लेख और कविताएं प्रकाशित होती थीं। विद्यार्थी जी अपने तीन साथी शिव नारायण मिश्र, नारायण प्रसाद अरोड़ा व यशोदा नंदन के साथ मिलकर 9 नवम्बर 1913 को उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में ‘प्रताप’ की नींव डाली थी। जन्म काल से ही ‘प्रताप’ का दफ्तर क्रांतिकारियों की शरण स्थली था तो युवाओं के लिए पत्रकारिता के प्रशिक्षण केन्द्र की भूमिका निभाने लगा था। विद्यार्थी जी ने महज पाठकों के लिए ही नहीं लिखा बल्कि नए पत्रकार तैयार करने और पत्रकारिता को मिशन बनाने की दिशा में भी काम किया। ‘प्रताप’ के माध्यम से जनजागरण का अभियान चलाया। जन आंदोलन को आगे बढ़ाने के पुरस्कार स्वरूप बार-बार कारावास की सजा काटी। 

‘प्रताप’ के पहले अंक में पत्रकारिता की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए ‘प्रताप की नीति’ नामक लेख लिखा, ‘आज अपने हृदय में नई-नई आशाओं को धारण करके और अपने उद्देश्यों पर पूर्ण विश्वास रख कर ‘प्रताप’ कर्मक्षेत्र में आता है। समस्त मानव जाति का कल्याण हमारा परमोद्देश्य है और इस उद्देश्य की प्राप्ति का एक बहुत बड़ा और बहुत जरूरी साधन हम भारतवर्ष की उन्नति को समझते हैं।’ उन्होंने इस लेख में ‘प्रताप’ के उद्देश्य पाठकों के सामने रखे तो पत्रकारिता के जरिए वह किसका साथ देंगे और किसका साथ नहीं देंगे, इसका भी उल्लेख किया, ‘हम न्याय में राजा और प्रजा दोनों का साथ देंगे, परन्तु अन्याय में दोनों में से किसी का भी नहीं। हमारी यह हार्दिक अभिलाषा है कि देश की विविध जातियों, संप्रदायों और वर्णों में परस्पर मेल-मिलाप बढ़े।’ 

साप्ताहिक ‘प्रताप’ ने सामान्य अंक निकालने के साथ साल में एक-दो विशेषांकों का प्रकाशन शुरू किया तो पत्रकारिता में पुस्तिका प्रकाशन की एक अलग तरह की परम्परा शुरू की। विद्यार्थी जी ‘स्वतंत्रता देवी’ को केन्द्र बिन्दु मानकर पत्रकारिता कर रहे थे, जो अंग्रेज सरकार को रास नहीं आ रही थी। लिहाजा ‘प्रताप’ को लक्ष्य कर छापों और जब्ती का दौर शुरू हो गया। ‘प्रताप को शुरू हुए एक वर्ष हुआ था कि 24 अप्रैल 1915 को रात के समय ‘प्रताप’ के प्रेस और कार्यालय तथा विद्यार्थी जी और मिश्र जी के आवासों पर पुलिस ने छापा मारा। तलाशी ली। ग्राहकों का रजिस्टर व सामग्री की प्रतियां उठवा ली। पर ‘प्रताप’ का काम रुका नहीं। इसी बीच ठाकुर लक्ष्मण सिंह चैहान का ‘कुली प्रथा’ नामक नाटक ‘प्रताप’ से छपकर आया, जिसे सरकार ने तुरंत जब्त कर लिया और प्रेस एक्ट के अन्तर्गत 1916 को प्रताप प्रेस से एक हजार रुपए की जमानत मांगी गई। कागज और कलम से अच्छी-खासी लड़ाई लड़ने के बाद अंततः जमानत दाखिल कर दी गई।’ ‘कुली प्रथा’ नाटक दूसरे देशों में प्रवासी भारतवासियों के शोषण और उनकी मांगें पूरी करने के लिए अभियान के तहत प्रकाशित किया गया था। इस पुस्तिका के जरिए शासन से अनुरोध किया गया था कि उनके अधिकारों की रक्षा की जाए। अनुरोध ब्रिटिश शासन के लिए आघात बना। उसने नाटक वाली पुस्तिका जब्त कर ली। संचालक बिना किसी विचलन के अपने ध्येय में लगे रहे। 

‘प्रताप’ में समाचार, अग्रलेख, लेख के साथ-साथ देश प्रेम पर आधारित कविताएं भी प्रकाशित होती थीं। इसी के तहत 19 जून 1916 के अंक में ‘दासता’ नामक कविता छपी। अंग्रेज शासन की नजर पड़ी तो उस कविता को राजद्रोहपूर्ण बताकर ‘प्रताप’ पर जमानत की सजा लगा दी। संचालकों ने ‘न्यू इंडिया’ और ‘कामरेड’ अखबार का उदाहरण देते हुए जमानत न मांगे जाने की दलील दी। लेकिन अधिकारी ने जमानत न मांगे जाने की आज्ञा को निरस्त कर 2 नवम्बर 1916 को जमानत स्वीकार कर ली। घाटे के बावजूद ‘प्रताप’ के तेवर में किसी तरह की कमी नहीं आई। उसमें देश प्रेम पर केन्द्रित जोश भरी कविताएं और लेख छपते रहे। जमानत और जब्ती का जिस तरह से सिलसिला आगे बढ़ा उसी गति से लेखकों की कलम की रफ्तार तेज होती गई। ‘22 अप्रैल 1918 के ‘प्रताप’ में नानक सिंह ‘हमदम’ द्वारा रचित ‘सौदा-ए-वतन’ शीर्षक की कविता प्रकाशित हुई तब शासन बौखला गया। उसने उसे राजद्रोहपूर्ण घोषित किया। 1916 में प्रताप द्वारा एक हजार रुपए की जमा की हुई जमानत जब्त कर ली गई और आदेश दिया गया कि पहली जून 1918 की राजकीय विज्ञप्ति (जो 6 जून को प्रताप कार्यालय में प्राप्त की गई थी) के अनुसार पुनः जमानत दाखिल की जाए।’ 

जमानत जब्त होने से ‘प्रताप’ को गहरा धक्का लगा। दोबारा जमानत जमा करने तक अखबार का प्रकाशन जारी रखना संभव नहीं था और तत्काल एक हजार रुपए का इंतजाम भी नहीं हो सकता था। उसने नई नीति अपनाते हुए पाठकों की ‘अदालत’ में जाने का फैसला किया, जिन्होंने ‘प्रताप’ को लोकप्रियता के शिखर पर बिठा दिया था। ‘प्रताप’ के अगले ही अंक में उसने अपनी विपदा को निम्न पंक्तियों में व्यक्त किया, ‘लगा घाव है अब कठिन रह-रह के होती चमक। रहा काम अब आपका मरहम रखिए या नमक।’ इसी अंक के साथ ‘प्रताप’ का प्रकाशन बंद हो गया। लेकिन चकित करने वाली बात यह कि पाठकों ने चंदा जमा करके जमानत के लिए धन एकत्र कर दिया। ‘8 जुलाई 1918 को अखबार का अगला अंक आया, जिसमें ‘प्रताप’ की दिलेरी और सरकार की दमन नीति का पूरा ब्योरा छापा गया। पाठकों-ग्राहकों और आम जनता पर इसका इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि लोग मुक्त हस्त से ‘प्रताप’ को आर्थिक सहयोग भेजने लगे और देखते-देखते आठ हजार रुपए का फंड एकत्र हो गया।’  

पाठकों का इस तरह सहयोग मिलते ही विद्यार्थी जी ने ‘प्रताप’ की मिलकियत को सार्वजनिक संपत्ति घोषित कर दिया। इस प्रक्रिया के तहत ट्रस्ट का गठन किया गया। यह देखकर कानपुर के जिला अधिकारी ने चैंका देने वाला आदेश दिया, ‘मैं ‘प्रताप’ से जमानत न लेने का कोई कारण नहीं देखता। नए प्रिंटर (अर्थात श्रीयुत शिव नारायण मिश्र) का इस बदनाम (छवजवतपवने) पत्र से पुराना संबंध है। बीस मास के भीतर पत्र को दो बार चेतावनी दी गई और एक बार उसकी 1000 रुपए की जमानत जब्त की गई। पहले प्रिंटर (अर्थात् गणेशशंकर विद्यार्थी) ने, जो कमेटी (ट्रस्ट) में है, हाल में (कानपुर में) होने वाली हड़तालों में विशेष भाग लिया है और आजकल के उपद्रव के समय में यह आवश्यक है कि समाचार पत्रों पर कड़ा अंकुश रखा जाए। इसलिए मैं 2000 रुपए की जमानत मांगता हूं और प्रकाशक को चेतावनी देता हूं कि उसे पत्र प्रकाशित करने की अनुमति उस समय तक नहीं है, जब तक कि वह मेरी अदालत में जमानत दाखिल न कर दे।’ ‘प्रताप’ ने नियम की धज्जियां उड़ाने वाले इस आदेश का भी पालन किया। दो हजार रुपए की जमानत जमा कर दी। इसी के साथ अब ‘प्रताप’ पाठकों का अखबार हो गया। 

इस घटना के बाद नए तरह की मुसीबत सामने थी। अभी तक महज पुलिस के छापों-तलाशियों और जमानत जब्ती का ही सिलसिला चल रहा था। नए घटनाक्रम में मानहानि के मुकदमों और जेल यात्राओं का दौर शुरू हो गया। इस नई चुनौती के तहत विद्यार्थी जी ने अपने जीवन में पांच जेल यात्राएं कीं। इनमें तीन उन्हें ‘प्रताप’ की पत्रकारिता और दो राजनीतिक भाषणों के कारण करनी पड़ीं। ‘प्रताप’ पर पहला अदालती मामला रायबरेली गोलीकांड का आंखों देखा विवरण छापने के कारण चला। ‘विद्यार्थी जी सामन्ती बर्बरता के विरुद्ध किसानों के संघर्ष के लेखनी से भी समर्थक थे (उनकी पहली जेल-यात्रा का कारण सामन्ती अत्याचार के विरुद्ध उनकी एक रपट बनी थी) और सक्रिय भागीदार भी। लेकिन साथ ही वे कानपुर के औद्योगिक परिवेश में रहते हुए मजदूर वर्ग की नारकीय स्थिति और उसकी संगठित शक्ति की अपरिमित सम्भावनाओं से भी परिचित हो चुके थे। भूलना नहीं होगा कि कानपुर में वाजिब मजदूरी के सवाल को उन्होंने 1919 में उठाया था और पच्चीस हजार मजदूरों की हड़ताल का सफल नेतृत्व किया था।’ 

अपनी इन्हीं भावनाओं के तहत पत्रकारिता करने वाले ‘प्रताप’ को सात साल की यात्रा में पाठकों को अपार प्रेम मिला। अंग्रेज सरकार की छापों, जब्ती, चेतावनी का संचालकों पर लेस मात्र का असर नहीं पड़ा। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 1919 में इस साप्ताहिक की प्रसार संख्या नौ हजार (9,000) थी। इस तरह साप्ताहिक ‘प्रताप’ की यात्रा 23 नवम्बर 1920 को दैनिक तक पहुंची। ‘साप्ताहिक की तरह ही दैनिक ‘प्रताप’ भी राष्ट्रवादी था और निरंकुश तथा अत्याचारी शासकों का घोर विरोधी था। उसकी यह नीति ही उसका सबसे बड़ा अपराध (?) था, जिसका कुपरिणाम उसे भुगतना पड़ा। सरकार और नौकरशाही के अतिरिक्त देशी रियासतों की भी उस पर कृपा हुई और सात-आठ रियासतों ने अपने राज्य में ‘प्रताप’ का जाना बन्द कर दिया।’  

इस समय तक ‘प्रताप’ हिंदी प्रदेश के किसानों व मजदूरों के अनवरत संघर्ष का वाहक बन गया था। यह वह समय था जब उत्तर भारत में ताल्लुकेदारों द्वारा किसानों का शोषण चरम पर था। किसान आजिज आ चुके थे। अवध क्षेत्र के अनेक जिलों में एकजुट होकर किसानों ने विद्रोह कर दिया। रायबरेली में जमींदार सरदार वीरपाल सिंह ने किसान आंदोलन को कुचलने के लिए गोली चलवा दी। इसमें कई किसान मारे गए और बहुत से जख्मी हो गए। किसानों की गिरफ्तारियां होने लगीं। सरकार और जमींदारों के दमन के इस प्रवाह में विद्यार्थी जी की लेखनी आग उगल रही थी। उन्होंने किसानों पर हुए अत्याचार की तुलना अमृतसर के जलियांवाला बाग हत्याकांड से की। दैनिक ‘प्रताप’ के 13 जनवरी 1921 के अंक में ‘डायरशाही और ओडायरशाही’ नामक अग्रलेख लिखा। ‘प्रताप’ का किसानों का साथ देने से जहां सरकार की कुदृष्टि उस पर पड़ी वहीं स्थानीय ताल्लुकेदार भी उससे खफा हो गए। अखबार में प्रकाशित सामग्री को अपने लिए अपमानजनक मानकर वीरपाल सिंह ने दैनिक ‘प्रताप’ पर मानहानि का मुकदमा कर दिया। इस मुकदमे ने बड़ा राजनैतिक रूप धारण कर लिया। बचाव पक्ष से 50 गवाह प्रस्तुत हुए। इनमें पं. मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, श्रीकृष्ण मेहता एवं डा. अवन्तिका प्रसाद जैसे राष्ट्रीय नेता भी शामिल थे। सेशन अदालत तक मामला गया, लेकिन फैसला ‘प्रताप’ के विरुद्ध रहा। ‘संपादक गणेश शंकर और प्रकाशक शिव नारायण मिश्र को तीन-तीन माह की कैद तथा पांच-पांच सौ रुपया जुर्माने का दण्ड मिला। 

