12 जुलाई 2015

भारत भाग्यविधाता?

Image result for kuldeep kumar

कुलदीप कुमार
12 जुलाई, जनसत्ता 

जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार केंद्र में सत्ता में आई है, राष्ट्रीय जीवन के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में फासीवादी हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। अब तो इस बात पर किसी को आश्चर्य भी नहीं होता कि भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद हो या नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट हो या पुणे का फिल्म एवं टेलीविज़न इंस्टीट्यूट, सभी जगह राष्ट्रवादियों को थोपा जा रहा है। सत्ता का चरित्र ही ऐसा है। जो भी सत्ता में आता है, वह बात तो जनता की सेवा करने की करता है---हमारे प्रधानमंत्री भी अपने को जनता का प्रधानसेवक कहलाना अधिक पसंद करते हैं---लेकिन असल में उसका मकसद सत्ता का सुख भोगना और पूरी-हलवा खाना-खिलाना होता है। कांग्रेसी सरकार ने भी इससे अलग आदर्श स्थापित नहीं किया। अगर किया होता तो लोग मोदी सरकार की इन कारगुजारियों को यूं खामोशी से बर्दाश्त न कर लेते। फिल्म इंस्टीट्यूट के छात्र-छात्राएँ अभी युवा हैं, उनका खून अभी ठंडा नहीं हुआ है, इसलिए वे विरोध करने के लिए सड़क पर आए हैं। वरना वे भी औरों की तरह चुप ही रहते।

नियुक्तियों तक तो फिर भी ठीक है। मेरे जैसे आदमी को अब हकीकत का इतना तो ज्ञान हो ही गया है कि जो भी सरकार में आता है, वह मनमानी करता है। अपने लोगों को उपकृत करता है और अपनी नीतियाँ थोपता है। लेकिन भाजपा और उसके नेता जो कर रहे हैं, वह इससे कहीं आगे की चीज है। वह संघ का दूरगामी एजेंडा है जिसको हासिल करने के लिए राजसत्ता केवल एक साधन मात्र है। संघ के कुछेक नेता भले ही सत्ता की फिसलनभरी राह पर रपट जाएँ, पर एक संगठन के रूप में वह अपने रास्ते पर अडिग है। और वह रास्ता भारत को पूरी तरह से एक हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करने की मंजिल की तरफ जाता है। संघ भारत को पाकिस्तान का प्रतिबिंब बना देना चाहता है। यह मेरा मौलिक चिंतन नहीं है। अनेक लोग इसके बारे में लिख-बोल चुके हैं।

यह संयोग नहीं है कि जब भी भाजपा सत्ता में आती है, उसके कुछ बड़े नेता राष्ट्रीय नायकों के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर देते हैं। उनके अपने संघ परिवार में कोई भी राष्ट्र नायक नहीं है, क्योंकि संघ की दृढ़ मान्यता थी कि अंग्रेज़ शासकों से लड़ने के बजाए हिन्दू समाज को संगठित करना अधिक आवश्यक है ताकि मुस्लिम आक्रांताओं को मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके। यह हमारे देश में ही संभव है कि आजादी की लड़ाई में भाग न लेने वाले यह दावा करें कि सबसे बड़े देशभक्त वे ही हैं। यही नहीं, जिन महापुरुषों ने इस लड़ाई का नेतृत्व किया, उन पर  बिना किसी संकोच के कीचड़ उछाली जाए और उनका चरित्रहनन किया जाए। वह भी एक ऐसे संगठन के द्वारा जिसका दावा है कि वह अपनी शाखाओं में चरित्र निर्माण पर सबसे अधिक ज़ोर देता है।

Image result for jan gan man song

जब कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने यह मौलिक विचार प्रकट किया था कि भारतवर्ष इतना प्राचीन देश है, फिर महात्मा गांधी को हम राष्ट्रपिता कैसे कह सकते हैं? वे तो असल में राष्ट्रपुत्र थे, भारतमाता की संतान थे। जब यह पता चला कि गांधी को सबसे पहले राष्ट्रपिता नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था-- वह भी तब जब वे गांधी के विरोध के कारण कई साल पहले कांग्रेस छोड़ कर अलग पार्टी बना चुके थे और जर्मनी एवं जापान के समर्थन से आजाद हिन्द फौज बना कर ब्रिटिश सेना से युद्ध के मैदान में लोहा ले रहे थे—तो कल्याण सिंह समेत अन्य संघियों की बोलती बंद हो गई क्योंकि जिस तरह इन दिनों वे सरदार वल्लभभाई पटेल और बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर को अपनी गिरफ्त में ले रहे हैं, उसी तरह वे दशकों पहले नेताजी को अपने नायकों की पंक्ति में जगह दे चुके थे। बिना किसी शर्म-लिहाज के, क्योंकि नेताजी विचारों से पक्के धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए किसी भी साधन का इस्तेमाल करने के लिए तत्पर थे, जबकि संघ ने हमेशा अपने को इस लड़ाई से दूर रखा।

नरेंद्र मोदी भले ही महात्मा गांधी के चित्र पर फूल चढ़ाएँ, और संघ भले ही दिखावे के लिए उनका नाम अपने प्रातःस्मरणीय महापुरुषों की सूची में शामिल कर ले, लेकिन असलियत यह है कि जब तक गांधी जनमानस में जिंदा और समादृत हैं, तब तक संघ को अस्थाई सफलता ही मिल सकती है। स्थायी रूप से वह अपनी विचारधारा को जनता के मन में स्थापित नहीं कर सकता। यही बात जवाहरलाल नेहरू और अंबेडकर के बारे में लागू होती है। इसलिए बाहर से अनेक तरह का दिखावा करने के बावजूद संघ और उसके कार्यकर्ताओं का हमेशा प्रयास रहेगा कि इन महापुरुषों की छवि पर कालिख पोती जाये।

अब कल्याण सिंह को इल्हाम हुआ है कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का गीत जन गण मन अधिनायक जय हे, जो भारत का राष्ट्रगान है, दरअसल ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम की स्तुति में लिखा गया  था। फिर वह स्वाधीन भारत का राष्ट्रगान कैसे हो सकता है? कल्याण सिंह तो संघ की शाखा से निकले हैं। उनके इस बयान पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता। आश्चर्य होता है सुप्रीम कोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश जस्टिस मार्कन्डेय काटजू पर जिन्होंने अपने ब्लॉग में रवीन्द्रनाथ ठाकुर को अंग्रेज शासकों का टहलुआ कहकर गाली दी है और एक विलक्षण खोज की है कि 1937 में जब उन्हें अपने-आपको देशभक्त सिद्ध करना था, तब उन्होंने यह स्पष्टीकरण दिया कि यह गीत तो उन्होंने भारतवर्ष के भाग्यविधाता यानि ईश्वर के लिए लिखा था। आश्चर्य इस बात पर भी होता है कि कैसे अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में भूमिका निभाने वाले कैलाशनाथ काटजू के परिवार को कोई सदस्य इस प्रकार की जाहिलाना बात कह सकता है, और कैसे इतने अपढ़ किस्म के लोग सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच सकते हैं? कोई जस्टिस काटजू से पूछे कि जब 1919  में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जलियाँवाला बाग के नरसंहार का विरोध करते हुए ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई सर की उपाधि वापस की थी, तब क्या वे उस सरकार के टहलुए की भूमिका अदा कर रहे थे? उन्हें 1937 में जाकर खुद को देशभक्त सिद्ध करने की जरूरत पड़ी? क्या तब तक उन्हें देशभक्त नहीं माना जाता था? ये वही काटजू साहब हैं जिनकी राय में देश के अधिकांश पत्रकार अनपढ़ हैं !