जिन दिनों रायबरेली मानहानि का मुकदमा विद्यार्थी जी और मिश्र जी पर चल रहा था, नौकरशाही ने ‘प्रताप’ पर एक और प्रहार किया। 27 अप्रैल 1921 को गणेश शंकर विद्यार्थी और शिव नारायण मिश्र से क्रमशः पांच-पांच हजार रुपए के मुचलके और दस-दस हजार रुपए की दो जमानतें देने का आदेश दिया गया। इसका कारण बताया गया कि रायबरेली और फैजाबाद के किसानों की अशान्ति के सम्बन्ध में लेख लिख और प्रकाशित कर राजद्रोह का प्रचार किया गया तथा सम्राट की प्रजा में द्वेष फैलाया गया।’  अंग्रेज सरकार ने संपादक विद्यार्थी जी और मुद्रक शिव नारायण मिश्र के विरुद्ध आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत दफा 108 में सम्मन जारी किया। सम्मन मिलते ही हालात पर विचार करने के लिए ‘प्रताप’ के ट्रस्टियों ने बैठक की, जिसमें विद्यार्थी जी ने संपादक पद से इस्तीफा दे दिया। वह नहीं चाहते थे कि उनकी वजह से ‘प्रताप’ को 15 हजार रुपए का बड़ा जोखिम उठाना पड़े। प्रकाशक शिव नारायण मिश्र ने सम्मन मिलने के तीन दिन पहले ही संबंधित मजिस्टेªट के यहां सूचना दे दी कि वह ‘प्रताप’ के मुद्रक और प्रकाशक नहीं रहे। उनकी घोषणा स्वीकार कर ली गई। अगले ही दिन कृष्णदत्त पालीवाल ने मुद्रक एवं प्रकाशक के रूप में नया घोषणा पत्र दाखिल कर दिया। ऐसा करने से साप्ताहिक ‘प्रताप’ एक भी दिन बंद नहीं हुआ। विद्यार्थी जी और शिव नारायण मिश्र ने ‘प्रताप’ के हितों की रक्षा के लिए अपने को अलग कर लिया, जिससे उनकी ओर से दफा 108 के तहत मुचलके भरने, जमानत जमा करने या नहीं करने पर भी ‘प्रताप’ की संपत्ति पर आंच न आए। फिर भी उनका मत था कि उन पर लगाए गए आरोप उन्हें दफा 108 के तहत अभियुक्त बनाने के लिए उपयुक्त नहीं थे। इसी कारण रायबरेली की अदालत में (जिसमें उन पर मानहानि का मुकदमा चल रहा था) उन्होंने अपना बचाव करना उचित नहीं समझा। ‘प्रताप’ के ट्रस्टियों ने विद्यार्थी जी का त्याग पत्र स्वीकार नहीं किया। इसके बदले उनका एक साल का अवकाश स्वीकृत कर दिया। 

‘रायबरेली अदालत में जब गणेश शंकर विद्यार्थी को राजद्रोहपूर्ण एवं भड़काने वाले लेख लिखने पर प्रथम बार दंडित किया गया था तब भी उन्हें केवल एक घंटे बाद ही रिहा करा लिया गया था। उनके मित्रों एवं शुभचिंतकों ने उनकी तुरंत जमानत जमा करा दी थी। परंतु कानपुर पहुंचने पर गणेश शंकर विद्यार्थी को दफा 108 के अंतर्गत रायबरेली से सम्मन मिला तो वह उसकी अवहेलना करने पर उतारू हो गए। उन्होंने तुरंत संबंधित मजिस्टेªट को लिखा कि 23 मई 1921 को जब उनकी जमानत ली गई थी तब उनसे पूछा नहीं गया था। उन्होंने जिला अधिकारी से निवेदन किया कि वह उस जमानत को निरस्त समझें। वह जेल जाने को भी उद्यत हो गए। शुभचिंतकों के समझाने-बुझाने के बावजूद उन्होंने 16 अक्तूबर 1921 को अपने को स्थानीय अधिकारियों के सुपुर्द कर दिया।’  

दरअसल जाने अनजाने विद्यार्थी जी ने उस समय वही काम किया जो अंग्रेज शासन चाहता था। रायबरेली मुकदमे में व्यस्त होने के कारण विद्यार्थी जी ने दैनिक ‘प्रताप’ का संपादन छोड़ दिया था। इस दौरान कृष्णदत्त पालीवाल संपादक की जिम्मेदारी निभा रहे थे। मुकदमे के दौरान परिस्थतियां विषम होती चली गईं। मामला इतना खर्चीला साबित हुआ कि दैनिक ‘प्रताप’ को बचाया नहीं जा सका। आखिरकार 6 जुलाई 1921 का अंक निकालने के बाद ‘प्रताप’ के संचालकों को बेमन दैनिक संस्करण बंद करने का फैसला लेना पड़ा। अंग्रेज शासन यही तो चाहता था। भारत में अंग्रेजी शासन की चापलूसी करने वाले एंग्लो इंडियन अखबार और लंदन के सभी समाचार पत्र रायबरेली हत्याकांड को लेकर दहशतजदा थे। उन्हें इसकी आड़ में क्रान्ति की आशंका दिख रही थी। ऐसे में भारतीय अंग्रेज सरकार व कानपुर के अधिकारियों ने मौके का लाभ उठाते हुए विद्यार्थी जी को 25 अक्तूबर को लखनऊ के केंद्रीय कारागार पहुंचा दिया। रायबरेली मुकदमे में उन्हें तीन माह की सजा मिली। इसलिए लखनऊ की उच्च अदालत में उनकी अपील 1 फरवरी 1922 तक सुनवाई के लिए पड़ी रही। विद्यार्थी जी को कारागार में ही सूचना मिली कि उनकी अपील निरस्त हो चुकी है और उनकी सजा बहाल रही, लेकिन उनके वकील ने सूचित किया कि चूंकि वह सजा दफा 108 के तहत प्रदत्त सजा के समानांतर ही चलेगी इसलिए अपील निरस्त होने का किसी तरह का प्रभाव नहीं पड़ेगा। सजा पूरी करने पर विद्यार्थी जी जिला कारागार लखनऊ से 22 मई 1922 को रिहा किए गए। इस अवधि में उन्हें आरंभ में दस दिन कानपुर जिला जेल, फिर केंद्रीय कारागार लखनऊ तो अंत में जिला जेल लखनऊ में अन्य सत्याग्रही साथी पं. मोतीलाल नेहरू, पं. जवाहरलाल नेहरू, पुरुषोत्तम दास टंडन, आचार्य कृपलानी आदि के साथ रखा गया। इस पहली जेल यात्रा के दौरान विद्यार्थी जी ने जेल डायरी लिखी। इसी के आधार पर ‘जेल जीवन की झलक’ नाम से संस्मरणपरक लेखमाला ‘प्रताप’ के बारह अंकों में लिखी। ‘दोनों लोगों पर दो-दो अभियोग थे, अतः उन पर अलग-अलग 3-3 महीने की सादी कैद और पांच-पांच सौ रुपए जुर्माने की सजा सुनाई गई। इसके अलावा मुकदमे के ही दौरान दोनों सज्जनों से सरकार ने नेकचलनी के नाम पर एक साल के लिए पांच-पांच हजार के मुचलके और दस-दस हजार की जमानतें भी मांगी थीं। इसी सिलसिले में पहली बार 30 जुलाई 1921 को कुछ घंटों के लिए और दोबारा 16 अक्तूबर 1921 से 22 मई 1922 तक विद्यार्थी जी को जेल में रहना पड़ा।’ 

रायबरेली मानहानि केस में प्रताप को हार का सामना अवश्य करना पड़ा। काफी धन और समय भी लगा। लेकिन वह अपने इस उद्देश्य में सफल रहा कि रायबरेली हत्याकांड के जरिए उसने ब्रिटिश उपनिवेशवाद और देश के भीतर की जनविरोधी सामंती ताकतों की साठ-गांठ का सच पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया। लोग बाग किसानों की बदहाली से परिचित हुए। एक तरह से ‘रायबरेली केस की जमानत और मुचलका रद्द करवाकर गणेश शंकर विद्यार्थी जेल गए। वह हारकर भी जीत गए। ‘प्रताप’ के आइने में विदेशी हुकूमत की निर्लज्जता खुलकर सामने आ गई। उसके बाद हुकूमत हर तरह की ‘थेथरई’ पर उतरी। गणेश शंकर के लिए जेल घर-आंगन बन गया। लेकिन 1931 तक साप्ताहिक ‘प्रताप’ कभी बंद नहीं हुआ। 1923-1931 तक ‘प्रताप’ ने हिन्दी पत्रकारिता का फिर एक नया इतिहास रचा-पहले से सर्वथा नया तथा रोमांचक! तूफान उठाने से लेकर बलिदान देने तक का ऐसा इतिहास, जो आज तक अपने में अकेली मिसाल है।’ 

‘प्रताप’ को दूसरा मामला मैनपुरी मानहानि केस (12 अगस्त 1926 से 17 नवम्बर 1926) लड़ना पड़ा। ‘यह मामला शिकोहाबाद के थानेदार की रिश्वतखोरी की खबरें छापने के कारण बना था और इसमें भी अभियुक्त संपादक और मुद्रक-प्रकाशक ही थे। संपादक अभी भी विद्यार्थी जी थे, लेकिन मुद्रक-प्रकाशक इस बार मिश्र जी नहीं बल्कि सुरेन्द्र शर्मा थे। 41 गवाहों के बयान दिए गए, उस थानेदार की रिश्वतखोरी के 13 मामले पेश किए गए, लेकिन दोषी इस बार भी अदालत को ‘प्रताप’ के संपादक-प्रकाशक ही नजर आए। दोनों अभियुक्तों को चार-चार सौ रुपए जुर्माना और छह-छह महीने जेल की सजा सुनाई गई। फैसला सुनकर विद्यार्थी जी ने मजिस्टेªट से कहा-हमारे साथ घोर अन्याय हुआ है। हम जुर्माना न देकर जेल जाने को तैयार हैं ताकि दुनिया आपके इंसाफ का नमूना देख ले।’  इस मानहानि के मामले में विद्यार्थी जी और सुरेन्द्र जी जेल चले गए। लेकिन पाठकों को उनका जेल जाना मंजूर नहीं था। ऐसी हालत में उन्होंने जुर्माने की रकम अदा कर संपादक-प्रकाशक को 24 घंटे में ही जेल से छुड़ा लिया। साथ ही मामले की अपील सेशन अदालत में करने का फैसला लिया गया। उक्त अदालत से भी वही फैसला बहाल रहा तब उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया, जिसने दोनों को निर्दोष करार देते हुए बाइज्जत बरी कर दिया। 

‘प्रताप’ पर तीसरा मानहानि का मामला 1928 में साईंखेड़ा मानहानि केस के नाम से चला, जो एक महंत व उसके चेले के ढोंग एवं कुकृत्यों का भंडाफोड़ करने वाला लेख प्रकाशित करने पर बना था। यह मामला आगे बढ़ता उसके पहले ही ‘प्रताप’ के कुछ शुभेच्छुओं की मध्यस्थता से यह बीच में ही समाप्त हो गया। विद्यार्थी जी सही तथ्य प्रकाशित होने पर अपने पक्ष को लेकर जितना अधिक अडिग रहते थे उसी तरह गलत तथ्य प्रकाशित होने पर खेद प्रकाश छापने में भी लेश मात्र का संकोच नहीं करते थे। एक तरह से अखबारों में भूल सुधार की प्रक्रिया भारतीय पत्रकारिता में उसी दौरान शुरू हुई। साईंखेड़ा मामले के दौरान इलाहाबाद की नैनी जेल में कैदियों के साथ हो रहे दुव्र्यवहार को लेकर प्रताप में एक नोट छपा, जिसे लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मानहानि का नोटिस भेजा। इस मामले में चूक प्रताप के ही संपादन विभाग की थी। ऐसे में बिना किसी देरी के ‘प्रताप’ ने अपनी भूल स्वीकार कर ली और मात्र खेद प्रकाश से ही मामला समाप्त हो गया। इन मामलों से साफ हो जाता है कि विद्यार्थी जी व ‘प्रताप’ महज हवा में ब्रिटिश उपनिवेशवाद विरोधी लड़ाई नहीं लड़ रहे थे बल्कि ऐसे सभी तत्वों को निशाना बना रहे थे, जो सामंती, नौकरशाही व पाखंडवाद के सरगना के रूप में देश की जनता का शोषण और उत्पीड़न कर रहे थे। 

रायबरेली और मैनपुरी वाले मामलों में तथा दफा 108 के जमानत-मुचलकों के सिलसिले में विद्यार्थी जी को तीन जेल यात्राओं के अलावा दो बार 10-10 महीने की जेल यात्राएं (नैनी व हरदोई जेल) उन्हें कांग्रेस नेता की हैसियत से फतेहपुर और कानपुर में व्याख्यान देने के कारण काटनी पड़ीं। लखनऊ जेल यात्रा के दौरान 1922 में उन्होंने फ्रांस की राज्य क्रान्ति वाली पृष्ठभूमि की विक्टर ह्यूगो की कृति ‘नाइंटी थ्री’ का ‘बलिदान’ नाम से अनुवाद किया तो अंतिम जेल यात्रा में अपनी एक कहानी ‘हाथी की फांसी’ लिखी। विद्यार्थी जी, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की राह के अनुगामी थे। तिलक के बाद राष्ट्रीय आंदोलन व कांग्रेस के मंच पर गांधी के नेतृत्व को स्वीकार अवश्य किया, लेकिन उनकी सोच को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। इसी कारण अहिंसा के सवाल पर उन्होंने कहा कि ‘मैं नाॅन-वायलेंस (अहिंसा) को शुरू से अपनी पाॅलिसी मानता रहा हूं, धर्म नहीं मानता रहा। मैंने अपने व्याख्यान में यह दिखाया कि मनसा और कर्मणा, अहिंसा साधारण मनुष्यों का सहज स्वभाव नहीं है और इसीलिए राजनीतिक संग्राम में उसे अपना साधारण हथियार नहीं बनाया जा सकता।’  यह बात उन्होंने 1922-23 के दौरान फतेहपुर में सभापति पद से दिए गए अपने भाषण के सिलसिले में अदालत के सामने कही थी। इसी मामले में दफा 124 ए के अभियोग में उन्हें एक साल की सजा और 100 रुपए जुर्माना हुआ था। एक तरह से वह गांधी के अहिंसक नेतृत्व और भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों के बीच खड़े थे। ‘गणेश शंकर विद्यार्थी ने देश की आजादी का जो सपना अपने मन में संजो रखा था, उसका वितान कांग्रेस के मध्यमार्गी नेतृत्व से बहुत आगे तक तना था। कांग्रेस के पूंजीवादी मानसिकता के नेतागण जहां देशी सामंतों के अत्याचारों की अनदेखी करने में ही अपना हित समझते थे, गणेश शंकर विद्यार्थी उनसे टकराते थे और लहूलुहान होते थे, लेकिन हार नहीं मानते थे। रायबरेली के सामंत द्वारा स्थानीय किसानों पर किया गया गोलीकांड हो, चंपारन के निलहे गोरों के अत्याचार हों या बिजोलिया के गरीब किसानों का शोषण-सर्वत्र गणेश जी अपना सीना खोलकर आगे खड़े दिखाई दिए।’  इसी कारण ‘प्रताप’ अपने सफर में किसानों एवं मजदूरों की आवाज बना। उनके आंदोलनों में हमराही की भूमिका में खड़ा हुआ। अपने निर्भीक लेखन, राष्ट्रीय आंदोलन और किसान आंदोलन में भागीदारी के चलते विद्यार्थी जी को सत्ता के कोप और प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। 

विद्यार्थी जी प्रेस की आजादी के कट्टर पक्षधर थे। इसके लिए तीन बार उन्हें जेल जाना पड़ा। अनेक बार ‘प्रताप’ पर छापे पड़े। जमानतें मांगी गईं और अखबार का प्रकाशन स्थगित करना पड़ा। ‘शुरू के 18 सालों के दौरान लगभग 45,000 रुपए विद्यार्थी जी और ‘प्रताप’ को जमानत के बतौर भरने पड़े। प्रेस की आजादी और अखबारांे के सरकारी दमन का जब-जब सवाल उठा, विद्यार्थी जी ने उसका प्रखर विरोध किया, चाहे वह उनके अपने अखबार का मामला हो या अन्य अखबारों का। प्रेस की आजादी के सवाल पर उनका ‘दूसरा कृपाण’ शीर्षक लेख 29 मार्च 1914 को प्रकाशित हुआ था। प्रेस एक्ट की तलवार तो देसी अखबारों पर लटक ही रही थी कि अचानक अखबारों की आवाज को और अधिक दबाने के इरादे से ‘कन्टेम्प्ट आॅफ कोर्ट’ का कानून लाद दिया गया। उसी नए कानून को विद्यार्थी जी ने इस लेख में दूसरा कृपाण कहा है।’  विद्यार्थी जी कहते थे कि पत्रकार की समाज के प्रति बड़ी जिम्मेदारी है। वह जो लिखे, प्रमाण और परिणाम का विचार रखकर लिखे और अपनी गति-मति में सदैव शुद्ध और विवेकशील रहे। पैसा कमाना उसका ध्येय नहीं, लोकसेवा उसका ध्येय है। अपनी शहादत के महज दो सप्ताह पहले विद्यार्थी जी हरदोई जेल (25 मई 1930 से 9 मार्च 1931 तक) से दफा 117 के तहत एक साल की सख्त कैद की सजा काटकर बाहर आए थे। यह सजा कानपुर में आयोजित कांग्रेस के प्रांतीय राजनीतिक सम्मेलन में प्रदेश के प्रथम डिक्टेटर के नाते दिए गए भाषण के कारण काटनी पड़ी थी। यह उनकी पांचवीं जेल यात्रा थी। जेल से आने के बाद वह ‘प्रताप’ के महज एक अंक का संपादन कर पाए थे कि इसी बीच अंग्रेज सरकार ने क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को फांसी के फंदे पर चढ़ा दिया। यह समाचार सुनकर गणेश जी काफी बेचैन हो गए। देश के अनेक नगरों में दंगा फसाद हो रहा था। कानुपर में भी दंगा भड़क गया। पुलिस इन दंगों को रोकने के बजाय मूक बनी रही। यह देखते हुए विद्यार्थी जी दंगे की आग शांत कराने के लिए मैदान में कूद पड़े। अपने कुछ साथियों के साथ हिन्दू इलाके में फंसे मुस्लिमों को निकालते तो मुस्लिम इलाकों के बीच फंसे हिन्दुओं को निकालते। यही प्रयास करते हुए वह 25 मार्च को कुछ फसादी तत्वों का शिकार बन गए और देश के नाम पर शहीद हो गए। देश और समाज के प्रति यह उनकी निर्भीक प्रतिबद्धता ही थी, जिसके चलते वह दिन-रात घूमकर कानपुर में भड़के साम्प्रदायिक दंगे की आग को बुझाने की कोशिश करते साम्प्रदायिक उन्मादी भीड़ के हाथों मारे गए। उनकी शहादत का समाचार कराची में चल रहे कांग्रेस के अधिवेशन में पहुंचा तो सभी दंग रह गए। अखबारों ने विद्यार्थी जी को श्रद्धांजलि देते हुए लेख प्रकाशित किए तो कुछ ने क्षोभ व्यक्त किया। गांधी जी ने ‘प्रताप’ के संयुक्त संपादक को तार भेजा-‘कलेजा फट रहा है तो भी गणेश शंकर की इतनी शानदार मृत्यु के लिए शोक-संदेश नहीं दूंगा। उनका परिवार शोक-संदेश का नहीं, बधाई का पात्र है। इसकी मिसाल अनुकरणीय सिद्ध हो।’ अपने पत्र ‘यंग इंडिया’ में लिखा, ‘उनके अनोखे दृष्टांत से हमें सब्र की प्रेरणा मिले। कानपुर की इस शर्मनाक घटना से हमें सबक सीखना चाहिए, ताकि हम यह अनुभव कर सकें कि स्थानीय शांति-स्थापना के लिए यदि तीन सौ स्त्री-पुरुषों का भी बलिदान हो जाता तो ज्यादा महंगा नहीं था।’  विद्यार्थी जी ने ‘प्रताप’ का संपादन करते हुए साहित्य, संस्कृति और राजनीति को राष्ट्रीय आंदोलन का घटक माना। एक उत्कृष्ट पत्रकार, ओजस्वी वक्ता और निर्भीक सेनानी के रूप में वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में ऐसे स्तम्भ हैं, जिनसे आने वाली पीढ़ियां प्रेरणा लेती रहेंगी। ‘प्रताप’ के माध्यम से उनका योगदान सदैव स्मरणीय और प्रेरणाप्रद रहेगा। 

(लेखक राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट के संयोजक हैं.)

27 फ़रवरी 2017

मैं आज़ाद हूँ

सौरभ बाजपेयी 

आज शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद की बलिदान दिवस है. 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश में अलीराजपुर जिले के भवरा गाँव में जन्मे आज़ाद भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का सबसे बड़ा मिथक थे. मिथक इसलिए कि ज्यादातर लोग उन्हें “किसी जासूसी उपन्यास के काल्पनिक रहस्यात्मक अति साहसी हीरो” की तरह याद करते हैं. उनके बारे में आम है कि आज़ाद पुलिस को चकमा देने में माहिर थे. वो कभी साधू कभी ड्राइवर का भेष बनाकर जासूसों को धता पढ़ाते रहते थे. वो इतने अचूक निशानची थे कि उड़ती चिड़िया पर निशाना साध सकते थे आदि-आदि. उनके बारे में कमोबेश यह सब बातें सच थीं. बावजूद इसके आज़ाद को सिर्फ इन्हीं वजहों से याद करना ज्यादती होगी. 



आज़ाद क्रांतिकारी आन्दोलन को दो पीढ़ियों के बीच का सेतु थे. एक पीढी रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह खान, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिरी सरीखों की थी. काकोरी ट्रेन डकैती (1925) के बाद यह समूची पीढ़ी या तो शहीद हो गयी या बुरी तरह तितर-बितर हो गयी. इनमें आज़ाद ही ऐसे थे जो पुलिस के हत्थे नहीं चढ़े और जिनके पास हर मुसीबत के बावजूद हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी को पुनर्संगठित करने का जज़्बा था. आज़ाद को याद करने की बुनियादी कसौटी यह है कि वह आज़ाद ही थे जिन्होंने क्रांतिकारी आन्दोलन की दूसरी पीढ़ी को खुद अपने परिश्रम से संगठित किया था. इस पीढ़ी का सबसे चमकता नाम शहीद भगत सिंह थे जो क्रान्ति का एक मौलिक दर्शन विकसित करने की राह में आगे बढ़ रहे थे. भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद लगभग हमउम्र थे. इसके बावजूद आज़ाद हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के निर्विवाद कमांडर-इन-चीफ थे. अपने सभी साथियों पर उनका जबर्दस्त नैतिक प्रभाव था. 

भगत सिंह चंद्रशेखर आज़ाद के बड़े चहेते थे. एक संगठनकर्ता होने के नाते उन्हें भगत सिंह की बौद्धिक क्षमता का अंदाजा था. इसीलिए वो भगत सिंह को व्यक्तिगत साहसिक कार्यवाहियों से दूर रखना चाहते थे. वो अपनी जेबों में किताबें भरकर लाते थे ताकि भगत सिंह पढ़ सकें. विचारधारा में खुद की कोई रूचि न होने के बावजूद वो भगत सिंह पर आँख मूंदकर यकीन करते थे. उन्होंने कुछ लिखा नहीं क्योंकि वो अपनी जासूसी को लेकर बेहद सचेत थे. परन्तु उनके साथी और समकालीन बताते हैं कि वो अपनी सोच में बहुत प्रगतिशील थे. जहाँ एक ओर भगत सिंह भारतीय क्रन्तिकारी आन्दोलन के प्रतीक माने गए वहीं चंद्रशेखर आज़ाद की छवि मूंछों पर बेवजह ताव देने वाले आर्य समाजी क्रांतिकारी की बना दी गयी. हमें सोचना चाहिए कि जो आदमी भगत सिंह जैसी महान बौद्धिक को सहेजता हो, वह अपनी सोच में दकियानूस कैसे हो सकता है? 

इसे सिद्ध करने के लिए कई मिसालें दी जा सकती हैं. पूर्णचंद्र सनक नामक आज़ाद के एक शिष्य ने जब उनसे हिन्दू राष्ट्र को लेकर बहस की तो आज़ाद बोले— हे भगत! तेरी ये हिन्दू राजतंत्र की कल्पना देश को बहुत बड़े खतरे में डालने वाली है. कुछ मुसलमान भी ऐसा ही स्वप्न देखते हैं. लेकिन यह तो पुराने शाही घरानों के हिन्दुओं और मुसलमानों की ख़ब्त है. हमें तो फ्रंटियर से लेकर बर्मा तक और नेपाल से लेकर कराची तक के हर हिन्दुस्तानी को साथ लेकर एक तगड़ी सरकार बनानी है. जब फिरंगी भाग जाएंगे तब ऐसी सरकार बनेगी और तब हर आदमी खुशहाल होगा. यानी आज़ाद अपनी सोच में बहुत प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष थे. 

उनके लिए भी हिंसा कोई बिन सोच-विचार की चीज़ नहीं थी. क्रांतिकारी दल को अपना काम चलाने के लिए डकैती आदि करनी पड़ती थीं. एक बार कानपुर के पास एक मंदिर से पुखराज की मूर्ती चुराने की योजना बनी. आज़ाद उसके काम को अंजाम देने वाले दल के मुखिया थे. मंदिर और आस-पास के माहौल को देखकर आज़ाद को यकीन हो गया कि इस काम में एक-दो निर्दोषों की जान जा सकती है. चार दिन तक वो लोग मंदिर गए लेकिन आज़ाद ने एक्शन की अनुमति नहीं दी. इस पर उनके कुछ कनिष्ठ साथियों ने कहा कि अब इन लोगों को कहाँ तक बचाया जाए. तो आज़ाद बड़े प्यार से बोले— धत्त  पगले! देशद्रोही के सिवा प्रत्येक देशवासी की जान कीमती है, उसे छीनना महापाप है. 

आजकल यह झूठ चारों तरफ फैला हुआ है कि जवाहरलाल नेहरु ने चंद्रशेखर आज़ाद की पुलिस से मुखबिरी की थी. पहली बात कि क्रांतिकारी आन्दोलन के लिए चन्दा इकठ्ठा करना, उन्हें छुपने के लिए शरण देना और उनके परिवारों की देखभाल करने का काम अक्सर कांग्रेस के लोग ही किया करते थे. शीर्ष नेतृत्व से लेकर जमीनी कार्यकर्ताओं तक कांग्रेसी और क्रांतिकारी एक-दूसरे की मदद किया करते थे. गांधीवादी सत्याग्रहों में भाग लेने वाले एक ऐसे कार्यकर्ता के बारे में हम खूब जानते हैं जो आज़ाद और उनके साथियों को तक सूचनाएं पहुंचाता था. मोतीलाल नेहरु और जवाहरलाल नेहरु क्रांतिकारी आन्दोलन को खूब चंदा देने वाले लोगों में थे यह बात किसी से छिपी नहीं थी. एक बार आज़ाद के कुछ साथी किसी एक्शन की योजना पर काम करते हुए धन की कमी महसूस कर रहे थे. उन्होंने इस कमी को पूरा करने के लिए डकैती डालने की योजना बनाई. यह बात जब आज़ाद को पता चली तो उन्होंने साफ़ कहा— जितना चंदा आसानी से इकठ्ठा हो सके, कर लो. बाकी कमी कांग्रेस पूरी कर देगी. कानपूर कांग्रेस के दफ्तर ने तो एक बार अपने गल्ले में जितना रूपया था, सब ‘इमरजेंसी केस’ की मद में डालकर आज़ाद को दे दिया. इस तरह, विचारधारात्मक मतभेदों और संघर्ष के तौर-तरीकों में जमीन-आसमान का अंतर होने के बावजूद मुख्यधारा का गांधीवादी आन्दोलन और क्रांतिकारी संघर्ष एक ही उद्देश्य पर काम कर रहे थे, वह था— अंग्रेजी राज की जकड़न से देश को आज़ाद कराना. 

आज़ाद सहित सभी क्रांतिकारी आज़ादी की लड़ाई के सरफ़रोश दीवाने थे. वह अपने उद्देश्यों को लेकर इस कदर समर्पित थे कि उन्होंने देश के आगे हर स्वार्थ की तिलांजलि दे दी थी. आज़ाद ने बहुत बचपने में ही अपने माता-पिता को छोड़कर क्रांतिकारी आन्दोलन का हाथ थाम लिया था. पुलिस की चौकसी से बचने के लिए जरूरी था कि वो अपने माता-पिता से न मिलें. लेकिन हद तो तब हुयी जब एक बार बुजुर्ग माता-पिता की देखरेख के लिए कुछ पैसा पार्टी फण्ड से आज़ाद को दिया गया. एचएसआरए पैसे की कमी से हमेशा जूझती रहती थी. ऐसे में क्रांतिकारी पार्टी के फण्ड से अपने माता-पिता को पैसे भेजना आज़ाद को गंवारा न हुआ. जब उनसे इस बाबत पुछा गया तो बोले— मेरे बूढ़े माता-पिता को जैसे-तैसे एक जून की रोटी तो मिल ही जाती है. अगर वो भूखों मर भी गए तो देश का क्या बिगड़ेगा. लेकिन पैसे की कमी से अगर एक भी क्रांतिकारी भूखों मर गया तो सोचो देश को कितना बड़ा नुकसान होगा. यह थे आज़ाद जिन्होंने न सिर्फ आज़ाद नाम मिला था बल्कि उन्होंने खुद को बहुत से मायामोह से भी आज़ाद कर लिया था. उनकी पुण्यतिथि पर आज़ादी की लड़ाई के इस महान नायक का स्मरण करिए और उनसे यह वादा कीजिये कि उन्होंने जिस देश के लिए अपना सर्वस्व दान कर दिया था, उसे आप अपने जीते-जी बर्बाद न होने देंगे.     
   
(लेखक राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट के संयोजक हैं.) 