सव्यसाची भट्टाचार्य समेत अनेक शीर्षस्थ इतिहासकार इस प्रकरण के बारे में तथ्य प्रस्तुत कर चुके हैं। शायद कल्याण सिंह और मार्कन्डेय काटजू जैसे देशभक्त अंग्रेजी पढ़ना पसंद न करते हों। लेकिन यदि वे हिन्दी के शीर्षस्थ विद्वान, अद्भुत उपन्यासकार और भारतीय संस्कृति के अप्रतिम व्याख्याता आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का इस विषय पर लेख पढ़ लेते, तो उनके दिमाग के कुछ जाले तो जरूर साफ हो जाते। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक भाषा साहित्य और देश में आचार्य द्विवेदी का वह लेख संकलित है जो उन्होंने देश को आजादी मिलने के कुछ ही समय बाद लिखा था। उस समय तक संविधान सभा ने यह तय नहीं किया था कि वंदे मातरम राष्ट्रगान होगा या जन गण मनयहाँ याद दिला दूँ कि उन्हें स्वयं रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शांतिनिकेतन में हिन्दी भवन की स्थापना के लिए आमंत्रित किया था और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में आने से पहले उन्होंने लंबे समय तक रवीन्द्रनाथ के सान्निध्य में रह कर शांतिनिकेतन में पढ़ाया था। इस लेख में आचार्य द्विवेदी ने लिखा है: रवीन्द्र-साहित्य का साधारण विद्यार्थी भी जानता है कि रवीन्द्रनाथ राजा या राजराजेश्वर किसे कहते हैं। साधारण जनता जिसे ईश्वर या भगवान कहती है उसी को रवीन्द्रनाथ ने राजा, राजेन्द्र, राजराजेश्वर आदि कहा है। उनकेराजा’, ‘डाकघर’, ‘अरूपतनआदि नाटकों में यही राजा अदृश्य पात्र होता है। एक शक्ति कविता में उन्होने इसीराजेन्द्रको सीमाहीन काल का नियन्ता कहा है।28 दिसंबर, 1911 के अंग्रेजी समाचारपत्र बंगाली में प्रकाशित रिपोर्ट से भी स्पष्ट है कि कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ का देशभक्तिपूर्ण गीत गाया गया था और उसके बाद ब्रिटिश सम्राट के प्रति राजभक्ति प्रकट करने वाला एक हिन्दी गीत गाया गया। काटजू साहब और कल्याण सिंह क्या बताएँगे कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने हिन्दी गीत कब लिखे?


Image result for jan gan man song


जन गण मन अधिनायक जय हे

Image result for acharya hazari prasad dwivedi

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

देश का राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम’ गान हो या ‘जनगणमन अधिनायक’, इस प्रश्न पर आज-कल बहुत वाद-विवाद हो रहा है। भारतीय विधान-सभा शीघ्र ही इस बात पर भी विचार करेगी। दोनों गानों के पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ कहा गया है। मुझे इन बातों पर यहाँ विचार करना अभीष्ट नहीं हैं। प्रन्तु इधर हाल ही में कुछ लोगों ने यह बात उड़ा दी है कि यह ‘जनगण’ वाला गान कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सम्राट जार्ज पंचम की स्तुति में लिखा था और वह पहले पहल सन १९१२ ई० के दिल्ली दरबार में गाया गया था। इस सम्बन्ध में मेरे पास अनेक सज्जनों ने पूछताछ की है। भारत का राष्ट्रगीत चाहे जो भी स्वीकार कर लिया जाय, वह हम लोगों के लिए पूजनीय और वन्दनीय होगा, पर किसी असत्य बात का प्रचार करना अनुचित है। मैंने विश्व भारती संसद (गवर्निंग बॉडी) के सदस्य की हैसियत से अन्य अनेक मित्रों के साथ एक वक्तव्य ३० नवम्बर, १९४८ को दिया था। परन्तु उस वक्तव्य के प्रकाशित होने के बाद भी पत्र आते रहे। इसलिए एक बार फिर मैं साधारण जनता के चित्त से इस भ्रान्त धारणा को दूर करने के उदेश्य से यह वक्तव्य प्रकाशित करा रहा हूँ।

कुछ दिनों पहले तक इस प्रकार के अपप्रचार का क्षेत्र बंगाल तक ही सीमित रहा है। कवि की जीवितावस्था में ही इस प्रकार की कानाफूसी चलने लगी थी। किसी किसी ने उनसे पत्र लिखकर यह जानने का प्रयत्न भी किया था कि इस कानाफूसी में कुछ तथ्य है या बिलकुल निराधार है। कवि ने बड़ी व्यथा के साथ सुधारानी देवी को अपने २३ मार्च,१९३९ के पत्र में लिखा था कि “मैंने चतुर्थ या पंचम जार्ज को ‘मानव इतिहास के युग-युग धावित पथिकों के रथयात्रा का चिरसारथी’ कहा है, इस प्रकार की अपरिमित मूढ़ता का सन्देह जो लोग मेरे विषय में कर सकते हैं, उनके प्रश्नों का उत्तर देना आत्मावमानना है।”

रवीन्द्र-साहित्य का साधारण विद्यार्थी भी जानता है कि रवीन्द्रनाथ राजा या राजराजेश्वर किसे कहते हैं। साधारण जनता जिसे ईश्वर या भगवान कहती है उसी को रवीन्द्रनाथ ने राजा, राजेन्द्र, राजराजेश्वर आदि कहा है। उनके ‘राजा’, ‘डाकघर’, ‘अरूपतन’ आदि नाटकों में यही राजा अदृश्य पात्र होता है। एक शक्ति कविता में उन्होने इसी ‘राजेन्द्र’ को सीमाहीन काल का नियन्ता कहा है। एक गान में उन्होने लिखा है कि तेरे स्वामी ने तुझे जो कौड़ी दी है उसे ही तू हँश कर ले ले, हजार-हजार खिंचावों में पड़ा मारा-मारा न फिर। ऐसा हो कि तेरा हृदय जाने कि तेरे राजा हृदय में ही विद्यमान हैं।

जे कड़ि तोर स्वामीर देवा सेइ कड़ि तुइनिस रे हेसे।
लोकेर कथा जिसने काने फिरिसने आट हजार टाने।
जेन रे तोर हृदय जाने हृदय तोर आद्येन राजा॥