21 फ़रवरी 2017

मौलाना आज़ाद ज़िन्दाबाद

मिनहाज़ अहमद

मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद की ज़िंदगी क्या थी और इन्होंने हिन्दुस्तानी क़ौम को क्या पैग़ाम दिया था । मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद की ज़ात गिरामी किसी तआरुफ़ की मोहताज नहीं । उनका शुमार बीसवीं सदी के अज़ीम एल्मर तिब्बत शख़्सियात में किया जाता है । मौलाना की शख़्सियत मुख़्तलिफ़ रंगों की आईना-ए-दार थी । उनकी ज़ात में क़ुदरत ने बैयकवक़त बहुत सी ख़सुसीआत जमा कर दी थीं । वो आलम दीन भी थे और मुफ़स्सिर क़ुरआन भी । वो ख़तीब भी थे और मुफ़कर भी वो मुदीर भी थे और दानिश्वर भी वो एक सियासत दां भी थे , सहाफ़ी भी और शोला बयान मुक़र्रर भी । आपकी तक़रीर में ऐसी दिल-कशी थी कि सामईन मस्हूर हो कर रह जाते । दिलचस्प बात ये है कि ये कहना मुश्किल है कि इन की कौनसी ख़ुसूसीयत बाक़ी तमाम ख़सुसीआत पर हावी थीं । आपकी ज़िंदगी मुसलसल जहद-ओ-अमल से इबारत है ।


अपनी बेशुमार ख़ूबीयों और सलाहीयतों की बुनियाद पर उन को अमामु उल-हिंद के ख़िताब से नवाज़ा गया । वो अपनी ज़ात मैं ख़ुद एक अंजुमन थे, मिल्लत का दर्द उन के सीने में पिनहां था , वो सच्चे मुहब वतन , मुसलम क़ौम परस्त और जद्द-ओ-जहद आज़ादी के अलमबरदार थे । मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद ने सैकूलर हिंदुस्तान की तामीर में अहम किरदार अदा किया है । उन्होंने आज़ादी के हुसूल के लिए क़ौमी यकजहती के उसूल को फ़रोग़ दिया , मौलाना ने हिंदू मुसलम इत्तिहाद , मुशतर्का तहज़ीब और मुत्तहदा क़ौमीयत की हिफ़ाज़त को हमेशा अव्वलीन तर्जीह दी । मुल्क की आज़ादी के लिए उन्होंने अलहिलाल और अलबलाग़ अख़बार के ज़रीया अवाम-ओ-ख़वास तक आज़ादी का पैग़ाम पहुंचाया उन की तहरीर का जादू ये था कि आज़ादी की तहरीक अवामी तहरीक बन गई और लोग दिल-ओ-जान से इसमें शरीक होने लगे । 

सयासी नुक़्ता-ए-नज़र से जब हम मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद की ज़िंदगी का मुताला करते हैं तो हमें मालूम होता है कि आपकी सयासी ज़िंदगी जज़्बा-ए-हुब अलोतनी से पर थी वो क़ौमों के दरमयान मुहब्बत और भाई चारा का जज़बा रखते थे । उन्होंने हिंदुस्तान की सलामती और आज़ादी के लिए जंग-ए-आज़ादी में हिस्सा लेकर अंग्रेज़ हुकमरानों का जवाँमर्दी और बहादुरी के साथ मुक़ाबला किया ।नज़रियाती तौर पर वो तकसीम-ए-हिंद के मुख़ालिफ़ थे। हिन्दोस्तान की तक़सीम के ख़िलाफ़ मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद ने जो सख़्त रवैय्या अपना या था उस के सबब उन्हें ना सिर्फ हिन्दोस्तान बल्कि आलमी तारीख़ में एक अहम मुक़ाम हासिल है । उनकी ख़्वाहिश थी कि हमारा मुल़्क हिन्दोस्तान गंगा जमुनी तहज़ीब की ऐसी मिसाल हो जो दुनिया में कहीं ना हो । इन्होंने तकसीम-ए-हिंद को रोकने के लिए अपनी तहरीर और तक़रीर के ज़रीया अपने करब और अपनी आवाज़ को हर हिन्दुस्तानी तक पहुंचाने की कोशिश की । खासतौर पर वो मुसलमान जो पाकिस्तान के क़ियाम के हामी थे और हिज्रत के लिए तैयार हो गए थे उन को बहुत आमादा करने की कोशिश की और कहा कि तुमने हिन्दोस्तान को आज़ाद कराने के लिए अज़ीम क़ुर्बानियां दीं । अपने मुल्क हिन्दोस्तान को छोड़कर मत जाओ ये मुल़्क तुम्हारा है , उसकी आज़ादी और तरक़्क़ी मैं तुम्हारी हिस्सादारी है । 

इन्होंने उस मौके पर दिल्ली की शाही मस्जिद में अपने ख़िताब के दौरान अपने जज़बात का इज़हार करते हुए कहा कि : आज अगर एक फ़रिश्ता आसमान की बदलियों से उतर आए और क़ुतब मीनार पर खड़े हो कर ये ऐलान कर दे कि सवो राज (आज़ादी) 24 घंटे के अंदर मिल सकता है , बशर्ति के हिंदुस्तान हिंदू मुसलम इत्तिहाद से दस्तबरदार हो जाये , तो मैं सवो राज से दस्तबरदार हो जाऊँगा मगर आपसी इत्तिहाद से दस्तबरदार ना होऊंगा । क्योंकि अगर सौ-ओ-राज के मिलने में ताख़ीर हुई तो ये हिन्दोस्तान का नुक़्सान होगा , लेकिन अगर हमारा इत्तिहाद जाता रहा तो ये आलमएइन्सानियत का नुक़्सान है । मौलाना की तक़रीर के इस इक़तिबास से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वो बकाए बाहम और क़ौमी यकजहती को कितना अहम समझते थे । मगर अफ़सोस मौलाना का ये ख़ाब शर्मिंदा-ए-ताबीर ना हो सका और ना सिर्फ ये कि हिन्दोस्तान तक़सीम हुआ बल्कि मुस्लमान तक़सीम हो गया । जिस पर उन के जज़बात ये थे :तुम्हें याद है मैंने तुम्हें पुकारा । तुमने मेरी ज़बान काट ली , मैंने क़लम उठाया और तुमने मेरे हाथ क़लम करदिए, मैंने चलना चाहा तुमने मेरे पांव काट दिए । मैंने करवट लेनी चाही तुमने मेरी कमर तोड़ दी। ये फ़रार की ज़िंदगी जो तुमने हिज्रत के मुक़द्दस नाम पर इख़तियार की है इस पर ग़ौर करो , अपने दिलों को मज़बूत बनाओ और अपने दिमाग़ों को सोचने की आदत डालो । अज़ीज़ो तबदीलीयों के साथ चलो ये ना कहो कि हम इस तबदीली के लिए तैयार ना थे बल्कि अब तैयार होजाओ । सितारे टूट गए लेकिन सूरज तो चमक रहा है । इस से किरणे मांग लू और उन को अँधेरी राहों में बिछा दो-जहाँ उजाले की सख़्त ज़रूरत है । यहां ये बात काबिल-ए-ज़िक्र है कि मौलाना हिंदू मुसलम इत्तिहाद के ज़बरदस्त हामी थे । उन्होंने अपने इस नज़र ये का इज़हार तहरीरों के ज़रीया भी किया और तक़रीरों के ज़रीया भी । मौलाना की मशहूर तक़रीर जिससे उन के दिल में इस्लाम और हिन्दोस्तान दोनों से मुहब्बत का इज़हार होता था गांधी जी को बहुत पसंद थी जिसमें मौलाना ने कहा था कि मैं मुस्लमान हूँ और फक्रके साथ महसूस करता हूँ कि मुस्लमान हूँ , इस्लाम की तेराह सौ बरस की शानदार रिवायतें मेरे विरसे में आई हैं । मैं तैयार नहीं कि इस का छोटे से छोटा हिस्सा भी ज़ाए होने दूं । इस्लाम की तालीम इस्लाम की तारीख़ , इस्लाम के उलूम-ओ-फ़नून , इस्लाम की तहज़ीब मेरी दौलत का सरमाया है और मेरा फ़र्ज़ है कि में इस की हिफ़ाज़त करूँ । लेकिन इन तमाम एहसासात के साथ एक और एहसास भी रखता हूँ जिसे मेरी ज़िंदगी की हक़ीक़तों ने पैदा किया है । मैं फक्रके साथ महसूस करता हूँ कि मैं हिन्दुस्तानी हूँ , मैं हिन्दोस्तान की एक और ना-काबिल तक़सीम मुत्तहिद क़ौमीयत का एक अंसर हूँ । मौलाना के इन अलफ़ाज़ से ये बख़ूबी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वो हिंदू मुसलम इत्तिहाद के कितने बड़े हामी थे । मौलाना ने आज़ादी की जद्द-ओ-जहद में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया , आज़ादी की जंग में वो महात्मा गांधी के साथ शरीक रहे । जनवरी1920 को मौलाना आज़ाद का महात्मा गांधी से राब्ता हुआ । आप गांधी जी के ख़्यालात से काफ़ी मुतास्सिर हुए और गांधी जी की क्या दत्त में जद्द-ओ-जहद आज़ादी में मसरूफ़ हो गए । 

मौलाना आज़ाद 1940 - 1946 तक इंडियन नैशनल कांग्रेस के सदर रहे । इस अरसा में इन्होंने आईनी तात्तुल दूर करने और फ़िर्कावाराना यकजहती के क़ियाम के लिए अनथक कोशिशें कीं । मौलाना का एक कारनामा ये भी है कि पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी के आर्किटेक्चर जदीद हिन्दोस्तान की तामीर में आपकी ख़िदमात ना-काबिल फ़रामोश हैं । कांग्रेस पार्टी में शमूलीयत के बाद मौलाना कई मर्तबा जेल गए , मुल्क की आज़ादी के लिए उन्हों नेकईबरस तक जेल की सऊबतें बर्दाश्त कीं । लेकिन इस से ना तो आपके अज़म-ओ-इस्तिक़लाल में कोई कमी आई और ना ही आपके दिल से वतन की मुहब्बत का जज़बा कम हो सका । आपकी कोशिशों का नतीजा ये हुआ कि पूरा मुलक बुला तख़सीस मज़हब-ओ-मिल्लत जद्द-ओ-जहद आज़ादी में शामिल हुआ । अंजाम-कार आज़ादी के मत्वालों की तहरीक रंग लाई और हमारा मुल़्क हिन्दोस्तान आज़ादी की नेअमत से सरफ़राज़ हो गया । उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी नाकामी ये थी कि वो तक़सीम को ना रोक सके । हिंद-ओ-स्तान के रहनुमाओं में बहादुर शाह ज़फ़र के बाद मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद वाहिद ऐसे लीडर थे जिन्हों ने आज़ाद ई हिंद के लिए हिंदूओं और मुस्लमानों को एक प्लेटफार्म पर जमा क्या हो। आज़ादी के बाद तक़सीम-ए-वतन का हादिसा पेश आया । मुस्लमान दो हिस्सों में तक़सीम हो गए । मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद तक़सीम-ए-वतन के ख़िलाफ़ थे इन्होंने हमेशा दो क़ौमी नज़रिया की मुख़ालिफ़त की इन्होंने अपनी तहरीर और तक़रीर के ज़रीया मुस्लमानों को ये पैग़ाम देने की कोशिश की कि ये मुल़्क तुम्हारा है तुम उसे छोड़कर मत जाओ । क्योंकि ऐसा करने से तुम्हारा इत्तिहाद तक़सीम होगा और तुम्हारी ताक़त टूट जाएगी । एक मौक़ा पर मौलाना ने अपनी क़ौम से बहुत ही दर्द मंदाना अंदाज़ में ख़िताब करते हुए कहा कि : आप मादर-ए-वतन को छोड़कर जा रहे हैं । आपने सोचा उस का अंजाम क्या हो आपके इस तरह फ़रार होने से हिन्दोस्तान में बसने वाले मुस्लमान कमज़ोर हो जाऐंगे और एक वक़्त ऐसा भी आ सकता है जब पाकिस्तान के इलाक़ाई बाशिंदे अपनी अपनी जुदागाना हैसियतों का दावा लेकर उठ खड़े हूँ । क्या उस वक़्त आपकी पोज़ीशन उन में बन बुलाए मेहमान की तरह नाज़ुक और बेबस नहीं रह जाएगी। मौलाना के बाक़ौल हिंदू आपका मज़हबी मुख़ालिफ़ तो हो सकता है क़ौमी और वतनी मुख़ालिफ़ नहीं । आप इस सूरत-ए-हाल से निपट सकते हैं मगर पाकिस्तान में आपको किसी वक़्त भी क़ौमी और वतनी मुख़ालफ़तों का सामना करना पड़ जायेगा । जिसके आगे आप बेबस हो जाऐंगे । मगर अफ़सोस लाख कोशिशों के बावजूद मौलाना आज़ाद अपने मक़सद में कामयाब ना हो सके और मुल्क तक़सीम हो गया । तकसीम-ए-हिंद का ज़ख़म सहने के बाद जब हिन्दोस्तान एक आज़ाद मुल्क की हैसियत से दुनिया के नक़्शा पर वजूद में आगया और हुकूमत तशकील दी गई तो तालयय ख़िदमात की रोशनी में मुल्क के पहले वज़ीर-ए-आज़म आँजहानी जवाहर लाल नहरू ने मौलाना आज़ाद को हिन्दोस्तान के पहले वज़ीर-ए-तालीम की हैसियत से वज़ारात-ए-तलीम का क़लमदान सौंपा । मौलाना आज़ाद क्योंकि तालीम को इन्सानी तरक़्क़ी की बुनियाद समझते थे इसलिए उनकी ख़्वाहिश थी कि मुल्क का हर फ़र्द सदफ़ीसद तालीम-ए-याफ़ता हो । आपने पूरे हिन्दोस्तान में यकसाँ निज़ाम-ए-तालीम पर-ज़ोर दिया ताकि मुल्क के दानिश्वर तबक़े की सोच और फ़िक्र भी यकसाँ हो । 

वज़ीर-ए-तालीम की हैसियत से मौलाना आज़ाद ने तालीम-ओ-सक़ाफ़्त के लिए बड़ा काम किया और बहुत से इदारे खोले जैसे साहित्य अकैडमी , नृत्य नाटय कला अकैडमी , आई ,सी , सी ,आर वग़ैरा । मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद की सोच का दायरा भी बहुत वसीअ था । एक तरफ़ अगर वो तकसीम-ए-हिंद से क़बल पाकिस्तान के क़ियाम के बारे में सोच भी नहीं सकते थे मगर दूसरी तरफ़ तक़सीम के बाद पा कसता नून के बारे में उन्होंने मुनकसरालमज़ाजी के साथ काम लिया और सहाफ़ीयों से यही कहा करते थे कि अब क्योंकि पाकिस्तान का क़ियाम अमल में आगया है । उन की ख़्वाहिश यही है कि वो फले फूले और तरक़्क़ी की राह पर गामज़न हो । उनके ज़माने में वज़ारात-ए-तलीम ने कई मैदानों में रहनुमाई की और ये बताया कि तालीम महिज़ किताबी इलम का नाम नहीं है। इस ज़माना में साइनटीफ़ीक और टेक्निकल एजूकेशन , टीचर ट्रेनिंग और ज़बान को पढ़ाने की ट्रेनिंग और शेड्यूल्ड कासट और शेड्यूल्ड ट्राइब के लिए स्कालर शिप का सिलसिला शुरू हुआ । मुल्क के पसमांदा तबक़ों की तरक़्क़ी की मुख़्तलिफ़ स्कीमों मौलाना आज़ाद ही के सामने बनी और शुरू हुईं । इन्सानी वज़ारत के फ़रोग़ के नाम की इस्तिलाह का इस्तिमाल अगरचे मौलाना ने ख़ुद नहीं किया था । मगर इन्होंने वज़ारात-ए-तलीम की इस तरह से तंज़ीम की थी कि हकूमत-ए-हिन्द के ज़हन में ये ख़्याल आया कि तालीम को इन्सानी वसाइल के फ़रोग़ का ज़रीया होना चाहीए । मौलाना की दानशोराना फ़िक्र का असर ये हुआ कि इन के ज़माने में काउंसल आफ़ टेक्नीकल एजूकेशन की तशकील हुई । यूनीवर्सिटी ग्रान्ट्स कमीशन ( यू , जी , सी ) का क़ियाम भी मौलाना की वज़ारत के दौरान अमल में आया । अदब , आर्ट और म्यूज़िक की अकैडमियों का मन्सूबा बिना या और उन्हें क़ायम किया । साहित्य अकैडमी , संगीत नाटय अकैडमी और ललित कला अकैडमी जैसे मंसूबे उनकी कामयाबी की दलील हैं । सयासी बसीरत का ये आलम था कि उन्हें इंडियन नैशनल कांग्रेस का सबसे जवाँ-साल सदर मुक़र्रर किया गया । 

आज़ाद हिन्दोस्तान के पहले वज़ीर-ए-आज़म पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें अमीर का रवां का ख़िताब दिया था पण्डित नहरू मौलाना आज़ाद को हिन्दोस्तान की अज़ीम विरासत और मुशतर्का तहज़ीब का नुमाइंदा समझते थे । मौलाना के इंतिक़ाल पर इन्होंने कहा कि मौलाना जदीद और क़दीम के दरमयान पुल का काम करते थे और जब कभी भी किसी मसला पर इन से मश्वरा किया जाता था तो वो बहुत बामक़सद मश्वरा दिया करते थे । मौलाना एक जय्यद आलम-ए-दीन थे । उर्दू , फ़ारसी और अरबी में तो उन्हें महारत थी लेकिन उन्हें इंग्लिश नहीं आती थी । एक जगह वो ख़ुद फ़रमाते हैं कि उन्हें एहसास हुआ कि माडर्न तालीम , फ़लसफ़ा , साईंस और टैक्नोलोजी को समझने के लिए इंग्लिश बहुत ज़रूरी है । चुनांचे इन्होंने ना सिर्फ ये कि इंग्लिश ज़बान सीखी बल्कि बाइबल का भी तफ़सीली मुताला किया । जिसका बेहद फ़ायदा उन्हें वज़ीर-ए-तालीम बनने के बाद हुआ । 

मौलाना आज़ाद बजा तौर पर इस्लाम को इन्सानियत की तामीर-ओ-तरक़्क़ी और हिदायत-ओ-रहनुमाई के लिए एक बेहतरीन मज़हब और निज़ाम ज़िंदगी समझते थे । जिसमें हर शोबा-ए-ज़िंदगी के लिए अमली हिदायात और दस्तूर-ए-हयात मौजूद है , उन की नज़र में इस्लाम एक इन्सानी , अख़लाक़ी और जमहूरी निज़ाम-ए-हयात है जो ख़ुदाए वाहिद की बंदगी के सिवा हर तरह की गु़लामी का ख़ातमा कर देता है और दुनिया को अमन-ओ-आफ़ियत का गहोराह बना देता है । इन्होंने इस्लाम की तर्जुमानी के लिए किताब-ओ-संत की रूह प्रवर और इन्सानियत नवाज़ तालीमात की दावत दी औरअलहलाल अलबलाग़ में उसकी तरफ़ बार-बार मुतवज्जा किया । अमामु उल-हिंद मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद को याद करने का यही मक़सद है कि मुल्क को मुसबत राहों पर कैसे ला या जाये , ना मुसाइद हालात में हिक्मत-ओ-दानाई के साथ तरक़्क़ी की मंज़िलें कैसे ढडी जाएं , एक महाज़ पर नाकाम होने के बा वजूद नए महाज़ पर कामयाबी हासिल करने की कोशिश कैसे की जाये , जोश जज़बात की जगह ग़ौर-ओ-फ़िक्र की रोष कैसे आम की जाये । 

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद की तालीमात को हासिल कर के उनके नक़श-ए-क़दम पर चलने की कोशिश करें । अमामु उल-हिंद मौलाना अबोलकलाम आज़ाद आज हमारे दरमयान नहीं हैं , उन की तालीमात , उनका पैग़ाम जो हमारी नौजवान नसलों के लिए मिशअल-ए-राह होना चाहीए था अफ़सोस कि हमारी नसल इस से भी बख़ूबी वाक़िफ़ नहीं । इसकी एक वजह तो ये है कि बदक़िस्मती से हमारे इस्लाफ़ का ज़िक्र तालीमी निसाब से निकाल दिया गया है , इस से बढ़कर महरूमी ये कि ख़ुद हमने अपने बुज़ुर्गों के बारे में जानना छोड़ दिया । यहां इस मौक़ा पर मुनासिब होगा कि अपने क़ाइद हज़रत मौलाना आज़ाद की हयात-ओ-ख़िदमात के बारे में अपने क़ारईन को मुतआरिफ़ कराने के लिए ऐसी कोशिश की जाये जिससे हमारी नौजवान नसल इस्तिफ़ादा हासिल कर सके.

(लेखक राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट के महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं. वे दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से अरबी में पीएचडी कर रहे हैं .)

29 जनवरी 2017

कोई नहीं है गाँधी का हत्यारा (Nobody killed Gandhi)

३० जनवरी १९४८ को महात्मा गाँधी को किसने मारा? आज की राजनीति के हिसाब से कहें तो सेमी-आटोमेटिक बेरेट्टा एम पिस्तौल से चली तीन गोलियों ने. न ही कोई विचारधारा और न ही कोई व्यक्ति इसके लिए जिम्मेदार था. अगर कोई अपनी सारी सूझ-बूझ को ताख पर रख दे तो ही उस सच को निगल सकता है जिसे ज़बरदस्ती हमारे गले में धकेला जा रहा है. लेकिन अगर कोई ऐसा न करे तो गाँधीजी की हत्या में आरएसएस की संलिप्तता के बारे बहुत कुछ है जिसे बार-बार याद करने, दोहराने और साबित करने की जरूरत है. मुद्दे से भटकने की कोई जरूरत नहीं है. यह लेख एक ऐसी साजिश की तरफ इशारा करता है जिसमें हिन्दू महासभा और आरएसएस दोनों बराबर के भागीदार थे.

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गाँधीजी की हत्या पर आर० के० लक्ष्मण का एक कार्टून 
आरएसएस कभी स्वीकार नहीं करता कि गाँधीजी की हत्या में उसका कोई हाथ था. उनके हिसाब से नाथूराम गोडसे द्वारा अदालत में दिया गया बयान इस आरोप को झूठा सिद्ध करने के लिए काफी है. जिसमें गोडसे ने संघ से अपना कोई भी सम्बन्ध होने से इनकार किया था और कहा था कि सिर्फ वो और नारायण आप्टे ही गाँधीजी की हत्या के षड़यंत्र में शामिल थे. आरएसएस के हिसाब से खुद हत्यारे की ओर से दिया गया यह बयान काफी होना चाहिए. लेकिन इसी बयान में नाथूराम हिन्दू महासभा के विनायक दामोदर सावरकर का हाथ होने से भी साफ़ मुकर गया था. क्या इसका अर्थ है कि न तो आरएसएस और न ही हिन्दू महासभा गाँधीजी की हत्या के लिए जिम्मेदार थे? दरअसल, नाथूराम से कहा गया था कि अदालती कार्यवाही में वो हिन्दू महासभा और आरएसएस का बचाव करे. इसीलिए पूरी कार्यवाही के दौरान उसने एक बार भी वी० डी० सावरकर की ओर आँख उठाकर नहीं देखा था. 

जब लालकृष्ण अडवानी ने आरएसएस को इस मामले में क्लीन चिट देने की कोशिश की थी तो नाथूराम गोडसे के भाई और साजिश करने वालों में एक गोपाल गोडसे बिफर उठे थे. न सिर्फ उसने मैंने गाँधी को क्यों मारा नामक किताब में बल्कि अन्य जगहों पर भी उसने जोर देकर कहा कि उसके बड़े भाई ने कभी भी आरएसएस नहीं छोड़ी और अंत तक संघ के बौद्धिक कार्यवाह के तौर पर काम करता रहा. जब उससे नाथूराम गोडसे के अदालती बयान एक बारे में पूछा गया तो गोपाल गोडसे ने कहा कि नाथूराम ने ऐसा इसलिए कहा कि “”गाँधी की हत्या के बाद गोलवलकर और आरएसएस काफी मुसीबत में पड़ गए थे”. “आप कह सकते हैं”, गोपाल गोडसे ने कहा, “आरएसएस ने कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया था कि जाओ और गाँधी को मार दो लेकिन आप उससे खुद को अलग नहीं कर सकते”. 

यह तो अदालती दस्तावेजों में दर्ज है कि फाँसी पर चढ़ने से पहले नाथूराम गोडसे ने आरएसएस की नयी संस्कृत प्रार्थना पढी थी जिसे पुरानी प्रार्थना की जगह १९४० में शामिल किया गया था. मृदुला मुख़र्जी, आदित्य मुख़र्जी और सुचेता महाजन अपनी किताब आरएसएस, स्कूल टेक्स्ट्स एंड मर्डर ऑफ़ महात्मा गाँधी में सही फरमाते हैं: “अगर वह तब आरएसएस में नहीं था, जैसा वह दावा करता है, तब वह नयी प्रार्थना से कैसे परिचित था और उस प्रार्थना को अपनी जिंदगी के ऐसे नाजुक मौके पर, जब वह मृत्यु के मुहाने पर खड़ा है, क्यों पढता है?” चलिए एक क्षण के लिए मान लेते हैं कि आरएसएस इस षड़यंत्र में सीधे शामिल नहीं था. वह तो हिन्दू महासभा का काम था जिसे ऐसा स्वीकार करने में कभी कोई शर्म नहीं आयी. आज भी उसे इस मामले में जरा सा भी संकोच नहीं होता. बल्कि अभी हाल ही में उन्होंने गोडसे की मूर्तियाँ स्थापित करने और मंदिर बनाने की बाकायदा कोशिशें की हैं. तब हिन्दू महासभा और आरएसएस के बीच के संबंधों की जाँच-पड़ताल जरूरी हो जाती है.  

गृह मंत्रालय का एक रिकॉर्ड बताता है कि आरएसएस और हिन्दू महासभा के बीच आपसी रिश्ते कितने गहरे थे. ८ अगस्त १९४७ को गृह सचिव ने सीआईडी के डीआईजी और मुंबई के पुलिस कमिश्नर से हिन्दू महासभा और आरएसएस के सदस्यों की लिस्ट तैयार करने को कहा. पूना पुलिस ने सिर्फ हिन्दू महासभा के सदस्यों की लिस्ट ही जमा कराई और आरएसएस के सदस्यों की अलग लिस्ट नहीं भेजी. क्योंकि दोनों के सदस्यों की अलग पहचान करना बहुत मुश्किल था और गुप्त संगठन होने की वजह से आरएसएस के बारे में जानकारी जुटाना खुद में बहुत कठिन काम था. १९४० के बाद जब आरएसएस ने उत्तर भारत में ताकत जुटानी शुरू की थी, गुप्तचर विभाग उसकी कार्यप्रणाली की जानकारी जुटाने में भारी मशक्कत करता रहा. आरएसएस की गतिविधियों पर १७ सितम्बर १९४७ की एक रिपोर्ट बताती है कि ‘उसके (संघ के) ज्यादातर संगठनकर्ता और कार्यकर्ता या तो हिन्दू महासभा के सदस्य हैं या उसकी विचारधारा में यकीन करते हैं.’ इसीलिए जीवनलाल कपूर समिति इस नतीजे पर पहुँची थी कि ‘यह सिद्ध करने के लिए साक्ष्य मौजूद हैं कि बहुतेरे आरएसएस सदस्य हिन्दू महासभा के भी सदस्य हैं’.     

इसके अलावा, गाँधीजी की हत्या के पीछे निर्णायक भूमिका उस जहरीले प्रचार की थी जो १९३० के मध्य से देश भर में फैलाया जा रहा था. वास्तव में न सिर्फ हिन्दू सांप्रदायिक संगठन बल्कि मुस्लिम लीग भी गाँधी और अन्य कांग्रेस नेताओं के खिलाफ जहर फैला रही थी. हिन्दू और मुस्लिम दोनों तरह के साम्प्रदयिकताओं के लिए गाँधी साझे दुश्मन थे. हालांकि, आखिर में, भारत के बंटवारे के बाद वो हिन्दू साम्प्रदायिकता ही थी जिसे गाँधी भारत में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के अपने पुराने सपने को साकार करने की दिशा में सबसे बड़ा रोड़ा लगते थे. यह भी सरकारी दस्तावेजों में दर्ज तथ्य है कि उस समय के गृह मंत्री सरदार पटेल ने गोलवलकर को लिखे एक पत्र में साफ़ तौर पर कहा था कि “उनके (संघियों के) सभी भाषण सांप्रदायिक जहर से भरे थे. इस जहर के परिणामस्वरुप देश को गाँधीजी के प्राणों की क्षति उठानी पड़ी.” “आरएसएस के लोगों ने”, पटेल ने आगे जोड़ा, “”गाँधीजी की मृत्यु के बाद ख़ुशी जाहिर की और मिठाइयाँ बांटीं.” १८ जुलाई १९४८ को श्यामाप्रसाद मुख़र्जी को लिखे अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा: “”गाँधीजी की हत्या और आरएसएस-हिन्दू महासभा के बारे में मामला न्यायालय में विचाराधीन है इसलिए इन दोनों (संगठनों) की संलिप्तता के बारे में मैं कुछ नहीं कहूँगा लेकिन हमारी सूचना बताती यह पुष्ट करती है कि इन दोनों संगठनों की गतिविधियों की वजह से, ख़ास तौर पर पहली (आरएसएस) की वजह से, देश में एक ऐसा वातावरण तैयार किया गया जिस कारण से यह खौफनाक हादसा संभव हुआ.”