जो लोग सरल भाव से विश्वास कर सकते हैं कि रवीन्द्रनाथ ने राजेश्वर कहकर किसी पंचमजार्ज की स्तुति की है, वे यदि गान की पँक्तियों पर थोड़ा भी विचार करते तो उन्हे अपना भ्रम स्पष्ट हो जाता। कैसे कोई किसी पंचम या षष्ठ जार्ज को—

“विकट पन्थ उत्थान पतन मय युग युग धावित यात्री
हे चिर सारथि तव रथचक्रे मिखरित पथ दिन रात्री
दारुण विप्लव माँझे, तब शंखध्वनि बाजे
संकट दुख परित्राता” (हिन्दी अनुवाद से)

कह सकता है? फिर कोई पंचम या अपंचम जार्ज को किस प्रकार—

"घोर अन्धतम विकल निशा भयमूर्छित देश जनों में
जागृत था तव अविचल मंगल नत अनिमिष नयनों में
दुःस्वप्ने आतंके आश्रय तव मृदु अंके,
स्नेहमयी तुम माता।”

कहकर उसे जनगण संकट त्राटक कह सकता है? और रवीन्द्रनाथ जैसे मनस्वी कवि से जो लोग आशा करते हैं कि किसी नरपति को वह इतना सम्मान देगा कि सम्पूर्ण भारत उसके चरणों में ‘नतमाथ’ होगा, उसे क्या कहा जाय!

वस्तुतः यह गाना दिल्ली दरबार में नहीं बल्कि सन १९११ ई० में हुए कांग्रेस के कलकत्ते वाले अधिवेशन में गाया गया था। सन १९१४ ई० में जॉन मुरे ने ‘दि हिस्टारिकल रेकार्ड ऑफ़ इम्पीरियल विज़िट टु इण्डिया, १९११’ नाम से दिल्ली दरबार का एक अत्यन्त विशद विवरण प्रकाशित किया था। उसमें इस गान की कहीं चर्चा नहीं है। सन १९१४ में रवीन्द्रनाथ की कीर्ति समूचे विश्व में फैल गई थी। अगर यह गान दिल्ली दरबार में गाया गया होता तो अंग्रेज प्रकाशक ने अवश्य उसका उल्लेख किया होता, क्योंकि इस पुस्तिका का प्रधान उद्देश्य प्रचार ही था।

असल में १९११ के कांग्रेस के मॉडरेट नेता चाहते थे कि सम्राट दम्पती की विरुदावली कांग्रेस मंच से उच्चारित हो। उन्होने इस आशय की रवीन्द्रनाथ से प्रार्थना भी की थी, पर उन्होने अस्वीकार कर दिया था। कांग्रेस का अधिवेशन ‘जनगणमन’ गान से हुआ और बाद में सम्राट दम्पती के स्वागत का प्रस्ताव पारित हुआ। प्रस्ताव पास हो जाने के बाद एक हिन्दी गान बंगाली बालक बालिकाओं ने गाया था, यही गान सम्राट की स्तुति में था। सन १९११ के २८ दिसम्बर के ‘बंगाली’ में कांग्रेस अधिवेशन की रिपोर्ट इस प्रकार छपी थी—

The proceedings commnenced witha patriotic song composed by Babu Rabindranath Tagore, the leading poet of Bengal (Janaganamana..) of which we give the English translation (यहाँ अँग्रेज़ी में इस गान का अनुवाद दिया गया था) Then after passing of the loyalty resolution, a Hindi song paying heartfelt homage to their imperial majesties was sung by Bengali boys and girls in chorus.

विदेशी रिपोर्टरों ने दोनों गानों को गलती से रवीन्द्रनाथ लिखित समझ कर उसी तरह की रिपोर्ट छापी थी। इन्ही रिपोर्टों से आज यह भ्रम चल पड़ा है।

मैं स्पष्ट रूप से बता दूँ कि मैं वन्दे मातरम गान का कम भक्त या प्रशंसक नहीं हूँ। यह वक्तव्य इस उद्देश्य से दिया गया है कि असत्य बात प्रचारित न हो और इस महान कवि के सिर व्यर्थ का ऐसा दोषारोप न किया जाय जिसने भारतवर्ष की संस्कृति को सम्पूर्ण जगत में प्रतिष्ठा दिलाई। रवीन्द्र मनस्वी कवि थे, वे कभी किसी विदेशी नरपति की स्तुति में इतना मनोहर गान लिख ही नहीं सकते थे।

(भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित 'भाषा साहित्य और देश' में संकलित तथा nirmal-anand.blogspot.in से साभार)


null

रवींद्र नाथ टैगोर के 'अधिनायक' के मायने
एम राजीवलोचन
प्रोफ़ेसर (इतिहास), पंजाब विश्वविद्यालय
8 जुलाई 2015, बीबीसी हिंदी

राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने भारत के राष्ट्र गान 'जन गण मन' पर सवाल उठाकर एक नई बहस को हवा दे दी है. कल्याण सिंह ने हाल में राजस्थान विश्वविद्यालय के 26वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए पूछा था कि 'जन गण मन अधिनायक जय हो' में अधिनायक किसके लिए है. उन्होंने कहा था कि यह ब्रिटिश समय के अंग्रेज़ी शासक का गुणगान है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रगान में संशोधन होना चाहिए. अब जरा, एक नज़र इस गाने के इतिहास पर भी डाल लेते हैं.

गद्दारी का गाना?
यही वह गाना था जिसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज के लड़ाकों ने राष्ट्रगान के तौर पर अपनाया था. स्वतंत्रता से पहले 1937 में प्रांतों में पहली चुनी हुई सरकारों ने भी इसे अपनाया. स्वतंत्र भारत के गणराज्य ने काफी चिंतन-मनन के बाद इसे 1950 में अपनाया. 2004 में साध्वी ऋतंभरा ने भी 'जन गण मन अधिनायक जय हे' को ‘गद्दारी का गाना’ का दर्जा दे डाला था.

यह गाना पहली बार 27 दिसंबर 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के दूसरे दिन का काम शुरू होने से पहले गाया गया था. 'अमृत बाज़ार पत्रिका' में यह बात साफ़ तरीके से अगले दिन छापी गई. पत्रिका में कहा गया कि कांग्रेसी जलसे में दिन की शुरुआत गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर द्वारा रचित एक प्रार्थना से की गई. 'बंगाली' नामक अखबार में खबर आई कि दिन की शुरुआत गुरुदेव द्वारा रचित एक देशभक्ति के गीत से हुई. टैगोर का यह गाना संस्कृतनिष्ठ बंग-भाषा में था यह बात बॉम्बे क्रॉनिकल नामक अखबार में भी छपी.

शासक का गुणगान!
यही वह साल था जब अंग्रेज सम्राट जॉर्ज पंचम अपनी पत्नी के साथ भारत के दौरे पर आए हुए थे. तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग्स के कहने पर जॉर्ज पंचम ने बंगाल के विभाजन को निरस्त कर दिया था और उड़ीसा को एक अलग राज्य का दर्जा दे दिया था. इसके लिए कांग्रेस के जलसे में जॉर्ज की प्रशंसा भी की गई और उन्हें धन्यवाद भी दिया गया.

'जन गण मन' के बाद जॉर्ज पंचम की प्रशंसा में भी एक गाना गाया था. यह दूसरा गाना रामभुज चौधरी द्वारा रचा गया था, सम्राट के आगमन के लिए. यह हिंदी में था और इसे बच्चों ने गाया: बोल थे, ‘बादशाह हमारा’. कुछ अखबारों ने इसके बारे में भी खबर दी. शायद आप रामभुज के बारे में न जानते हों. उस वक्त भी लोग कम ही जानते थे. दूसरी ओर, टैगोर जाने-माने कवि और साहित्यकार थे. सो सत्ता-समर्थक अख़बारों ने खबर कुछ इस तरह दी कि जिससे लगा कि सम्राट की प्रशंसा में जो गीत गाया गया था वह टैगोर ने लिखा था. तबसे लेकर आज तक, यह विवाद चला आ रहा है कि कहीं गुरुदेव ने यह गाना अंग्रेज़ों की प्रशंसा में तो नहीं लिखा था?

टैगोर की सफ़ाई
इस गाने के बारे में इसके रचियता टैगोर ने 1912 में ही स्पष्ट कर दिया कि गाने में वर्णित भारत भाग्य विधाता के केवल दो ही मतलब हो सकते हैं: देश की जनता, या फिर सर्वशक्तिमान ऊपर वाला—चाहे उसे भगवान कहें, चाहे देव. टैगोर ने इसे खारिज़ करते हुए साल 1939 में एक पत्र लिखा, ''मैं उन लोगों को जवाब देना अपनी बेइज्जती समझूँगा जो मुझे इस मूर्खता के लायक समझते हैं.''

Image result for tagore

इस गाने की बड़ी खासियत यह थी कि यह उस वक़्त व्याप्त आक्रामक राष्ट्रवादिता से परे था. इसमें राष्ट्र के नाम पर दूसरों को मारने-काटने की बातें नहीं थीं. गुरुदेव ने इसी दौरान एक छोटी सी पुस्तक भी प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक था ‘नेशनलिज़्म’. यहाँ उन्होंने अपने गीत 'जन गण मन अधिनायक जय हे' की तर्ज पर यह समझाया कि सच्चा राष्ट्रवादी वही हो सकता है तो दूसरों के प्रति आक्रामक न हो. आने वाले सालों में 'जन गण मन अधिनायक जय हे' ने एक भजन का रूप ले लिया. कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशनों की शुरुआत इसी गाने से की जाने लगी. 1917 में टैगोर ने इसे धुन में बंधा. धुन इतनी प्यारी और आसान थी कि जल्द ही लोगों के मानस पर छा गई.

10 जुलाई 2015

नेहरू-नफरत के पीछे दिमाग की सड़न

Image result for apoorvanand
अपूर्वानंद
3 जुलाई 2015, आउटलुक   

[नेहरूजी पर ताजा हमले का बहुत ही माकूल जवाब अपूर्वानंदजी ने आउटलुक में प्रकाशित इस लेख में दिया है। किसी कांग्रेस प्रवक्ता को उधृत करते हुए उन्होंने लिखा है कि "मुसलमान कहे जाने पर अपने जीवनकाल में जब नेहरू न चिढ़े तो अब हम क्यों चिढ जाएं? लेकिन उस दिमाग की सड़न को ज़रूर पहचान लें जो नेहरू को मुसलमान और वेश्या के संतान कह कर उनसे नफरत की दावत देता है:... यह इस मानिसकता को समझने की कुंजी है...]

“नेहरू की अनेक जीवनियां मौजूद हैं जो गहन शोध के बाद लिखी गई हैं। लेकिन उनके अलावा जनश्रुतियाँ भी हैं। उनकी जो तस्वीर जनमानस में नक्श है, वह अधिकतर अफवाहों से बनाई गई है। आप साधारण जन से बात करें तो उनकी छवि एक आरामतलब,ऐय्याश,धोखेबाज,भाई-भतीजावादी नेता और कमजोर प्रशासक की ही उभरती है। ”

नेहरू एक बार फिर चर्चा में हैं। विकीपीडिया में उनके पृष्ठ के साथ छेड़छाड़ की गई है। विकीपीडिया में इसकी छूट है कि कोई भी चाहे तो किसी सामग्री में कुछ जोड़-घटा सकता है। इस वजह से उसे अकादमिक जगत में विश्वसनीय नहीं माना जाता, फिर भी पढ़े-लिखे लोग कई बार आरंभिक जानकारियों के लिए विकीपीडिया का सहारा लेते हैं। यानी,यह जानकारी का एक लोकप्रिय स्रोत बन गया है। विकीपीडिया में कई विषयों के संपादक भी हैं और वे पृष्ठों पर नज़र रखते हैं तथा भरसक हर नई तब्दीली की छानफटक करते रहते हैं।

नेहरूजी के खिलाफ सांप्रदायिक दुष्प्रचार की एक बानगी 
जवाहरलाल नेहरू वाले पृष्ठ के साथ की गई यह छेड़खानी इसलिए गंभीर मानी जा रही है कि यह जिस कंप्यूटर से की गई उसका पता एक सरकारी विभाग का बताया जा रहा है। नेहरू हिंदू नहीं थे, उनके पूर्वज मुसलमान थे और अंग्रेजों से बचने के लिए हिंदू नाम रख लिया था आदि, जैसी जानकारी इस छेड़छाड़ के जरिये उपलब्ध कराई गई थी। सवाल है, क्या यह काम किसी सरकारी कर्मचारी ने किया या उसके कंप्यूटर का उपयोग किसी और ने किया? यह भी इत्तफाक है कि यह घटना उस वक्त हुई जब गाजे बाजे के साथ ‘डिजिटल सप्ताह’ का श्रीगणेश हो रहा था और कहा जा रहा था कि साइबर-सुरक्षा के लिए हमें सन्नद्ध होना चाहिए। सरकारी महकमे ही जब असुरक्षित हों तो बाकी जगह के लिए क्या उम्मीद!