मान लें कि अगर ऊपर लिखा यह सब निरा झूठ है और आरएसएस का गाँधीजी की हत्या से कोई लेना-देना नहीं है तो उसे नाथूराम गोडसे, सावरकर और हिन्दू महासभा की सार्वजनिक रूप से निंदा करनी चाहिए. उसे गाँधीजी के खिलाफ दिए गए जहरीले भाषणों के लिए माफी मांगनी चाहिए जो कि अभिलेखीय स्रोतों में साफ़ तौर पर दर्ज हैं. उसे एनडीए-1 के दौरान संसद परिसर में सावरकर की प्रतिमा लगाने के लिए भी सार्वजनिक क्षमा मांगनी चाहिए. उसे सरदार पटेल की सार्वजनिक भर्त्सना भी जरूर करनी चाहिए जिन्होंने न सिर्फ आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाया था बल्कि अपने पत्राचार में संघ के बारे में इस तरह की ‘आपत्तिजनक’ टिप्पणियाँ भी की थीं. सबसे बढ़कर, उसे हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के अपने सपने से छुटकारा पा लेना चाहिए जो कि उसकी विचारधारा से नाभिनालबद्ध है और जिसकी वजह से गाँधीजी की हत्या की गयी थी.    

सौरभ बाजपेयी 
(लेखक आज़ादी की लड़ाई के मूल्यों को समर्पित राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट नामक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक हैं.)

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Nobody killed Gandhi
Who killed Gandhi on 30 January 1948? Trying to be politically correct; three petty bullets fired from semi automatic Beretta M pistol. Neither any ideology nor any individual was responsible for that. If one surrenders one’s own faculty of critical enquiry would comfortably swallow the truth we are pushed to be swallowed nowadays. But, if not, then there is much to be reiterated, reasserted and remembered about RSS links to the murder of Mahatma Gandhi. There is no need to divert the issue. Hence, this article emphasizes on historical evidences which insinuate a conspiracy in which RSS and Hindu Mahasabha were equal stake holders.

RSS never accepted that it had anything to do with Gandhi’s murder conspiracy. For them, the proof is Nathuram Godse’s court statement. Godse denied any links with the RSS and said that only he and Narayan Apte were involved in the conspiracy. For RSS, this submission by the assassinator himself is more than enough. But in the same statement he also nullified Hindu Mahasabha and its mentor Savarkar’s hand in it. Does it prove neither RSS nor Hindu Mahasabha was responsible for Gandhi’s murder? Actually, Godse was instructed to shield the RSS and the Hindu Mahasabha. That’s why during the trial he never made an eye to eye contact with Savarkar.

When Lalkrishna Advani tried to give RSS a clean chit, Godse’s younger brother and one of the conspirator Gopal Godse infuriated. Not only he wrote a book on Gandhi’s assassination entitled as Why I Assassinated Gandhi but in other places too, he testified that the elder Godse had never left the RSS and served as its Bouddhik Karyavah (intellectual worker). When he was asked by a correspondent about Godse’s court statement, Gopal Godse said that Nathuram denied it because “Golwalkar and RSS were in a lot of trouble after the murder of Gandhi”. “You can say”, junior Godse added, “RSS did not pass a resolution, saying that, ‘go and assassinate Gandhi’. But you do not disown him.” It is a recorded fact that before going to gallows, Nathuram Godse had recited the new Sanskrit RSS prayer that replaced the old one in 1940. Mridula and Aditya Mukherjee, in their famous book RSS, School Texts and the Murder of Mahatma Gandhi rightly asked: “if he was no longer in the RSS, as he claimed, then how did he know the new prayer and why did he recite it at such a critical point in his life, on the threshold of its end?”

Let’s assume for a moment, RSS was not directly involved in the conspiracy. It was Hindu Mahasabha which never ever felt ashamed of the act. Even today, it does not show any sign of embarrassment in this regard. Rather, they, very recently, tried to erect statues and build temples after Godse’s name. How close the association between both the organisations was shown by a record of Home Ministry. On 8 August 1947, the Home Secretary asked the DIG of the CID and the Police Commissioner of Bombay to prepare a list of RSS and Hindu Mahasabha workers, the Poona Police only submitted the list of Hindu Mahasabha members and didn’t submit a separate list of the RSS members. Getting information about RSS organization was quite difficult as it was a secret organization. Since 1940s when the RSS was strengthening its position in northern India, the IB was struggling to get details of its modus operandi. A report on the activities of the RSS dated 17 September 1947 stated that ‘most of its prominent organizers and workers are either members of the Hindu Mahasabha or sponsors of the Hindu Mahasabha ideology’. Hence, the Jeevan Lal Kapur Commission reached on the conclusion that ‘there is evidence to show that many RSS members were members of the Hindu Mahasabha’.

Apart from that, the pivotal factor behind Gandhi’s assassination was the vicious atmosphere which had been created since middle of 1930s. Actually, not only the Hindu communal organizations like RSS and Hindu Mahasabha but the Muslim League too was spreading venom against Gandhi and other Congress leaders. Either for Hindu or Muslim communalism, Gandhi was the common enemy. However, at last, after partition of India, it was Hindu communalism which found Gandhi the biggest obstacle to achieve the long cherished goal of establishing a Hindu Raj in India. It is again a recorded fact that Sardar Patel, the then Home Minister of India, in a letter to Golwalkar, categorically said that “all their (RSS men) speeches were full of communal poison. As a result of their poison, the country had to suffer the sacrifice of the invaluable life of Gandhiji.” “RSS men”, Patel added, “expressed joy and distributed sweets after Gandhiji’s death.” In his letter to Syama Prasad Mookerjee dated 18 July 1947 Patel categorically wrote:“As regards the RSS and the Hindu Mahasabha, the case relating to Gandhiji’s murder is sub judice and I should not like to say anything about the participation of the two organisations, but our reports do confirm that, as a result of the activities of these two bodies, particularly the former, an atmosphere was created in the country in which such a ghastly tragedy became possible.”

Above all, if everything written above is false and RSS had nothing to do with Gandhi’s assassination, it must publically condemned Nathuram Godse, Savarkar and Hindu Mahasabha. It should also apologize for its hate speeches against Gandhi that is well documented in the archival records. It should make a public apology for erecting a statue of Savarkar in the premises of Parliament of India during NDA I. It must denunciate Sardar Patel who imposed a ban on the RSS and made such comments in his correspondence. Moreover, it should get rid of ideology of Hindu Rashtra which killed Gandhi.

Saurabh Bajpai
(The writer is the National Convener of the National Movement Front; an organization dedicated to uphold the values of the freedom struggle.)

20 जनवरी 2017

हम आपके वारिस हैं खान बाबा

सभ्यता की एक सामूहिक याददाश्त होती है. हमारी याददाश्त दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है. हम जिस देश के झंडे पर फख्र करते हैं और जिस भारत माता की जयकार लगाते हैं, उसके सबसे जांबाज सपूतों को भुला चुके हैं. यह आश्चर्य की बात है कि बहुतेरे पढ़े-लिखे युवा ईमानदारी से बताते हैं कि वो खान अब्दुल गफ्फार खान को नहीं जानते. किसी को न जानने से कोई आफत नहीं आती, आफत तब आने वाली होती है जब आप अपने पुरखों को भूलने लगते हैं. जब आप अपने अतीत को भूलने लगते हैं तो यकीन मानिए आपके नीचे की जमीन दरक रही है. वो दिन दूर नहीं जब मौज से यूट्यूब पर गाँधीजी-नेहरुजी के बारे में चटकारेदार वीडिओ देखते-देखते आपके नीचे की जमीन अचानक धंस जायेगी. 

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गांधीजी के साथ बादशाह खान

आज खान अब्दुल गफ्फार खान की पुण्यतिथि के मौके पर यही चेताते हुए मैं आपसे पूछता हूँ कि आप अफगानिस्तान के जलालाबाद शहर को आप कैसे जानते हैं? जाहिर है आतंक के गढ़ के तौर पर; जहां आये दिन कोई न कोई आतंकी घटना होती रहती है. कितनों को पता है कि इसी जमीन के भीतर शान्ति का एक बेचैन मसीहा दफ़न है. खान अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हें हम सब बादशाह खान के नाम से पुकारते हैं, की कब्र इसी दहशतज़दां शहर जलालाबाद में है. फ़र्ज़ कीजिये मुस्लिम लीग न होती, जिन्ना ने देश को तोड़ने में अपनी सारी प्रतिभा न लगा दी होती और भारत का बंटवारा न हुआ होता तो क्या होता? खान अब्दुल गफ्फार खान के लाल कुर्ती वाले खुदाई खिदमतगार पूरे देश में घूम- घूमकर शान्ति और सद्भावना का सन्देश दे रहे होते. हमेशा से सशस्त्र संघर्षों में यकीन करने वाली लड़ाकू जातियों को अहिंसक सत्याग्रही बनाने का जादू काम कर गया होता और भारतीय उपमहाद्वीप के इस ऊपरी हिस्से की तस्वीर आज कुछ और होती. 

बहरहाल, इतिहास हमारी मर्जी से नहीं बनता- बिगड़ता. बादशाह खान को उनकी जन्मशती पर याद करते हुए भी यह कसक रह ही जाती है. 1890 में पेशावर के पास उत्मज़ई गाँव के एक सम्पन्न पठान परिवार में पैदा हुए बादशाह खान ऊंचे डील-डौल के मजबूत आदमी थे. इतने मजबूत कि एक बार अंग्रेज सरकार ने उनको पहनाने के लिए ख़ास मजबूत बेड़ियाँ आर्डर पर बनवाई थीं. लेकिन वो भीतर से और भी फौलाद निकले. एक तरफ अंगरेजी राज के जुल्म को सहते और दूसरी तरफ मुस्लिम लीग की दुश्मनी को निबाहते बादशाह खान ने अहिंसा को अपनी सबसे मजबूत ढाल बना लिया. उन्होंने अपनी जिंदगी के तमाम साल न सिर्फ अंगरेजी जेलों में बिताये बल्कि आज़ाद पाकिस्तान की सरकार ने भी उनसे दुश्मनों सा ही बर्ताव किया क्योंकि बादशाह खान भारत के बंटवारे की मांग के सामने सीना तानकर खड़े रहे थे. मुस्लिम सांप्रदायिक उनसे इस हद तक घृणा करते थे कि 1946 में उनकी जान लेने की नाकाम कोशिश भी की गयी. 

एक बार बादशाह खान ने गांधीजी से कहा कि गर्म खून के पठान अहिंसा का पालन किस हद तक कर पायेंगे. गांधीजी बोले कि अहिंसा कायरों का हथियार नहीं है. इसके लिए बहुत ज्यादा बहादुर होने की जरूरत है और पठान एक बहादुर कौम हैं इसलिए वो अहिंसा का सबसे दृढ़ता से पालन कर सकते हैं. वाकई यही हुआ. शायद ही गांधीजी का कोई दूसरा ऐसा सिपहसालार हो, जिसने अहिंसा का पालन करने में उतनी कुशलता हासिल की हो, जितनी बादशाह खान और उनके लालकुर्ती वालों ने की थी. बादशाह खान ने धार्मिक पठानों को अहिंसा के पालन का एक नायब नुस्खा दे दिया था. उन्होंने कहा कि अहिंसा उनके इमाम यानी आस्था का हिस्सा है. इस पर भी मुस्लिम लीग ने उन पर जबरदस्त हमला बोला और खूब हो-हल्ला मचाया गया. 

आज जब हम पूरी दुनिया में इस्लाम की कट्टरपंथी व्याख्याओं के बीच खड़े हैं, बादशाह खान और इस्लाम की उनकी समझ हमारे लिए मशाल की तरह हैं. किस तरह बादशाह खान इस इलाके के लिए शांतिदूत थे, इसे एक मिसाल से समझा जा सकता है. 1988 में उनकी मृत्यु के वक़्त अफगानिस्तान में शीत युद्ध की वजह से गृह युद्ध चल रहा था. सोवियत संघ समर्थित नजीबुल्लाह के खिलाफ अमेरिका समर्थित मुजाहिदीन संघर्ष छेड़े हुए थे. लेकिन तकरीबन दो लाख लोगों का कारवाँ जब बादशाह खान के पार्थिव शरीर को लेकर पेशावर से जलालाबाद की ओर चला, तो दोनों तरफ़ से उनके सम्मान में युद्ध विराम घोषित कर दिया गया था. हमें आप जैसे पुरखों की रौशनी की जरूरत है खान बाबा. हम आपकी लड़ाई में साथ देने के लिए नहीं थे लेकिन इस पीढ़ी के जेहन में हम आपकी विरासत को हरहाल में जिंदा कर देंगे. आपके संघर्षों के बदले हमारे पास देने के लिए इससे तुच्छ और क्या हो सकता है? 

सौरभ बाजपेयी
संयोजक
राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट
(आज़ादी की लड़ाई को समर्पित संगठन)

17 जनवरी 2017

दर्शन-रहित खादी सिर्फ एक कपड़ा है.

सौरभ बाजपेयी

क्या गाँधीजी के लिए चर्खा एक ब्रांड था? क्या गाँधीजी चर्खे के ब्रांड एम्बेसडर थे? आजकल हर चीज़ को बाज़ार की शब्दावली में पिरोने का बड़ा चलन है. मोदीजी इस कला के माहिर हैं. उनके लिए कहा जाता है कि वो इवेंट मैनेजर हैं. वो हर चीज़ को बाजारी जुमले में परोसते हैं. मेड इन इंडिया में कुछ भी इंडियन नहीं है, पर बाजारबोध है. यही हाल कमोबेश उनकी हर योजना का है. मोदीजी विकास के नाम पर वोट मांगकर सत्ता में आये हैं. उनकी मजबूरी है कि वो हर कहीं अच्छे दिन का अहसास दिलाते रहें. इसलिए इस साल खादी की बिक्री में हुयी बढ़ोत्तरी को वो अपनी उपलब्धि की तरह पेश करना चाहते हैं. इसमें कुछ गलत नहीं है लेकिन आत्मरति की एक सीमा होती है. वो उस सीमा को पार कर गए हैं. उन्हें अपनी छवि इतनी विराट दिखने लगी है कि वो गाँधीजी की जगह खुद को देखना चाहते हैं. लेकिन क्या यह कोई आसान सपना है? 