कांग्रेस पार्टी ने इस पर उचित ही रोष व्यक्त किया है लेकिन अन्य राजनीतिक दलों और अकादमिक दुनिया के लोगों ने इस घटना को इस लायक नहीं माना कि प्रतिक्रिया जाहिर की जाए, मानो,नेहरू कांग्रेस पार्टी की ही चीज़ हों। लेकिन जनस्मृति में नेहरू की छवि को विकृत करने का यह कोई पहला प्रयास नहीं।

नेहरू की अनेक जीवनियां मौजूद हैं जो गहन शोध के बाद लिखी गई हैं। लेकिन उनके अलावा जनश्रुतियाँ भी हैं। उनकी जो तस्वीर जनमानस में नक्श है, वह अधिकतर अफवाहों से बनाई गई है। आप साधारण जन से बात करें तो उनकी छवि एक आरामतलब,ऐय्याश,धोखेबाज,भाई-भतीजावादी नेता और कमजोर प्रशासक की ही उभरती है। वह ऐसा इंसान है जिसने गांधी को मोह लिया और ‘सच्चे’ गांधीवादियों’ के कंधे पर पांव रखकर प्रधानमंत्री बन गया। इस अफवाहबाजी के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अनौपचारिक प्रचार तंत्र तो है ही, लोहियावादी समाजवादी और गांधीवादियों का भी हाथ है।

नेहरू के कपड़े पेरिस से धुल कर आते थे, यह सुनते हुए हम सब बड़े हुए। लेकिन यह तो उनके जीवनकाल में ही बहुप्रचारित था। लोहिया ने प्रधानमंत्री नेहरू की एक कप चाय के खर्चे को लेकर जो हंगामा किया था उसने नेहरू को एक शाहखर्च के रूप में बदनाम करने में खासी भूमिका निभाई। इसकी फुर्सत शायद ही किसी को हो कि प्रधानमंत्री नेहरू के दस्तावेजों को पढ़े, जिससे यह मालूम हो कि वह बार-बार संबंधित विभाग को यह कह रहे थे कि उनका बिजली का खर्च कम होना चाहिए और तीन मूर्ति भवन में उनके रहने की जगह विस्तृत होने की कोई आवश्यकता नहीं। उनके पास ढेरों कपडे नहीं थे और उन्हें अपने फटे मोज़े खुद सिलते हुए लोगों ने प्रधानमंत्री निवास में ही देखा है। नेहरू मूलतः सादगी पसंद व्यक्ति थे लेकिन वह शालीन सादगी थी। यह उन्होंने अपने प्रिय गुरु गांधी से ही सीखा होगा जिनकी भव्यता को उनकी आधी धोती ने उभारा है।

भारतीय राजनीतिक और सामाजिक जीवन में एक नेहरू-ग्रंथि शुरू से काम कर रही है। एक तरह की ईर्ष्या अनेक कारणों से अलग-अलग तबकों में नेहरू के प्रति पाई जाती है। बंगाली अवचेतन सुभाषचंद्र बोस को वाजिब हक से महरूम कर देने के लिए उन्हें जवाबदेह मानता है। यह लगभग मान ही लिया गया कि गांधी को लुभाकर उन्होंने पटेल का पावना यानी प्रधानमंत्री की कुर्सी हथिया ली। कायस्थों की समझ है कि अगर वह न होते तो राजेंद्र प्रसाद या जय प्रकाश नारायण प्रधान मंत्री हुए होते। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को भी गांधी का उत्तराधिकारी मानेवालों की संख्या कम नहीं है।

जिन्ना को अगर वह प्रधानमंत्री बन जाने देते तो देश का बंटवारा न होता, यह तो ऐसा सहज बोध है जिसे आप काट नहीं सकते, चाहे इसके लिए कितने ही ऐतिहासिक दस्तावेज क्यों न जुटा लें। गांधीवादी भी कभी गांधी को क्षमा न कर पाए कि उन्होंने राजेंद्र प्रसाद, पटेल, राजगोपालाचारी जैसे पक्के गांधीवादियों के रहते एक अपेक्षाकृत कम गांधीवादी को अपना उत्तराधिकारी चुन लिया।

मेरे पिता ने मुझे एक दिलचस्प किस्सा सुनाया: 1961 में लोहिया एक जनसभा को संबोधित करने आसनसोल के करीब एक छोटे कस्बे, बराकर गए। वहां शाम को अनौपचारिक गोष्ठी में उन्होंने शिकायत के अंदाज में कहा कि गांधी ने वर्णवादी होने के कारण ब्राह्मण नेहरू को अपना उत्तराधिकारी चुना। लोहिया का ख्याल था कि उनकी ‘हेठी’ जाति के कारण प्रधानमंत्रीत्त्व की उनकी प्रतिभा को नज़रअंदाज कर दिया गया। हिन्दीवादियों का ख्याल है कि नेहरू न होते तो भारत में हिंदी का राज होता। बराकर वाली इस गोष्ठी में ही जब लोहिया से पूछा गया कि अगर वह प्रधानमंत्री होते तो क्या करते तो उन्होंने उत्तर दिया: भारतमाता को उसकी जुबान दिला देता, यानी हिंदी!

नेहरू से परेशानी की वजहें कई थीं। 1950 के दशक के मध्य में महाराष्ट्र के सतारा में शिवाजी की प्रतिमा के अनावरण के लिए नेहरू को आमंत्रित किया गया। इसपर भारी विरोध होने लगा जिसमें मराठी बुद्धिजीवी भी शामिल थे। उनका कहना था कि नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘भारत की खोज’ में शिवाजी की विकृत छवि प्रस्तुत की है, इसलिए उन्हें शिवाजी की प्रतिमा के अनावरण का अधिकार नहीं है। और तो और नेहरू को विरोध पत्र लिखने वालों में कम्युनिस्ट श्रीपाद अमृत डांगे भी थे। नेहरू ने स्पष्ट किया कि वह किताब उन्होंने जेल में रहते हुए सीमित स्रोतों के आधार पर लिखी थी और बाद के संस्करणों में संशोधन कर लिया गया है लेकिन विरोध कम न हुआ। नेहरू ने आखिरकार अपना कार्यक्रम स्थगित कर दिया। लेकिन उसका कारण नैतिक था: उन्होंने कहा कि चूंकि आम चुनाव करीब हैं, मैं नहीं चाहता कि यह मूर्ति अनावरण एक विशेष सामाजिक तबके को आकर्षित करने के प्रयास के रूप में देखा जाए।

नेहरू से सबसे बड़ी नाराजगी भारत को हिन्दू राष्ट्र न बनने देने के  कारण राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और प्रायः हिन्दुओं की रही है। अगर नेहरू न होते तो मुसलमानों को पूरी तरह भगाया जा सकता था, यह ख्याल अब तक भीतर-भीतर घूम रहा है। गांधी को तो फौरन रास्ते से हटा दिया गया लेकिन असली कांटा नेहरू रह ही गया। पटेल और राजेन्द्र प्रसाद जैसे नेता एक हिन्दू राष्ट्र भारत का स्वागत ही करते, ऐसा विचार भी अनेक लोगों का है। नेहरू को ही मारना उचित था, अवचेतन में बसी यह इच्छा अनुकूल अवसर मिलते ही पिछले साल शासक दल के एक नेता के मुंह से व्यक्त हो ही गई थी।

उन्नीस सौ सत्तावन के लोक सभा चुनाव के पहले पूरी दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनीतिक शाखा जनसंघ ने पोस्टर लगवाए जिनमें नेहरू हाथ में तलवार लिए गायों को बूचड़ खाने की ओर हाँकते दिखाए गए। नेहरू ने ब्लिट्ज के सम्पादक आर.के.करंजिया को दिए गए इंटरव्यू में इसका जिक्र किया और कहा और मुझे आधा मुसलमान और आधा क्रिस्तान कहा जाता है।

सारे दुष्प्रचार के बावजूद भारतीय जनमन से नेहरू को अपदस्थ करने में उनके जीवनकाल में उनके विरोधी सफल न हुए।  लेकिन नेहरू से एक चिढ़ खासकर भारतीय शिक्षित वर्ग को थी। नेहरू उन्हें चुनौती देते मालूम पड़ते थे: क्या तुम आधुनिक शिक्षा के बल पर एक कॉस्मोपॉलिटन इंसान बन सकते हो, जाति, धर्म,राष्ट्र की संकीर्णताओं से ऊपर उठते हुए? क्या तुम सोचने का नया तरीका अपना सकते हो जो हर चीज़ पर शक करता हो और आस्थावादी न हो? इस चुनौती के कारण नेहरू को नास्तिक, लामजहब,पाश्चात्यवादी, अभारतीय, आदि घोषित किया गया।

नेहरू के खिलाफ जो ‘नया’ प्रचार है, उस पर ध्यान दें तो उसके पीछे की मानसिकता का पता लगता है: नेहरू दरअसल मुसलमान वंश के थे। उनका जन्म वेश्याओं के मोहल्ले में हुआ था। घृणा जितनी नेहरू के प्रति है, उतनी ही मुसलमानों के प्रति और वेश्याओं के प्रति। यह कैसा दिमाग है जो मुसलमान और वेश्या होने को बड़ा अपराध मानता है, जो उन्हें घृणित मानता है? इसलिए कांग्रेस प्रवक्ता का यह वक्तव्य ठीक था कि आपत्ति नेहरू को मुसलमान कहे जाने पर नहीं है। मुसलमान कहे जाने पर अपने जीवनकाल में जब नेहरू न चिढ़े तो अब हम क्यों चिढ जाएं? लेकिन उस दिमाग की सड़न को ज़रूर पहचान लें जो नेहरू को मुसलमान और वेश्या के संतान कह कर उनसे नफरत की दावत देता है। 

8 जुलाई 2015

आईसीएचआर पैनलः रोमिला थापर, इरफान हबीब आदि गए, ‘चीन्हो तो जानें’ आए

[इतिहास के खिलाफ दुष्प्रचार के लिए जरूरी है सबसे पहले इतिहास लेखन के लिए संस्थाओं को संघ के कब्जे में लाया जाए भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् मोदी सरकार का बड़ा निशाना है इसकी शुरुआत जुलाई 2014 में संघ के कैडर रहे प्रो० वाई सुदर्शन राव को परिषद् का अध्यक्ष बनाकर की गई थी हालिया हमला परिषद् के पुनर्गठन के समय किया जा रहा है सवाल यह नहीं है कि मोदी सरकार यह नियुक्तियाँ क्यों कर रही है सवाल यह है कि जो नियुक्त किये जा रहे हैं उनका इतिहासलेखन में योगदान क्या है?]

पवित्रा एस. रंगन
आउटलुक, 4 जुलाई, 2015  

“जैसे चीजें चल रही हैं, भारतीय अनुसंधान परिषद का नाम जल्द ही भारतीय इतिहास गोलमाल परिषद कर देना चाहिए। उदाहरण के तौर पर सबसे पहले पहचान की एक गड़बड़ी को लें। भारत के गजट में अधिसूचित किया गया कि किन्हीं वी.वी हरिदास को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का नया सदस्य नियुक्त किया गया है जो ‘कालीकट में इतिहास के प्रोफेसर’ हैं। जब इन हरिदास महाशय ने हिचकते हुए आईसीएचआर फोन करके कहा कि वह इससे बहुत सम्मानित महसूस कर रहे हैं, तब पता चला कि यह वह हरिदास नहीं हैं जिनकी अनुशंसा मंत्रालय ने की थी। इतिहास में पीएचडी वी.वी हरिदास मंगलूर विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं। लेकिन यह तो कोई दूसरे पी.टी हरिदास थे जिन्हें परिषद के लिए मनोनीत किया गया था हालांकि वह पी.एच.डी नहीं थे। ”


बाद में आईसीएचआर वेबसाइट पर उनका नाम तो सही आ गया लेकिन उन्हें सिर्फ ‘सदस्य’ लिखा गया। सोचिए, इस सूची में ‘इरफान हबीब, सदस्य’ लिखा गया होता तो किसी को कोई संदेह नहीं होता। लेकिन पी.टी. हरिदास को तो कोई जानता ही नहीं था और मीडिया में अनुमान लगाया जाने लगा कि वह कौन थे। ‘वह दरअसल भाजपा परिवार के अंग हैं,’ परिषद के एक विदा प्राप्त सदस्य चहकते हुए बताते हैं। अंततः आईसीएचआर ने अपनी सूची ताजा की और पता चला कि पी.टी. हरिदास वाकई कालीकट के एक कॉलेज में इतिहास के पूर्व विभागाध्यक्ष थे। लेकिन उनका पी.एच.डी. न होना थोड़ा चुभने वाला तथ्य था– और थोड़ी बहुत चर्चा यह भी हुई कि उनके बदले उनकी पत्नी श्रीमती हरिदास को परिषद का सदस्य बना दिया जाए जो पी.एच.डी. थीं। बहरहाल, आईसीएचआर की ताजातरीन सूची में दर्ज 18 नए सदस्यों की वजह से स‌िंधु नदी सुलगी नहीं है।

भारतीय इतिहास की शानदार शख्सियत और जवाहर लाल नेहरू विश्व‌विद्यालय में मानद प्रोफेसर रोमिला थापर इस सूची के बारे में कहती हैं, ‘मैं इन लोगों में से किसी के कामकाज के बारे में नहीं जानती। शायद मैं अज्ञानी हूं। दिलीप चक्रवर्ती को छोड़कर मैंने इनमें से किसी की कोई पुस्तक नहीं पढ़ी है।’ जुलाई 2014 में मानव संसाधन मंत्रालय ने प्रोफेसर वाई. सुदर्शन राव को आईसीएचआर का अध्यक्ष नियुक्त किया था। वह इंटरनेट के भगवा मिशनरी हैं। उनके विचार जाति व्यवस्‍था के बारे में अलबेले हैं। उनकी नियुक्ति पर तब बहुत चिंता व्यक्त की गई थी। लेकिन परिषद सदस्यों के उनके चयन ने आईसीएचआर के सचिवालय स्टाफ को भी हतप्रभ कर दिया है। कुछ सदस्यों के पास तो इतिहास में कोई डिग्री भी नही हैं। एम.डी. श्रीनिवास चेन्नई स्थित सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी हैं, पूरबी रॉय अंतरराष्ट्रीय संबंधों में प्रोफेसर हैं, मिशेल दानिनो के पास फ्रांस की इंजीनियरिंग डिग्री है जहां उनकी पैदाइश हुई थी।