गाँधीजी के लिए चरखा कातना और खद्दर पहनना भारत की आम गरीब जनता के साथ एकाकार होने का जरिया था. गाँधीजी ने खादी अपनाई थी क्योंकि वो भारत के आम गरीब लोगों की तरह दिखना चाहते थे. आज जो लोग खादी पहनकर उसके ब्रांड अम्बेसडर बनना चाहते हैं, वो आम लोगों के बीच ख़ास दिखना चाहते हैं. गाँधीजी ने अपने करियर को स्वेच्छा से त्यागकर गरीबी को अपना लिया था. वो पैदाइशी गरीब नहीं थे, उन्होंने गरीब हो जाने के रास्ते को सोच-समझकर चुना था. आज जो लोग कैलेंडर पर चरखा कात रहे हैं वो कहते हैं कि वो पैदाइशी गरीब थे. उन्होंने—उनके खुद के कहे मुताबिक़— रेलवे स्टेशन पर चाय तक बेची है. लेकिन अपने हाथ में ताकत आते ही उन्होंने अमीर रजवाड़ों जैसी जिंदगी चुन ली है. वो भोग-विलास और सुख-सुविधा की जिंदगी जीने वाले व्यक्ति हैं. महंगे कपडे उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा हैं. कई बार तो उनके सूट की कीमत कई-कई लाख होती है. उनके द्वारा इस्तेमाल किये गए पेन और घड़ियाँ भी दुनिया के सबसे महंगे ब्रांड हैं.

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इसलिए गाँधीजी जब चरखा कातते थे तो उसके पीछे त्याग की एक पूरी गाथा छिपी थी. जो व्यक्ति लन्दन से बैरिस्टरी पढ़कर शानो-शौकत की जिंदगी बसर कर सकता था, उसने अपने लिए ताउम्र संघर्ष की राह चुनी थी. सादा-कठोर जीवन और थकाने वाली दिनचर्या— गाँधीजी के चरखे के पीछे यह नैतिक ताकत काम करती थी. गाँधीजी विलायत से लौटकर भारत आये तो वापस नहीं गए. दूसरे गोलमेज सम्मलेन के लिए ही वो लन्दन गए और वहाँ भी उन्होंने अपनी वेशभूषा नहीं बदली. अपनी धोती को आधा पहने और आधा ओढ़े वो फ़कीर यूरोप की ठंडी आबोहवा में भी ब्रिटिश राज की आँख की किरकिरी बना रहा. लेकिन आज जो लोग कैलेंडर पर गाँधीजी की जगह लेने की हसरत पाल बैठे हैं, वो पूरी दुनिया का चक्कर लगाने के लिए भारत के प्रधानमंत्री बने हैं. उनका दिल अपने देश, अपने देश के लोगों और उसकी मिट्टी में लगने से ज्यादा विदेश में रमता है. गाँधीजी ने खुद को हर तरह के झूठ-फरेब और धोखाधड़ी से बचाकर आत्मबल इकठ्ठा किया था. मोदीजी अपने हवाई जुमलों, झूठे वायदों और कॉर्पोरेट के पक्ष में आम गरीब लोगों को ठगने के लिए जाने जाते हैं. गाँधीजी के विरोधी उन्हें गाली देने के लिए “अधनंगा फ़कीर” कहते थे. मोदीजी जब खुद को फ़कीर कहते हैं तो लोग सिवाय खिल्ली उड़ाने के उनको गंभीरता से नहीं लेते.   

यहाँ यह बताना भी जरूरी है कि खादी कोई उत्पाद नहीं है. अगर है भी तो बिना अपने दर्शन के तो कतई नहीं. सवाल है कि क्या खादी की बिक्री के साथ ही खादी दर्शन का भी इजाफा हुआ है? अगर नहीं तो यह खादी हमारे किस काम की? फिर तो चाहे हम खादी पहनें या रेशम— उसका हमारे लिए कोई मोल नहीं. खादी एवं ग्रामोद्योग कमीशन का दावा है कि मोदीजी द्वारा खादी पहनने की अपील के बाद खादी की बिक्री में ३४% का इजाफा हुया है. इसलिए बदले जमाने में जो खादी की बिक्री में उछाल लाएगा वही उसका ब्रांड अम्बेसडर बन जाएगा. ठीक है लेकिन सवाल तो बनता है कि खादी के पीछे गाँधीजी ने जो दर्शन जोड़ा था क्या मोदीजी उसकी बिक्री में उछाल लाने की कोई कोशिश करने को तैयार हैं? गाँधीजी आम गरीब भारतीयों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए चरखे को मुद्रा व्यवस्था की तरह सार्वभौमिक बनाना चाहते थे. यहाँ मोदीजी आम गरीब की फ़िक्र किये बिना चरखे को मुद्रा व्यवस्था बनाना तो दूर, खुद मुद्रा का ही विमुद्रीकरण कर देते हैं. पिछले कुछ महीनों से नोटबंदी की वजह से तकरीबन पांच-छह करोड़ मजदूर बेरोजगार हो गए हैं. गाँधीजी होते तो उनके हाथ में चरखा देकर मोदी सरकार के विरुद्ध प्रतिरोध खड़ा कर देते.

खादी के दर्शन को समझने के कई आयाम हैं. पहला उसके पीछे छुपा आर्थिक आत्मनिर्भरता का सूत्र है. गाँधीजी सबसे पहले और मूल रूप से राजनीतिज्ञ थे. उन्होंने अपने समयकाल परिस्थिति के अनुसार अपनी रणनीति बनायी थी. अंगरेजी राज के बर्बर आर्थिक शोषण ने भारत को खोखला कर दिया था. परंपरागत हस्तशिल्प और करघा उद्योग को बर्बाद करके विदेशी कपड़ों से भारत के बाजार को पाट दिया था. लन्दन और मैनचेस्टर के कारखानों में बने कपड़े के लिए भारत एक बाज़ार बन गया था. बुनकरों की दशा ऐसी हो गयी थी कि वो हमेशा मौत की कगार पर खड़े रहते थे. भारत में खेती और अन्य उद्योग एक दूसरे के पूरक थे. जो बुनकर थे वो किसान भी थे और जो किसान थे वे भी बुनकरी जैसे काम करते रहते थे. इस हाल में स्वदेशी आन्दोलन के नेताओं ने विदेशी माल और संस्थानों का बहिष्कार किया. गाँधीजी ने इसी भाव को विस्तार देने के लिए १९०८ के बाद चरखे को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना दिया. 

चरखा उनके लिए कई मायनों में बहुत उपयोगी अस्त्र रहा. वे हर हाथ को काम देने के पक्षधर थे. मशीन से हुआ उत्पादन उन्हें मानव श्रम के विरुद्ध लगता था. इसलिए भी चरखा कातना उन्हें मशीन के प्रति प्रतिरोध जैसा लगता था. दूसरी चीज थी कि यह भयंकर गरीबी से जूझ रहे लोगों के लिए एक ही साथ आर्थिक संबल और राजनीतिक हथियार था. आम गरीब लोग लम्बे समय तक जेल नहीं आ सकते थे. उनकी संघर्ष की क्षमता कम थी क्योंकि उन्हें अपने परिवार का पेट भी पालना होता था. इसलिए चरखा कातकर वो अपने लिए कपड़ा जुटा सकते थे, उनकी कुछ आय भी हो जाती थी और वो ब्रिटिश गुलामी के खिलाफ चल रहे महासंग्राम का हिस्सा भी बन जाते थे. तीसरे, चरखा कातने के कार्यक्रम में महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा ले सकती थीं. उनके लिए यह आराम से उनकी दिनचर्या का हिस्सा हो सकता था. महिलाओं को राजनीतिक प्रक्रियाओं का हिस्सा बनाना गाँधीजी का एक महत्वपूर्ण योगदान था. 

गाँधी चरखे को इतना महत्त्व देते थे कि उन्होंने चरखे को स्वराज के बराबर बताया था. उन्होनें कहा कि जो चरखे का महत्त्व नहीं समझते, वो स्वराज के अर्थ नहीं समझ सकते. मोदीजी और उनकी संगठन आरएसएस ने बहुत पहले ही स्वराज को सुराज में तब्दील कर दिया है. स्वराज का मतलब है हर भारतीय का अपना राज जबकि सुराज का मतलब है सत्ता चाहे किसी के हाथ हो उसे ठीक ढंग से संचालित करना. यानी उन्होंने गाँधीजी के चरखे से जुड़े दर्शन को सिर के बल खड़ा कर दिया है. हर भारतीय के हाथ में सत्ता के बजाय अब सत्ता अम्बानी-अडानी के हाथ में भी हो सकती है. और, मोदीजी उनके लिए जमीन से लेकर संसाधन तक जुटाने के लिए श्रमिक कानूनों में सुराज के नाम पर श्रमिक विरोधी बदलाव कर सकते हैं. अगर किसान अपनी जमीनें स्वेच्छा से सरकार को सौंपने को तैयार न हों तो मोदीजी सुराज के नाम पर भूमि अधिग्रहण बिल में किसान-विरोधी संशोधन कर सकते हैं.   

मोदीजी की बात अलग है. वो इतिहास का हर पन्ना फाड़कर हर कहीं अपना नाम लिखने को बेताब हैं. अगर ऐसा वो अपने कामों के बूते करते तो अलग बात थी. वो अपने प्रचार माध्यम से लोगों को यह यकीन दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि वो किसी भी महापुरुष से बड़े महापुरुष हैं. पहले उन्होंने नेहरु के खिलाफ दुष्प्रचार करने के लिए खुद को सरदार पटेल की तरह पेश किया. यह बात अलग है कि सरदार पटेल और नेहरु आपस में प्रतिद्वंदी नहीं सहयोगी थे. सरदार पटेल ने गाँधीजी की हत्या के बाद जाने कितनी बार लोगों से नेहरु को अपना नेता मानने की अपील की थी. लेकिन आरएसएस और उसके उत्पाद मोदीजी को इतिहास के सत्य से मतलब नहीं. उन्हें लोगों के दिमाग में यह कीड़ा डालने से मतलब है कि अगर नेहरु की जगह सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते तो इतिहास कुछ और ही होता. गाँधीजी पर सीधा हमला बोलने की कुव्वत इस देश में किसी के पास नहीं है. लेकिन अपरोक्ष रूप से इसी बहाने वो गाँधीजी पर भी हमला बोल लेते हैं. गाँधीजी के आस-पास के सभी महापुरुष अगर आपस में लड़ने-झगड़ने वाले तुच्छ स्वार्थी सिद्ध हो गए तो गाँधीजी सहित आजादी की समूची लड़ाई को ध्वस्त करना आसान हो जाएगा. यह कहने की जरूरत नहीं है कि आज़ादी की लड़ाई से धोखा करने वालों के पास अपना चेहरा बचाने का सिर्फ एक रास्ता है— स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत को जड़ से मिटा देना.  

गाँधीजी के बारे में उल-जुलूल बातें फैलाना और इतिहास के तथ्यों को विकृत करके पेश करना इसी योजना का हिस्सा है. हाल ही में इन्टरनेट के प्रसार के बाद संघ और उससे जुड़े संगठनों ने सोशल मीडिया और डिजिटल स्पेस के जरिये लोगों के मन में गाँधीजी के प्रति नफरत फैलाने का काम और तेज किया है. अब यह पहले से कहीं सस्ता और सुलभ साधन है. इसलिए हर तरह की सोशल नेटवर्किंग साइट्स और यूट्यूब आदि पर गाँधीजी के विरुद्ध घृणित दुष्प्रचार किया है. ये कौन लोग हैं? यह ऐसा सवाल है जिसका उत्तर एकदम आसान है. गाँधीजी की हत्या में संलिप्तता के बावजूद संघ ने कभी यह नहीं माना कि उसने गाँधीजी की हत्या में हाथ बंटाया. उसी तरह कौन नहीं जानता कि छद्म नामों से इन्टरनेट पर गाँधीजी के खिलाफ अभियान चलने वाले कौन हैं और किस विचारधारा के हामी हैं. 

आज जो भी समाज सेवा या राजनीति के क्षेत्र में आता है, खादी उसका स्वाभाविक पहनावा बन जाता है. गाँधीवादी कार्यकर्ता ही नहीं, अन्य सभी खादी के बने कुरते पहने दिखाई देते हैं. राजनीति में तो खादी एक तरह से राजनीतिक होने का प्रतीक बन गयी है. खद्दर पहनकर लोग बिना कुछ त्याग किये एक दर्जा हासिल कर लेते हैं. वह दर्जा है गाँधीजी की तरह देश और समाज के लिए समर्पित होने का. जब भी कोई राजनीति में हाथ अजमाने का विचार करता है, वह सीधा खादी भण्डार की ओर चल देता है. यह कई लोगों की गाँधी के प्रति श्रृद्धा है. वो गांधी को अपना आदर्श मानते हैं. इसलिए गाँधीजी जैसा पहनावा और उसके पीछे का दर्शन उनके जीवन का अंग बन जाता है. कई समर्पित गाँधीवादी कार्यकर्ता आज भी रोजाना चरखा कातते हैं. कई आजीवन खादी को पहनकर सादगीपूर्ण जीवन जीते हैं. इसलिए वो लोग इस विवेचना के दायरे में नहीं आते. मैं उन सब लोगों के प्रति चिंतित हूँ जो खादी को अपनी कमियाँ-कमजोरियाँ छुपाने की ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं. 

कभी-कभार खादी पहनने के बावजूद मैं खुद को यह नहीं समझा पाता कि एक गाँधीवादी कार्यकर्ता होने के नाते मुझे हमेशा खादी पहननी चाहिए. इसकी वजह है कि आज खादी भंडारों पर बिकने वाली खादी के पीछे गाँधीजी का सामाजिक-राजनीतिक दर्शन लापता है. अब यह किसी राजनीतिक लड़ाई का अस्त्र नहीं है, सामाजिक रूपांतरण का साधन नहीं है. केवल एक चीज है कि खादी की बुनाई-कताई में लगे लोगों के लिए खादी आज भी रोजगार का साधन है और खादी ग्रामोद्योग जैसे संस्थानों के लिए मोटी कमाई और मुनाफे का जरिया. हाल की इस घटना ने मेरे इस विश्वास को पुख्ता कर दिया है कि यह खादी वह खादी नहीं है. वैसे भी गाँधीजी कहते थे कि कातो तो पहनो और पहनो तो कातो. अब कातने वाले महँगी होने की वजह से खादी पहनते नहीं और पहनने वाले खादी-दर्शन के प्रति श्रद्धा न होने की वजह से कातते नहीं. इसीलिए लोगों से खादी पहनने की अपील करके खादी की बिक्री में अभूतपूर्व उछाल लाने वाले मोदीजी जब लुधियाना में चरखा कातते हैं तो चरखा नहीं कात पाते, महज़ फोटो सेशन करते हैं. और, सिर्फ मोदीजी ही क्यों, राजनीतिक गलियारों में ठाठ से खादी पहनकर घूमने वालों में जाने कितनों को तकली पकड़ना तक नहीं आता होगा. बस उनमें और मोदीजी में इतना फर्क है कि सारी अज्ञानता के बावजूद वो गाँधीजी की जगह अपनी फोटो लगवाने की बात सोच तक नहीं सकते और मोदीजी संघ की पाठशाला से भारत के चप्पे-चप्पे से गाँधीजी का नामो-निशान मिटाने की हसरत लेकर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे हैं.