Displaying The Murder of History by K K Aziz.jpg

सितंबर में पुरानी परिषद की अवधि समाप्त हो रही है इसलिए सदस्य सचिव गोपीनाथ रवींद्रन ने 18 इतिहासकारों की सूची राव के पास भेजी थी। लेकिन इनमें से कोई परिषद तक नहीं पहुंच पाया। इसके बदले नामों की यह बिल्कुल नई सूची मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने चयनित की। इस सूची में कई लोगों का नाम तो पहले किसी ने सुना ही नहीं था।

इंडियन हिस्टॉरिकल रिव्यू उन कुछ जर्नल्स में है जिन्हें प्रतिष्ठित थॉमसन रॉयटर्स सूची में स्‍थान मिला है। इंडियन हिस्टॉरिकल रिव्यू को इस उखाड़पछाड़ का नतीजा भुगतना पड़ रहा है। नई आईसीएचआर टीम के पांच लोगों को इस जर्नल के संपादकीय बोर्ड का सदस्य बनाया गया है, और बाकी 13 को उसकी सलाहकार कमेटी में डाला गया है। जबकि पिछली 24 सदस्यीय कमेटी में रोमीला थापर, मुशीरुल हसन और इरफान हबीब जैसे प्रख्यात इतिहासकार तथा देश-विदेश के विश्वविद्यालयों के कम से कम 10 प्रतिष्ठित विद्वान शामिल थे। उद्देश्य यह ‌था कि कठोर विद्वत-समीक्षा के जरिये सदस्य ‌इतिहास के विभिन्न विषयों पर जर्नल में लिखने के लिए उभरते हुए प्रतिभाशाली इतिहासकारों का चयन कर सकें। लेकिन अब, पूर्व परिषद सदस्य और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर वी.पी. साहू के अनुसार, ‘रिव्यू परिषद की महज अंदरूनी पत्रिका बनकर रह गया है।’

कमेटी के 13 सदस्यों में सिर्फ 4 नाम परिचित हैं। एपीग्राफिस्ट, सच्चिदानंद सहाय अंकोरवाट मंदिर के पुनरुद्धार के लिए जाने जाते हैं। लेकिन अन्य तीन को तो उनसे संबंधित विवादों के लिए ज्यादा जाना जाता रहा है। एनडीए-1 के शासन काल में मीनाक्षी जैन अपनी विवादास्पद एनसीईआरटी पाठ‍्यपुस्तक के लिए चर्चा में आई थीं जिसे रोमिला थापर की पुस्तक की जगह प्रकाशित किया गया था। मिशेल दानिनो ने भारतीय आर्यों के आव्रजन सिद्धांत के खिलाफ और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मनोनुकूल लेखन किया है। उन्होंने सरस्वती नदी पर भी ‌पुस्तक लिखी है और वेदों के पुनः तिथि निर्धारण के पक्ष में हैं। पूरबी रॉय नेताजी सुभाषचंद्र बोस पर अपनी विवादास्पद पुस्तक के‌लिए चर्चित हैं। अधिकतर अन्य सदस्य, यदि इतिहास के प्रोफेसर हुए भी तो, आरएसएस के विभिन्न आनुषंगिक संगठनों, जैसे तिरुअनंतपुरम स्थित भारतीय विचार केंद्रम, के सदस्य हैं। नारायण राव और ईश्वरशरण विश्वकर्मा संघ स‌मर्थित अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के पदाधिकारी हैं।

राव की अध्यक्षता ने कई त्यागपत्र प्रेरित किए। त्यागपत्र देने वालों में रवींद्रन भी हैं। वह एक मात्र सदस्य हैं जिन्हें सरकार ने मनोनीत नहीं किया था। राव के साथ 8 महीने काम कर चुके पूर्व परिषद सदस्यों के अनुसार उनके सभी निर्णय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को खुश करने वाले और संघ सिद्धांतकारों के कृपाकांक्षी होते हैं। नियुक्तियों के अलावा मंत्रालय चेयरमैन राव की तत्पर सहायता से कई सिलसिलेवार परिवर्तन कर रही है ताकि सरकार ‘इतिहास गढ़ने’ के लिए परिषद पर पूर्ण नियंत्रण रख सके। इसके लिए अनुसंधान और वित्तीय सहायता के नियम भी बदले जा रहे हैं।

3 जुलाई 2015

Mahatma and Manuben

Uday Mahurkar  
June 7, 2013, India Today

Mahatma & Manuben: Newly discovered diaries of Gandhi's personal attendant reveal how his experiments with celibacy changed her life.
Image result for gandhi and manuben relation

Mahatma Gandhi with Manuben (Right) and AbhaMahatma Gandhi with Manuben (Right) and Abha
She is one of the most recognised faces in Indian history, always by Mahatma Gandhi's side as his "walking stick" in his last two years. Yet, she remains a mystery. Just 17 when she rejoined the Mahatma as one of his personal assistants in 1946, she was the great man's constant companion till his assassination. Yet, Mridula Gandhi, or Manuben as she is widely known, died a lonely spinster at the age of 40 in Delhi.

Manuben was portrayed by Supriya Pathak in Richard Attenborough's Gandhi (1982). More than four decades after her death, India Today has got access to 10 of her diaries, written in Gujarati and running into 2,000 pages. Studied in detail by Gujarati academic Rizwan Kadri, the diaries, which begin from April 11, 1943, reveal the psychological impact of Gandhi's experiment with his sexuality on Manuben. They also throw light on the jealousy and anger rife at the heart of Gandhi's entourage, many of them young women. The diaries begin when Manuben, a grandniece of Gandhi, came to Aga Khan Palace in Pune to look after Gandhi's wife Kasturba during the couple's internment starting from 1942 following the Quit India movement. Manuben nursed Kasturba in her final months of illness. The diary entries end 22 days after January 30, 1948, the day Nathuram Godse pushed aside Manuben to fire three shots at Gandhi from a 9mm Beretta.

The diaries, in which Gandhi often signed on the margins, reveal a girl devoted to him. In an entry on December 28, 1946, at Srirampur, Bihar, nine days after joining the then 77-year-old Gandhi who was on a walk through of troubled villages after massacres in Noakhali in then East Bengal, she writes: "Bapu is a mother to me. He is initiating me to a higher human plane through the Brahmacharya experiments, part of his Mahayagna of character-building. Any loose talk about the experiment is most condemnable." Pyarelal, Gandhi's secretary, endorsed this view in Mahatma Gandhi: The Last Phase, "He did for her everything that a mother usually does for her daughter. He supervised her education, her food, dress, rest, and sleep. For closer supervision and guidance, he made her sleep in the same bed with him. Now a girl, if her mind is innocent, never feels embarrassment in sleeping with her mother." She, in turn, was his primary personal attendant-massaging and bathing him as well as cooking for him.

Image result for gandhi and manuben relation
"While the flames on the funeral pyre were consuming Bapu's body, I felt like sitting till well after the funeral was over...Bapu was there two days ago, yesterday at least his body was there and today I am all alone. I am totally distraught."
- Manuben

The diaries go into the details of the lives of Gandhi's women associates like Dr Sushila Nayar, his personal physician and Pyarelal's sister, and who later became Union health minister, as well as his Rajput-Muslim follower Bibi Amtussalam. They also indicate the intense jealousy over who would be part of the Mahatma's experiments with celibacy. Manuben's diary entry dated February 24, 1947, at Haimchar, Bihar, states: "Today Bapu wrote a strong letter to Amtussalamben saying that the element of regret that his celibacy experiment didn't start with her was apparent in her letter to him."

The diaries, which found their way to the National Archives in Delhi in 2010, also show Pyarelal, despite being 47 years old, making repeated overtures to Manuben with Sushila Nayar pushing the case. Manuben finally makes a telling entry on February 2, 1947, at Dashdharia, Bihar: "I see Pyarelalji as my elder brother and nothing else. The day I decide to marry my guru, my elder brother or my grandfather, I shall marry him. Don't force me on this any further."

Manuben's jottings also give an insight into the growing disquiet among Gandhi's followers over his celibacy tests. In a diary entry of January 31, 1947, when she was at Navgram, Bihar, Manuben refers to a letter to Gandhi from his close follower Kishorelal Mashruwala where he calls her "Maya" (an illusion or a temptress) and asks the Mahatma to free himself off her clutches. To this, Gandhi replies: "You do whatever you want but I am firm in my belief regarding this experiment." Even as Manuben and Gandhi walked through Noakhali in Bengal, two of his entourage- R.P. Parasuram, who had acted as his secretary, and Nirmal Kumar Bose, also his secretary and later director of Anthropological Society of India-left in anger over Gandhi's behaviour. Sardar Vallabhbhai Patel, in a letter to Gandhi on January 25, 1947, currently among the Patel papers housed in the National Archives, asked him to suspend the experiment which Patel called a "terrible blunder" on Gandhi's part that pained his followers "beyond measure".

The deep imprint the Mahatma left on Manuben's psyche is best reflected in a letter to Jawaharlal Nehru from Morarji Desai on August 19, 1955, soon after he called on Manuben in August at the Bombay Hospital where she had been admitted for an "unknown" ailment. Desai writes: "Manu's problem is more psychological than physiological. She appears to have despaired for life and developed allergy to all kinds of medicines."

Manuben was one of two persons by the Mahatma's side when he was shot by Nathuram Godse at 5.17 p.m. on January 30, 1948, at Birla House in Delhi, the other being Abhaben Gandhi, wife of his nephew Kanu Gandhi. Manuben writes the next day: "While the flames on the funeral pyre were consuming Bapu's body, I felt like sitting till well after the funeral was over. Sardar Patel comforted me and took me to his home. It was just unimaginable for me. Bapu was there two days ago, yesterday at least his body was there and today I am all alone. I am totally distraught." The next and last entry in the diary is on February 21, 1948, when she left for Mahuva near Bhavnagar from Delhi by train. It says: "Today I left Delhi." In Last Glimpses of Bapu, one of five books Manuben wrote after Gandhi's death, she notes: "Kaka (Gandhi's youngest son Devdas) warned me not to disclose the contents of my diary to anyone and at the same time forbade me to divulge the contents of the important letters… He said, 'You are very young but you possess a lot of valuable literature. And you are also unsophisticated.'"

Even in her 68-page memoir, Bapu: My Mother, Manuben never revealed her feelings about Gandhi's experiments with his sexuality in which she was a part. In one of the 15 chapters, she writes that soon after the death of Kasturba, which happened within 10 months of her moving to Pune, she received a very moving note from Bapu as he was in maunvrat (vow of silence) and could communicate only by writing. Gandhi advised her in that note to go to Rajkot and resume her studies. "From that day Bapu became my mother," Manuben writes in the chapter. The teenaged Manuben, who had studied till Class V in Karachi where her father, Gandhi's nephew Jaisukhlal, worked in the Scindia Steam Navigation Company, also needed a mother-like anchor since she had just lost her mother when she came to Pune.

Manuben's final years were spent by herself. She lived in Mahuva near Bhavnagar in Gujarat for almost 21 years after Gandhi's assassination. She ran a children's school besides floating Bhagini Samaj, which espoused women's issues. Among those who were associated with Manuben during this last phase of her life is Bhanuben Lahiri, from a family of freedom fighters. She was one of the 22 women members of the Samaj. Lahiri recalls the profound impact Gandhi left on his grandniece. Once, she says, when Manuben took a chunari (a scarf-like piece of cloth) from her for the marriage of one of her poor followers, she said: "I see myself as Mirabai (the great medieval saint who worshipped Lord Krishna) who lived only for her Shyamlo (Krishna)."

Commenting on the diaries, psychoanalyst and scholar Sudhir Kakar writes: "So focused was the Mahatma on his own feelings during these experiments that I believe he may have 'chosen' to overlook their consequences for the women involved. Except for the flaring up of violent jealousy between the various women, we do not know the psychological effects, if any, that these experiments left on each of the women."

Now, thanks to the recovery of Manuben's diaries, we can assess the psychological impact the Mahatma had on his intimate companion.


Here's a look at excerpts from Manuben's diaries.
February 25, 1947, Haimchar, Bihar
Bapu told Bapa (Amritlal Thakkar was popularly called Thakkar Bapa) that Brahmacharya is one of the five commandments of religion and he was trying to pass that test. He said this was his yagna for atmashuddhi (self-purification) and he can't suspend it because of the public opinion against it. Then Bapa told him that his definition of Brahmacharya was quite different from that of the common man and asked what would happen if the Muslim League comes to know about it and uses it to make innuendos. Bapu replied saying he won't leave what he saw as his religion because of a certain fear and that he had told Birla (G.D. Birla, industrialist) that if his mind is impure during the experiment and he was being hypocritical, then he would die a miserable death. Bapu also told Bapa that even if Vallabhbhai (Patel) or Kishorebhai (Mashruwala) leave him, he will continue the experiment.

March 2, 1947, Haimchar, Bihar
Today Bapu received a secret letter from Bapa. He gave it to me for reading. The letter was so moving that I requested Bapu to allow me to sleep separately from today for the sake of satisfying Bapa. When I told Bapa about my decision, he said after talking to Bapu and me he was satisfied with the aim of the experiment but my decision to sleep separately and bring an end to the experiment was proper. Then Bapa wrote a letter to Kishorelal Mashruwala and Devdas Gandhi that the chapter had now ended.

स्वाधीनता आंदोलन की दीर्घकालिक रणनीति

लोगों की संघर्ष करने की क्षमता न केवल उन पर होने वाले शोषण और उस शोषण की उनकी समझ पर निर्भर करती है बल्कि उस रणनीति पर भी निर्भर करती है जिस...