(लेखक राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट नामक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक है. यह संगठन स्वाधीनता संघर्ष के मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए समर्पित है.) 
ईमेल: saurabhvajpeyi@gmail.com

15 जनवरी 2017

गांधी, खादी और मोदी

कुमार प्रशांत



फुर्सत के पल में, जब दूसरा कुछ न सूझे तो हम सबका एक शगल होता है : कलम ले कर किसी लड़की के फोटो पर दाढ़ी-मूंछ चस्पां करना या कि किसी पुरुष चेहरे को लड़कीनुमा बनाना !अापने भी कभी-न-कभी ऐसी कलमकारी की होगी अौर फिर अपनी ही निरुद्देश्यता पर शर्माए होंगे. ऐसे ही कई कारनामे इन दिनों राजधानी दिल्ली के निरुद्देश्य गद्दीनशीं कर रहे हैं जिसमें चापलूसी का तड़का भी जी भर कर उड़ेला जा रहा है. सबसे ताजा है वह कारनामा जो सरकारी खादी-ग्रामोद्योग अायोग ने किया है - उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फोटो पर कलमकारी कर उसे महात्मा गांधी बनाने की कोशिश की है याकि महात्मा गांधी के फोटो पर कलमकारी कर, उसे नरेंद्र मोदी बनाने का उपक्रम किया है. दोनों ही मामलों में किरकिरी तो नरेंद्र मोदी की ही हुई है - एक पूरा का सारा इंसान कार्टून बना कर छोड़ दिया गया है.

देश में इससे बड़ी हलचल पैदा हुई है - यहां तक कि खादी-ग्रामोद्योग अायोग के कर्मचारी भी अपने ही नौकरीदाताअों के खिलाफ खड़े हो गए हैं ! ऐसा इसलिए हो रहा है कि चापलूसों की फौज नरेंद्र मोदी का कितना भी कार्टून बनाए देश को उससे फर्क नहीं पड़ता है लेकिन यहां मामला यह बना है कि नरेंद्र मोदी का फोटो लगाने के लिए महात्मा गांधी का फोटो हटाया गया है ! खादी-ग्रामोद्योग अायोग ने २०१७ को अपने कैलेंडर व डायरी पर चरखा कातते नरेंद्र मोदी का वैसा फोटो छापा है जिसे संसार महात्मा गांधी के फोटो के रूप में पहचानता है. लेकिन फर्क भी है : जैसा चर्खा मोदी हिला रहे हैं वैसा चर्खा न तो गांधीजी ने कभी काता, न वैसा चर्खा बनाने की इजाजत ही वे कभी देते; फोटो-शूट का यह सरकारी अायोजन जिस ताम-झाम से किया गया है वैसा अायोजन कर, उसमें गांधीजी को बुलाने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता था; इस फोटो-शूट में मोदीजी ने जैसे कपड़े पहन रखें हैं वैसे कपड़े गांधीजी ने तो कभी नहीं ही पहने, ऐसी धज में उनके सामने जाने की हिमाकत कोई नहीं करता; जैसे टेबल पर चरखा रखा गया है अौर जैसे टेबल पर बैठ कर मोदीजी उस तथाकथित चर्खे को घुमा रहे हैं, गांधीजी वहां होते तो पहली बात तो यही कहते कि तुम ऐसा दिखावटी तामझाम नहीं करते तो इन्हीं साधनों से हम कितने ही नये चर्खे बना लेते ! सवाल कितने ही हैं लेकिन अाज माहौल ऐसा बनाया गया है कि सवाल पूछना देशद्रोह से जोड़ दिया गया.

अगर यह कैलेंडर अौर यह डायरी नरेंद्र मोदी की सहमति व इजाजत से छापी गई है तो मुझे उन पर दया अा रही है, क्योंकि अाज वे गहरे पश्चाताप में होंगे. कई बार हम किसी मौज में ऐसे काम कर जाते हैं जिसके परिणाम का हमें अंदाजा नहीं होता है. जैसे गांधीजी की फोटोबंदी का यह फैसला या फिर नोटबंदी का वह फैसला ! अगर फोटोबंदी का यह फैसला नरेंद्र मोदी की जानकारी या सहमति के बिना हुअा है तो यह खतरे की घंटी है : चापलूसों अौर चापलूसी से सावधान ! ऐसे चापलूसों ने कितने ही वक्ती नायकों को इतिहास के कूड़ाघर में जा पटका है. इसलिए फैसला प्रधानमंत्री को करना है : वे अायोग के कर्मचारियों की बात मान कर इन सारी डायरियों व कैलेंडर को कूड़ाघर भिजवा दें ! ऐसा नहीं है कि इससे पहले कभी अायोग ने ऐसे कैलेंडर/डायरी नहीं छापे कि जिन पर गांधीजी का फोटो नहीं था. भाजपा का हर प्रवक्ता वैसे सालों की सूची बना कर घूम रहा है अौर बता रहा है कि संविधान में ऐसी कोई धारा नहीं है कि जिसके तहत महात्मा गांधी का फोटो हटाना अपराध हो ! यह सच है. संविधान पर ऐसी कोई धारा नहीं है. इन बेचारों के लिए यह समझना कठिन है कि जो संविधान में नहीं है, वह समाज में मान्य कैसे है !! ये नासमझ लोग संविधान के पन्ने पलटते हैं अौर परेशान पूछते हैं कि इसमें कहां लिखा है कि महात्मा गांधी राष्ट्रपिता हैं ? कहीं नहीं लिखा है लेकिन समाज इसे इस कदर मान्य किए बैठा है कि इस प्रतीक को छूते ही करेंट लगता है भले हमारे अपने जीवन का बहुत सरोकार इससे न हो ! जिस समाज ने संविधान में प्राण फूंके हैं उसी समाज ने गांधी को अपने मन-प्राणों में बसा रखा है. इसलिए अायोग ने जब-जब गांधी का फोटो नहीं छापा तब-तब किसी दूसरे का फोटो भी नहीं छापा. मतलब साफ था : गांधी का विकल्प नहीं है ! अब अाप अाज समाज को नई बारहखड़ी रटवाना चाह रहे हैं कि ‘म’ से ‘महात्मा’, ‘म’ से ‘मोदी’ ! लेकिन सत्ता की ताकत से, सत्ता की पूंजी से, सत्ता के अादेश से अौर सत्ता के अातंक से समाज ऐसी बारहखड़ी नहीं सीखता है.

यह समझना जरूरी है कि खादी कनॉटप्लेस पर बनी दूकान नहीं है कि जिसे चमकाने में सारी सरकार जुटी हुई है; खादी बिक्री के बढ़ते अांकड़ों में छिपा व्यापार नहीं है; जो हर पहर पोशाक बदलते हैं अौर समाज में उसकी कीमत का अातंक बनाते हैं, उनकी पोशाक खादी की है या पोलिएस्टर की समाज को इससे फर्क नहीं पड़ता है. पोशोकों अौर मुद्राअों के पीछे की असलियत समाज पहचानता है. खादी के लिए गांधी सिर्फ तीन सरल सूत्र कहते हैं : कातो तब पहनो, पहनो तब कातो अौर समझ-बूझ कर कातो ! अाज हालत यह है कि खादी कमीशन ने कर्ज देने के नाम पर सारी खादी उत्पादक संस्थाअों की गर्दन दबोच रखी है; उनकी चल-अचल संपत्ति अपने यहां गिरवी रख रखी है अौर अपनी नौकरशाही के अादेश पूरा करने का उन पर भयंकर दवाब डाल रखा है. यह स्थिति अाज की नहीं है बल्कि कमीशन बनने के बाद से शनै-शनै यह स्थिति बनी है. सरकार अौर बाजार मिल कर गांधी की खादी की हत्या ही कर डालेंगे, यह देख-जान कर विनोबा भावे के खादी कमीशन के समांतर खादी मिशन बनाया था अौर कहा था : जो अ-सरकारी होगा, वही असरकारी होगा ! लेकिन खादी के काम में लगे लोग भी तो माटी के ही पुतले हैं न ! सरकारी पैसों का अासान रास्ता अौर उससे बचने का भ्रष्ट रास्ता सबकी तरह इन्हें भी अासान लगता रहा अौर कमीशन का अजगर उन्हें अपनी जकड़ में लेता गया. गांधी ने खादी की ताकत यह बताई थी कि इसे कितने लोग मिल कर बनाते हैं यानी कपास की खेती से ले कर पूनी बनाने, कातने, बुनने, सिलने अौर फिर पहनने से कितने लोग जुड़ते हैं. खादी उत्पादन यथासंभव विकेंद्रित हो अौर इसका उत्पादक ही इसका उपभोक्ता भी हो ताकि मार्केटिंग, बिचौलिया, कमीशन जैसे बाजारू तंत्र से मुक्त इसकी व्यवस्था खड़ी हो. जब गांधी ने यह सब सोचा-कहा तब कम नहीं थे ऐसी अापत्ति उठाने वाले कि यह सब अव्यवहारिक है, यह बैलगाड़ी युग में देश को ले जाने की गांधी की खब्त है, यह अाधुनिक प्रगति के चक्र को उल्टा घुमाने की कोशिश है ! अाज भी तथाकथित अाधुनिक लोग, खादी कमीशन के ‘निरक्षर खादी अधिकारी’ अादि ऐसा ही कहते हैं. इन सारे महानुभावों की बातों का जवाब हुए लेकिन अपने विश्वास में अडिग गांधी ने खादी के काम को इस तरह अागे बढ़ाया कि शून्य में से ताकत खड़ी होने लगी अौर सुदूर इंग्लैंड में लंकाशायर की मिलें बंद होने लगीं. गांधी कहते भी थे कि वह खादी है ही नहीं जो मिलों के सामने अस्तित्व का सवाल न खड़ा करती हो. राजनीतिक दलों, सरकारों का क्षद्म उन्होंने पहचान लिया था अौर इसलिए अाजादी के बाद देश में बनी सरकारें गांधी से मिलने, उनके प्रति अपनी श्रद्धा निवेदित करने अौर खादी के बारे में तरह-तरह के अाश्वासन देने अाने लगीं तो गांधी खासे कठोर हो कर उनसे अपनी बातें कहने लगे थे अौर पूछने लगे थे कि क्या मैं मानूं कि अाप अपने यहां खादी को इतना मजबूत बनाएंगे कि अापके राज्य में मिलें बंद हो जाएंगी ? बिहार की सरकार से कहा कि अाप अपने मन में यह क्षद्म मत रखना कि खादी भी चलेगी अौर मिल भी चलेगी ! अाज पर्यावरण का भयावह खतरा, संसाधनों की विश्वव्यापी किल्लत, नागरिकों की अौर प्राकृतिक संसाधनों की अंतरराष्ट्रीय लूट अादि को जो जानते-समझते हैं, वे सब स्वीकार करते हैं कि गांधी इस शताब्दी के सबसे अाधुनिक अौर वैज्ञानिक चिंतक थे जिन्होंने अपने दर्शन के अनुकूल व्यावहारिक ढांचा विकसित कर दिखला दिया.

पहले सरकारों ने इतना अनुशासन रखा था कि खादी का कोई मान्य व्यक्ति ही खादी कमीशन का अध्यक्ष बनाया जाता था. फिर यह तरीका बना है कि खादी कमीशन का अध्यक्ष सरकारी पार्टी का सबसे कमजोर सदस्य बना दिया जाता है ताकि गुड़ भी खाएं अौर गुलगुले से परहेज भी रखें. कई बार तो कोई नौकरशाह ही इस कुर्सी पर बिठा दिया गया है. इसलिए खादी उत्पादन अौर बिक्री का सारा अनुशासन,जो गांधीजी ने ही तैयार किया था, रद्दी की टोकड़ी में फेंक दिया गया अौर खादी कमीशन सरकारी भोंपू में बदल दिया गया. अाज सरकार जैसी कोई चीज बची नहीं है, एक व्यक्ति है जो सब कुछ है ! इसलिए कमीशन का ‘पप्पू’ अध्यक्ष टीवी पर अा कर यह बताता है कि मोदीजी के खादी-प्रेम से खादी की बिक्री कितनी बढ़ी है. वह यह नहीं बताता है कि खादी का उत्पादन कितना बढ़ा है, खादी की काम करने वाली संस्थाएं कितनी बढ़ी हैं, खादी कातने वाले अौर खादी बुनने वाले कितने बढ़े हैं. यदि ये अांकड़े नहीं बढ़े हैं तो बिक्री के अांकड़े कैसे बढ़ रहे हैं ? फिर तो ये अांकड़े ही बता देते हैं कि जो बिक रहा है या बेचा जा रहा है वह खादी नहीं है ! अाज स्थिति यह है कि बाजार में मिलने वाला, खादी के नाम पर बिक रहा ९०% कपड़ा खादी है ही नहीं ! इस कारनामे में प्रधानमंत्री का गुजरात काफी अागे है.

गांधी ने खादी को सत्ता पाने का नहीं, जनता को स्वावलंबी बनाने का अौजार माना था. वे कहते थे कि जो जनता स्वावलंबी नहीं है वह स्वतंत्र व लोकतांत्रिक कैसे हो सकती है ? अाज सारी सत्ता येनकेनप्रकारेण अपने हाथों में समेट लेने की भूख ऐसी प्रबल है कि वह न तो कोई विवेक स्वीकारती है, न किसी मर्यादा का पालन करती है. लेकिन वह भूल गई है कि अाप तस्वीर तो बदल सकते हैं लेकिन विचारों की तासीर का क्या करेंगे ? वह गांधी की तासीर ही थी जिससे टकरा कर संसार का सबसे बड़ा साम्राज्य ऐसा ढहा कि फिर जुड़ न सका; वह विचारों की तासीर ही थी कि जिसके बल पर दिल्ली से कांग्रेस का खानदानी शासन ऐसा टूटा कि अब तक, ४० सालों बाद तक अपने बूते लौट नहीं सका है. अब ये अपने शेखचिल्लीपन में तस्वीरें बदलने में लगे हैं. देखिए, इतिहास क्या-क्या बदलता है.
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स्वाधीनता आंदोलन की दीर्घकालिक रणनीति

लोगों की संघर्ष करने की क्षमता न केवल उन पर होने वाले शोषण और उस शोषण की उनकी समझ पर निर्भर करती है बल्कि उस रणनीति पर भी निर्भर करती है जिस...